
बाल मुकुन्द ओझा
संयुक्त राष्ट्र द्वारा 6 फरवरी को महिला जननांग विकृति के लिए शून्य सहनशीलता दिवस मनाया जाता है। यह दिन जागरूकता पैदा करता है और लोगों को जननांग विकृति यानि खतना प्रक्रिया से गुजरने वाली लड़कियों द्वारा सामना किए जाने वाले परिणामों के बारे में शिक्षित करता है। महिला जननांग विकृति एक ऐसा अपराध है जिससे आज के दौर में विश्व की ज्यादातर महिलाएं प्रभावित हैं। यह कुप्रथा उनकी गरिमा को भी भंग करती है और स्वास्थ्य को बहुत नुकसान पहुंचाती है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार 23 करोड़ महिलाएं और बच्चियां खतना का शिकार हुई हैं। 2016 की तुलना में देखें तो इनकी संख्या में तीन करोड़ यानी 15 फीसदी का इजाफा हुआ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि यह प्रथा एक हजार वर्षों से अधिक समय से जारी है। यह तय किया गया है कि 2030 तक महिला जननांग विकृति कुप्रथा को समाप्त किया जाए। संयुक्त राष्ट्र ने कुछ आँकड़ों का संदर्भ देते हुए कहा कि महिला ख़तना के कारण स्वास्थ्य को होने वाले नुक़सान का इलाज करने और अन्य गतिविधियों पर हर साल लगभग एक अरब 40 करोड़ डॉलर का ख़र्च आता है। महिला ख़तना ना केवल मानवाधिकारों का ऐसा गंभीर और दर्दनाक उल्लंघन है जो करोड़ों महिलाओं और लड़कियों के ना केवल शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर नुक़सान पहुँचाता है बल्कि ये देश के आर्थिक संसाधन भी बर्बाद करता है। दुनिया भर में इस समय लगभग 23 करोड़ महिलाएँ व लड़कियाँ हैं जिन्हें महिला ख़तना की दर्दनाक प्रक्रिया से गुज़रना पड़ा है। वर्ष 2023 में महिला के लिए जीरो टॉलरेंस के अंतर्राष्ट्रीय दिवस की थीम महिला जननांग विकृति को समाप्त करने के लिए सामाजिक और लैंगिक मानदंडों को बदलने के लिए पुरुषों और लड़कों के साथ साझेदारी रखा गया है।
जननांगों को लेकर देश और दुनिया में कई तरह की कुप्रथाएं हैं। हमारे देश में सामाजिक मान्यताओं और रीति रिवाजों की कुप्रथा के चलते महिलाओं को अनेक शारीरिक कष्टों का सामना करना पड़ता है इनमें जननांगों की समस्या प्रमुख है। महिला जननांग विकृति लिंग समान प्रकृति के अन्य हानिकारक प्रचलन की तरह, असमानता की व्यापक प्रवृत्ति को दर्शाता है।
इस प्रथा की ज्यादातर लड़कियां शिकार होती है। यह प्रथा लड़कियों की गरिमा भंग करती है। स्वास्थ्य को ख़तरे में डालती है और अनावश्यक पीड़ा सहन करने के लिए मजबूर करती है। कुप्रथा के कारण जननांग से जुड़ी बीमारियां होती है और आगे चलकर गंभीर रोग में बदल जाती है । इसमें कई बार मरीज लंबे समय तक दर्द झेलता है और आखिर में उसकी मौत भी हो जाती है। इससे जुड़े रोग का विभिन्न सामाजिक कारणों से इलाज नहीं किया जाता। अधिकतर परिवार घरेलू उपचार से इस रोग का निदान करने का प्रयास करते है और सही उपचार नहीं मिलने से रोग बढ़ जाता है और गंभीर रूप ले लेता है। डॉक्टर बता रहे हैं कि इस मामले में लड़कियों को ज्यादा परेशान होती है। स्त्री रोग विशेषज्ञ के अनुसार इस कुप्रथा के चलते जननांग में गंभीर दर्द, अत्यधिक रक्तस्राव (रक्तस्राव), झटका, जननांग ऊतक की सूजन, संक्रमण, इम्यूनोडिफीसिअन्सी वायरस (एचआइवी), पेशाब की समस्याओं, और असामान्य निशान यहां तक की टीटनस होने के कारण मौत हो सकती है। संयुक्त राष्ट्र की बाल एजेंसी (यूनिसेफ) के अनुसार महिला जननांग विकृति और काटना महिलाओं और लड़कियों के मूल अधिकारों का उल्लंघन है। यह एक खतरनाक और अपरिवर्तनीय प्रक्रिया है जो सामान्य रूप से नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है।
महिला जननांग विकृति को जननांग खतना या जननांग को आंशिक काटने और पूरी तरह हटाने या अचिकित्सा कारणों मुख्य रूप से सांस्कृतिक परंपरा के आधार पर महिला प्रजनन अंगों की क्षति के नाम से भी जाना जाता है। इस कृत्य के लिए रेजर ब्लेड या चाकू का उपयोग किया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप गंभीर स्वास्थ्य परेशानियाँ जैसे कि गंभीर रक्तस्राव, संक्रमण, बांझपन, बच्चे के जन्म के समय होने वाली जटिलताएँ और नवजात मृत्यु हो सकती है। इस कुप्रथा के खिलाफ लोगों को जागरूक करना बेहद जरूरी है। इससे महिलाओं की मानसिक और शारीरिक सेहत पर बहुत बुरा असर पड़ता है।
बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर