सनातन,संत, सत्ता और संग्राम                                                                       

0
16

 – तनवीर जाफ़री

गत दिनों मौनी अमावस्या के दिन प्रयागराज में उस समय के एक अजीब स्थिति पैदा हो गयी जबकि माघ मेला में मेला प्रशासन व पुलिस द्वारा शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को संगम में स्नान करने से रोका गया ? मेला प्रशासन के अनुसार सुरक्षा कारणों से उनके वाहन (पालकी ) को रोका गया और स्नान हेतु पैदल जाने को कहा गया। परन्तु  शंकराचार्य जी ने इस प्रशासनिक निर्देश को प्रोटोकॉल का उल्लंघन मानते हुए अस्वीकार कर दिया। घटना के सम्बन्ध में प्राप्त ब्यौरे के अनुसार स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद मौनी अमावस्या के दिन अपनी पालकी पर सवार होकर अपने सैकड़ों भक्तों व अनुयायियों के साथ संगम नोज़ की तरफ़ बढ़ रहे थे। उसी समय मेला प्राधिकरण की ओर से तैनात पुलिस ने भारी भीड़ बताकर उनकीपालकीको रोक दिया और शंकराचार्य जी से सीमित अनुयायियों के साथ पैदल स्नान स्थल तक पहुँचने व स्नान करने का अनुरोध किया। परन्तु शंकराचार्य ने पूरे सम्मान और प्रोटोकॉल की मांग की, जो अस्वीकार होने पर उन्होंने स्नान नहीं किया और अनशन पर बैठ गए। इस संबंध में मेला व पुलिस प्रशासन का पक्ष है कि शंकराचार्य को स्नान से नहीं, बल्कि वाहन से स्नान लिये जाने से रोका गया था और सुरक्षा व भीड़ प्रबंधन के लिए यह ज़रूरी भी था। 

               परन्तु शंकराचार्य जी व उनके शिष्यों द्वारा जो आरोप लगाये गये हैं वे बेहद गंभीर हैं। कहा जा रहा है कि पुलिस द्वारा शंकराचार्य जी महाराज के शिष्यों की चोटी (शिखा) को  पकड़कर घसीटा गया,उन्हें बुरी तरह पीटा गया व अपमानित किया गया। इस घटना को केवल एक कृत्य या हिंसा नहीं, बल्कि इसे सुनियोजित सांस्कृतिक अपमान बताया जा रहा है। क्योंकि यह सब उस समय हुआ जब शंकराचार्य, साधु,संत, शिष्य और श्रद्धालु किसी विरोध या प्रदर्शन के लिए नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और ईश्वर आराधना के लिए संगम घाट पर आए थे। लिहाज़ा क्या वजह है कि सनातन धर्म व संतों की रक्षा व इसके मान सम्मान की दुहाई देने वाली भाजपा सरकार के शासन काल में शंकराचार्य स्तर के सम्मानित संतों व उनके गुरुकुल के शिष्यों का धर्म क्षेत्र प्रयागराज में इस तरह अपमान किया गया ? 

              इस घटना के फ़ौरन बाद जिस तरह 19 जनवरी को प्रशासन ने एक नोटिस चिपका कर 24 घंटे में शंकराचार्यजी से यह बताने को कहा गया कि अविमुक्तेश्वरानंद जी शंकराचार्य कैसे हैं ? गोया शंकराचार्य को स्नान से रोके जाने  की बात यहां तक जा पहुंची कि अविमुक्तेश्वरानंद जी शंकराचार्य हैं या नहीं ? शंकराचार्य कैसे बनते हैं और कौन बना सकता है ? क्या सरकार तय करेगी कि कौन शंकराचार्य है और कौन नहीं ? यानी भीड़ को बहाना बनाकर शंकराचार्य की पालकी को रोकना उनके अनुयायियों से मारपीट करना व उन्हें अपमानित करना फिर उसके बाद उनकी शंकराचार्य की पदवी को ही चुनौती देने का अर्थ है कि उन्हें किसी पूर्वाग्रह के चलते ही रोका गया। साथ ही जिसतरह कई संत सरकार की भाषा बोलते व सरकार का पक्ष लेते दिखाई दिये उससे भी साफ़ हो गया कि उन्हें रोकना व अपमानित करना न केवल सत्ता के अहंकार का एक उदाहरण है बल्कि इसके पीछे शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी के विरुद्ध सत्ता का पूर्वाग्रह भी नज़र आता है। हालाँकि देश का अधिकांश संत समाज अविमुक्तेश्वरानंद जी व उनके शिष्यों व अनुयायियों के साथ हुये दुर्व्यवहार व अपमान से आहत नज़र आया। इस घटना के बाद जिस तरह देश के कोने कोने से शंकराचार्य के अनुयायी व अनेक संत संगम तट पर इकठ्ठा होने शुरू किया  इससे भी सरकार की काफ़ी फ़ज़ीहत हुई है।     

