रक्षा , अनुसंधान, शिक्षा और प्रौद्योगिकी सहायता में सहयोग को बढ़ाने के लिए डीआरडीओ और आरआरयू ने समझौता किया

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रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) और राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय (आरआरयू) ने रक्षा एवं आंतरिक सुरक्षा के क्षेत्र में अनुसंधान, शिक्षा, प्रशिक्षण और प्रौद्योगिकी सहायता के क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा देने के लिए एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए हैं। इस एमओयू पर विशिष्ट वैज्ञानिक एवं महानिदेशक (उत्पादन समन्वय एवं सेवा अंतःक्रिया) डॉ. चंद्रिका कौशिक और आरआरयू के कुलपति प्रो. (डॉ.) बिमल एन पटेल ने रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह की उपस्थिति में 22 दिसंबर, 2025 को नई दिल्ली के साउथ ब्लॉक में हस्ताक्षर किए। इस अवसर पर रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव और डीआरडीओ के अध्यक्ष डॉ. समीर वी कामत भी उपस्थित थे।

इस समझौता ज्ञापन का उद्देश्य आत्मनिर्भर भारत की राष्ट्रीय परिकल्पना और अमृत काल के दौरान अपनाए गए समग्र राष्ट्रव्यापी विजन के अनुरूप रक्षा और आंतरिक सुरक्षा प्रौद्योगिकियों में भारत की आत्मनिर्भरता को सुदृढ़ करना है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा तैयारियों को बढ़ाने और आंतरिक सुरक्षा में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को सुदृढ़ करने के लिए प्रौद्योगिकी, ज्ञान और परिचालन अंतर्दृष्टि के एकीकरण के प्रति साझा प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

गृह मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय एक राष्ट्रीय महत्व का संस्थान और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा नामित रक्षा अध्ययन का नोडल केंद्र है जो आंतरिक सुरक्षा के क्षेत्र में मजबूत अकादमिक, प्रशिक्षण और नीतिगत विशेषज्ञता प्रदान करता है। देश का प्रमुख रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) , सशस्त्र बलों और सुरक्षा एजेंसियों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अत्याधुनिक स्वदेशी प्रौद्योगिकियों और प्रणाली-स्तरीय विशेषज्ञता का योगदान देता है।

समझौता ज्ञापन के तहत, दोनों संगठन संयुक्त अनुसंधान परियोजनाओं, पीएचडी और फैलोशिप कार्यक्रमों तथा सुरक्षा बलों के लिए विशेष प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों पर सहयोग करेंगे। इस सहयोग में उभरती परिचालनगत चुनौतियों पर अध्ययन, प्रौद्योगिकी अंतराल विश्लेषण, भविष्य की आवश्यकताओं का पूर्वानुमान और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों तथा गृह मंत्रालय के अधीन अन्य एजेंसियों में शामिल डीआरडीओ – विकसित प्रणालियों के जीवन-चक्र प्रबंधन का अध्ययन भी शामिल होगा।

भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौते की घोषणा

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प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने आज न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन से टेलीफोन पर बातचीत की। दोनों प्रधानमंत्रियों ने संयुक्त रूप से ऐतिहासिक, महत्वाकांक्षी और पारस्परिक रूप से लाभकारी भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) के सफल समापन की घोषणा की।

मार्च 2025 में प्रधानमंत्री लक्सन की भारत यात्रा के दौरान वार्ता शुरू होने के बाद, दोनों प्रधानमंत्रियों ने इस बात पर सहमति जताई कि रिकॉर्ड 9 महीनों में मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) का संपन्न होना दोनों देशों के बीच संबंधों को और गहरा करने की साझा महत्वाकांक्षा और राजनीतिक इच्छाशक्ति को दर्शाता है। यह मुक्त व्यापार समझौता द्विपक्षीय आर्थिक जुड़ाव को काफी मजबूत करेगा, बाजार पहुंच को बढ़ाएगा, निवेश प्रवाह को प्रोत्साहित करेगा, दोनों देशों के बीच रणनीतिक सहयोग को मजबूत करेगा और साथ ही विभिन्न क्षेत्रों में दोनों देशों के नवप्रवर्तकों, उद्यमियों, किसानों, लघु एवं मध्यम उद्यमों, छात्रों और युवाओं के लिए नए अवसर खोलेगा।

इस मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) से मिली मजबूती और विश्वसनीय नींव के साथ, दोनों प्रधानमंत्रियों ने अगले पांच वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करने और अगले 15 वर्षों में न्यूजीलैंड की ओर से भारत में 20 अरब अमेरिकी डॉलर के निवेश का विश्वास व्यक्त किया। दोनों नेताओं ने खेल, शिक्षा और दोनों देशों के लोगों के बीच परस्पर संबंधों जैसे द्विपक्षीय सहयोग के अन्य क्षेत्रों में हासिल की गई प्रगति का भी स्वागत किया और भारत-न्यूजीलैंड साझेदारी को और मजबूत करने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि की।

बातचीत में दोनों नेताओं ने आपस में संपर्क बनाए रखने पर सहमति जताई।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में भारत और न्यूजीलैंड ने एक व्यापक, संतुलित और भविष्योन्मुखी मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर हस्ताक्षर किए हैं,  जो हिंद-प्रशांत क्षेत्र के साथ भारत की सहभागिता में एक महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक उपलब्धि है।

यह ‘विकसित भारत 2047’ के दृष्टिकोण अनुरूप, भारत के सबसे शीघ्र संपन्न हुए मुक्त व्यापार समझौतों में से एक है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री श्री पीयूष गोयल और न्यूजीलैंड के व्यापार एवं निवेश मंत्री श्री टॉड मैक्ले के बीच हुई बैठक के दौरान 16 मार्च 2025 को औपचारिक वार्ता का शुभारंभ हुआ। 5 औपचारिक दौर की वार्ताओं और कई आभासी बैठकों के बाद निरंतर चर्चाओं के माध्यम से यह समझौता संपन्न हुआ। इस मुक्त व्यापार समझौते के तहत आर्थिक साझेदारी रोजगार को बढ़ावा देती है, कौशल गतिशीलता को सुगम बनाती है, व्यापार एवं निवेश आधारित विकास को गति देती है, कृषि उत्पादकता के लिए नवाचार को प्रोत्साहित करती है और दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता को मजबूत करने के लिए लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) की भागीदारी को बढावा देती है।

