मेलबर्न, 27 दिसंबर (हि.स.)। इंग्लैंड ने लगभग 15 साल और लगातार 18 मैचों के इंतजार को खत्म करते हुए ऑस्ट्रेलिया में टेस्ट जीत दर्ज की। मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड (एमसीजी) पर खेले गए बॉक्सिंग डे टेस्ट में इंग्लैंड ने ऑस्ट्रेलिया को चार विकेट से हराकर एशेज सीरीज में बड़ी उपलब्धि हासिल की। मुश्किल पिच पर मिले 175 रन के लक्ष्य को इंग्लैंड के बल्लेबाजों ने आक्रामक अंदाज में हासिल किया।
यह टेस्ट इतिहास में महज पांचवां मौका था जब किसी सीरीज में दो-दो दिन में खत्म होने वाले एक से अधिक मैच खेले गए। ऑस्ट्रेलिया में इससे पहले केवल दो बार ऐसा हुआ था। दो दिनों में रिकॉर्ड 1.86 लाख से ज्यादा दर्शकों की मौजूदगी के बावजूद क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया को इस टेस्ट से आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा, हालांकि इंग्लैंड के लिए यह जीत कहीं ज्यादा मायने रखती थी क्योंकि टीम एक और क्लीन स्वीप से बचने में सफल रही।
इंग्लैंड की जीत में जैकब बेथेल ने अहम भूमिका निभाई। इस टेस्ट के लिए टीम में लौटे बेथेल ने 40 रन की उपयोगी पारी खेली और अपनी प्रतिभा की झलक दिखाई। हालांकि उनके आउट होने के बाद इंग्लैंड को थोड़ी घबराहट का सामना करना पड़ा। जो रूट एलबीडब्ल्यू हुए और बेन स्टोक्स मिशेल स्टार्क की गेंद पर आउट हो गए, लेकिन अंत में चार लेग बाई ने इंग्लैंड को जीत दिला दी। यह ऑस्ट्रेलिया में 1932 के बाद पहला टेस्ट था जिसमें कोई भी बल्लेबाज अर्धशतक नहीं लगा सका।
इससे पहले ऑस्ट्रेलिया ने दूसरी पारी में केवल 132 रन बनाए। इंग्लैंड के लिए कप्तान बेन स्टोक्स और ब्राइडन कार्स ने सात विकेट साझा किए, जबकि जोश टंग ने दो विकेट झटके। गस एटकिंसन के हैमस्ट्रिंग चोट के कारण मैदान छोड़ने के बावजूद इंग्लैंड के गेंदबाजों ने शानदार प्रदर्शन किया।
175 रन के लक्ष्य का पीछा करने उतरी इंग्लैंड की शुरुआत आक्रामक रही। जैक क्रॉली और बेन डकेट ने सात ओवर में ही 51 रन जोड़कर दबाव खत्म कर दिया। डकेट ने मिशेल स्टार्क को पहली ही गेंद पर बाउंड्री लगाई, जबकि क्रॉली ने माइकल नेसर के ओवर में बड़ा शॉट खेलकर मैच का रुख इंग्लैंड की ओर मोड़ दिया।
हालांकि डकेट के आउट होने और कुछ विकेट गिरने के बाद मुकाबला थोड़ा रोमांचक हुआ, लेकिन ऑस्ट्रेलिया के पास बचाव के लिए पर्याप्त रन नहीं थे। दूसरी ओर, ऑस्ट्रेलिया की बल्लेबाजी दूसरी पारी में पूरी तरह लड़खड़ा गई। मार्नस लाबुशेन, ट्रैविस हेड और उस्मान ख्वाजा जैसे बल्लेबाज बड़ी पारी नहीं खेल सके।
अंततः इंग्लैंड ने लक्ष्य हासिल कर लिया और मेलबर्न टेस्ट चार विकेट से अपने नाम कर लिया। इस जीत के साथ इंग्लैंड ने न सिर्फ ऑस्ट्रेलिया में लंबे समय से चला आ रहा सूखा खत्म किया, बल्कि एशेज सीरीज में भी खुद को मजबूत स्थिति में ला खड़ा किया।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की के बीच रविवार को फ्लोरिडा में होने वाली अहम शांति बैठक से पहले रूस ने यूक्रेन पर बड़ा हमला कर दिया है।27 दिसंबर को यूक्रेन की राजधानी कीव पर रूस ने ताबड़तोड़ मिसाइल और ड्रोन हमले किए। शहर और आसपास के इलाकों में कई विस्फोटों की आवाज सुनी गई।
पिछले चार वर्षों से जारी रूस-युक्रेन युद्ध के संदर्भ में यह सबसे महत्वपूर्ण सप्ताहांत माना जा रहा था लेकिन इसकी शुरुआत शुक्रवार को यूक्रेन की राजधानी कीव में हवाई हमले के सायरनों की आवाज से हुई। मीडिया समूह कीव इंडिपेंडेंट के मुताबिक 7 दिसंबर की रात रूस ने कीव पर कई हाइपरसोनिक मिसाइलें, चार बैलिस्टिक मिसाइलें और कई क्रूज मिसाइलें दागीं, जिसके बाद बड़े पैमाने पर बैलिस्टिक मिसाइल का हमला हुआ।
राजधानी और कीव ओब्लास्ट में कई विस्फोटों की आवाजें सुनी गईं। इस हमले में कीव से लगभग पाँच किलोमीटर उत्तर में स्थित विशहोरोड में एक ऊंची इमारत का कुछ हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया, जबकि कीव ओब्लास्ट के बोरिसपिल जिले में कई गोदामों के साथ-साथ दो कारें क्षतिग्रस्त हो गईं।
कीव ओब्लास्ट के गवर्नर मिकोला कलाश्निक ने रूसी हमले की पुष्टि करते हुए कहा कि महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे पर एक बार फिर हमला हुआ है। पश्चिमी यूक्रेन के इवानो-फ्रांकिवस्क ओब्लास्ट में हुए हमले में एक व्यक्ति घायल हो गया और उसे अस्पताल ले जाया गया।
