तुलसी गौड़ा: मौन की महत्ता और जंगल की आत्मा

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– डॉ. प्रियंका सौरभ

आज जिस दुनिया में हर उपलब्धि को फ़्लैश लाइट, कैमरा और सोशल मीडिया की चमक से मापा जाता है, वहाँ एक वास्तविक नायक का जनम होना और जीवनभर जीना—यह किसी लोककथा से कम नहीं है। तुलसी गौड़ा—वह नाम जिसे धरती ने सींचा, जंगल ने अपनाया और हवा में हर पत्ती के स्वरूप में जीवन का संदेश छोड़ा। वे केवल एक पर्यावरण-सेवी नहीं थीं, बल्कि जंगल की आत्मा हैं—जिसे हम देखते नहीं, पर उसकी साँस महसूस करते हैं।

तुलसी गौड़ा का जन्म कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले के अंकला तालुक के होनाली गाँव में हुआ था, जो आज भी अपनी प्राकृतिक हरियाली के लिए जाना जाता है। वे हलाक्की आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखती थीं, एक समाज जो सदियों से प्रकृति के साथ अपने गहरे रिश्ते को अनुभव और परंपरा के रूप में संजोए हुए है। गरीबी, असमर्थता और सामाजिक सीमाओं के बीच उनका जीवन शुरुआत से ही कठिन रहा। उनके पिता का देहांत तब हो गया था जब वे केवल दो वर्ष की थीं, और उनकी माँ के साथ बचपन से ही उन्हें जंगल की गोद में ही मेहनत करनी पड़ी—किसी औपचारिक शिक्षा का अवसर प्राप्त नहीं हो सका और पाठ्यपुस्तकों का ज्ञान तो वे कभी सीख ही नहीं पाईं। यही अपरंपरिक पृष्ठभूमि उन्हें प्रकृति की अपार समझ और वनस्पतियों के विस्तृत ज्ञान की ओर ले गई। 

तुलसी गौड़ा ने जीवन भर जंगल के साथ संवाद किया—कठोर शब्दों में नहीं, बल्कि तमीज़, संवेदना और अनुभव की भाषा में। बचपन से ही जंगल को वह घर के रूप में समझती थीं, पेड़ों को परिवार के सदस्यों की भाँति मानती थीं और मिट्टी की खुशबू को अपनी साँस मानती थीं। उन्होंने लगभग 30,000 से अधिक पौधे स्वयं लगाए और उनकी देखभाल की, तथा कई वृक्षों और पौधों के विकास की ऐसी सूक्ष्म बातें जान लीं, जिन्हें पारंपरिक विज्ञान भी सहजता से व्यक्त नहीं कर पाता। इसी वजह से उन्हें पर्यावरण और वनस्पति के क्षेत्र में ‘Forest Encyclopedia’, यानी जंगल का विश्वकोश कहा गया। 

उनके जीवन में कर्तव्य कोई विकल्प नहीं था—बल्कि धर्म जैसा था। उन्होंने दशकों तक कर्नाटक के विभिन्न वन क्षेत्रों में पौधों की पोषण, जड़ों से पौधों के उद्धार, मिट्टी में जीववैज्ञानिक संतुलन, तथा पेड़ों को थमने और बढ़ने की विधियाँ अपने अनुभव से सीखी और सिखाईं। वे केवल पौधे नहीं लगाती थीं; वे जीवन के स्वरूप को पुनर्स्थापित करती थीं—हर एक पौधे में वह जीवन के कई रूप देखने में सक्षम थीं, इसलिए वन विभाग और स्थानीय समुदाय के लोग उन्हें ‘Vriksha Maata’ (पेड़ों की माता) के नाम से भी पुकारते थे। 

उनका यह ज्ञान केवल यांत्रिक वृक्षारोपण का परिणाम नहीं था। वह जंगल की भाषा, मिट्टी की गति, पत्तियों की गिरावट, बीज के अंकन और प्रकृति की अनंत जुड़ाव की भाषा को समझकर आया था। वे मां के दूध की तरह पेड़ों के पोषण को महसूस कर सकती थीं, न कि केवल तकनीक से पढ़ सकती थीं। यही उन सबका सबसे बड़ा योगदान था—उन्होंने हमें यह सिखाया कि प्रकृति को जीना किसी पढ़ाई की किताब से नहीं, बल्कि अनुभव की स्याही से सीखा जाता है।

उनका जीवन उसी भावार्थ में आगे बढ़ा—बिना गम के, बिना घोषणा के, बिना किसी शो-ऑफ की चाह के। वे जंगल विभाग की एक अस्थायी स्वयंसेवक के रूप में अपनी सेवाएँ देने लगीं, जहाँ उन्हें पौधों के नर्सरी का काम सौंपी गई। उनकी लगन, ज्ञान और समर्पण ने उन्हें इतने वर्षों बाद स्थायी पद तक पहुँचा दिया, जहाँ उन्होंने करीब पैनतीस वर्षों तक मजदूरी कार्मिक के रूप में काम किया और उसके बाद पन्द्रह वर्ष के लिए स्थायी कर्मचारी के रूप में वन संरक्षण और हरियाली संवर्धन में कार्य किया। उन्होंने वन विभाग के प्रोजेक्टों को स्थानीय वन्यजीव संरक्षण, आग नियंत्रण और पौधों की प्रजातियों के संरक्षण का एक जीवंत नेटवर्क बनाया। 