व्यापार एवं निवेश मंत्री श्री पीयूष गोयल ने समझौता वार्ता संपन्न होने पर कहा, “यह मुक्त व्यापार समझौता व्यापार को बढ़ावा देने, हमारे किसानों, उद्यमियों, छात्रों, महिलाओं और नवप्रवर्तकों के लिए नए अवसरों के साथ उपज और किसानों की आय को बढ़ाते हुए आधुनिक कृषि उत्पादकता को गति देता है। यह समझौता सुव्यवस्थित निर्यात के माध्यम से भारतीय व्यवसायों के लिए द्वार खोलता है और हमारे युवाओं को वैश्विक मंच पर सीखने, काम करने और आगे बढ़ने के विकल्प प्रदान करता है।”

शत-प्रतिशत टैरिफ हटाने से भारत के सभी निर्यातों पर शुल्क-मुक्त बाजार पहुंच प्राप्त होती है। यह बाजार पहुंच वस्त्र, परिधान, चमड़ा, जूते, समुद्री उत्पाद, रत्न और आभूषण, हस्तशिल्प, इंजीनियरिंग सामान और ऑटोमोबाइल सहित भारत के श्रम-प्रधान क्षेत्रों की प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाती है, जिससे भारतीय श्रमिकों, कारीगरों, महिलाओं, युवाओं और लघु एवं मध्यम उद्यमों को प्रत्यक्ष रूप से सहायता मिलती है और वे वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं के साथ एकीकृत होते हैं।

यह मुक्त व्यापार समझौता न्यूजीलैंड के अब तक के सभी मुक्त व्यापार समझौतों में सबसे महत्वाकांक्षी सेवा प्रस्ताव है। भारत ने आईटी और आईटी-सक्षम सेवाओं, पेशेवर सेवाओं, शिक्षा, वित्तीय सेवाओं, पर्यटन, निर्माण और अन्य व्यावसायिक सेवाओं सहित कई उच्च-मूल्य वाले क्षेत्रों में प्रतिबद्धताएं हासिल की हैं, जिससे भारतीय सेवा प्रदाताओं और कुशल रोजगार के क्षेत्रों के लिए पर्याप्त नए अवसर खुल गए हैं

एक्सप्रेस वे पर लोगों को चलना भी सिखाना  होगा

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अशोक मधुप

वरिष्ठ पत्रकार

विकास की रफ़्तार तभी सुखद  है जब वह सुरक्षित हो। भारत सरकार ने पिछले 10 वर्षों में जो बुनियादी ढांचा खड़ा किया है, विशेषकर सड़क तंत्र में जो क्रांतिकारी परिवर्तन आए हैं, वे अभूतपूर्व हैं। जहाँ पहले दो शहरों के बीच का सफर घंटों और दिनों में तय होता था, आज वह समय काफी कम हो गया है। लेकिन इस भौतिक प्रगति के बीच एक गंभीर प्रश्न खड़ा होता है। क्या हम इन आधुनिक सड़कों पर चलने के लिए मानसिक और तकनीकी रूप से तैयार हैं? अब समय आ गया है कि हम ईंट और डामर की सड़कों से आगे बढ़कर ‘मानव व्यवहार’ में सुधार पर निवेश करें। याद रखिए, एक्सप्रेसवे केवल मंजिल तक जल्दी पहुँचने के लिए नहीं हैं, बल्कि सुरक्षित पहुँचने के लिए हैं। यदि हम गति के साथ गरिमा और अनुशासन नहीं अपना सकते, तो ये चमचमाती सड़कें हमारे लिए वरदान के बजाय अभिशाप सिद्ध होंगी। अब जरूरत है कि​”हाईवे और एक्सप्रेसवे बनाने से पहले लोगों को उन पर चलना सिखाना चाहिए”—यह केवल एक सुझाव नहीं, बल्कि समय की मांग है। केवल कंक्रीट के जाल बिछाने से राष्ट्र का कल्याण नहीं होगा, बल्कि उन सड़कों पर सुरक्षित सफर सुनिश्चित करना भी सरकार और नागरिक दोनों की सामूहिक जिम्मेदारी है।

भारत में सड़क निर्माण की गति पिछले दस वर्षों (2014-2024) में सांख्यिकीय और भौगोलिक दोनों दृष्टि से ऐतिहासिक रही है। 2014 के आसपास देश में राष्ट्रीय राजमार्गों की कुल लंबाई लगभग 91,287 किलोमीटर थी, जो 2024 तक बढ़कर 1,46,000 किलोमीटर से अधिक हो गई है। 2014-15 में सड़क निर्माण की दर लगभग 12 किलोमीटर प्रतिदिन थी, जो वर्तमान में बढ़कर औसतन 28 से 37 किलोमीटर प्रतिदिन तक पहुँच चुकी है।

 भारत ने ‘भारतमाला परियोजना’ के तहत विश्व स्तरीय एक्सप्रेसवे का जाल बिछाया है। दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे, पूर्वांचल एक्सप्रेसवे यमुना  एक्सप्रेसवे और समृद्धि महामार्ग जैसे गलियारे भारत की नई पहचान बन चुके हैं। अटल टनल और चेनाब ब्रिज जैसे इंजीनियरिंग के चमत्कार इसी दशक की देन हैं, जिन्होंने दुर्गम क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ा है।

इतना सब हुआ। सड़कों की चौड़ाई तो बढ़ी है, लेकिन सुरक्षा के मोर्चे पर हम अब भी संघर्ष कर रहे हैं। पिछले पांच वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि हमारी लापरवाही की कीमत बहुत भारी है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2019 में हुई 4,49,002  दुर्घटनाओं 1,51,113मौत  हुईं। 2020 में हुई  3,66,138  दुर्घटनाओं में 1,31,714 व्यक्ति मरे। 2021 में हुए 4,12,432 एक्सीडेंट में 1,53,972  व्यक्ति मौत के मुंह में समा गए। 2022 में  हुई 4,61,312 दुर्घटनाओं मे 1,68,491  जान गईं। 2023 हुई 4,80,000+ (अनुमानित) में 1,70,000 व्यक्ति मौत के शिकार हुए। ये आंकड़े बताते हैं कि दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। घायलों की संख्या  तो मरने वालों से काफी ज्यादा होनी चाहिए। अभी  यमुना  एक्सप्रेसवे  पर हुए हादसे में 19 लोग मरे। 100  से ज्यादा घायल हुए।

आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि लगभग 70  प्रतिशत से अधिक दुर्घटनाएं ‘ओवरस्पीडिंग’ यानी अत्यधिक गति के कारण होती हैं। एक्सप्रेसवे पर दुर्घटनाओं की गंभीरता सामान्य सड़कों से कहीं अधिक होती है क्योंकि यहाँ वाहनों की गति बहुत तेज़ होती है। एक्सप्रेसवे सामान्य सड़कें नहीं हैं। यहाँ ड्राइविंग के अपने नियम हैं, जिन्हें भारतीय चालकों को सीखना होगा।  इन पर चलते समय लेन का अनुशासन  का पालन करना होगा । भारत में सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोग भारी वाहन सबसे दाईं ओर चलाते हैं, जबकि वह लेन केवल ओवरटेकिंग के लिए होती है। तेज़ रफ़्तार वाली सड़कों पर गलत लेन में वाहन चलाना आत्महत्या के समान है।

एक्सप्रेसवे पर केवल अधिकतम गति ही नहीं, बल्कि न्यूनतम गति का पालन भी जरूरी है। धीमी गति से चल रहे वाहन तेज़ रफ्तार वाहनों के लिए अवरोध बन जाते हैं, जिससे टक्कर की संभावना बढ़ जाती है। एक्सप्रेसवे की सीमेंट वाली सड़कों पर टायर बहुत जल्दी गर्म होते हैं। यदि टायर पुराने या घिसे हुए हैं, तो वे फट सकते हैं। लोगों को यह सिखाना जरूरी है कि लंबी यात्रा से पहले अपने वाहनों की तकनीकी जांच कैसे करें। एक्सप्रेसवे पर चढ़ने और उतरने के लिए बने रास्तों (रैम्प) का सही उपयोग करना अधिकांश लोगों को नहीं आता। अचानक मुख्य मार्ग पर वाहन मोड़ देना घातक होता है।

वाहनों की संख्या और लाइसेंस धारकों के बीच का यह अंतर यह दर्शाता है कि हमारी सड़कों पर ‘अकुशल’ चालकों की फौज मौजूद है। एक्सप्रेसवे जैसी तेज़ रफ़्तार वाली सड़कों पर यह स्थिति और भी घातक हो जाती है। एक आदर्श स्थिति में, सड़क पर चल रहे हर वाहन के अनुरूप कम से कम एक वैध लाइसेंस होना चाहिए। हालांकि, भारत में स्थिति काफी चिंताजनक है। राष्ट्रीय रजिस्टर के अनुसार, देश में कुल ड्राइविंग लाइसेंसों की संख्या लगभग 21 से 23 करोड़ के बीच है। यदि हम 35 करोड़ पंजीकृत वाहनों की तुलना 23 करोड़ लाइसेंसों से करें, तो स्पष्ट होता है कि वाहनों और चालकों के बीच 12 करोड़ का भारी अंतर है।

विभिन्न क्षेत्रीय परिवहन कार्यालयों (RTO) और पुलिस द्वारा चलाए गए जांच अभियानों के अनुसार, बिना लाइसेंस वाहन चलाने वालों के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। एक अनुमान के अनुसार, देश में लगभग 25से 30  प्रतिशत लोग बिना किसी वैध ड्राइविंग लाइसेंस के सड़कों पर वाहन चला रहे हैं। सड़क दुर्घटनाओं के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि हादसों में जान गंवाने वाले या दोषी पाए जाने वाले चालकों में से लगभग 65  प्रतिशत युवाओं के पास वैध लाइसेंस नहीं होता। ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में यह प्रतिशत और भी अधिक है, जहाँ लगभग 40 प्रतिशत दोपहिया चालक बिना लाइसेंस के गाड़ी दौड़ा रहे हैं।

एक पुरानी रिपोर्ट (सेव लाइफ फाउंडेशन) यह भी बताती है कि जिनके पास लाइसेंस है, उनमें से भी 10 में से छह लोगों ने बिना किसी व्यावहारिक ड्राइविंग टेस्ट  के इसे प्राप्त किया है, जो सुरक्षा के लिहाज से एक बड़ा खतरा है।

इसलिए बिना ड्राइविंग लाइसेंस पकड़े जाने पर केवल जुर्माना नहीं, बल्कि वाहन को लंबे समय के लिए ज़ब्त करना होगा। नाबालिगों द्वारा गाड़ी चलाने पर अभिभावकों को जेल की सजा का प्रावधान में कड़ाई जरूरी है। डिजिटल तकनीक का उपयोग कर हर मोड़ पर बिना लाइसेंस वाले पर कार्रवाई  अमल में लानी होगी।

इन एक्सप्रेसवे पर चलना सिखाने के लिए सिर्फ शिक्षा पर्याप्त नहीं है; अनुशासन के लिए कानून का भय भी आवश्यक है। गलत वाहन चलाने वालों, शराब पीकर गाड़ी चलाने वालों और उल्टी दिशा (रॉन्ग साइड) में चलने वालों पर इतनी सख्ती होनी चाहिए कि वे दोबारा नियम तोड़ने की हिम्मत न करें। बार-बार नियम तोड़ने वालों का ड्राइविंग लाइसेंस स्थायी रूप से रद्द कर दिया जाना चाहिए। हर कुछ किलोमीटर पर कैमरे और रडार होने चाहिए जो नियम तोड़ते ही चालान सीधे चालक के पते पर भेजें। नियम पन मानने वालों पर  जुर्माना केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि दंडात्मक होना चाहिए ताकि वह व्यक्ति की आर्थिक स्थिति पर प्रभाव डाले।

यमुना  एक्सप्रेसवे पर हुई  दुर्घटना के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने इस एक्सप्रेसवे पर प्रत्येक किलोमीटर पर कैमरे लगाने का निर्णय  लिया है। यह तो पूरे देश के महत्वपूर्ण मार्ग पर करना होगा, तभी  दुर्घटनाएं रूकेंगी।

सड़क सुरक्षा को केवल पुलिस का विषय न मानकर इसे शिक्षा का हिस्सा बनाना होगा। विद्यालयों में बच्चों को बचपन से ही सड़क के संकेतों, लेन अनुशासन और जीवन के मूल्य के बारे में सिखाया जाना चाहिए। जब तक सुरक्षा की भावना हमारे संस्कार में नहीं आएगी, तब तक आधुनिक सड़कें केवल मृत्यु के गलियारे बनी रहेंगी।

अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार  हैं)

त्याग, तपस्या और बलिदान की प्रतिमूर्ति स्वामी श्रद्धानंद

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बाल मुकुन्द ओझा

स्वामी श्रद्धानंद बलिदान दिवस 23 दिसम्बर को मनाया जाता है। भारत के अनेक महापुरुषों ने अपने विचारों और सिद्धांतों पर चलते हुए देश और समाज की भलाई के लिए अपने प्राणों की आहुति दी उनमें स्वामी श्रद्धानन्द का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। देश के लिए सर्वस्व समर्पित करने वाले स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती भारत के महान शिक्षाविद, स्वतंत्रता सेनानी तथा आर्यसमाज के संन्यासी थे जिन्होंने देशभर में स्वामी दयानन्द सरस्वती की शिक्षाओं का प्रसार किया। वे भारत के उन महान राष्ट्रभक्त संन्यासियों में अग्रणी थे, जिन्होंने अपना जीवन स्वाधीनता, स्वराज्य, शिक्षा तथा वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित कर दिया था। स्वामी श्रद्धानंद 19वीं सदी और शुरू होती 20वीं सदी के सर्वाधिक प्रतिभाशाली  विद्वान, अछूतोद्धारक और समाजसेवी थे।  23 दिसंबर, 2025 को उनके 99 वें बलिदान दिवस पर देश उन्हें श्रद्धा से नमन करता है। स्वामी श्रद्धानन्द की 23 दिसंबर, 1926 को चांदनी चौक, दिल्ली में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी ।

स्वामी श्रद्धानन्द का जन्म 2 फरवरी सन् 1856 को पंजाब के जालन्धर जिले के तलवान ग्राम में एक कायस्थ परिवार में हुआ था। उनके पिता, लाला नानक चन्द, ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा शासित यूनाइटेड प्रोविन्स (वर्तमान उत्तर प्रदेश) में पुलिस अधिकारी थे। उनका बचपन का नाम मुंशीराम था। बताया जाता है एक बार आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती वैदिक-धर्म के प्रचारार्थ बरेली पहुंचे। पुलिस अधिकारी नानकचन्द अपने पुत्र को साथ लेकर स्वामी दयानन्द का प्रवचन सुनने पहुँचे। युवावस्था तक मुंशीराम ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते थे। लेकिन स्वामी दयानन्द के तर्कों और आशीर्वाद ने मुंशीराम को दृढ़ ईश्वर विश्वासी तथा वैदिक धर्म का अनन्य भक्त बना दिया। उनका विवाह श्रीमती शिवा देवी के साथ हुआ था। उन्होंने वकालत की शिक्षा ग्रहण की और एक सफल वकील बने तथा काफी नाम और प्रसिद्धि प्राप्त की। 1917 में उन्होने सन्यास धारण कर लिया और स्वामी श्रद्धानन्द के नाम से विख्यात हुए।

उनका राजनैतिक जीवन रोलेट एक्ट का विरोध करते हुए एक स्वतन्त्रता सेनानी के रूप में प्रारम्भ हुआ। अच्छी-खासी वकालत की कमाई छोड़कर स्वामीजी ने ”दैनिक विजय” नामक समाचार-पत्र में ”छाती पर पिस्तौल” नामक क्रान्तिकारी लेख लिखे। स्वामीजी महात्मा गांधी के सत्याग्रह से प्रभावित थे। जालियांवाला बाग हत्याकाण्ड तथा रोलेट एक्ट का विरोध वे हिंसा से करने में कोई बुराई नहीं समझते थे।

स्वामीजी ने 13 अप्रैल 1917 को संन्यास ग्रहण किया, तो वे स्वामी श्रद्धानन्द बन गये । आर्यसमाज के सिद्धान्तों का समर्थक होने के कारण उन्होंने इसका बड़ी तेजी से प्रचार-प्रसार किया। वे नरम दल के समर्थक होते हुए भी ब्रिटिश उदारता के समर्थक नहीं थे। आर्यसमाजी होने के कारण उन्होंने हरिद्वार में गंगा किनारे गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना कर वैदिक शिक्षा प्रणाली को महत्व दिया।

दलितों को धार्मिक स्थलों में प्रवेश नहीं दिए जाने से वह बहुत आहत थे। मनुष्य का मनुष्य से ऐसा बरताव उन्हें कचोटता था। स्वामीजी ने दलितों के साथ हो रहे छूआछूत का मुखर विरोध किया और हवन यज्ञ में साथ बिठाकर सदियों से चली रही असमानता को खत्म करने का काम किया। उस समय कट्टरवादियों ने उनका विरोध भी किया लेकिन वह सामाजिक असमानता के खिलाफ लड़ाई लड़ते रहे। स्वामी श्रद्धानन्द ने दलितों की भलाई के लिए आगे बढ़कर कार्य किये। उन्होंने  कांग्रेस के स्वाधीनता आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया। कांग्रेस में उन्होंने 1919 से लेकर 1922 तक सक्रिय रूप से महत्त्वपूर्ण भागीदारी की। 1922 में अंग्रेज सरकार ने उन्हें गिरफ्तार किया, लेकिन उनकी गिरफ्तारी कांग्रेस के नेता होने की वजह से नहीं हुई थी, बल्कि वे सिक्खों के धार्मिक अधिकारों की रक्षा के लिए सत्याग्रह करते हुए बंदी बनाये गए थे। स्वामी श्रद्धानन्द कांग्रेस से अलग होने के बाद भी स्वतंत्रता के लिए कार्य लगातार करते रहे। हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए स्वामी जी ने जितने कार्य किए, उस वक्त शायद ही किसी ने अपनी जान जोखिम में डालकर किए हों। उन्होंने समाज के हर वर्ग में जनचेतना जगाने का कार्य किया।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

देश-समाज को जगाने वालों पर सवाल क्यों?