इस बीच, यूक्रेन की वायुसेना ने कई क्षेत्रों में रूसी ड्रोन और मिसाइलों के निरंतर खतरे की चेतावनी दी है। वायु सेना ने कीव और आसपास के इलाकों में ड्रोन सक्रिय पाए। एयर फोर्स के मुताबिक ड्रोन कीव शहर के ऊपर देखे गए, जबकि कीव क्षेत्र के वेलिका डिमेरका और पेरेयास्लाव गांव के पश्चिमी इलाकों में भी ड्रोन की गतिविधि दर्ज की गई।
रूस के ताजा हमले से पहले शुक्रवार को यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने कहा था कि ट्रंप के साथ बैठक से शांति समझौते की दिशा में कदम बढ़ सकते हैं। यूक्रेनी और अमेरिकी अधिकारियों द्वारा तैयार किया गया 20-बिंदुओं का शांति प्लान लगभग तैयार है। जबकि अमेरिकी डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि कोई भी शांति समझौता उनकी मंजूरी के बिना लागू नहीं होगा। उल्लेखनीय है कि पिछले चार साल से जारी रूस-यूक्रेन युद्ध को रोकने की कूटनीतिक कोशिशों के बीच रविवार को फ्लोरिडा में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की की अहम शांति वार्ता होने वाली है। अमेरिका सहित दुनिया के कई देश रूस-यूक्रेन युद्ध रोकने की हिमायत करते हुए कूटनीतिक कोशिशें कर रहे हैं जिनमें भारत भी शामिल है।
भारत में बाल तस्करी आज केवल एक सामाजिक विकृति नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित, बहुस्तरीय और संगठित आपराधिक तंत्र का रूप ले चुकी है। यह अपराध उन कमजोर सामाजिक-आर्थिक संरचनाओं में जड़ें जमाता है जहाँ गरीबी, अशिक्षा, विस्थापन, लैंगिक असमानता और प्रशासनिक उदासीनता एक साथ मौजूद रहती हैं। बाल तस्करी की भयावहता केवल इस तथ्य में निहित नहीं है कि बच्चे शोषण का शिकार बनते हैं, बल्कि इस बात में भी है कि यह अपराध अत्यंत कुशलता से कानून और न्यायिक प्रक्रिया की सीमाओं का लाभ उठाता है। इसी कारण, कड़े कानूनी प्रावधानों और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के बावजूद भारत में बाल तस्करी से जुड़े मामलों में दोषसिद्धि दर चिंताजनक रूप से कम बनी हुई है।
बाल तस्करी को ‘स्तरित संगठित अपराध’ कहा जाना मात्र एक सैद्धांतिक अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि यह इसके कार्य-तंत्र की वास्तविक प्रकृति को दर्शाता है। इस अपराध में सामान्यतः कोई एक केंद्रीय संचालक नहीं होता, बल्कि अनेक स्वतंत्र लेकिन परस्पर पूरक इकाइयाँ कार्य करती हैं। भर्ती करने वाला व्यक्ति प्रायः स्थानीय स्तर पर सक्रिय होता है, जो बच्चों या उनके अभिभावकों को शिक्षा, रोजगार, बेहतर जीवन या विवाह जैसे झूठे वादों के माध्यम से फुसलाता है। इसके बाद परिवहन से जुड़े एजेंट, आश्रय उपलब्ध कराने वाले नेटवर्क, दस्तावेज़ों की जालसाजी करने वाले समूह और अंततः शोषण करने वाले व्यक्ति या संस्थाएँ अलग-अलग स्तरों पर सक्रिय होती हैं। इन सभी के बीच प्रत्यक्ष संपर्क न्यूनतम होता है, जिससे पूरे अपराध तंत्र को एक सूत्र में बाँधकर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना अत्यंत कठिन हो जाता है।
इस स्तरित संरचना का सबसे बड़ा लाभ अपराधियों को यह मिलता है कि प्रत्येक कड़ी स्वयं को सीमित भूमिका तक प्रतिबंधित दिखा सकती है। कोई स्वयं को केवल ‘मददगार’, कोई ‘दलाल’, तो कोई ‘नियोक्ता’ बताकर अपनी आपराधिक मंशा से पल्ला झाड़ लेता है। परिणामस्वरूप, अभियोजन पक्ष के लिए आपराधिक षड्यंत्र, साझा मंशा और संगठित अपराध को सिद्ध करना लगभग असंभव हो जाता है। यह जटिलता तब और बढ़ जाती है जब तस्करी अंतर-राज्यीय या अंतरराष्ट्रीय स्वरूप ग्रहण कर लेती है, जहाँ विभिन्न राज्यों के कानून, पुलिस तंत्र और न्यायिक प्रक्रियाएँ एक-दूसरे से समन्वित नहीं हो पातीं।
आधुनिक समय में डिजिटल प्रौद्योगिकी ने इस अपराध को और अधिक अदृश्य बना दिया है। एन्क्रिप्टेड सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, गुप्त मैसेजिंग ऐप्स और डिजिटल भुगतान प्रणालियों के माध्यम से तस्कर न केवल बच्चों की आवाजाही को नियंत्रित करते हैं, बल्कि साक्ष्यों को भी शीघ्र नष्ट कर देते हैं। इस स्थिति में पारंपरिक जाँच पद्धतियाँ अपर्याप्त सिद्ध होती हैं और अभियोजन का पूरा बोझ अंततः पीड़ित की गवाही पर आ टिकता है।