उनके समर्पण और अनुभव के लिए उन्हें कई सम्मान मिले। वर्ष 2021 में भारतीय सरकार ने उन्हें ‘पद्म श्री’ से सम्मानित किया, जो देश का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है, पर्यावरण संरक्षण और वृक्षारोपण में उनके अतुलनीय योगदान के लिए। यह सम्मान राष्ट्रपति के हाथों दिया गया, जिससे वर्षों तक शांतिपूर्वक चल रहे उनके काम को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली। इसके अलावा उन्हें इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्षमित्र पुरस्कार, कर्नाटक राज्योत्सव पुरस्कार और बाद में धरवाड़ कृषि विश्वविद्यालय द्वारा मानद डॉक्टरेट भी प्रदान किया गया—ये सभी सम्मान उनकी सेवा और ज्ञान की विश्वसनीयता को रेखांकित करते हैं। 

लेकिन तुलसी गौड़ा के लिए यह सभी पुरस्कार केवल गहरी सांसों के सहारे लगते थे। उन्होंने स्वयं कहा था कि वे जंगल और पेड़ों को ही अपना सबसे बड़ा सम्मान मानती हैं—उनके लिए हर नया अंकुर, हर हरियाली की पत्ती, धरती की हरी मुस्कान थी, जिसे पाना जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य था।

उनकी लोकप्रियता का एक बड़ा पहलू यह भी था कि वे स्वयं कभी किसी दिखावे में नहीं आईं। पद्म श्री पाने के अवसर पर भी वे पारंपरिक स्थानीय परिधान और नग्न पाँव (बेरूफूट) में मैदान में पहुँचीं, यह दिखाते हुए कि वास्तविक सेवा किसी औपचारिक कपड़े, मंच या कैमरे की रोशनी की मोहताज नहीं होती। 

तुलसी गौड़ा का जीवन केवल प्रकृति-सेवा की कहानी नहीं है; यह मानवता की धरती के साथ पुनः जुड़ने की अप्रतिम कथा है। उन्होंने वह किया, जो अक्सर हमारी सभ्यता भूल जाती है—धरती को संबंध, सम्मान और पति–पत्नी के समान गहरा बन्धन देना। आज के समय जब लोग पर्यावरण संरक्षण को केवल दिखावे, पोस्टिंग और प्रतिष्ठा के रूप में देखते हैं, उनका सिर्फ ठहरना ही एक जीवंत प्रश्न बन जाता है—क्या हम वास्तव में प्रकृति को समझते हैं या केवल उसके फोटो में स्वयं को महान दिखाते हैं?

तुलसी गौड़ा ने जवाब मौन में दिया। उन्होंने न केवल बीज लगाए, बल्कि संस्कार बोए, न केवल पौधे उगाए, बल्कि समझ उपजी, न केवल धरती को हरा किया, बल्कि देश को जागृत किया। जब वे अपने गृह गांव होनाली में अपने घर पर 16 दिसंबर 2024 को 86 वर्ष की आयु में शांतिपूर्वक चल बसें, तब एक युग का अंत नहीं, बल्कि एक जीवंत प्रेरणा का आरंभ हुआ—एक ऐसी प्रेरणा जो हम सभी के भीतर पर्यावरण के प्रति सम्मान की लौ को प्रज्वलित करने की क्षमता रखती है। 

आज जब विश्व जल-संकट, वायु प्रदूषण और वन विनाश की समस्याओं से घिरा है, तुलसी गौड़ा की याद हमें यह याद दिलाती है कि परिवर्तन केवल बड़े पहलुओं में नहीं, बल्कि व्यक्ति के प्रत्यक्ष, सकुशल और समर्पित कर्म में निहित है। उनके जीवन का संदेश यह है कि असली सेवा दिखावे से नहीं, चुपचाप, निरंतर और समर्पण-भर प्रयास से होती है।

उनकी कहानी यह भी दर्शाती है कि प्रकृति और मानव का संबंध केवल नया उद्यान लगाने का नहीं, बल्कि उसे समझने, जीने, बचाने और साझा करने का है। तुलसी गौड़ा ने वह सब किया जिसे हम सामाजिक उत्तरदायित्व कहकर भूल जाते हैं। वे केवल जंगल की विश्वकोश नहीं थीं—वे धरती की आत्मा थीं।

उनका जीवन हमें सिखाता है कि असली नायक वह नहीं जो कैमरे में चमकता है, बल्कि वह जो धरती में जीवन का प्रकाश बनाए रखता है। तुलसी गौड़ा को नमन—उनकी शांति, उनकी समझ और उनकी सेवा को याद रखकर ही हम एक स्थायी और हरित भविष्य की ओर कदम बढ़ा सकते हैं।

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

मुख्यमंत्री ने विश्व अल्पसंख्यक अधिकार दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में किया प्रतिभाग

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मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने गुरुवार को हिमालयन सांस्कृतिक केन्द्र, नींबूवाला, देहरादून में विश्व अल्पसंख्यक अधिकार दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में प्रतिभाग किया। इस दौरान मुख्यमंत्री ने अल्पसंख्यक समुदाय के मेधावी छात्रों को सम्मानित एवं विभिन्न स्टालों का अवलोकन किया।

