*भारत सचमुच अपने फैसले स्वयं ले रहा* 

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किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए रणनीतिक स्वायत्तता केवल विदेश नीति की तकनीकी भाषा नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न है। जब बड़े फैसले बाहरी दबाव, प्रतिबंधों के डर या वैश्विक छवि सँवारने की चिंता से लिए जाते हैं, तो राष्ट्र धीरे‑धीरे नीति‑निर्माता से ज़्यादा “प्रबंधित सहयोगी” बन जाता है। सचमुच मजबूत भारत वह होगा, जो अमेरिका, रूस, चीन और यूरोप—सभी से संवाद रखे, पर अपने हितों पर अंतिम निर्णय स्वयं ले। तालियाँ, सुर्खियाँ और फोटो‑ऑप्स क्षणिक हैं; लेकिन राष्ट्रीय हित के पक्ष में लिया गया स्वतंत्र स्टैंड ही किसी देश की दीर्घकालिक गरिमा तय करता है।

– डॉ. प्रियंका सौरभ

किसी भी राष्ट्र की मजबूती उसके सैन्य बजट, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दिए गए भाषणों या विदेशी नेताओं के साथ खिंचवाई गई तस्वीरों से नहीं मापी जाती। असली ताक़त इस बात में निहित होती है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप कितनी स्वतंत्रता से निर्णय ले पाता है। भारत आज खुद को “मजबूत राष्ट्र”, “विश्वगुरु” और “उभरती वैश्विक शक्ति” के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, पर मूल प्रश्न यही है: क्या भारत सचमुच अपने फैसले स्वयं ले रहा है, या वैश्विक शक्तियों के संकेतों के अनुरूप अपने कदम समायोजित कर रहा है? 

विदेश नीति किसी भी राष्ट्र के आत्मसम्मान और संप्रभुता का सबसे स्पष्ट दर्पण होती है; यहीं तय होता है कि वह किन देशों से मित्रता करेगा, किससे दूरी बनाए रखेगा, और किन शर्तों पर वैश्विक व्यवस्था में भागीदारी करेगा। भारत ने दशकों तक गुटनिरपेक्षता और बाद में **रणनीतिक** स्वायत्तता के नाम पर यही संदेश दिया कि वह किसी भी शक्ति‑गुट का स्थायी अनुयायी नहीं, बल्कि अपने हितों के अनुसार साझेदारी करने वाला स्वतंत्र खिलाड़ी है। शीतयुद्ध के दौर में भारत ने अमेरिका और सोवियत संघ, दोनों से संबंध रखते हुए भी औपचारिक सैन्य गठबंधनों से दूरी बनाए रखी; इसी रुख ने नव‑स्वतंत्र एशियाई और अफ़्रीकी देशों के लिए उसे एक वैचारिक प्रेरणा बनाया। नई सदी में, खासकर पिछले कुछ वर्षों में, यह संतुलन पहले से कहीं अधिक दबाव में है—चाहे वह अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिद्वंद्विता हो या रूस‑यूक्रेन युद्ध के बाद की ध्रुवीकृत दुनिया।

ईरान का चाबहार बंदरगाह भारत के लिए सिर्फ एक व्यापारिक ठिकाना नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया, अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधे पहुँच का वह द्वार था, जो पाकिस्तान को बायपास करते हुए चीन के ग्वादर और बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के दबद्बे को संतुलित कर सकता था। अमेरिकी प्रतिबंधों और फिर चाबहार पर से छूट हटने के बाद परियोजना पर भारतीय प्रतिबद्धता लगातार कमजोर पड़ती गई; हाल की रिपोर्टें यह संकेत देती हैं कि भारत पोर्ट पर अपनी दीर्घकालिक उपस्थिति को सीमित करने की दिशा में बढ़ चुका है। यहाँ असली सवाल तकनीकी नहीं, राजनीतिक है: क्या भारत ने अपने दीर्घकालिक भू‑रणनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए कोई स्वतंत्र स्टैंड लिया, या फिर वॉशिंगटन की नाराज़गी के डर ने उसे व्यवहारिक विकल्पों से पीछे हटने पर मजबूर कर दिया? 