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– डॉ सत्यवान सौरभ

किसी भी जीवंत समाज की पहचान यह नहीं होती कि वह कितनी परंपराओं का पालन करता है, बल्कि यह होती है कि वह परंपराओं को कितनी विवेकपूर्ण दृष्टि से देखता है। इतिहास गवाह है कि जिन समाजों ने प्रश्न पूछने वालों को सम्मान दिया, वही आगे बढ़े; और जिन्होंने उन्हें दबाने की कोशिश की, वे जड़ता और पतन का शिकार हुए। आज जब कोई व्यक्ति, संगठन या विचारक अंधविश्वास, पाखंड और झूठ के खिलाफ आवाज़ उठाता है, तो उसके इरादों पर सवाल खड़े कर दिए जाते हैं। उसे धर्म-विरोधी, संस्कृति-विरोधी या समाज-विरोधी ठहराने की कोशिश की जाती है। यह प्रवृत्ति स्वयं में एक गंभीर प्रश्न है—आखिर समाज को जगाने वालों पर सवाल क्यों?

आस्था और अंधविश्वास के बीच का फर्क समझना आज सबसे बड़ी जरूरत बन चुका है। आस्था व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाती है, उसे नैतिकता, करुणा और आत्मबल प्रदान करती है। इसके विपरीत अंधविश्वास भय, अज्ञान और असहायता को जन्म देता है। आस्था जहां विवेक के साथ चलती है, वहीं अंधविश्वास विवेक को कुचल देता है। दुर्भाग्यवश, आज इन दोनों को जानबूझकर एक-दूसरे में मिलाया जा रहा है, ताकि सवाल पूछने वालों को चुप कराया जा सके और पाखंड के कारोबार को सुरक्षित रखा जा सके।

धर्म का मूल उद्देश्य कभी भी मनुष्य को अज्ञान में रखना नहीं रहा। भारतीय दर्शन की परंपरा तो प्रश्नों और संवादों की रही है। उपनिषदों से लेकर बुद्ध और कबीर तक, हर विचारधारा ने जिज्ञासा और तर्क को महत्व दिया। “सवाल मत पूछो” की संस्कृति भारतीय चिंतन की आत्मा के विपरीत है। इसके बावजूद आज यह धारणा बनाई जा रही है कि सवाल करना आस्था पर हमला है। यह न केवल बौद्धिक रूप से गलत है, बल्कि सामाजिक रूप से भी खतरनाक है।

अंधविश्वास का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि वह शोषण को वैधता देता है। चमत्कारों के नाम पर लोगों को ठगा जाता है, बीमारों को इलाज के बजाय झाड़-फूंक के हवाले कर दिया जाता है, महिलाओं और बच्चों को डर और अपराधबोध में जीने के लिए मजबूर किया जाता है। जब कोई इन कुप्रथाओं के खिलाफ आवाज उठाता है, तो उसे ‘परंपरा तोड़ने वाला’ घोषित कर दिया जाता है। वास्तव में वह परंपरा नहीं, परंपरा के नाम पर चल रहे शोषण को चुनौती दे रहा होता है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि अंधविश्वास केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर लोकतंत्र पर पड़ता है। एक ऐसा समाज, जो तर्क और वैज्ञानिक सोच से दूर हो, वह आसानी से अफवाहों, नफरत और झूठे प्रचार का शिकार बन जाता है। लोकतंत्र की बुनियाद ही सूचित और विवेकशील नागरिकों पर टिकी होती है। जब नागरिक डर और अज्ञान के आधार पर निर्णय लेने लगते हैं, तब लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर पड़ने लगती हैं।

भारत का संविधान इस संदर्भ में एक स्पष्ट मार्गदर्शक है। यह केवल शासन की व्यवस्था नहीं, बल्कि एक सामाजिक दस्तावेज भी है। संविधान वैज्ञानिक दृष्टिकोण, समानता और मानव गरिमा को बढ़ावा देता है। अनुच्छेद 51(क) में नागरिकों के मूल कर्तव्यों में वैज्ञानिक सोच, मानववाद और सुधार की भावना के विकास की बात कही गई है। इस दृष्टि से देखें तो अंधविश्वास के खिलाफ आवाज उठाना किसी की व्यक्तिगत सनक नहीं, बल्कि एक संवैधानिक जिम्मेदारी है।

इसके बावजूद, समाज को जगाने वालों को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। इसका एक कारण यह भी है कि परिवर्तन हमेशा असहज होता है। जो व्यवस्था लंबे समय से चली आ रही हो, उससे लाभ उठाने वाले वर्ग परिवर्तन से डरते हैं। उन्हें लगता है कि यदि लोग सवाल पूछने लगे, तो उनका वर्चस्व खत्म हो जाएगा। इसलिए वे सवाल उठाने वालों को बदनाम करने का आसान रास्ता अपनाते हैं।

मीडिया और सोशल मीडिया की भूमिका भी इस बहस में महत्वपूर्ण है। जहां एक ओर कुछ मंच विवेक और तर्क को जगह देते हैं, वहीं दूसरी ओर सनसनी और अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाला कंटेंट भी तेजी से फैलता है। चमत्कारों की कहानियां, अवैज्ञानिक दावे और डर पैदा करने वाले संदेश अधिक ‘वायरल’ होते हैं। ऐसे माहौल में तर्क की आवाज अक्सर धीमी पड़ जाती है, और तर्क देने वाले व्यक्ति को ‘नकारात्मक’ या ‘विवादित’ करार दे दिया जाता है।

शिक्षा इस पूरी समस्या की जड़ में है। यदि शिक्षा केवल डिग्री दिलाने का माध्यम बनकर रह जाए और उसमें वैज्ञानिक सोच, प्रश्न पूछने की आदत और नैतिक साहस न हो, तो समाज में अंधविश्वास का फैलना स्वाभाविक है। बच्चों को बचपन से ही यह सिखाया जाना चाहिए कि हर बात को बिना समझे स्वीकार करना जरूरी नहीं है। सम्मानजनक असहमति और तार्किक सोच ही स्वस्थ समाज की नींव होती है।

यह भी सच है कि हर बदलाव धीरे-धीरे आता है। समाज को जगाने वालों की राह आसान नहीं होती। उन्हें विरोध, उपहास और कभी-कभी हिंसा का भी सामना करना पड़ता है। लेकिन इतिहास में ऐसे ही लोगों ने समाज को नई दिशा दी है। राजा राममोहन राय ने सती प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई तो उन्हें भी विरोध झेलना पड़ा। डॉ. आंबेडकर ने जातिगत भेदभाव को चुनौती दी तो उन पर भी सवाल उठे। आज वे सभी समाज-सुधारक सम्मान के साथ याद किए जाते हैं।

