संसद में हंगामा : जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा हो रहा है स्वाहा

Date:

बाल मुकुन्द ओझा

संसद का शीतकालीन सत्र सोमवार को मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के मुद्दे पर विपक्ष के जोरदार हंगामे और विरोध प्रदर्शनों के साथ शरू हुआ। यह सत्र 19 दिसंबर तक चलेगा। विपक्ष के नेताओं ने पहले ही कह दिया था कि यदि SIR पर चर्चा नहीं हुई तो वह संसद की कार्यवाही चलने नहीं देगी। और वही हुआ, विपक्ष के जोरदार हंगामे के बीच सत्ता पक्ष ने कार्यवाही चालू रखी। एसआईआर के मुद्दे पर विपक्ष के जोरदार हंगामे के बीच मणिपुर जीएसटी (दूसरा संशोधन) विधेयक 2025 बिना चर्चा के पारित हो गया। यह बिल पारित होने के बाद सदन की कार्यवाही दिनभर के लिए स्थगित हो गई है।

संसद  के पिछले कुछ सत्रों की कार्यवाही पर एक नज़र डालें तो लगेगा संसद में काम कम और हंगामा ज्यादा होता है। जनता के खून पसीने की कमाई हंगामे की भेंट चढ़ जाती है जो किसी भी स्थिति में लोकतंत्र के लिए हितकारी नहीं है। देश की संसद आजकल कामकाज की जगह हंगामे की ज्यादा शिकार हो रही है।  संसद आम आदमी की समस्याओं को दूर करेगा। मगर हो रहा है ठीक इसके उल्टा।  संसद के पिछले कुछ सत्रों में ऐसा ही कुछ हो रहा है। संसदीय लोकतंत्र में संसद ही सर्वोच्च है। हमारे माननीय संसद सदस्य इस सर्वोच्चता का अहसास कराने का कोई मौका भी नहीं चूकते, पर खुद इस सर्वोच्चता से जुड़ी जिम्मेदारी-जवाबदेही का अहसास करने को तैयार नहीं। बेशक विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की ऐसी तस्वीर बेहद निराशाजनक ही नहीं, चिंताजनक भी है । संसद ठप रहने की बढ़ती प्रवृत्ति भी कम खतरनाक नहीं है। संसद सत्र अपने कामकाज के बजाय हंगामे के लिए ही समाचार माध्यमों में सुर्खियां बनता जा रहा है। अगर हम संसद की घटती बैठकों के मद्देनजर देखें तो सत्र के दौरान बढ़ता हंगामा और बाधित कार्यवाही हमारे माननीय सांसदों और उनके राजनीतिक दलों के नेतृत्व की लोकतंत्र में आस्था पर ही सवालिया निशान लगा देती है। संसद की सर्वोच्चता का स्पष्ट अर्थ यह भी है कि वह देश हित-जनहित में कानून बनाने के अलावा सरकार के कामकाज की कड़ी निगरानी और समीक्षा भी करे, लेकिन हमारे देश में लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर का हाल यह है कि देश का बजट तक बिना चर्चा के पारित हो गया।

भारत की संसद लोकतंत्र की धुरी है। यह संविधान के अनुच्छेद 79 के तहत स्थापित है। लोकसभा और राज्यसभा, जनता और राज्यों का प्रतिनिधित्व करते हुए, कानून निर्माण, बजट स्वीकृति और महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा करते हैं। लोकसभा अस्थायी सदन है जिसका कार्यकाल 5 वर्ष होता है, जबकि राज्यसभा स्थायी सदन है जिसमें सदस्य 6 वर्ष के लिए चुने जाते हैं। यह निर्विवाद रूप से सत्य है कि संसद के सुचारू और प्रभावी कामकाज के लिए सरकार और विपक्ष दोनों की सामूहिक जिम्मेदारी है। सदन में अनुशासन, मर्यादा संसदीय संस्थाओं की अनिवार्य शर्त है। संसद में कोई व्यवधान या रुकावट नहीं बल्कि अधिक बहस, संवाद, चर्चा, विचार-विमर्श होना चाहिए। स्वस्थ और सशक्त लोकतंत्र के लिए विवाद और प्रतिरोध के स्थान पर संवाद और सहयोग का माहौल बनाने की जरूरत है। संसद में रचनात्मक बहस और संवाद लोकतंत्र का आभूषण है।