बड़ी संख्या में आई मुस्लिम महिलाओं ने उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता लागू करने पर मुख्यमंत्री का आभार व्यक्त किया। महिलाओं ने कहा कि मुख्यमंत्री श्री धामी एक भाई के रूप में प्रदेश और अल्पसंख्यक समुदाय के लिए कार्य कर रहे हैं। इस दौरान मुख्यमंत्री ने कहा कि अल्पसंख्यक समुदाय के लिए सरकार द्वारा कई योजनाएं चलाई जा रही हैं।
उन्होंने कहा कि आज का दिन भारत की एकता और अखंडता के संरक्षण के लिए हमारे मौलिक कर्तव्यों को याद करने का अवसर है। भारतीय संस्कृति में सदियों से समानता और सभी धर्मों तथा समुदायों के प्रति सम्मान की परंपरा रही है। भारत में अनेकों संस्कृतियों, परंपराओं, भाषाओं और खान-पान की विविधता के बावजूद एकता की भावना रही हैं। उन्होंने कहा वसुधैव कुटुम्बकम के महान सिद्धांत को आत्मसात करते हुए भारत ने हमेशा समूची दुनिया को एक परिवार के रूप में माना है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि आज जन-धन योजना, उज्जवला योजना, पीएम आवास योजना, मुफ्त राशन योजना जैसी अनेकों योजनाओं के माध्यम से अल्पसंख्यक समुदाय के सभी लोगों को मुख्यधारा से जोड़ा जा रहा है। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में करतारपुर साहिब कॉरिडोर का निर्माण, लंगर से सभी प्रकार के करों को हटाना, जियो पारसी योजना, बौद्ध सर्किट का विकास, जैन अध्ययन केंद्र की स्थापना, हज यात्रा की प्रक्रिया को डिजिटल और पारदर्शी बनाने एवं तीन तलाक जैसी कुप्रथा का अंत जैसे निर्णय लिए गए हैं।

मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री जन विकास कार्यक्रम के माध्यम से अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में स्कूल, कॉलेज, छात्रावास, आईटीआई, स्वास्थ्य केंद्र और कौशल विकास संस्थान स्थापित किए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री ने कहा नए वक़्फ़ कानूनों में सुधार के माध्यम से वक़्फ़ संपत्तियों के पारदर्शी, उत्तरदायी की दिशा में भी ठोस कदम उठाए गए हैं, ताकि इन संपत्तियों का वास्तविक लाभ समाज के गरीब, जरूरतमंद और पिछड़े वर्गों तक पहुँच सके।

मुख्यमंत्री ने कहा कि अल्पसंख्यक क्षेत्रों में मांग के अनुरूप आर्थिक एवं शैक्षणिक विकास को गति देने के लिए अल्पसंख्यक विकास निधि की स्थापना भी की गई है। जिसके अंतर्गत प्रतिवर्ष 4 करोड़ रुपये की धनराशि उपलब्ध कराई जा रही है। मुख्यमंत्री हुनर योजना के माध्यम से अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को रोजगार से जोड़ा जा रहा है। अल्पसंख्यक स्वरोजगार योजना के अंतर्गत स्वरोजगार के लिए 25 प्रतिशत सब्सिडी के साथ 10 लाख रुपये तक का ऋण भी उपलब्ध कराया जा रहा है। मौलाना आज़ाद एजुकेशन ऋण योजना के अंतर्गत अल्पसंख्यक वर्ग के गरीब छात्र-छात्राओं को 5 लाख रुपये तक का ब्याजमुक्त शिक्षा ऋण भी उपलब्ध कराया जा रहा है। जिसके अंतर्गत पिछले 4 वर्षों में 169 लाभार्थियों को 4 करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि वितरित की गई है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार ने सभी धर्मों की स्वायत्तता की रक्षा सुनिश्चित करने के लिए राज्य में धर्मांतरण विरोधी कानून भी लागू किया है। ताकि किसी भी प्रकार के दबाव, प्रलोभन या छल से होने वाले धर्मांतरण को रोका जा सके और सामाजिक सौहार्द बना रहे। मुख्यमंत्री ने कहा विश्व के कई अन्य देशों में अल्पसंख्यक समुदायों को भेदभाव, उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। मुख्यमंत्री ने विश्व अल्पसंख्यक दिवस के अवसर पर सभी अल्पसंख्यको से आह्वान करते हुए कहा कि सभी सोशल मीडिया के माध्यम से उन देशों में हो रहे अत्याचार और भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाएं।

इस अवसर पर उत्तराखण्ड अल्पसंख्यक आयोग की उपाध्यक्ष श्रीमती फरजाना बेगम, पद्मश्री डॉ. आर.के जैन, श्री हेमकुंड साहिब ट्रस्ट अध्यक्ष श्री नरेंद्रजीत सिंह बिंद्रा, अध्यक्ष वक्फ बोर्ड श्री शादाब शम्स, एवं अन्य लोग मौजूद रहे।

निफ्ट ने विभिन्न श्रेणियों में वर्ष 2026-27 बैच की प्रवेश परीक्षा के लिए आवेदन शुल्क घटाया

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राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान (निफ्ट) ने फैशन डिजाइन, प्रबंधन और प्रौद्योगिकी के विभिन्न स्‍नातक और स्‍नातकोत्‍तर पाठ्यक्रमों के लिए वर्ष 2026-27 बैच के लिए प्रवेश परीक्षा की प्रक्रिया शुरू कर दी है। फॉर्म भरने की आखिरी तिथि जनवरी 2026 है (7 जनवरी से 10 जनवरी 2026 तक विलम्‍ब शुल्‍क के साथ) और परीक्षा की तिथि फरवरी 2026 है। सीबीटी और पेन-पेपर आधारित अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) द्वारा देश भर के 100 से अधिक शहरों में आयोजित की जाएगी।

वर्ष 2026-27 बैच के लिए, शुल्क 3,000 रुपये से घटाकर 2,000 रुपये कर दिया गया है, जो ओपन, ओबीसी (एनसीएल) के लिए है और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पीडब्ल्यूडी उम्मीदवारों के लिए शुल्क 1,500 रुपये से घटाकर 500 रुपये कर दिया गया था।

केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने शिक्षण और अध्‍ययन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग पर परामर्शी समिति की बैठक की अध्यक्षता की

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केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने आज नई दिल्ली में शिक्षण और अध्‍ययन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के उपयोग पर परामर्शी समिति की तीसरी बैठक की अध्यक्षता की। श्री प्रधान ने कहा कि एआई में शिक्षा के क्षेत्र में कुछ सबसे बड़ी चुनौतियों- विशेष रूप से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को अधिक समावेशी, सुलभ और न्यायसंगत बनाने की दिशा में- का समाधान करने की क्षमता है।