आज का समय भी ऐसे ही साहस की मांग करता है। अंधविश्वास के खिलाफ खड़ा होना किसी एक धर्म, वर्ग या समुदाय के खिलाफ खड़ा होना नहीं है। यह मनुष्य की गरिमा और विवेक के पक्ष में खड़ा होना है। यह कहना कि झूठ, पाखंड और डर का धर्म में कोई स्थान नहीं होना चाहिए, किसी की आस्था का अपमान नहीं, बल्कि उसकी रक्षा है।

समाज को यह तय करना होगा कि वह किस ओर जाना चाहता है—भय और अज्ञान की ओर या विवेक और प्रगति की ओर। यदि हम सच में एक मजबूत, न्यायपूर्ण और लोकतांत्रिक भारत चाहते हैं, तो हमें उन आवाज़ों को सुनना होगा जो हमें सोचने पर मजबूर करती हैं। सवालों से डरने के बजाय उनका सामना करना होगा।

अंततः प्रश्न यही है कि समाज को जगाने वालों पर सवाल क्यों? शायद इसलिए क्योंकि जागरूक समाज सत्ता, पाखंड और शोषण के लिए असुविधाजनक होता है। लेकिन यही असुविधा भविष्य की बुनियाद भी होती है। आज यदि हम विवेक की आवाज़ के साथ खड़े होते हैं, तो आने वाली पीढ़ियों को एक अधिक जागरूक, स्वतंत्र और मानवीय समाज मिलेगा।

अंधविश्वास का अंत किसी एक आंदोलन से नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना से होगा। यह चेतना सवाल पूछने से शुरू होती है। इसलिए जो सवाल पूछ रहा है, जो सोचने के लिए प्रेरित कर रहा है, वह समाज का दुश्मन नहीं, उसका सच्चा मित्र है।

जय हिन्द। जय भारत। जय संविधान। 

दक्षिण अफ्रीका में एक बार में हुई गोलीबारी में 9 लोगों की मौत

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दक्षिण अफ्रीका में रविवार सुबह एक बार में हुई गोलीबारी में नौ लोगों की मौत हो गई। यह घटना जोहान्सबर्ग से करीब 40 किलोमीटर दूर बेकर्सडेल इलाके में हुई, जो अपनी सोने की खदानों के लिए जाना जाता है। इस महीने देश में मास शूटिंग की यह दूसरी बड़ी घटना है।

जानकारी के अनुसार, घटना रात करीब 1:00 बजे हुई, जब दो गाड़ियों में आए दर्जन भर हमलावरों ने बार में बैठे लोगों पर अचानक गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। भागते समय भी हमलावर अंधाधुंध फायरिंग करते रहे। इस हमले में नाै लोगों की जान चली गई और 10 अन्य घायल हुए हैं। मरने वालों में एक ऑनलाइन टैक्सी ड्राइवर भी शामिल है जो बार के बाहर मौजूद था। हमलावरों की तलाश जारी है।

महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों में महायुति गठबंधन को भारी जीत

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महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों में महायुति गठबंधन ने भारी जीत हासिल की है। बीजेपी 288 नगर परिषद सीटों में से 129 जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी है। महायुति के अन्य घटक दलों (शिवसेना-शिंदे गुट और एनसीपी-अजित पवार गुट) ने भी महत्वपूर्ण सीटें जीती हैं। देवेंद्र फडणवीस ने इसे ‘सकारात्मक राजनीति’ की जीत बताया। वहीं, विपक्षी कांग्रेस और शिवसेना (UBT) ने चुनाव आयोग पर पक्षपात और सत्ता पक्ष द्वारा धनबल के इस्तेमाल का आरोप लगाया है।

महाराष्ट्र की 288 नगर परिषद और नगर पंचायत सीटों के नतीजों में सत्ताधारी महायुति गठबंधन ने शानदार जीत दर्ज की है। भारतीय जनता पार्टी ने सबसे अधिक सीटें जीतकर अपनी स्थिति और मजबूत कर ली है। विपक्ष के लिए यह नतीजे एक बड़े झटके के रूप में देखे जा रहे हैं।

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने जीत का श्रेय प्रधानमंत्री मोदी के प्रति जनता के भरोसे को दिया। उन्होंने कहा, ‘मैंने पहली बार बिना किसी आरोप-प्रत्यारोप के केवल अपनी योजनाओं के दम पर सकारात्मक प्रचार किया, जिसे लोगों ने स्वीकार किया।फडणवीस ने बताया कि उन्होंने पहले ही अनुमान लगाया था कि नगर परिषद अध्यक्षों में करीब 75 प्रतिशत महायुति से होंगे और जनता ने ठीक वैसा ही फैसला दिया है। अब तक के आंकड़ों के मुताबिक भाजपा के करीब 129 नगर परिषद अध्यक्ष चुने गए हैं। महायुति की तीनों सहयोगी पार्टियों को मिलाकर नगर परिषद अध्यक्षों में 75 प्रतिशत हिस्सेदारी हुई है। इससे यह भी साफ हो गया है कि भाजपा महाराष्ट्र की नंबर वन पार्टी बनकर उभरी है।फडणवीस ने कहा कि पार्षदों के चुनाव में भाजपा ने नया रिकॉर्ड बनाया है। करीब 3300 पार्षद भाजपा से चुने गए हैं। यह आंकड़ा जनता के भारी समर्थन को दिखाता है। उन्होंने कहा कि यह प्रदर्शन विधानसभा चुनावों के बराबर ही नहीं, बल्कि उससे भी बेहतर है। यह जीत 2017 से कहीं बड़ी है और पिछले तीन दशकों में ऐसी सफलता नहीं मिली थी।हार का सामना कर रहे महा विकास अघाड़ी के नेताओं ने चुनाव आयोग पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस के हर्षवर्धन सपकाल ने तंज कसते हुए आयोग को महायुति की ‘मदद’ के लिए बधाई दी। वहीं, शिवसेना (यूबीटी) के अंबादास दानवे ने आरोप लगाया कि सत्ताधारी दलों ने बाहुबल और धनबल का इस्तेमाल किया है।विदर्भ और पश्चिम महाराष्ट्र जैसे इलाकों में भी बीजेपी और महायुति का प्रदर्शन काफी बेहतर रहा है, जबकि विपक्षी गठबंधन पिछड़ गया ।