2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद पक्ष और विपक्ष में जो कटुता देखने को मिली वह लोकतंत्र के हित में नहीं कही जा सकती। इससे हमारी लोकतान्त्रिक प्रणाली का ह्रास हुआ है। आज सत्ता और विपक्ष के आपसी सम्बन्ध इतने खराब हो गए है की आपसी बात तो दूर एक दूसरे को फूटी आँख भी नहीं सुहाते। दुआ सलाम और अभिवादन भी नहीं करते। औपचारिक बोलचाल भी नहीं होती। लोकतंत्र में सत्ता के साथ विपक्ष का सशक्त होना भी जरुरी है मगर इसका यह मतलब नहीं है की कटुता और द्वेष इतना बढ़ जाये की गाली गलौज की सीमा भी लाँघी जाये। हमारे देश में राजनीतिक माहौल इतना कटुतापूर्ण हो गया है कि लोकतांत्रिक राजनीति के इतिहास में कहीं नहीं हुआ होगा। लोकतांत्रिक जिम्मेदारी-जवाबदेही याद दिलाती थी। दरअसल तर्क कुछ भी दिया जाये, लेकिन कोई भी सदन सत्तापक्ष और विपक्ष, दोनों के बीच सहयोग के बिना चल ही नहीं सकता। हां, सरकार में होने के नाते सत्तापक्ष विपक्ष की मांगों पर बड़प्पन और लचीला रुख दिखाते हुए सदन सुचारु रूप से चलाने की गंभीर पहल अवश्य कर सकता है। मगर विपक्ष का अड़ियल रवैया किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है।    

आजादी के बाद देश में लोकतान्त्रिक प्रणाली को चुना गया। लोकतांत्रिक संसदीय व्यवस्था में बहुमतवाला दल शासन सँभालता है, अन्य दलों के सदस्य सत्तारूढ़ दल के कार्यकलापों की आलोचना करते हैं। सरकार बनने के बाद जो दल शेष बचते हैं, उनमें सबसे अधिक सदस्योंवाले दल को विरोधी दल कहा जाता है । भारतीय राजनीति में विपक्ष का अर्थ, जो सत्ता में नहीं है,से है। विपक्ष के रूप में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है। स्वस्थ विपक्ष का कार्य सरकार की सकारात्मक तरीके से आलोचना करना होना चाहिए। स्वस्थ विपक्ष के रूप में विपक्ष को जनता के हित से जुड़े मुद्दों पर सरकार की आलोचना व बहस करना चाहिए। आजादी के बाद जो संघर्ष तत्कालीन विपक्षी दलों ने शुरू किया था वह सत्ता की नहीं बल्कि विचारों की प्रत्यक्ष लड़ाई थी। उनके विचारों में राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के तत्व मौजूद थे।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी .32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_imgspot_img

Popular

More like this
Related

ट्रंप ने दी ग्रीनलैंड का समर्थन करने वाले देशों पर 10 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी

वाशिंगटन, 17 जनवरी (हि.स.)। ग्रीनलैंड को लेकर बढ़ते विवाद...

उत्तर प्रदेश दिवस पर सांसद अनुराग शर्मा को राज्य प्रतिनिधि की जिम्मेदारी

-हैदराबाद में होंगे यूपी सरकार के प्रतिनिधि, बुंदेलखंड के...

महाभारत समागम का दूसरा दिन, हुई पांचाली,दुःशासन वध, उर्वशी और शिखंडी की प्रस्तुति

- श्रीलंका और पूर्वोत्तर राज्य के कलाकारों ने अपनी...

उत्तराखंड में तैयार गद्दी पर विराजमान होंगे योगी आदित्यनाथ महाराज

यूपी के सीएम और गोरखनाथ मंदिर के महंत योगी...
en_USEnglish