उन्होंने सदस्यों के बहुमूल्य सुझावों और विचारों की सराहना की और उन्हें धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि हम अध्‍ययन को विद्यार्थी-केंद्रित और व्यक्तिगत बनाने, अध्‍ययन परिणामों में सुधार करने, हमारे विविध विद्यार्थी समुदाय की विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ-साथ विद्यार्थियों और शिक्षकों को सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

उच्च शिक्षा में किए जा रहे उपायों पर एक विस्तृत प्रस्तुति भी दी गई, जिसमें शिक्षण-अध्‍ययन प्रक्रियाओं, अनुसंधान, नवोन्‍मेषण और रोजगार क्षमता को सुदृढ़ करने में एआई की रूपांतरकारी भूमिका पर बल दिया गया। चर्चा में केंद्र द्वारा वित्त पोषित संस्थानों में एआई-सक्षम पाठ्यक्रम अद्यतन, कौशल-आधारित और अंतःविषयक पाठ्यक्रमों का एकीकरण और उन्नत शिक्षा तथा अनुसंधान में सहायता करने के लिए डिजिटल और वास्‍तविक अवसंरचना के संवर्धन की रूपरेखा प्रस्तुत की गई। प्रस्तुति में रेखांकित किया गया कि इन उपायों का उद्देश्य भविष्य के लिए तैयार स्नातकों का निर्माण करना, उच्च शिक्षा संस्थानों के भीतर नवोन्‍मेषण इकोसिस्‍टम को बढ़ावा देना और यह सुनिश्चित करना है कि भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी और समावेशी बनी रहे।

शिक्षा एवं पूर्वोत्‍तर क्षेत्र विकास (डोनर) राज्य मंत्री सुकांत मजूमदार; कौशल विकास एवं उद्यमिता (स्वतंत्र प्रभार) एवं शिक्षा राज्य मंत्री जयंत चौधरी; समिति के सदस्य, विद्यालय शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के सचिव संजय कुमार; उच्च शिक्षा विभाग के सचिव डॉ. विनीत जोशी और मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी बैठक में उपस्थित थे।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने ‘काकोरी ट्रेन एक्शन’ के बलिदानियों को याद किया

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केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने स्वाधीनता संग्राम को ‘काकोरी ट्रेन एक्शन’ के माध्यम से नई ऊर्जा देकर ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिलाने वाले वाले पं. राम प्रसाद बिस्मिल जी, अशफाक उल्ला खां जी और रोशन सिंह जी के बलिदान दिवस पर उन्हें नमन किया।

X प्लेटफॉर्म पर एक पोस्ट में केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने कहा “स्वाधीनता संग्राम को ‘काकोरी ट्रेन एक्शन’ के माध्यम से नई ऊर्जा देकर ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिलाने वाले वाले पं. राम प्रसाद बिस्मिल जी, अशफाक उल्ला खां जी और रोशन सिंह जी के बलिदान दिवस पर उन्हें नमन करता हूँ। देश के संसाधनों और मेहनतकश देशवासियों के श्रम से बनी वस्तुओं पर यहाँ के लोगों का ही अधिकार हो सकता है, इस संकल्प को इन सेनानियों ने न केवल साकार किया, बल्कि क्रांतिकारियों के लिए साहस और पराक्रम की प्रेरणा भी बने। देश इन बलिदानियों को कभी भूल नहीं पाएगा।”

प्रधानमंत्री− गृहमंत्री ने गोवा मुक्ति दिवस पर स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानों को याद किया

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अमित शाह ने गोवा मुक्ति दिवस पर गोवा के लोगों को हार्दिक शुभकामनाएं दीं

प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने कहा है कि गोवा मुक्ति दिवस देश को भारत की राष्ट्रीय यात्रा के एक महत्वपूर्ण अध्याय की याद दिलाता है। प्रधानमंत्री ने अदम्य साहस और दृढ़ विश्वास के साथ आजादी के लिए संघर्ष करने वाले स्‍वतंत्रता सेनानियों की वीरता को याद किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि उनके बलिदान देश को गोवा के सर्वांगीण विकास के लिए प्रेरणा देते हैं।केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने गोवा मुक्ति दिवस पर गोवा के लोगों को हार्दिक शुभकामनाएं दीं।

एक्‍स पर अपनी एक पोस्‍ट में प्रधानमंत्री ने लिखा,

“गोवा मुक्ति दिवस हमें हमारी राष्ट्रीय यात्रा के एक महत्वपूर्ण अध्याय की याद दिलाता है। हम उन स्‍वतंत्रता सेनानियों के अदम्य साहस और दृढ़ विश्वास के साथ आजादी के लिए संघर्ष करने की उनकी वीरता को स्‍मरण करते हैं जिन्होंने कभी अन्याय को स्वीकार नहीं किया। उनके बलिदान हमें गोवा के सर्वांगीण विकास की दिशा में कार्य करने की प्रेरणा देते हैं।”

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने गोवा मुक्ति दिवस पर गोवा के लोगों को हार्दिक शुभकामनाएं दी हैं।

X प्लेटफॉर्म पर एक पोस्ट में केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने कहा कि गोवा मुक्ति दिवस पर गोवा के लोगों को हार्दिक शुभकामनाएं। उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी को शायद यह पता न हो कि 1961 तक भारतीयों को गोवा जाने के लिए परमिशन लेनी पड़ती थी। उन्होंने कहा कि प्रभाकर वैद्य, बाला राया मापारी, नानाजी देशमुख जी और जगन्नाथ राव जोशी जी जैसे कई महान लोगों ने इसके खिलाफ आवाज उठाई और गोवा की आज़ादी के लिए लड़ाई लड़ी। श्री शाह ने कहा कि हमारे देशभक्तों के महान बलिदानों के बाद गोवा भारत का एक अभिन्न अंग बना। मैं उन सभी महान आत्माओं के प्रति दिल से आभार व्यक्त करते हुए उन्हें नमन करता हूँ जिन्होंने गोवा की आज़ादी के लिए बहुत कष्ट सहे।