यहीं से बाल तस्करी से जुड़े मामलों में साक्ष्यगत चुनौतियों की वास्तविक समस्या प्रारंभ होती है। नाबालिग पीड़ित अक्सर भय, मानसिक आघात, सामाजिक कलंक और आर्थिक निर्भरता के कारण स्वतंत्र रूप से अपनी बात रखने की स्थिति में नहीं होते। लंबे समय तक चली शारीरिक और मानसिक यातना उनके स्मृति-तंत्र को प्रभावित करती है, जिसके कारण उनकी गवाही में असंगतियाँ, रिक्तताएँ और विरोधाभास स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होते हैं। इसके बावजूद, परंपरागत न्यायिक दृष्टिकोण में इन असंगतियों को गवाही की अविश्वसनीयता के रूप में देखा जाता रहा है।
इतिहासतः भारतीय न्याय प्रणाली में तस्करी के शिकार बच्चों को कई बार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सह-अपराधी की तरह देखा गया। विशेष रूप से यौन शोषण या अवैध श्रम से जुड़े मामलों में यह धारणा बनी कि पीड़ित ने परिस्थितियों से समझौता किया या किसी स्तर पर अपराध में भागीदारी निभाई। इस दृष्टिकोण के कारण उनकी गवाही को अतिरिक्त पुष्टिकरण की आवश्यकता बताई गई, जबकि संगठित अपराधों में स्वतंत्र साक्ष्य उपलब्ध होना पहले से ही दुर्लभ होता है। नतीजतन, अभियुक्त संदेह का लाभ उठाकर बरी होते रहे और पीड़ित न्याय से वंचित रह गए।
शिकायत दर्ज करने में देरी भी एक बड़ी समस्या रही है। सामाजिक भय, परिवार की प्रतिष्ठा, आर्थिक असुरक्षा और अपराधियों की धमकियों के कारण पीड़ित या उनके अभिभावक प्रायः लंबे समय तक चुप रहते हैं। न्यायालयों द्वारा इस देरी को संदेह की दृष्टि से देखा जाना अभियोजन को और कमजोर कर देता है। इसके अतिरिक्त, अपराध की पूरी श्रृंखला को क्रमबद्ध रूप से न बता पाना, विशेषकर तब जब अपराध कई महीनों या वर्षों तक चला हो, पीड़ित की गवाही को तकनीकी आधार पर खारिज करने का कारण बनता रहा है।
इसी पृष्ठभूमि में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नाबालिगों को ‘पीड़ित गवाह’ के रूप में मान्यता देने का निर्देश भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में एक गुणात्मक परिवर्तन का संकेत देता है। यह निर्देश यह स्वीकार करता है कि बाल तस्करी के शिकार बच्चे अपराध के सहभागी नहीं, बल्कि संरचनात्मक शोषण के शिकार हैं। ‘पीड़ित गवाह’ की अवधारणा गवाही के मूल्यांकन के पारंपरिक मानकों को मानवीय यथार्थ के साथ जोड़ती है और न्यायालयों को यह स्मरण कराती है कि आघात-ग्रस्त स्मृति पूर्णतः तार्किक या रैखिक नहीं होती।
इस न्यायिक दृष्टिकोण के तहत अब यह अनिवार्य नहीं रह जाता कि पीड़ित की गवाही हर बिंदु पर पूर्णतः सुसंगत और त्रुटिहीन हो। सूक्ष्म विरोधाभास, घटनाओं के क्रम में अस्पष्टता या विवरणों में अंतर को स्वाभाविक मानवीय प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाता है, न कि झूठ या मनगढ़ंत कहानी के प्रमाण के रूप में। इससे अभियोजन को यह अवसर मिलता है कि वह अपराध की व्यापक संरचना को परिस्थितिजन्य साक्ष्यों और पीड़ित के कथन के संयुक्त मूल्यांकन के आधार पर प्रस्तुत कर सके।
‘पीड़ित गवाह’ का दर्जा यह भी सुनिश्चित करता है कि शिकायत में देरी को स्वचालित रूप से गवाही की कमजोरी न माना जाए। भय, सामाजिक दबाव और मानसिक आघात को न्यायिक संज्ञान में लेते हुए अब देरी को परिस्थितिजन्य वास्तविकता के रूप में समझा जाता है। यह परिवर्तन विशेष रूप से बाल तस्करी जैसे अपराधों में महत्वपूर्ण है, जहाँ पीड़ित की चुप्पी स्वयं अपराध की निरंतरता का परिणाम होती है।
इसके अतिरिक्त, यह दृष्टिकोण स्मृति-लोप और विखंडित स्मृति को भी वैध मान्यता देता है। आघात के कारण उत्पन्न स्मृति-विघटन में पीड़ित को अपराध की पूरी श्रृंखला याद न रह पाना स्वाभाविक है। पहले जहाँ यह स्थिति अभियुक्त के पक्ष में जाती थी, वहीं अब न्यायालयों को यह विवेक प्राप्त होता है कि वे गवाही के मूल भाव और संदर्भ को महत्व दें, न कि केवल तकनीकी पूर्णता को।
इस प्रकार, ‘पीड़ित गवाह’ की अवधारणा न्यायिक प्रक्रिया को औपचारिकता-प्रधान से पीड़ित-केंद्रित यथार्थवाद की ओर ले जाती है। यह परिवर्तन न केवल दोषसिद्धि दर बढ़ाने की क्षमता रखता है, बल्कि संगठित अपराधों के मनोवैज्ञानिक और सामाजिक आयामों को भी न्यायिक विमर्श में स्थान देता है। जब पीड़ित की आवाज़ को संदेह के बजाय संवेदना और समझ के साथ सुना जाता है, तभी न्याय प्रणाली अपने वास्तविक उद्देश्य की पूर्ति कर पाती है।
फिर भी, यह स्वीकार करना आवश्यक है कि केवल न्यायिक निर्देश पर्याप्त नहीं हैं। यदि ‘पीड़ित गवाह’ की अवधारणा को प्रभावी बनाना है, तो इसके साथ-साथ जाँच एजेंसियों की संवेदनशीलता, अभियोजकों का प्रशिक्षण, गवाह संरक्षण तंत्र और पीड़ितों का पुनर्वास भी उतना ही आवश्यक है। बिना सामाजिक-आर्थिक पुनर्स्थापन के, पीड़ित पुनः शोषण के चक्र में फँस सकता है, जिससे न्यायिक उपलब्धियाँ खोखली सिद्ध होंगी।