रूस से रियायती दर पर कच्चा तेल खरीदना भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक विवेक का प्रश्न है, न कि केवल कूटनीतिक जिद का। पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने शुरुआती चरण में साफ संकेत दिया कि वह अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार ही ऊर्जा स्रोत चुनेगा, और इसी तर्क के तहत रूस से तेल आयातों में तेज उछाल भी देखा गया। समय के साथ अमेरिका और यूरोपीय देशों से आने वाले “नैतिक उपदेश” और अप्रत्यक्ष प्रतिबंधों के संकेतों ने अतिरिक्त दबाव बनाया; कुछ बड़े कॉर्पोरेट आयातकों ने रूसी तेल की खरीद घटाकर पश्चिम‑समर्थक विकल्पों की ओर झुकाव दिखाया, भले ही कुल मिलाकर रूसी तेल आयात अभी भी ऊँचे बने हुए हों। मजबूत राष्ट्र वह होता है जो दूसरे देशों के “इमेज मैनेजमेंट” या नैरेटिव से नहीं, अपने नागरिकों के आर्थिक हितों और ऊर्जा सुरक्षा से संचालित हो—वरना “रणनीतिक स्वायत्तता” की जगह “रणनीतिक संकोच” ले लेता है।

सबसे खतरनाक प्रवृत्ति यह है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मिली तालियाँ और सुर्खियाँ, निर्णय‑स्वायत्तता का विकल्प बनती जा रही हैं। विदेशी संसदों में दिए भाषण, वैश्विक मीडिया में छपी प्रशंसात्मक हेडलाइनें या किसी महाशक्ति की “पीठ थपथपाहट” को राष्ट्रीय सम्मान का प्रमाणपत्र बनाकर पेश किया जा रहा है, जबकि हालिया इतिहास इराक, लीबिया और अफ़ग़ानिस्तान जैसे उदाहरणों से भरा है कि बाहरी समर्थन कितनी जल्दी दिशा बदल लेता है। सैन्य और सुरक्षा संबंधी निर्णय किसी भी लोकतंत्र की संप्रभुता की अंतिम रेखा होते हैं; यदि यहाँ भी “किसी और की स्वीकृति” या “वैश्विक संदेश” की चिंता हावी हो जाए, तो यह केवल नीति नहीं, स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न है। 

ऐसे समय में लोकतांत्रिक समाज की असली परीक्षा यह है कि क्या वह विदेश नीति और सुरक्षा रणनीति पर आलोचनात्मक सवाल पूछने वालों को देशद्रोही ठहराए बिना बहस की जगह दे सकता है। लोकतंत्र में असहमति कमजोरी नहीं, बल्कि **लोक‑नियंत्रण** की बुनियादी शर्त है; देशभक्ति का अर्थ सत्ता से सहमति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित के लिए सच बोलने का साहस है। 

“आत्मनिर्भर भारत” की सच्ची कसौटी यह नहीं कि कितने मोबाइल या कारें देश में बन रही हैं, बल्कि यह है कि भारत अपनी विदेश नीति, ऊर्जा विकल्पों और रणनीतिक साझेदारियों पर कितना स्वतंत्र निर्णय ले पाता है। भारत आज एक चौराहे पर खड़ा है: एक रास्ता उसे उस मुकाम तक ले जा सकता है जहाँ वह अमेरिका, रूस, चीन और यूरोप सभी से संबंध रखे, पर किसी के आगे झुके नहीं; दूसरा रास्ता उसे एक प्रभावशाली, पर आश्रित सहयोगी में बदल सकता है, जो हर बड़े निर्णय से पहले वॉशिंगटन या किसी और राजधानी की प्रतिक्रिया का इंतज़ार करे। मजबूत राष्ट्र वही है जो तालियाँ बटोरने की जगह अपना स्टैंड बचाकर चलता है; आने वाले वर्षों में भारत की असली परीक्षा यही होगी कि वह “प्रबंधित सहयोगी” बनना चुनता है या सचमुच एक संप्रभु, आत्मविश्वासी शक्ति के रूप में खड़ा होता है।

#भारत

 

डॉ. प्रियंका सौरभ
−कवयित्री | सामाजिक चिंतक | स्तंभकार

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