केंद्र ने मुंबई मरीना के लिए 887 करोड़ रुपये की योजना को मंजूरी दी

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योजना का उद्देश्य तटीय नौवहन और समुद्री पर्यटन को बढ़ावा देना है

फोटो कैप्शन: प्रस्तावित ‘विकसित भारत मुंबई मरीना’ का कलात्मक चित्रण, जिसे मुंबई पोर्ट अथॉरिटी द्वारा विश्वस्तरीय समुद्री पर्यटन अवसंरचना को बढ़ावा देने के लिए विकसित किया जा रहा है।

केंद्र सरकार ने मुंबई हार्बर में 887 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से एक विश्व स्तरीय मरीना विकसित करने की योजना को मंजूरी दी है, इस कदम से देश की वित्तीय राजधानी में तटीय नौवहन, समुद्री पर्यटन और वॉटरफ्रंट के नेतृत्व वाले शहरी विकास को महत्वपूर्ण बढ़ावा मिलने की आशा  है।

प्रस्तावित ‘विकसित भारत मुंबई मरीना’ को पोर्ट्स, शिपिंग और जलमार्ग मंत्रालय द्वारा मंजूरी मिल चुकी है, जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा वैश्विक मानक के पर्यटन स्थलों के निर्माण और भारत की समुद्री अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने के लिए व्यक्त किए गए दृष्टिकोण के अनुरूप है।

इस अवसर पर  केंद्रीय पत्तनपोत परिवहन और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने कहा, “‘विकसित भारत मुंबई मरीना’ की यह मंजूरी तटीय नौवहन और समुद्री पर्यटन को मजबूत करने के हमारे प्रयासों में एक महत्वपूर्ण कदम है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के दृष्टिकोण से निर्देशित, यह परियोजना विश्व स्तरीय बुनियादी ढांचे का निर्माण करेगी, सार्वजनिक उपयोग के लिए तट खोलेगी, निजी निवेश को प्रोत्साहन देगी और रोजगार के नए अवसर पैदा करेगी। यह भारत के व्यापक नीली अर्थव्यवस्था लक्ष्यों को आगे बढ़ाते हुए मुंबई को वैश्विक समुद्री पर्यटन केंद्र के रूप में स्थापित करने में मदद करेगा।

इस परियोजना को हाइब्रिड डेवलपमेंट मॉडल के माध्यम से लागू किया जाएगा, जिसके तहत मुंबई पोर्ट अथॉरिटी ईपीसी आधार पर कोर मरीना इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण के लिए लगभग 470 करोड़ रुपये का निवेश करेगी, जबकि एक निजी ऑपरेटर 417 करोड़ रुपये के अनुमानित निवेश के साथ तटवर्ती सुविधाओं का विकास करेगा। मंत्रालय ने बंदरगाह प्राधिकरण के निवेश को मंजूरी दे दी है, और निविदाएं जारी कर दी गई हैं, जिनकी बोलियां 29 दिसंबर, 2025 को बंद होगी ।

केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने कहा, “यह प्रोजेक्ट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के मुंबई को ग्लोबल मरीना डेस्टिनेशन बनाने के विज़न को दिखाता है। यह प्रोजेक्ट मैरीटाइम टूरिज्म को मज़बूत करेगा, प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को आकर्षित करेगा और इससे जुड़े सेक्टर्स में 2,000 से ज़्यादा नौकरियां पैदा करेगा, साथ ही कोस्टल और ब्लू इकॉनमी एक्टिविटीज़ में नए मौके खोलेगा।”

लगभग 12 हेक्टेयर जल क्षेत्र में योजनाबद्ध, मरीना में 30 मीटर तक की लंबाई की 424 नौकाओं को रखने की क्षमता होगी। समुद्री बुनियादी ढांचे में एक एप्रोच ट्रेस्टल, पाइल्ड ब्रेकवाटर, सर्विस प्लेटफॉर्म, पोंटून और गैंगवे शामिल होंगे जिन्हें सुरक्षित और कुशल नौका संचालन का समर्थन करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

निजी ऑपरेटर द्वारा विकसित की जाने वाली तटवर्ती सुविधाओं में एक मरीना टर्मिनल भवन, एक नमो भारत अंतर्राष्ट्रीय नौकायन स्कूल, एक समुद्री पर्यटन विकास केंद्र, होटल और क्लब हाउस सुविधाएं, एक कौशल विकास केंद्र और नौका स्टैकिंग और मरम्मत बुनियादी ढांचा शामिल होंगे।

यह प्रोजेक्ट मैरीटाइम इंडिया विजन (एमआईवी) 2030, मैरीटाइम अमृत काल विजन (एमएकेवी) 2047, सागरमाला कार्यक्रम  और क्रूज़ भारत मिशन जैसे मुख्य नेशनल फ्रेमवर्क के साथ-साथ मुंबई पोर्ट अथॉरिटी के पोर्ट मास्टर प्लान 2047 के साथ संरेखित  है।

यह मरीना 2,000 से अधिक रोजगार सृजित करने की उम्मीद है, जो मरीना संचालन, क्रूज़ सेवाएं, आतिथ्य और संबद्ध गतिविधियों में होंगे, जबकि तटीय अवसंरचना में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देगा। इसका उद्देश्य सार्वजनिक पहुँच को जलतट तक बेहतर बनाना और मुंबई को एक प्रमुख समुद्री पर्यटन और क्रूज़ यातायात केंद्र के रूप में मजबूती से स्थापित करना है।