अंततः, बाल तस्करी के विरुद्ध संघर्ष केवल कानून का प्रश्न नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक उत्तरदायित्व का विषय है। सर्वोच्च न्यायालय का ‘पीड़ित गवाह’ संबंधी निर्देश इस दिशा में एक महत्त्वपूर्ण मील का पत्थर है, जो यह संकेत देता है कि न्याय अब केवल प्रक्रिया का पालन नहीं, बल्कि पीड़ित के अनुभव को समझने का प्रयास भी है। यदि इस दृष्टिकोण को सशक्त संस्थागत समर्थन प्राप्त होता है, तो यह भारत में बाल तस्करी जैसे स्तरित संगठित अपराधों के विरुद्ध एक प्रभावी हथियार सिद्ध हो सकता है और न्याय की अवधारणा को वास्तव में मानवीय बना सकता है।
भारत में भी कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के बेज़ा इस्तेमाल पर रोक लगाने की मांग अब जोर शोर से उठने लगी है। मद्रास हाई कोर्ट ने अपने हालिया फैसले में कहा है भारत सरकार 16 साल से कम उम्र के बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर कानून बनाएं। यह कानून आस्ट्रेलिया की तरह हो सकता है जहां 16 साल तक के बच्चों के सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर रोक है। न्यायलय ने अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहा कि इंटरनेट पर घृणित सामग्री देखी जा रही है। अश्लीलता के साथ नशे की सामग्री भी सरे आम परोसी जा रही है। ये बच्चों के लिए ये जोखिम भरी है। इसलिए माता पिता की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है।
आज घर घर में बच्चे और युवा धड़ल्ले से मोबाइल पर स्क्रीनिंग कर रहे है। उन्हें इस बात की कोई चिंता नहीं है की यह उनके स्वास्थ्य और पढ़ाई के लिए कितना खतरनाक है। मीडिया में छोटे और किशोर आयु के बच्चों को मोबाइल लत के खतरे से लगातार आगाह किया जा रहा है। अनेक बच्चे इसके दुष्परिणामों के शिकार होकर अस्पतालों में अवसाद का इलाज़ करा रहे है। सेंसर टावर की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि अपने देश में गत वर्ष मोबाइल पर 1.12 ट्रिलियन घंटे स्क्रीनिंग की गई जो दुनियाभर में सर्वाधिक आंकी गई है। इससे पता चलता है 18 वर्ष की आयु सीमा के 40 करोड़ बच्चे में से हर तीसरा बच्चा मोबाइल अवसाद का शिकार है, जिनकी संख्या 13 करोड़ से अधिक बताई जा रही है। इसी भांति एक अन्य नई रिसर्च के मुताबिक मोबाइल, टैबलेट और लैपटॉप जैसे गैजेट्स न केवल बच्चों के स्वास्थ्य अपितु उनके शैक्षिक जीवन के लिए भी खतरा बन रहे है। टेक्नोलॉजी के इस दौर में बच्चे मोबाइल फोन, टैबलेट से ही अपनी पढ़ाई कर रहे हैं। खासकर कोविड में ऑनलाइन पढ़ाई के बाद उनके बीच स्क्रीन टाइम बहुत बढ़ा है। पांच हजार से ज्यादा कनाडाई बच्चों पर साल 2008 से 2023 तक चली एक रिसर्च बताती हैं कि बढ़ते स्क्रीन टाइम के कारण बच्चों में बेसिक मैथ्स और पढ़ने की समझ ठीक से विकसित नहीं हो पा रही है। यहां तक कि स्क्रीन टाइम की वजह से बच्चों के मार्क्स में 10 फीसदी तक कमी आई है। एक अन्य रिपोर्ट में यह सामने आया है कि 73 प्रतिशत स्कूली बच्चे अश्लील सामग्री देखते हैं। वहीं, 80 प्रतिशत बच्चे रोज़ाना सोशल मीडिया पर कम से कम 2 घंटे बिताते हैं। इसका सीधा असर उनकी पढ़ाई, सोचने-समझने की क्षमता और व्यवहार पर पड़ रहा है।मोबाइल आपका दोस्त है या दुश्मन। बिना विलंब किए इस पर गहनता से मंथन की जरुरत है। आजकल मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल बच्चों को इंटरनेट एडिक्शन की तरफ ले जा रहा है। एक स्टडी रिपोर्ट में एक बार फिर मोबाइल के खतरे से सावचेत किया गया है। रिपोर्ट में बताया गया है पैरेंट्स बिना सोचे-समझे सिर्फ दो-ढाई साल के बच्चों के हाथ में मोबाइल थमा देते हैं। इसके बाद बिना मोबाइल यूज किए बच्चा खाना तक नहीं खाता है। हालांकि इंफॉर्मेशन, टेक्नॉलोजी और एआई के दौर में मोबाइल का इस्तेमाल जरूरी है। लेकिन छोटे-छोटे बच्चों को मोबाइल देने की क्या जरूरत है? अगर आप भी मोबाइल एडिक्शन को सीरियसली नहीं ले रहे हैं, तो आपको बता दें कि सेलफोन आपके बच्चों का सबसे बड़ा दुश्मन बन रहा है। कच्ची उम्र में बच्चों को डिजिटल डिमेंशिया जैसी घातक बीमारी हो सकती है। टाइम ज्यादा होने का सबसे पहला असर बच्चों की आंखों की रोशनी पर पड़ रहा