लोकतंत्र के लिए एक काला अध्याय है पाकिस्तान का 27वां संशोधन

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– डॉ. प्रियंका सौरभ

संवैधानिक संशोधन लोकतंत्र की आत्मा होते हैं, जो समय के साथ बदलती चुनौतियों का सामना करने के लिए ढांचे को लचीला बनाते हैं। लेकिन जब ये संशोधन सत्ता के संतुलन को बिगाड़ने का हथियार बन जाते हैं, तो वे लोकतंत्र को ही खोखला करने लगते हैं। पाकिस्तान की संसद द्वारा नवंबर 2025 में पारित 27वां संवैधानिक संशोधन ठीक ऐसा ही एक उदाहरण है। यह संशोधन सतह पर संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करता प्रतीत होता है, किंतु वास्तव में कार्यपालिका और सेना के हाथों में न्यायपालिका को बंधक बनाने का प्रयास है। इसने न केवल पाकिस्तानी संस्थानों के बीच शक्ति संतुलन को उलट दिया है, बल्कि विधि के शासन को गंभीर खतरे में डाल दिया है। भारत जैसे पड़ोसी देश के लिए यह एक कठोर चेतावनी है, जहां न्यायिक स्वायत्तता लोकतंत्र की रीढ़ बनी हुई है। पाकिस्तान का यह कदम हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमारी अपनी व्यवस्था ऐसी चुनौतियों के प्रति सजग है।

पाकिस्तान के संवैधानिक इतिहास को देखें तो संशोधन हमेशा से सत्ता संघर्ष का मैदान रहे हैं। 1973 के संविधान के बाद से 26 संशोधन हो चुके हैं, जिनमें से कई तानाशाही शासकों ने अपनी सनक के अनुरूप ढाले। लेकिन 27वां संशोधन एक नया मोड़ लाता है। इसमें संघीय संवैधानिक न्यायालय की स्थापना की गई है, जो संवैधानिक व्याख्या और मौलिक अधिकारों पर विशेष अधिकार क्षेत्र रखेगा। पहले ये जिम्मेदारियां सर्वोच्च न्यायालय के पास थीं। अब सर्वोच्च न्यायालय केवल गैर-संवैधानिक मामलों का अपीलीय निकाय बनकर रह गया है। यह बदलाव न्यायपालिका को उसके मूल कर्तव्य से वंचित करता है—संविधान का संरक्षक बनना। राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री की सलाह पर इस नए न्यायालय के जजों की नियुक्ति का अधिकार मिला है, बिना किसी पारदर्शी चयन मानदंड के। इससे राजनीतिक संरक्षण संस्थागत हो जाता है, जहां जजों की नियुक्ति सत्ता की कृपा पर निर्भर हो जाती है।

इसके अलावा, संशोधन उच्च न्यायालयों के जजों को उनकी सहमति के बिना प्रांतों के बीच स्थानांतरित करने की अनुमति देता है। अगर कोई जज इनकार करता है, तो उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती है, यहां तक कि निष्कासन तक। यह प्रावधान न्यायाधीशों को कार्यपालिका के आगे झुकने पर मजबूर करता है। सबसे चिंताजनक सैन्य शक्ति का समेकन है। चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज का नया पद सृजित किया गया, जिसे सेना प्रमुख ही संभालेगा। इससे सेना को सभी सशस्त्र सेवाओं पर प्रधानता मिलती है और उसे अभियोजन से आजीवन छूट भी प्रदान की गई है। पाकिस्तान का यह हाइब्रिड शासन मॉडल अब संवैधानिक रूप धारण कर चुका है, जहां सेना सिविल प्रक्रियाओं में हस्तक्षेप का औपचारिक आधार पा गई है। विधेयक को संसद में जल्दबाजी में पारित किया गया, बिना व्यापक बहस या विपक्षी परामर्श के। इससे संसदीय संप्रभुता ही कमजोर हुई है।

इस संशोधन के परिणामस्वरूप न्यायिक संस्थाओं का विखंडन हो गया है। एक समानांतर प्रणाली उभरी है, जिसे कार्यपालिका आसानी से नियंत्रित कर सकती है। जवाबदेही का अभाव स्पष्ट है—राष्ट्रपति और शीर्ष सैन्य अधिकारियों को छूट देकर विधि के समक्ष समानता का सिद्धांत तोड़ा गया। अब एक विशेष वर्ग कानून से परे हो गया है। असहमति को दबाने की प्रवृत्ति भी दिखी। वरिष्ठ जजों जैसे जस्टिस मंसूर अली शाह ने इस्तीफा दे दिया, जो न्याय व्यवस्था में विश्वास की भारी कमी को दर्शाता है। नागरिक अधिकारों की रक्षा करने की क्षमता अब संदिग्ध है। विधि का शासन क्षरण की इस प्रक्रिया ने पाकिस्तान को एक ऐसे बिंदु पर ला खड़ा किया है, जहां लोकतंत्र केवल नाम का रह गया है। सैन्य हस्तक्षेप अब संवैधानिक वैधता के आवरण में हो रहा है।