गले की फांस बन गया नीतीश का हिजाब हटाना

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बाल मुकुन्द ओझा

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पिछले कुछ समय से अपने अजीबोगरीब व्यवहार के कारण सियासत की सुर्खिया बटोर रहे हैं। विभिन्न मौके पर उनके व्यवहार या असामान्य हरकतों की घटनाओं की वजह से उनकी आलोचना हो रही है। उनकी पार्टी और सहयोगी भाजपा चिंता में हैं। ऐसी ही एक हिजाब हटाने की घटना ने लोगों का ध्यान खिंचा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा पटना में एक कार्यक्रम के दौरान एक महिला डॉक्टर का नकाब हटाने को लेकर बवाल मच गया। इस घटना पर सोशल मीडिया से लेकर सार्वजनिक मंचों तक तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। इस दौरान पक्ष और विपक्ष में बयानों की झड़ी लग गई। एक वर्ग ने जहां इसकी निंदा की है वहीं दूसरे वर्ग का कहना है नीतीश ने एक अभिभावक के तौर पर ऐसा किया। उनकी नियत में कोई खोट नहीं थी। सांसद पप्पू यादव का कहना है कि हिजाब नहीं हटाया गया था। उन्होंने अपनी बेटी की तरह बात की। लड़की और पिता के बीच का रिश्ता नीतीश कुमार के रवैये में दिखा। हालांकि इस घटना के बाद महिला डॉक्टर ने एक बड़ा फैसला लिया है कि वह अब सरकारी सेवा में शामिल नहीं होंगी। नीतीश की भावना कुछ भी होगी मगर यह प्रकरण उनके गले की फांस बन गया लगता है। इसी बीच राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का एक पुराना वीडियो भी वायरल होने लगा है जिसमें वे एक महिला का घूंघट उठाते नज़र आ रहे है। इसके साथ ही एक बार फिर देशभर में हिजाब और घूँघट को लेकर सियासत गर्म हो चुकी है।

घूंघट, नकाब या हिजाब इज्जत और शर्म का प्रतीक है या गुलामी का इस पर देशव्यापी बहस शुरू हो गई है। दुनियां के देशों में हिजाब, नकाब या बुर्के को लेकर अलग अलग मान्यता है। कुछ देशों में इसका कड़ाई से पालन किया जाता है तो बहुत से देशों में इस पर प्रतिबन्ध भी लगा है। भारत में शैक्षिक क्रांति के बाद महिलाएं घूंघट से बाहर निकली मगर उत्तर भारत में आज भी घूंघट का बोलबाला है। हमारे प्राचीन वेद एवं धर्मग्रंथों में पर्दा प्रथा का कहीं भी विवरण नहीं मिलता है। भारत में हिन्दुओं में पर्दा प्रथा इस्लाम की देन है। इस्लाम के प्रभाव से तथा इस्लामी आक्रमण के समय आक्रमणकारी दरिंदों से बचाव के लिये हिन्दू स्त्रियाँ परदा करने लगीं। भारतीय महिलाओं की सुंदरता से प्रभावित आक्रमणकारी अत्याचारी होते जा रहे थे। उस दौरान महिलाओं के साथ बलात्कार और अपहरण की घटनाएं बढने लगीं थी। बताया जाता है भारत में 1930 तक घूंघट अपने चरम पर था। लेकिन इसके बाद इसमें कमी आती गई। आज भी राजस्थान, हरियाणा, यूपी, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में यह प्रथा जीवित है।

भारत में महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा उपेक्षित ही रही हैं। इसका एक ज्वलंत उदाहरण है पर्दा प्रथा। जहाँ मुस्लिम समाज में महिलाओं को नकाब में रहना पड़ता है वहीँ हिन्दुओं में घूंघट प्रथा का साम्राज्य कायम है। घूंघट प्रथा निश्चित रूप से महिलाओं  के विकास और चेतना को अवरुद्ध करती है। उसे गुलामों जैसा अहसास कराती है। जो स्त्रियां इस प्रथा से बंध जाती है। वे कई बार इतना संकोच करने लगती हैं कि बीमारी में भी अपनी सही से जांच कराने में असफल रहती हैं। इस प्रथा को समाज मे रखने के नुकसान बहुत हैं।

कुछ विद्वानों और प्राचीन ग्रंथों के अनुसार रामायण और महाभारत में भी महिलाएं कहीं पर भी पर्दा अथवा घूंघट का प्रयोग नहीं करती थीं। अजंता और सांची की कलाकृतियों में भी स्त्रियों को बिना घूंघट दिखाया गया है। मनु और याज्ञवल्क्य ने स्त्रियों की जीवन शैली के संबंध में कई नियम बनाए हुए हैं, परंतु कहीं भी यह नहीं कहा है कि स्त्रियों को पर्दे में रहना चाहिए। ज्यादातर संस्कृत नाटकों में भी पर्दे का उल्लेख नहीं है। यहां तक कि 10वीं शताब्दी के प्रारंभ काल के समय तक भी भारतीय राज परिवारों की स्त्रियां बिना पर्दे के सभा में तथा घर से बाहर भ्रमण करती थीं। घूंघट के पक्षधरों का मानना है घूंघट भारतीय परंपरा में अनुशासन और सम्मान का प्रतीक माना जाता है। आज भी राजस्थान में यह प्रथा गाँव से लेकर शहर तक में जीवित है। यह भी कहा जाता है  हिन्दू धर्म में महिलाओं पर घूँघट के लिए दवाब नहीं डाला जाता बल्कि महिलायें स्वयं उस व्यक्ति से सम्मानस्वरुप पर्दा करती हैं जो रिश्ते में उनसे बड़ा होता है।

