वर्दी, मर्यादा और विश्वास का संकट

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(कर्नाटक डीजीपी प्रकरण के संदर्भ में)

-डॉ. प्रियंका सौरभ

लोकतंत्र में सत्ता का सबसे संवेदनशील और प्रभावशाली चेहरा पुलिस व्यवस्था होती है। पुलिस केवल कानून लागू करने वाली संस्था नहीं, बल्कि राज्य की नैतिक शक्ति का प्रतीक भी है। जब इसी व्यवस्था का कोई शीर्ष अधिकारी गंभीर नैतिक आरोपों में घिरता है, तो सवाल केवल व्यक्ति विशेष तक सीमित नहीं रहते, बल्कि पूरे तंत्र की साख, जवाबदेही और आचरण पर उठ खड़े होते हैं। कर्नाटक के एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी और डीजीपी (सिविल राइट्स एन्फोर्समेंट) को कथित आपत्तिजनक वीडियो सामने आने के बाद निलंबित किया जाना इसी गहरे संकट की ओर संकेत करता है।

सोशल मीडिया पर वायरल हुए कथित वीडियो क्लिप्स ने प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी। राज्य सरकार द्वारा त्वरित निलंबन का निर्णय इस बात का संकेत है कि मामला केवल निजी आचरण तक सीमित नहीं माना गया, बल्कि सार्वजनिक पद की गरिमा और संस्थागत प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ समझा गया। हालांकि, यह भी उतना ही आवश्यक है कि किसी भी व्यक्ति को कानूनन दोषी ठहराने से पहले निष्पक्ष और पारदर्शी जांच हो। लोकतंत्र का यही संतुलन है—न तो आरोपों को नज़रअंदाज़ करना और न ही जांच से पहले निर्णय सुना देना।

पुलिस वर्दी एक साधारण पोशाक नहीं होती। यह नागरिकों और राज्य के बीच विश्वास का प्रतीक होती है। विशेष रूप से डीजीपी स्तर का अधिकारी केवल आदेश देने वाला प्रशासक नहीं, बल्कि पूरे बल के लिए नैतिक मानक तय करने वाला चेहरा होता है। उसके आचरण से यह संदेश जाता है कि व्यवस्था किस दिशा में खड़ी है।

जब किसी शीर्ष अधिकारी पर ऐसे आरोप लगते हैं, तो आम नागरिक के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यदि नीति निर्धारण और अनुशासन लागू करने वाले ही मर्यादाओं को लेकर लापरवाह हों, तो व्यवस्था से न्याय की उम्मीद कैसे की जाए? यही वह बिंदु है जहाँ व्यक्तिगत आचरण सार्वजनिक चिंता का विषय बन जाता है।

यह प्रकरण एक और महत्वपूर्ण पहलू को उजागर करता है—सोशल मीडिया का प्रभाव। आज किसी भी कथित वीडियो या सामग्री का कुछ ही घंटों में व्यापक प्रसार हो जाता है। इससे एक ओर पारदर्शिता बढ़ी है, तो दूसरी ओर अफवाह, संपादन और दुरुपयोग का खतरा भी। इसलिए राज्य और जांच एजेंसियों के सामने दोहरी चुनौती होती है—जनभावना का सम्मान करते हुए भी तथ्यों की गहराई से पड़ताल करना।

सोशल मीडिया पर वायरल सामग्री को आधार बनाकर प्रशासनिक कार्रवाई करना एक संवेदनशील निर्णय होता है। कर्नाटक सरकार द्वारा निलंबन का फैसला यह दर्शाता है कि प्रारंभिक स्तर पर ही जवाबदेही तय करने की कोशिश की गई, ताकि जांच निष्पक्ष वातावरण में हो सके। निलंबन स्वयं में दंड नहीं, बल्कि जांच के लिए रास्ता साफ करने की प्रक्रिया है—यह तथ्य समझना भी जरूरी है।

अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि किसी अधिकारी का निजी जीवन उसके काम से अलग होना चाहिए। सिद्धांत रूप में यह बात सही लग सकती है, लेकिन उच्च संवैधानिक या प्रशासनिक पदों पर बैठे लोगों के लिए निजी और सार्वजनिक जीवन के बीच की रेखा बहुत पतली होती है। कारण साफ है—उनका हर आचरण संस्था की छवि से जुड़ जाता है।