है। स्क्रीन को नजदीक और एकटक देखने से आंखें ड्राई होने लगती हैं यही हालात रहने पर आंखों की रोशनी कम होने लगती है। मोबाइल बच्चों का दोस्त है या दुश्मन। बिना विलंब किए अभिभावकों को इस पर गहनता से मंथन की जरुरत है। आजकल मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल बच्चों को इंटरनेट एडिक्शन की तरफ ले जा रहा है। इस तरह के एडिक्शन से मानसिक बीमारियां पैदा होती हैं और ऐसे में बच्चे कोई न कोई गलत कदम उठा लेते हैं। आजकल के बच्चे इंटरनेट लवर हो गए हैं। इनका बचपन रचनात्मक कार्यों की जगह डेटा के जंगल में गुम हो रहा है। पिछले कई सालों में सूचना तकनीक ने जिस तरह से तरक्की की है, इसने मानव जीवन पर गहरा प्रभाव डाला है बल्कि एक तरह से इसने जीवनशैली को ही बदल डाला है। बच्चे और युवा एक पल भी स्मार्टफोन से खुद को अलग रखना गंवारा नहीं समझते। इनमें हर समय एक तरह का नशा सा सवार रहता है। वैज्ञानिक भाषा में इसे इंटरनेट एडिक्शन डिस्ऑर्डर कहा गया है।
भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 28 से 30 दिसंबर तक तीन दिवसीय यात्रा पर झारखंड आ रही हैं। सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए बिरसा मुंडा एयरपोर्ट से हिनू चौक, बिरसा चौक, अरगोड़ा चौक से लोकभवन के 200 मीटर की परिधि को सदर अनुमंडल दंडाधिकारी उत्कर्ष कुमार ने नो फ्लाइंग जोन घोषित किया है।
यह बीएनएसएस की धारा के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए निषेधाज्ञा जारी की गई। उपरोक्त क्षेत्र के ऊपर ड्रोन, पैराग्लाइडिंग व हॉट एयर बैलूंस पूरी तरह वर्जित रहेंगे।
यह निषेधाज्ञा 28 दिसंबर सुबह 6:00 बजे से 30 दिसंबर रात 10:00 बजे तक के लिए लागू रहेगा।
तेल अवीव, 27 दिसंबर (हि.स.)। इजराइल ने सोमालीलैंड गणराज्य को स्वतंत्र राष्ट्र की मान्यता दे दी है। इजराइल ऐसा करने वाला संयुक्त राष्ट्र (यूएन) का पहला सदस्य देश है। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने शुक्रवार को कहा कि उन्होंने सोमालीलैंड के राष्ट्रपति अब्दिरहमान मोहम्मद अब्दिलाही के साथ वर्चुअल माध्यम से एक संयुक्त घोषणा पर हस्ताक्षर किए हैं। सोमालीलैंड को इजराइल की तरफ से मान्यता दिए जाने से तुर्किए और सोमालिया को झटका लगा है।
सोमालिया से साल 1991 अलग हुए सोमालीलैंड काफी समय से राजनयिक मान्यता की कोशिशें करता रहा है। हालांकि उसे अब तक बहुत कामयाबी नहीं मिली थी। शुक्रवार को इजरायल ने सोमालीलैंड को पूरी तरह से मान्यता दी है लेकिन ब्रिटेन, यूएई, डेनमार्क, कीनिया, ताइवान जैसे देशों से अनौपचारिक राजनयिक संबंध हैं। दी टाइम्स ऑफ इजराइल के मुताबिक शुक्रवार को इजराइल सोमालीलैंड गणराज्य को एक स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता देने वाला पहला देश बन गया। यह अफ्रीकी क्षेत्र सोमालिया से अलग होने के तीन दशक से अधिक समय बाद हुआ है। इजराइल की ओर से प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और विदेश मंत्री गिदोन सार ने घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए, जबकि सोमालीलैंड के राष्ट्रपति अब्दिरहमान मोहम्मद अब्दुल्लाही ने अपने देश की ओर से हस्ताक्षर किए।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने सोमालीलैंड को इजराइल की तरफ से मान्यता दिए जाने की जानकारी साझा करते हुए कहा कि “हम आर्थिक क्षेत्रों, कृषि और सामाजिक विकास के क्षेत्रों में मिलकर काम करने का इरादा रखते हैं।”
सोमालीलैंड को मान्यता देने संबंधी घोषणा ने सोमालिया और तुर्की को असहज कर दिया है। सोमालिया के विदेश मंत्रालय ने इजरायल के कदम की निंदा करते हुए इसे उसकी संप्रभुता पर किया गया हमला करार दिया। जबकि तुर्किए ने इसे नेतन्याहू सरकार की गैर-कानूनी कार्रवाइयों का एक नया उदाहरण बताया, जिसका मकसद क्षेत्रीय और वैश्विक दोनों स्तरों पर अस्थिरता पैदा करना है।
सोमालीलैंड अफ्रीका के हॉर्न क्षेत्र स्थित एक महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्र है। सोमालिया से अलग होकर स्वतंत्र रूप से शासन व्यवस्था संभाल रहे इसे अबतक किसी ने स्वतंत्र देश की औपचारिक मान्यता नहीं दी।
हालांकि स्वतंत्र सोमालीलैंड की पृष्ठभूमि पुरानी है। 1960 में कुछ समय के लिए यह ए क स्वतंत्र राष्ट्र बना और इजराइल सहित कई देशों ने उसे मान्यता दे दी।लेकिन बाद में वह सोमालिया के साथ एकीकृत हो गया। 1991 में सोमालिया जब गृहयुद्ध की चपेट में आया तो सोमालीलैंड ने खुद को स्वतंत्र देश घोषित कर दिया।