उत्तराखंड के प्रदेश के स्कूलों में गीता के श्लोक का पाठ हुआ अनिवार्य

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मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने रविवार को घोषणा की है कि उत्तराखंड सरकार ने स्कूलों में श्रीमद् भगवत गीता के श्लोक के पाठ को अनिवार्य किया है। इसका मकसद छात्रों को भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों और जीवन दर्शन से जोड़ना है। इससे छात्रों के सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त होगा।सीएम के निर्देश पर शिक्षा विभाग ने शिक्षकों के लिए यह निर्देश जारी किया था कि शिक्षक समय-समय पर भगवत गीता के श्लोकों की व्याख्या करें। अब सीएम धामी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में भी यह बात कही।

सीएम ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में यह बात कही साथ ही सीएम ने एक वीडियो पोस्ट में, अल्मोड़ा जिले में स्थित ऐतिहासिक कटारमल सूर्य मंदिर का जिक्र किया। भगवान सूर्यदेव को समर्पित यह मंदिर कत्यूरी काल की उत्कृष्ट वास्तुकला और गहरी भक्ति का प्रमाण है। सीएम धामी ने मंदिर के महत्व पर जोर देते हुए कहा, यह उत्तराखंड के गौरवशाली इतिहास और जीवंत सांस्कृतिक परंपरा को दर्शाता है!

शिक्षा विभाग ने शिक्षकों के लिए यह निर्देश जारी किया था कि शिक्षक समय-समय पर भगवत गीता के श्लोकों की व्याख्या करें। साथ ही छात्र-छात्राओं को जानकारी दें कि श्रीमद् भगवत गीता के सिद्धांत किस तरह से मूल्य, व्यवहार, नेतृत्व कौशल, निर्णय क्षमता, भावनात्मक संतुलन और वैज्ञानिक सोच विकसित करते हैं। छात्र-छात्राओं को यह भी जानकारी दी जाए कि श्रीमद् भगवत गीता में दिए गए उपदेश सांख्य, मनोविज्ञान, तर्कशास्त्र, व्यवहार विज्ञान एवं नैतिक दर्शन पर आधारित हैं, जो धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण से संपूर्ण मानवता के लिए उपयोगी हैं।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर श्रीमद् भगवत गीता और रामायण को राज्य पाठ्यचर्या की रुपरेखा में शामिल कर लिया गया है। माध्यमिक शिक्षा निदेशक डॉ. मुकुल कुमार सती के मुताबिक विद्यालयी शिक्षा के लिए राज्य पाठ्यचर्या की रूपरेखा की सिफारिश के अनुरूप पाठ्य पुस्तकों को अगले शिक्षा सत्र से लागू किया जाना प्रस्तावित है। शिक्षा निदेशक ने कहा, श्रीमद् भगवत गीता को जीवन के हर क्षेत्र में पथ प्रदर्शक माना गया है। इसका वैज्ञानिक आधार भी है। जो न केवल एक धार्मिक ग्रंथ है बल्कि यह मानव जीवन के विज्ञान, मनोविज्ञान तथा व्यवहार शास्त्र का भी उत्कृष्ट ग्रंथ है। जिसमें मनुष्य के व्यवहार, निर्णय क्षमता, कर्तव्यनिष्ठा, तनाव प्रबंधन एवं विवेकपूर्ण जीवन जीने के वैज्ञानिक तर्क निहित हैं। विद्यालयों में छात्र-छात्राओं को एक श्रेष्ठ नागरिक बनाने के दृष्टिगत श्रीमद् भगवत गीता मील का पत्थर साबित हो सकती है।

उपराष्ट्रपति ने इंदौर में अटल बिहारी वाजपेयी के जन्म शताब्दी समारोह में भाग लिया

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भारत के उपराष्ट्रपति श सी. पी. राधाकृष्णन ने आज मध्य प्रदेश के इंदौर में भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी के जन्म शताब्दी समारोहों में भाग लिया। यह कार्यक्रम अटल फाउंडेशन द्वारा आयोजित किया गया था।

तमिल क्लासिक तिरुक्कुरल के एक दोहे को याद करते हुए, उपराष्ट्रपति ने कहा कि जन्म से सभी मनुष्य समान होते हैं, जबकि महानता अपने कर्मों से प्राप्त की जाती है। उपराष्ट्रपति ने कहा कि श्री अटल बिहारी वाजपेयी कोई साधारण व्यक्ति नहीं थे बल्कि स्वयं एक मिशन थे, जो सिद्धांतों और मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता में हमेशा “अटल” बने रहे। उन्होंने देखा कि श्री अटल बिहारी वाजपेयी को एक राजनेता, प्रशासक, सांसद, कवि के रूप में उनके उदाहरणीय कार्यों के लिए याद किया जाता है और सम्मानित किया जाता है, और सबसे ऊपर, एक महान मानव के रूप में।

उपराष्ट्रपति ने नोट किया कि श्री वाजपेयी संवाद, समावेशी विकास और मजबूत लेकिन मानवीय शासन में गहराई से विश्वास रखते थे। उन्होंने कहा कि श्री अटल जी ने गरिमा और शालीनता के साथ सार्वजनिक विमर्श को ऊंचा उठाया और यह प्रदर्शित किया कि राजनीति सिद्धांतपूर्ण और करुणामय हो सकती है। उन्होंने जोड़ा कि यही कारण है कि श्री वाजपेयी का जन्मदिन अच्छे शासन दिवस के रूप में मनाया जाता है।व्यक्तिगत संस्मरण साझा करते हुए, उपराष्ट्रपति ने याद किया कि श्री वाजपेयी सांसदों के लिए हमेशा सुलभ रहते थे और राष्ट्र-निर्माण के लिए सभी पक्षों से सुझावों के प्रति खुले रहते थे। उन्होंने श्री वाजपेयी के प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड राज्यों के गठन का उल्लेख किया, इसे शासन और प्रशासन को बेहतर बनाने के लिए दूरदर्शी कदम बताते हुए।

राष्ट्र-निर्माता के रूप में श्री वाजपेयी के योगदान को रेखांकित करते हुए, उपराष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और गोल्डन क्वाड्रिलेटरल परियोजना जैसे ऐतिहासिक पहलों का उदाहरण दिया।

1998 के पोखरण परमाणु परीक्षणों का जिक्र करते हुए, उपराष्ट्रपति ने कहा कि श्री वाजपेयी के नेतृत्व ने भारत को आत्मविश्वासी और आत्मनिर्भर राष्ट्र के रूप में दृढ़ता से स्थापित किया। उन्होंने कहा कि श्री वाजपेयी का विज्ञान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आगे बढ़ाया जा रहा है, जो विकसित भारत @2047 के लक्ष्य की ओर राष्ट्र को निर्देशित कर रहे हैं।