                यदि आप शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी के विगत कुछ वर्षों की सक्रियता व उनकी कारगुज़ारियों पर नज़र डालें तो हम यह देखेंगे कि वे बे हिचक और बिना लाग लपेट के और बिना सत्ता की परवाह किये अपनी बात कहने वाले संत हैं। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने जनवरी 2024 में अयोध्या राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा का विरोध करते हुये कहा था कि उस समय चूँकि मंदिर का शिखर, कलश और ध्वज स्थापित नहीं थे लिहाज़ा अधूरे मंदिर में प्रतिष्ठा करने से मूर्ति में “आसुरी शक्ति” प्रवेश कर सकती है, जो शास्त्रों के विरुद्ध है। इसी तरह उन्होंने नवंबर 2025 में भी ध्वजारोहण पर यह कहते हुये सवाल उठाए थे कि शास्त्रों में ध्वजारोहण का उल्लेख नहीं है, बल्कि शिखर प्रतिष्ठा होती है, जो अभी बाक़ी थी। उन्होंने इस आयोजन को  मनमाना और शास्त्र-विरोधी भी बताया था तथा शंकराचार्यों को न बुलाने पर भी नाराज़गी जताई थी । शंकराचार्य ने प्रयागराज के महाकुंभ में हुई भगदड़ के लिये भी योगी आदित्यनाथ सरकार की कड़ी आलोचना की थी। उस वक़्त उन्होंने कहा था कि सरकारी प्रबंधों के दावों की पोल खुल गई है और राज्य सरकार को ख़ुद ही हट जाना चाहिए। शंकराचार्य ने कहा था कि ‘महाकुंभ में 40 करोड़ श्रद्धालुओं के आने का दावा करने वाली सरकार को व्यापक तैयारी करनी चाहिए थी, लेकिन भगदड़ ने सरकार की नाकामी उजागर कर दी। इसी तरह शंकराचार्य जी ने वाराणसी में काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के विकास कार्यों के नाम पर प्राचीन मंदिरों को तोड़े जाने का कड़ा विरोध किया था। उन्होंने गोविंदेश्वर महादेव मंदिर को तोड़े जाने पर धरना दिया था और प्रशासन पर शिवलिंग ग़ायब करने का आरोप लगाया था । स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी ने इसे हिंदू धार्मिक परंपराओं के ख़िलाफ़ बताया था और कहा था कि विकास के नाम पर मंदिर नष्ट नहीं किए जाने चाहिए। उन्होंने स्कंद पुराण में उल्लिखित मंदिरों का हवाला देते हुए विरोध प्रदर्शन किया और धर्म संसद भी बुलाई थी।

                        इसी तरह स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी ने केदारनाथ मंदिर से 228 किलोग्राम सोने के ग़ायब होने की मीडिया में प्रसारित ख़बरों पर प्रतिक्रिया करते हुये इसे ‘सोना घोटाला’ क़रार दिया था। उन्होंने दिल्ली में केदारनाथ मंदिर के निर्माण पर भी सवाल उठाते हुये कहा था कि हिमालय में स्थित मंदिर को दिल्ली में नहीं बनाया जा सकता। गोहत्या के विरुद्ध हमेशा मुखर व आंदोलित रहने वाले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने गौ हत्या मामले में पूर्व मंत्री मुख़्तार अब्बास नक़वी और केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू की तुलना करते हुए भाजपा के घोर आंतरिक विरोधाभास पर टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था कि ‘नक़वी ने गोमांस खाने वालों को पाकिस्तान जाने की सलाह दी थी तो ऐसे व्यक्ति को मंत्री पद से हटा दिया गया जबकि किरण रिजिजू ने गोमांस खाने वालों का समर्थन करते हुए कहा था कि वे ख़ुद भी बीफ़ खाते हैं और कोई उन्हें रोक नहीं सकता। ऐसा व्यक्ति (किरण रिजिजू) प्रधानमंत्री के पीछे बैठा दिखाई देता है ‘। हिंदू भावनाओं के साथ खिलवाड़ व भाजपा की दोहरी नीति का उदाहरण बताते हुए उन्होंने गौ रक्षा के प्रति पार्टी की गंभीरता पर सवाल उठाए थे । ऐसे और भी कई उदाहरण हैं जिनसे यह पता चलता है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का अनेक धार्मिक मुद्दों पर मुखरित होकर बोलना उस सत्ता को रास नहीं आता जो अपने विरुद्ध की जाने वाली किसी भी आलोचना या टीका टिप्पणी को सहन नहीं कर पाती। शायद यही वजह है कि सनातन की रक्षा का दवा करने वाली सत्ता और सनातन के वास्तविक ध्वजवाहक संतों के मध्य कभी कभी संग्राम जैसी स्थिति पैदा हो जाती है।                                                            तनवीर जाफ़री 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here