काठमांडू, 27 दिसंबर (हि.स.)। नेत्रविक्रम चन्द ‘विप्लव’ के नेतृत्व वाली नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के अर्घाखांची जिला स्थित ‘कम्युन’ से विस्फोटक सामग्री बरामद की गई है।
शुक्रवार रात करीब 10 बजे अर्घाखांची की शितगंगा नगरपालिका–11, बोक्से क्षेत्र में जिला पुलिस प्रमुख डीएसपी दिवस बहादुर जिसी के नेतृत्व में गश्त के दौरान एक पशुशाला से बंदूक और ग्रेनेड समेत कई विस्फोटक पदार्थ बरामद किए गए।
बरामद हथियार और विस्फोटकों में दो बंदूकें, 14 ग्रेनेड, 12 डेटोनेटर, लॉन्चर जैसा दिखने वाला पाइप, पांच लीटर का एक प्रेशर कुकर बम, एक स्टील बम, बिजली के तार के चार बंडल और 50 किलो बारूद शामिल हैं।
पुलिस के अनुसार, विस्फोटक सामग्रियों को शनिवार तड़के नेपाली सेना की सहायता से निष्क्रिय कर दिया गया है।
वहीं, नेकपा माओवादी के प्रवक्ता खड्गबहादुर विश्वकर्मा ‘प्रकाण्ड’ ने कम्युन पर की गई इस कार्रवाई को ‘राज्य का आतंक’ करार दिया है। उन्होंने दावा किया कि अर्घाखांची की शितगंगा नगरपालिका–11 स्थित पार्टी द्वारा संचालित कम्युन और आम नागरिकों के घरों पर छापेमारी कर आतंक फैलाया गया है।
पार्टी द्वारा जारी विज्ञप्ति में उन्होंने कहा, “एक ओर सरकार शांतिपूर्ण चुनाव का माहौल बनाने का प्रचार कर रही है, वहीं दूसरी ओर माओवादी के उत्पादन केन्द्रों और आम जनता के घरों पर छापे मार रही है। इससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य शांतिपूर्ण समाधान नहीं चाहता, बल्कि देश को अशांति की ओर धकेलना चाहता है।”
उन्होंने इस घटना की निष्पक्ष जांच के लिए मानवाधिकार संगठनों से भी अपील की है।
मैनचेस्टर यूनाइटेड ने शुक्रवार को खेले गए साल के एकमात्र बॉक्सिंग डे मुकाबले में न्यूकैसल यूनाइटेड को 1-0 से हराकर प्रीमियर लीग अंक तालिका में पाँचवें स्थान पर छलांग लगा दी। यूनाइटेड के लिए पैट्रिक डॉर्गु ने पहले हाफ में निर्णायक गोल दागा।
रूबेन अमोरिम के मार्गदर्शन में खेल रही मैनचेस्टर यूनाइटेड ने इस जीत के साथ 18 मैचों में 29 अंक हासिल कर लिए हैं। वहीं न्यूकैसल यूनाइटेड 23 अंकों के साथ 11वें स्थान पर बना हुआ है। लीग के बाकी मुकाबले शनिवार और रविवार को खेले जाएंगे।
मैच का एकमात्र गोल 24वें मिनट में आया। डियोगो डालोट के लंबे थ्रो को न्यूकैसल की रक्षा पंक्ति पूरी तरह साफ नहीं कर पाई और गेंद पैट्रिक डॉर्गु के पास जा गिरी।
डेनमार्क के इस खिलाड़ी ने 15 गज की दूरी से जोरदार वॉली लगाते हुए गेंद को गोलपोस्ट के निचले बाएं कोने में पहुंचा दिया। यह डॉर्गु का मैनचेस्टर यूनाइटेड के लिए पहला गोल रहा।
दूसरे हाफ में न्यूकैसल ने बराबरी के लिए जोर लगाया, खासकर अंतिम मिनटों में, लेकिन यूनाइटेड की मजबूत रक्षापंक्ति को भेदने में वह नाकाम रहा। खास बात यह रही कि मैनचेस्टर यूनाइटेड इस मैच में अपने कई अहम खिलाड़ियों के बिना उतरा था। कप्तान ब्रूनो फर्नांडीस चोट के कारण बाहर थे, जबकि ब्रायन एम्ब्यूमो और अमाद डियालो अफ्रीका कप ऑफ नेशंस में व्यस्त हैं।
यह मुकाबला 43 वर्षों में बॉक्सिंग डे पर खेला गया सबसे कम प्रीमियर लीग मैचों वाला दिन भी रहा। आमतौर पर बॉक्सिंग डे पर दर्शकों को कई बड़े मुकाबले देखने को मिलते हैं, लेकिन इस बार परंपरा से हटकर सिर्फ एक ही शीर्ष स्तरीय मैच खेला गया।
सिख धर्म के दसवें गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के पावन प्रकाश पर्व के अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु, केंद्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और विभिन्न राजनीतिक दल के नेताओं ने उन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण कर उनके साहस, त्याग, समानता और न्याय के आदर्शों को याद किया।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने एक्स पर पोस्ट कर अपने संदेश में कहा कि गुरु गोबिंद सिंह अदम्य साहस और दूरदर्शिता के प्रतीक थे। उन्होंने धर्मपूर्वक जीवन जीने की प्रेरणा दी और न्याय व आत्मसम्मान की रक्षा के लिए लोगों को संगठित किया। उनकी शिक्षाएं एकता, करुणा और सभी के प्रति सम्मान पर आधारित समाज के निर्माण का मार्ग दिखाती रहेंगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरु गोबिंद सिंह जी के पवित्र प्रकाश उत्सव के अवसर पर उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन किया हैं। उन्होंने अपने एक्स एकांडट पर कहा कि वे साहस, करुणा और त्याग के साक्षात प्रतीक हैं। उनका जीवन और शिक्षाएँ हमें सत्य, न्याय, धर्मपरायणता के लिए खड़े होने और मानवीय गरिमा की रक्षा करने के लिए प्रेरित करती हैं। श्री गुरु गोबिंद सिंह जी की दृष्टि पीढ़ियों को सेवा और निस्वार्थ कर्तव्य की ओर मार्गदर्शन करती रहती है। ये तस्वीरें इस वर्ष के आरंभ में पटना साहिब स्थित तख्त श्री हरिमंदिर जी की मेरी यात्रा की हैं, जहाँ मैंने श्री गुरु गोबिंद सिंह जी और माता साहिब कौर जी के पवित्र जोरे साहिब के दर्शन भी किए।