उपराष्ट्रपति ने श्री वाजपेयी के तमिलनाडु से गहरे जुड़ाव को भी याद किया, उनकी भाषाई विविधता, सांस्कृतिक बहुलता और संवाद के प्रति सम्मान का उल्लेख करते हुए, जिसने उन्हें राजनीतिक और वैचारिक सीमाओं को पार करते हुए प्रशंसा दिलाई।

श्री अटल बिहारी वाजपेयी को आधुनिक भारत को ईमानदारी, बुद्धिमत्ता और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अटल प्रतिबद्धता के साथ ढालने वाली एक ऊंचा व्यक्तित्व बताते हुए, उपराष्ट्रपति ने कहा कि उनका जीवन राष्ट्र की याद दिलाता है कि नेतृत्व केवल सत्ता के बारे में नहीं, बल्कि सेवा, जिम्मेदारी और लोगों के प्रति प्रतिबद्धता के बारे में है।

उपराष्ट्रपति ने डेली कॉलेज परिसर में देवी अहिल्याबाई होलकर की प्रतिमा का भी अनावरण किया। उपराष्ट्रपति ने अहिल्या बाई होलकर की प्रतिमा के उद्घाटन का हिस्सा बनने पर गौरवान्वित महसूस करने की बात कही। उन्हें लोगों के कल्याण और समृद्धि के लिए निस्वार्थ रूप से जीवन समर्पित करने वाली दूरदर्शी शासिका बताते हुए उन्होंने इंदौर को देश के सबसे स्वच्छ शहर के रूप में लगातार शीर्ष स्थान प्राप्त करने पर बधाई दी और इसे सामूहिक नागरिक जिम्मेदारी का प्रतिबिंब बताया।

मध्य प्रदेश के राज्यपाल श्री मांगूभाई पटेल, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, साथ ही अन्य गरिमामय व्यक्तियों ने इस कार्यक्रम में भाग लिया।

मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान ने विश्व ध्यान दिवस मनाया

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आयुष मंत्रालय के अंतर्गत मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान (एमडीएनआईवाई) ने आज विश्व ध्यान दिवस मनाया। इस अवसर पर विशेष ध्यान सत्रों का आयोजन किया गया।कार्यक्रम में प्रख्यात विद्वान, योग करने वाले और उत्साही लोग एक साथ आए। इस आयोजन ने बढ़ते वैश्विक तनाव के बोझ से निपटने में प्राचीन योगिक ज्ञान और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के संगम को रेखांकित किया।

एमडीएनआईवाई के निदेशक प्रो. (डॉ.) काशीनाथ समागंडी ने उपस्थित  को संबोधित करते हुए आज के प्रतिस्पर्धी विश्व में ध्यान के नैदानिक ​​महत्व का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि लगभग 60 से 70 प्रतिशत तनाव व्यावसायिक प्रकृति का होता है और पतंजलि योगसूत्र में वर्णित तकनीकों के माध्यम से शरीर और मन को संतुलित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया है।  समकालीन शोध का हवाला देते हुए उन्होंने समझाया कि न्यूरोइमेजिंग अध्ययनों से पता चलता है कि ओम का जाप करने से एमिग्डाला – मस्तिष्क का भय और नकारात्मक भावनाओं का केंद्र- की गतिविधि कम हो जाती है, क्योंकि यह प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स को सक्रिय करता है जो भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करता है। एक एफएमआरआई अध्ययन ने विश्राम अवस्था की तुलना में तेज आवाज में ओम का जाप करने के दौरान एमिग्डाला की महत्वपूर्ण निष्क्रियता को प्रदर्शित किया है। उन्होंने अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (एआईआईएमएस), नई दिल्ली के निष्कर्षों का भी हवाला दिया जो यह दर्शाते हैं कि योग निद्रा से मस्तिष्क की क्रिया में परिवर्तन होते हैं जो गहन विश्राम और भावनात्मक विनियमन से जुड़े होते हैं जिससे तनाव कम होता है।

ध्यान की आध्यात्मिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हुए, नई दिल्ली के रामकृष्ण मिशन के स्वामी मुक्तिमयानंद ने प्रतिभागियों को स्थायी शांति के लिए अंतर्मुखी होने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मानसिक उतार-चढ़ाव को शांत करने की शुरुआत आत्म-समझ और अपने सच्चे स्वरूप – सत चित आनंद स्वरूप – की पहचान से होती है, जो प्रेम और करुणा पर आधारित है। उन्होंने अहंकार, ईर्ष्या और अधूरी इच्छाओं पर काबू पाने के लिए यम और नियम का पालन करने पर भी बल दिया जो आंतरिक सामंजस्य को भंग करते हैं।इस कार्यक्रम में विभिन्न ध्यान तकनीकों का व्यावहारिक प्रदर्शन किया गया। इसका उद्देश्य प्रतिभागियों को मानसिक और भावनात्मक लचीलेपन को बढ़ाने के लिए प्रभावी उपकरण प्रदान करना था। कार्यक्रम का समापन “स्वस्थ मन, स्वस्थ भारत” के दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के लिए दैनिक जीवन में ध्यान को शामिल करने के सामूहिक संकल्प के साथ हुआ।

इस कार्यक्रम में विश्वास मेडिटेशन, नई दिल्ली के श अतुल चावला, एमडीएनआईवाई के कार्यक्रम अधिकारी डॉ. आई.एन. आचार्य और एमडीएनआईवाई के संचार एवं प्रलेखन अधिकारी मोहम्मद तैयब आलम उपस्थित थे। कार्यक्रम में योगाभ्यास करने वालों, छात्रों, संकाय सदस्यों और विभिन्न विभागों के अधिकारियों सहित लगभग 700 प्रतिभागियों ने भाग लिया।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने पिछले वर्ष 21 दिसंबर को विश्व ध्यान दिवस घोषित किया था, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का आनंद लेने के अधिकार की पुष्टि की गई थी। यह पहल आयुष मंत्रालय के उन निरंतर प्रयासों के अनुरूप है, जिनका उद्देश्य स्वस्थ समाज के लिए पारंपरिक भारतीय ज्ञान को आधुनिक जीवनशैली के साथ एकीकृत करना है।