लक्कुंडी की खुदाई बनी वैश्विक आकर्षण, देश-विदेश से पहुंच रहे पर्यटक

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-सोने के खजाने की खोज के बाद खुदाई कार्य को लेकर बढ़ी जिज्ञासा

गदग (कर्नाटक), 23 जनवरी (हि.स.)। दान चिंतामणि अत्तिमब्बे की कर्मभूमि के रूप में प्रसिद्ध तथा 101 मंदिरों और 101 बावड़ियों के गौरवशाली इतिहास को संजोए कर्नाटक के गदग जिले का ऐतिहासिक लक्कुंडी गांव इन दिनों देश-विदेश के पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन गया है। हाल ही में यहां सोने का खजाना मिलने के बाद चल रहे पुरातात्विक खुदाई कार्य को देखने के लिए बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक भी पहुंच रहे हैं।

लक्कुंडी में 10 जनवरी को लगभग 470 ग्राम सोने का खजाना मिलने की घटना ने न केवल देश, बल्कि विदेशों में भी व्यापक उत्सुकता पैदा की है। खजाना मिलने वाले स्थल पर फ्रांस से आए पर्यटकों के एक दल ने खुदाई स्थल का दौरा कर कार्य की विस्तृत जानकारी ली। खुदाई के दौरान प्राप्त सोने को सरकार को सौंपने वाले प्रज्वल रिट्टी की ईमानदारी की विदेशी पर्यटकों ने खुले तौर पर सराहना की।

खुदाई स्थल से हड्डियां, कंचे, धातु की वस्तुएं सहित कई प्राचीन अवशेष प्राप्त हुए हैं। इससे यह विश्वास और प्रबल हुआ है कि लक्कुंडी का वास्तविक इतिहास अभी भी जमीन की गहराइयों में छिपा हुआ है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि वैज्ञानिक तरीके से और गहराई तक खुदाई की जाए, तो प्राचीन लक्कुंडी का वैभवपूर्ण अतीत सामने आ सकता है।

ग्रामीणों के अनुसार, कोटे वीरभद्रेश्वर मंदिर से सिद्धर बावी तक बड़े पत्थरों से बनी नहरनुमा सड़क मौजूद है। मान्यता है कि उस काल के राजा इसी बावी में स्नान कर इसी मार्ग से चलते हुए मंदिरों में पूजा-अर्चना के लिए जाते थे। वर्तमान में खुदाई स्थल को देखने के लिए प्रतिदिन बड़ी संख्या में स्थानीय लोग और पर्यटक पहुंच रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2003 में गदग तालुका के लक्कुंडी में अल्लमप्रभु मठ के समीप पुरातत्व विभाग द्वारा खुदाई कार्य कराया गया था। इसके लिए किसान शरणप्पा कमतर के परिवार ने 3 एकड़ 33 गुंटा भूमि उपलब्ध कराई थी। तत्कालीन विधायकों और स्थानीय नेताओं के आश्वासन पर, शरणप्पा कमतर के दादा वीरुपाक्षप्पा कमतर की सहमति से यह भूमि खुदाई के लिए दी गई थी।

लगभग दो वर्षों तक चली खुदाई में कुछ प्राचीन अवशेष मिले, लेकिन इसके बाद पुरातत्व विभाग स्थल को अधूरी अवस्था में छोड़कर चला गया। वर्तमान स्थिति सरकारी लापरवाही को उजागर करती है। बीते 20 वर्षों से यह भूमि उपेक्षित पड़ी है, जहां झाड़ियां और कंटीली घास उग आई हैं। खुदाई में मिले कुछ अवशेष भी वहीं खुले में छोड़ दिए गए हैं।

भूमि अबतक न लौटाए जाने और मुआवजा न मिलने से किसान परिवार आज भी गहरी नाराजगी और पीड़ा व्यक्त कर रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि सरकार इस स्थल पर पुनः गंभीरता से खुदाई और संरक्षण का कार्य शुरू करे, तो लक्कुंडी को वैश्विक पुरातात्विक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है

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