गृह मंत्री अमित शाह ने गुरु गोबिंद सिंह जी को ‘सरबंसदानी’ बताते हुए कहा कि मानव इतिहास में उनके जैसा अद्वितीय त्याग विरल है। उन्होंने अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करते हुए धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए अपने पूरे परिवार सहित सर्वोच्च बलिदान दिया। खालसा पंथ की स्थापना के माध्यम से उन्होंने सेवा के साथ-साथ रक्षा को सशक्त बनाया।
सड़क और परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि गुरु गोबिंद सिंह के प्रकाश पर्व की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। उनका जीवन और उनके विचार सदियों को प्रेरित करते रहेंगे। आज उनके प्रकाश पर्व के अवसर पर उन्हें नमन।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि उनका निडर रुख, समानता और कर्तव्य का संदेश एक मजबूत और एकजुट भारत को प्रेरित करता है।
कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मलिकार्जुन खरगे ने कहा कि सरबंस दानी, साहिब-ए-कमाल व सिख धर्म के दसवें गुरु एवं खालसा पंथ के संस्थापक, धन धन गुरु गोबिंद सिंह के प्रकाश पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं। उन्होंने सम्पूर्ण मानवता को शांति, प्रेम, एकता, समानता और भाईचारे का संदेश दिया।
लोक सभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने गुरु गोबिंद सिंह के प्रकाश पर्व की सभी को बधाईयां देते हुए लिखा है कि मानव कल्याण, साहस और सत्य के लिए उनके द्वारा दिखाए गए आदर्श और मार्ग सदैव हमें प्रेरणा देते रहेंगे।
दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता कहा कि अन्याय और दमन के विरुद्ध चेतना जागृत करने वाले, खालसा पंथ के संस्थापक, ‘सरबंस दानी’ साहिब-ए-कमाल गुरु गोबिंद सिंह के पावन प्रकाश पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं। गुरु साहिब का जीवन शौर्य, त्याग और आध्यात्मिक उत्कर्ष का अद्वितीय समन्वय है।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कहा कि महान संत एवं धर्मयोद्धा, साहस और त्याग की प्रतिमूर्ति, खालसा पंथ के संस्थापक, दशमेश पिता गुरु गोबिन्द सिंह महाराज के पावन प्रकाश पर्व पर उन्हें श्रद्धांजलि। अन्याय व अधर्म के विरुद्ध आपका संघर्ष और धर्मरक्षा का संदेश संपूर्ण मानवता को सत्य, निष्ठा एवं निर्भीकता के मार्ग पर अडिग रहने की प्रेरणा देता है।
राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने कहा कि सिख धर्म के दसवें गुरु, खालसा पंथ के संस्थापक गुरु गोबिंद सिंह के पावन प्रकाश पर्व पर नमन। साहस, त्याग, समानता और धर्म की रक्षा का संदेश मिलता है। उन्होंने खालसा पंथ की स्थापना कर मानवता को अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा दी। उनकी शिक्षाएं हमें सत्य, सेवा और न्याय के मार्ग पर सदैव अग्रसर रहने का संकल्प कराती हैं।
उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि साहस, बलिदान और धर्मनिष्ठा के पर्याय, खालसा पंथ के संस्थापक एवं सिख पंथ के 10वें गुरु गुरु गोबिंद सिंह के प्रकाश पर्व पर नमन। उन्होंने कहा कि गुरु गोविंद सिंह का जीवन चरित्र संपूर्ण मानवता के लिए साहस, सत्य और समर्पण का प्रतीक है। उनकी शौर्यगाथा यह शिक्षा देती है कि धर्म का वास्तविक अर्थ अन्याय के विरुद्ध निर्भीक होकर संघर्ष करने की शक्ति है।