यह कहने में कोई संकोच नहीं होता है की घूंघट या बुरका एक सामाजिक कुरुति है। यह औरतों को गैर बराबरी का अहसास कराता  है। पुरुष और नारी दोनों एक ही मानव समाज के अभिन्न अंग है। प्रतिबंध और कानून दोनो पर समान लागू होने चाहिए। यदि घूंघट प्रथा इज्जत और सदाचार की रक्षा के लिए है तो उसे पुरुष पर लागू किया जाना चाहिए क्योंकि दूराचार में पुरूष हमेशा आगे रहता है। यदि यह पुरूष के लिए आवश्यक नहीं है तो नारी पर भी लागू नहीं होना चाहिए। देश अब विकास के पथ पर बहुत आगे बढ़ चुका है। इस कुरीति से निकलने के लिए शिक्षा, साहस और जागरूकता की जरुरत है। इसके साथ समाज की सोच और रवैये को बदलना होगा तभी देश में महिलाएं सुख की साँस ले पाएंगी और पुरुषों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर देश के विकास में योगदान दे पाएंगी।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

बांग्लादेश: छात्र नेता की मौत के बाद देशभर में हिंसक प्रदर्शन, अल्पसंख्यकों पर हमले

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ढाका में तनाव, कई शहरों में कर्फ्यू जैसे हालात
ढाका, १९ दिसंबर। बांग्लादेश में छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की मौत की खबर के बाद देशभर में हिंसक प्रदर्शन भड़क उठे हैं। राजधानी ढाका सहित कई प्रमुख शहरों में प्रदर्शनकारियों ने सड़कों पर उतरकर तोड़फोड़ की। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस हिंसा में हिंदू समुदाय के लोगों और उनकी संपत्तियों को निशाना बनाया गया। अनेक मंदिरों में तोड़फोड़ की गई और हिंदू परिवारों के घरों पर हमले हुए। स्थानीय सूत्रों के अनुसार अब तक कम से कम पंद्रह लोगों की मौत हो चुकी है और सैकड़ों लोग घायल हैं।
प्रशासन ने कई क्षेत्रों में धारा १४४ लगा दी है और सुरक्षा बलों को सड़कों पर उतार दिया गया है। इंटरनेट सेवाओं को भी कुछ इलाकों में बाधित कर दिया गया है ताकि अफवाहों के प्रसार को रोका जा सके। हालांकि हिंसा फैलने की खबरें लगातार आ रही हैं।
छात्र नेता की मौत ने भड़काई हिंसा
शरीफ उस्मान हादी एक युवा छात्र नेता थे जो हाल के महीनों में विभिन्न छात्र आंदोलनों में सक्रिय रहे थे। बुधवार देर रात उनके शव को ढाका के बाहरी इलाके में मिला। प्रारंभिक जांच में उनकी मौत संदिग्ध परिस्थितियों में बताई जा रही है। उनके समर्थकों का आरोप है कि उनकी हत्या की गई है, जबकि पुलिस अभी मौत के कारणों की जांच कर रही है।
खबर फैलते ही उनके समर्थक और विभिन्न छात्र संगठनों के कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आए। प्रदर्शनकारियों ने न्याय की मांग करते हुए मुख्य सड़कों को जाम कर दिया। स्थिति तब बिगड़ गई जब कुछ उग्र तत्वों ने इस अवसर का फायदा उठाते हुए हिंसा भड़काना शुरू कर दिया। विभिन्न इलाकों में आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आईं।
हिंदू समुदाय पर लक्षित हमले
हिंसा का सबसे भयावह पहलू यह रहा कि अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय को विशेष रूप से निशाना बनाया गया। ढाका, चटगांव, सिलहट और खुलना सहित विभिन्न शहरों में हिंदू परिवारों के घरों और दुकानों पर हमले हुए। उग्र भीड़ ने कई मंदिरों में तोड़फोड़ की और मूर्तियों को क्षतिग्रस्त किया।
ढाका के रामना काली मंदिर और चटगांव के पुराने शहर में स्थित एक प्राचीन मंदिर पर हमले की खबरें मिली हैं। कई हिंदू परिवारों को अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर शरण लेनी पड़ी है। स्थानीय हिंदू संगठनों ने सरकार से तत्काल सुरक्षा की गुहार लगाई है। कुछ इलाकों में हिंदू व्यापारियों की दुकानों को लूटा गया और आग लगा दी गई।
सरकार की प्रतिक्रिया और सुरक्षा इंतजाम
बांग्लादेश सरकार ने स्थिति को गंभीरता से लेते हुए सुरक्षा बलों को पूरी तरह सतर्क कर दिया है। गृह मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा है कि हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। पुलिस और अर्धसैनिक बलों की अतिरिक्त टुकड़ियां प्रभावित क्षेत्रों में तैनात की गई हैं।
प्रधानमंत्री कार्यालय से जारी बयान में कहा गया है कि शरीफ उस्मान हादी की मौत की स्वतंत्र जांच कराई जाएगी और दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जाएगी। साथ ही अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए विशेष इंतजाम किए जा रहे हैं। सरकार ने सभी राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों से शांति बनाए रखने की अपील की है।
राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया
विपक्षी दलों ने सरकार पर कानून व्यवस्था बनाए रखने में विफल रहने का आरोप लगाया है। मुख्य विपक्षी दल ने छात्र नेता की मौत की न्यायिक जांच की मांग की है। उन्होंने अल्पसंख्यकों पर हमलों की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि यह बांग्लादेश की धर्मनिरपेक्ष परंपरा पर हमला है।
कई छात्र संगठनों ने शांतिपूर्ण विरोध की अपील की है और हिंसा से दूर रहने को कहा है। उन्होंने कहा कि शरीफ उस्मान हादी के लिए न्याय की लड़ाई लोकतांत्रिक तरीके से लड़ी जाएगी। कुछ प्रमुख धार्मिक नेताओं ने भी सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने की अपील की है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता
भारत ने बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं पर हमलों पर गहरी चिंता व्यक्त की है। विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि भारत बांग्लादेश में अपने नागरिकों और अल्पसंख्यक समुदाय की सुरक्षा को लेकर चिंतित है। भारत ने बांग्लादेश सरकार से अपने सभी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का आग्रह किया है।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग ने भी बांग्लादेश में हिंसा और अल्पसंख्यकों पर हमलों पर चिंता जताई है। मानवाधिकार संगठनों ने बांग्लादेश सरकार से जवाबदेही सुनिश्चित करने और पीड़ितों को न्याय दिलाने की मांग की है।
पीड़ितों की कहानियां
प्रभावित क्षेत्रों से मिली जानकारी के अनुसार कई हिंदू परिवार भयभीत हैं। चटगांव निवासी एक व्यापारी ने बताया कि उनकी दुकान को पूरी तरह जला दिया गया। उन्होंने कहा कि वर्षों की मेहनत की कमाई एक रात में बर्बाद हो गई। ढाका के एक मंदिर को भी क्षति पंहुचाई गई।(सोनेट)