यदि कथित कृत्य ऐसे हों जो सार्वजनिक नैतिकता, महिला सम्मान या पद की गरिमा के विपरीत माने जाएँ, तो उन्हें केवल “निजी मामला” कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। विशेषकर तब, जब वे कृत्य सार्वजनिक प्रतीकों, वर्दी या आधिकारिक वातावरण से जुड़े होने का आरोप झेल रहे हों।

इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा प्रश्न व्यक्ति से आगे जाकर संस्थागत जवाबदेही का है। क्या हमारी प्रशासनिक संरचना में ऐसे तंत्र पर्याप्त रूप से मजबूत हैं, जो समय रहते आचरण संबंधी विचलनों को पहचान सकें? क्या वरिष्ठ अधिकारियों के लिए आंतरिक आचार संहिता केवल कागज़ों तक सीमित रह गई है?

आईपीएस जैसे प्रतिष्ठित कैडर से समाज अपेक्षा करता है कि वह न केवल कानून लागू करे, बल्कि नैतिक नेतृत्व भी प्रदान करे। यदि किसी एक अधिकारी की कथित चूक पूरे बल की छवि पर प्रश्नचिह्न लगा देती है, तो यह संकेत है कि आंतरिक निगरानी और नैतिक प्रशिक्षण पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है।

किसी भी लोकतांत्रिक राज्य में सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह होता है कि कानून सबके लिए समान है। चाहे वह आम नागरिक हो या सर्वोच्च पद पर बैठा अधिकारी। यदि जांच के बाद आरोप सिद्ध होते हैं, तो कार्रवाई ऐसी होनी चाहिए जो यह स्पष्ट करे कि पद, प्रभाव और पहचान कानून से ऊपर नहीं हैं।

साथ ही, यदि आरोप असत्य या बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किए गए पाए जाते हैं, तो यह भी उतना ही आवश्यक है कि संबंधित अधिकारी की प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित किया जाए। न्याय का अर्थ केवल दंड देना नहीं, बल्कि सत्य की स्थापना भी है।

आम नागरिक पुलिस से केवल सुरक्षा नहीं, बल्कि नैतिक आश्वासन भी चाहता है। वह यह विश्वास करना चाहता है कि जिन हाथों में कानून की बागडोर है, वे स्वयं कानून और मर्यादा के दायरे में हैं। जब ऐसे प्रकरण सामने आते हैं, तो जनता का भरोसा डगमगाता है—और यही किसी भी लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा होता है।

इसलिए सरकारों और संस्थानों की जिम्मेदारी केवल तात्कालिक कार्रवाई तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्हें यह भी सोचना होगा कि भविष्य में ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति न हो—इसके लिए प्रशिक्षण, मनोवैज्ञानिक परामर्श, नैतिक मूल्यांकन और जवाबदेही की स्पष्ट प्रक्रियाएँ विकसित करनी होंगी।

कर्नाटक डीजीपी प्रकरण केवल एक अधिकारी के कथित आचरण का मामला नहीं है। यह उस व्यापक प्रश्न का प्रतीक है कि सत्ता, नैतिकता और जवाबदेही के बीच हमारा संतुलन कितना मजबूत है। निलंबन एक प्रारंभिक कदम है, अंतिम निष्कर्ष नहीं। असली कसौटी निष्पक्ष जांच, पारदर्शी प्रक्रिया और न्यायसंगत निर्णय में होगी।

लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब संस्थाएँ स्वयं को सुधारने का साहस दिखाती हैं। वर्दी की गरिमा, पद की मर्यादा और जनता का विश्वास—इन तीनों की रक्षा के लिए यह आवश्यक है कि कानून बिना भय और पक्षपात के अपना काम करे। यही इस पूरे प्रकरण से निकलने वाला सबसे महत्वपूर्ण संदेश होना चाहिए।

 

डॉ. प्रियंका सौरभ
पीएचडी (राजनीति विज्ञान)
कवयित्री | सामाजिक चिंतक | स्तंभकार

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