गिरिजा ओक भारतीय सिनेमा की एक प्रतिष्ठित अभिनेत्री हैं जिन्होंने मराठी और हिंदी फिल्म उद्योग में अपनी अमिट छाप छोड़ी है। उनका जन्म महाराष्ट्र में हुआ था और बचपन से ही उन्हें अभिनय के प्रति गहरा लगाव था। एक मध्यमवर्गीय परिवार से आने के बावजूद उन्होंने अपनी प्रतिभा और कड़ी मेहनत के दम पर फिल्म जगत में अपनी पहचान बनाई। उनकी शिक्षा-दीक्षा परंपरागत भारतीय संस्कारों में हुई जिसका प्रभाव उनके अभिनय और व्यक्तित्व में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। गिरिजा ओक ने अपने करियर की शुरुआत रंगमंच से की थी और वहां मिली सफलता ने उन्हें फिल्मों की ओर आकर्षित किया। गिरिजा ओक का व्यक्तित्व सरल और सहज है। उन्होंने हमेशा अपनी जड़ों से जुड़े रहने को प्राथमिकता दी और फिल्मी चकाचौंध में भी अपनी मराठी संस्कृति और परंपराओं को बनाए रखा। उनका विवाह भी एक सामान्य परिवार में हुआ और उन्होंने अपने पारिवारिक जीवन और करियर के बीच बेहतरीन संतुलन बनाए रखा। अपने परिवार के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताना उनकी प्राथमिकताओं में हमेशा शामिल रहा है। एक अभिनेत्री होने के साथ-साथ वे एक समर्पित पत्नी और माँ की भूमिका भी निभाती रहीं। मराठी सिनेमा में गिरिजा ओक का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। उन्होंने कई यादगार मराठी फिल्मों में काम किया जिनमें उनके चरित्र दर्शकों के दिलों में आज भी बसे हुए हैं। मराठी फिल्मों में उन्होंने मुख्य रूप से मध्यमवर्गीय महिलाओं की भूमिकाएं निभाईं जो दर्शकों से सीधे जुड़ती थीं। उनकी स्वाभाविक अभिनय शैली और संवाद अदायगी ने उन्हें मराठी दर्शकों का प्रिय बना दिया। उन्होंने परिवारिक और सामाजिक विषयों पर आधारित फिल्मों में विशेष रुचि दिखाई और ऐसी भूमिकाओं को चुना जो समाज को कुछ सकारात्मक संदेश दे सकें। हिंदी सिनेमा में भी गिरिजा ओक ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई हालांकि उनका मुख्य फोकस मराठी फिल्मों पर ही रहा। हिंदी फिल्मों में उन्होंने अधिकतर सहायक भूमिकाएं निभाईं लेकिन हर भूमिका में उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। माँ, सास, बुआ और अन्य पारिवारिक किरदारों में उनकी विश्वसनीयता दर्शकों को प्रभावित करती रही। उन्होंने कई बड़े सितारों के साथ काम किया और हर फिल्म में अपनी उपस्थिति का असर छोड़ा। भले ही उनकी भूमिकाएं छोटी होती थीं परंतु उनका प्रभाव गहरा होता था। गिरिजा ओक की अभिनय शैली की सबसे बड़ी विशेषता उनकी स्वाभाविकता है। वे अपने किरदारों में इतनी सहजता से घुल-मिल जाती थीं कि दर्शकों को कभी नहीं लगता था कि वे अभिनय कर रही हैं। उनके चेहरे के भाव, आंखों की अभिव्यक्ति और संवाद अदायगी में एक खास आत्मीयता थी जो उन्हें अन्य अभिनेत्रियों से अलग करती थी। उन्होंने कभी भी अति-नाटकीय अभिनय नहीं किया बल्कि सूक्ष्म और यथार्थवादी अभिनय को प्राथमिकता दी। यही कारण है कि उनके द्वारा निभाए गए साधारण किरदार भी दर्शकों के मन में विशेष स्थान बना गए। टेलीविजन की दुनिया में भी गिरिजा ओक ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने कई लोकप्रिय मराठी और हिंदी धारावाहिकों में काम किया जो दर्शकों में बेहद पसंद किए गए। टेलीविजन ने उन्हें घर-घर तक पहुंचने का अवसर दिया और वे लाखों दर्शकों की प्रिय बन गईं। धारावाहिकों में उनकी भूमिकाएं अक्सर परिवार की बुजुर्ग महिलाओं की होती थीं जो अपनी बुद्धिमत्ता और अनुभव से परिवार को संभालती हैं। इन किरदारों के माध्यम से उन्होंने पारिवारिक मूल्यों और भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व किया। फिल्म उद्योग में गिरिजा ओक को उनकी व्यावसायिकता और अनुशासन के लिए भी जाना जाता है। सेट पर वे हमेशा समय पर पहुंचती थीं और अपने काम के प्रति पूर्णतः समर्पित रहती थीं। निर्देशकों और सह-कलाकारों के साथ उनके संबंध सौहार्दपूर्ण थे और सभी उनके अनुभव और मार्गदर्शन का सम्मान करते थे। उन्होंने कभी भी स्टारडम की होड़ में भाग नहीं लिया बल्कि अपने काम की गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित किया। यही कारण है कि उन्हें उद्योग में एक सम्मानित स्थान प्राप्त है। गिरिजा ओक का फिल्म जगत में योगदान केवल उनके अभिनय तक सीमित नहीं है। उन्होंने कई युवा कलाकारों को प्रेरित किया और उन्हें मार्गदर्शन प्रदान किया। उनकी विनम्रता, सादगी और प्रतिभा नई पीढ़ी के कलाकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत रही है। वे साबित करती हैं कि प्रतिभा और कड़ी मेहनत के दम पर बिना किसी फिल्मी पृष्ठभूमि के भी सफलता हासिल की जा सकती है। आज भी जब उनकी फिल्में या धारावाहिक प्रसारित होते हैं तो दर्शक उन्हें उसी प्रेम और सम्मान के साथ देखते हैं।( सोनेट)