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने एमपी के सांसदों से जमीनी स्तर पर टीबी-मुक्त भारत अभियान को गति देने का आह्वान किया

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केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जेपी नड्डा ने टीबी मुक्त भारत अभियान को गति देने के उद्देश्य से राज्यवार आयोजित की जा रही बैठकों की श्रृंखला के अंतर्गत आज मध्य प्रदेश के सांसदों के साथ एक बैठक की। यह बैठक विभिन्न राज्यों के सांसदों के साथ चल रहे संवाद का हिस्सा है, जो इस महीने की शुरुआत में उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात और तमिलनाडु के सांसदों के साथ आयोजित इसी तरह की बैठकों के बाद हो रही है।

मध्य प्रदेश भवन में ‘‘संसद सदस्य टीबी मुक्त भारत के लिए प्रतिबद्ध’’ विषय के तहत आयोजित इस संवाद में टीबी उन्मूलन के राष्ट्रीय लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए निर्वाचन क्षेत्र स्तर पर कार्रवाई करने और अंतरदलीय सहयोग को बढ़ावा देने में निर्वाचित प्रतिनिधियों की महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर दिया गया। आज के सत्र में राज्य के सांसदों के साथ-साथ केंद्रीय संचार एवं पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्री श्री ज्योतिरादित्य एम. सिंधिया, केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री श्रीमती अनुप्रिया पटेल और केंद्रीय जनजातीय कार्य राज्य मंत्री श्री दुर्गादास उइके भी उपस्थित थे।

सांसदों को संबोधित करते हुए नड्डा ने तपेदिक के खिलाफ लड़ाई में भारत की महत्वपूर्ण प्रगति पर प्रकाश डाला। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की वैश्विक टीबी रिपोर्ट 2025 का हवाला देते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री श्रीमती अनुप्रिया पटेल ने 2015 और 2024 के बीच टीबी की घटनाओं में 21 प्रतिशत की कमी का उल्लेख किया जो वैश्विक औसत कमी से लगभग दोगुनी है, साथ ही टीबी से संबंधित मृत्यु दर में 25 प्रतिशत की कमी आई है। भारत ने उपचार की सफलता दर में 90 प्रतिशत की उपलब्धि हासिल की है, जो वैश्विक औसत 88 प्रतिशत से कहीं अधिक है। उन्होंने इन उपलब्धियों का श्रेय निरंतर राजनीतिक नेतृत्व, सशक्त कार्यक्रम कार्यान्वयन और मजबूत जन भागीदारी को दिया, जिसने भारत को टीबी उन्मूलन प्रयासों में विश्व नेता के रूप में स्थापित किया है।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की अपर सचिव और मिशन निदेशक, श्रीमती आराधना पटनायक ने भारत के नवोन्मेषी और रोगी-केंद्रित टीबी उन्मूलन ढांचे पर प्रकाश डालते हुए कहा कि देश के व्यापक निदान अवसंरचना में अब 9,300 से अधिक एनएएटी मशीनें शामिल हैं, जो देशभर के सभी ब्लॉक में कवरेज सुनिश्चित करती हैं। उन्होंने टीबी के खिलाफ भारत की निरंतर प्रगति को लेकर मिली वैश्विक मान्यता पर भी जोर दिया। उन्होंने मध्य प्रदेश के प्रमुख संकेतकों पर प्रदर्शन का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया, जिनमें संवेदनशील आबादी की जांच, मामलों की सूचना, उपचार सफलता दर और पोषण संबंधी सहायता कवरेज शामिल हैं। श्रीमती पटनायक ने टीबी उन्मूलन को और अधिक गति देने के लिए अंतर-विभागीय समन्वय के महत्व पर जोर दिया।

दिसंबर 2024 में शुरू किए गए और बाद में पूरे देश में विस्तारित किए गए टीबी मुक्त भारत अभियान के अंतर्गत भारत शीघ्र निदान, समय पर उपचार की शुरुआत, उच्च जोखिम वाले रोगियों के लिए अनुकूलित देखभाल और व्यापक मनोसामाजिक सहायता सुनिश्चित करने के लिए मिशन मोड में काम कर रहा है। जन आंदोलन के अंतर्गत, दो लाख से अधिक मायभारत स्वयंसेवकों, 67 लाख से अधिक निक्षय मित्रों और 30,000 से अधिक निर्वाचित प्रतिनिधियों ने टीबी मुक्त भारत के राष्ट्रीय मिशन को साकार करने में सहयोग देने के लिए आगे कदम बढ़ाया है।