भारत इस घटना से गहरी सीख ले सकता है। हमारा संविधान शक्तियों के पृथक्करण पर आधारित है, और न्यायपालिका ने इसे बार-बार मजबूती दी है। केशवानंद भारती मामले में प्रतिपादित मूल ढांचा सिद्धांत संवैधानिक संशोधनों के विरुद्ध सबसे बड़ी ढाल है। यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी संशोधन न्यायिक समीक्षा या शक्तियों के विभाजन को कमजोर न करे। पाकिस्तान का अनुभव बताता है कि कार्यपालिका के नेतृत्व वाली नियुक्तियों से बचना चाहिए। हमारी कॉलेजियम प्रणाली भले आलोचित हो, लेकिन यह बेंच को राजनीतिक आधिपत्य से बचाती है। जजों के तबादलों को पारदर्शी और प्रशासनिक आवश्यकता पर आधारित रखना जरूरी है, न कि दंडात्मक मंशा से प्रेरित। समानांतर न्यायालयों के निर्माण का कोई प्रस्ताव हो तो उसकी कठोर जांच होनी चाहिए, ताकि वे कार्यपालिका के हितैषी न बनें।

भारतीय बार और बेंच को एकजुट रहना चाहिए। विभाजित न्यायपालिका विधायी अतिक्रमण के प्रति कमजोर पड़ती है। संसदीय बहसों को मजबूत बनाना होगा, ताकि संशोधन जल्दबाजी में न पास हों। नागरिक समाज की भूमिका भी महत्वपूर्ण है—सार्वजनिक विमर्श से सत्ता के दुरुपयोग को रोका जा सकता है। भारत ने अब तक 106 संशोधन झेले हैं, लेकिन मूल ढांचा अटल रहा। फिर भी, सजगता जरूरी है। राजनीतिक अस्थिरता या बहुमत की निरंकुशता में संशोधन सत्ता केंद्रीकरण का हथियार बन सकते हैं। न्यायिक स्वायत्तता केवल कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि निरंतर संघर्ष है।

पाकिस्तान का 27वां संशोधन एक लोकतांत्रिक दुविधा है—जहां विधिक प्रक्रियाओं का उपयोग लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करने के लिए हो रहा है। भारत को इस अनुभव से सतर्क होकर अपनी संस्थाओं को और मजबूत करना चाहिए। न्यायपालिका मनमानी सत्ता पर अंकुश बनी रहे, तभी गणराज्य की पवित्रता सुरक्षित रहेगी। समय है कि हम पाकिस्तान की गलतियों से बचें और लोकतंत्र को सशक्त बनाएं।

पाकिस्तान का 27वां संवैधानिक संशोधन लोकतंत्र के लिए एक काला अध्याय है। यह सतह पर प्रक्रियात्मक वैधता का दिखावा करता है, किंतु वास्तव में कार्यपालिका और सेना द्वारा न्यायपालिका पर कब्जे का प्रयास है। संघीय संवैधानिक न्यायालय की स्थापना, जजों की मनमानी नियुक्तियां, बिना सहमति तबादले और सैन्य छूट ने शक्ति संतुलन को हमेशा के लिए बिगाड़ दिया। विधि का शासन क्षरण, संस्थागत विखंडन और विश्वास-ह्रास ने पाकिस्तान को हाइब्रिड शासन की ओर धकेल दिया, जहां सिविल प्रक्रियाएं सैन्य छत्रछाया में सिकुड़ गईं। जस्टिस मंसूर अली शाह जैसे इस्तीफों ने संकट की गहराई उजागर की।

भारत के लिए यह कठोर अनुस्मारक है। मूल ढांचा सिद्धांत, कॉलेजियम प्रणाली और पारदर्शी तबादलों को अटल रखें। समानांतर न्यायालयों का प्रतिरोध करें, बार-बेंच एकजुट रहें। संसदीय बहसें मजबूत हों, नागरिक विमर्श सक्रिय। न्यायिक स्वायत्तता निरंतर संघर्ष है—इसे मजबूत रखें, ताकि मनमानी सत्ता पर अंकुश बना रहे। पाकिस्तानी दुविधा से बचकर भारत लोकतंत्र की मिसाल बने। गणराज्य की पवित्रता रक्षा ही हमारा कर्तव्य है।

  (डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)

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