भूख की दुश्वारियां : विकसित देश निभाएं अपनी जिम्मेदारियां

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  बाल मुकुन्द ओझा                                                                                               

देश और दुनिया में भुखमरी एक बहुत बड़ी समस्या बन गई है। आबादी विस्फोट के साथ भुखमरी का आंकड़ा भी बेहद चिंताजनक स्थिति में दिन-प्रतिदिन लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इसी समस्या से निपटने के लिए विश्व खाद्य दिवस 16 अक्टूबर को मनाया जाता है।  इस दिन को मनाने का मकसद यह है कि दुनिया में किसी भी व्यक्ति को भूखा न सोना पड़े और सभी को पोषक आहार मिल सके। देश और दुनिया में अभी भी करोड़ो लोग भुखमरी के शिकार है। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में लगभग 73.3 करोड़ लोग प्रतिदिन पर्याप्त मात्रा में भोजन न मिलने के कारण भूख का सामना करते हैं, जबकि लगभग 2.8 बिलियन लोग पौष्टिक आहार का खर्च वहन नहीं कर पाते हैं। आश्चर्य तो इस बात का है कि हमारे देश में 81 करोड़ गरीबों को मुफ्त राशन उपलब्ध कराने के बावजूद अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा 123 देशों में कुपोषण और बाल मृत्यु दर संकेतकों के आधार पर भुखमरी के स्तर को मापने और ट्रैक करने के लिए उपयोग किया जाने वाले वैश्विक भुखमरी सूचकांक यानी ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2025 में भारत को 102वें स्थान पर रखा गया है। रिपोर्ट में इंडेक्स एंट्री के अनुसार बताया गया है कि ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2025 में 25 .8 का स्कोर के साथ भारत में भूख का स्तर गंभीर है। भारत की स्थिति में वर्ष 2024 और 2023 के मुकाबले सुधार दिखाया गया है। 2024 में भारत 105 वें  और 2023 में 111 वें स्थान पर बताया गया था। यह स्थिति तो तब है जब सरकारी थिंक टैंक नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले दस वर्षों में देश में रहने वाले लगभग 25 करोड़ लोग ‘बहुआयामी गरीबी’ से बाहर आ गए है। तथा गरीबों के लिए 5 करोड़ घर बनाए गए। हालांकि भारत सरकार का कहना है, ग्लोबल हंगर रिपोर्ट  में इस्तेमाल किया गया भूख मापने का पैमाना बेहद “त्रुटिपूर्ण” है और यह भारत की वास्तविक स्थिति को नहीं दर्शाता ह।  साथ ही सरकार ने जोर देकर कहा कि वह देश में कुपोषण के मुद्दे को हल करने के लिए गंभीर प्रयास कर रही है।

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कृषि उत्पादक देश है, फिर भी भुखमरी और कुपोषण यहाँ एक बड़ी समस्या है। आजादी के 78 वर्ष  बाद भी देश को भूख और कुपोषण जैसी समस्याओं से छुटकारा नहीं मिल पाया है। बच्चे, महिलाएं और वंचित समाज के लोग इन समस्याओं का सबसे अधिक सामना कर रहे हैं। एक तरफ हम खाद्यान्न के मामले में न केवल आत्मनिर्भर हैं, बल्कि अनाज का एक बड़ा हिस्सा निर्यात करते हैं साथ ही 81 करोड़ गरीबों को मुफ्त राशन दे रहे है, वहीं दूसरी ओर दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी कुपोषित आबादी भारत में है। इन्हीं चुनौतियों का सामना करने के लिए हर साल  विश्व खाद्य दिवस 16 अक्टूबर को मनाया जाता है। 

विश्व खाद्य दिवस 2025 की थीम खाद्य सुरक्षा: क्रियाशील विज्ञान रखी गई है। यह विषय इस बात पर केंद्रित है कि विज्ञान, नवाचार और डेटा किस प्रकार से खाद्य जनित रोगों के खतरों को कम कर सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन ने आधिकारिक तौर पर 1979 में 16 अक्टूबर को विश्व खाद्य दिवस के रूप में घोषित किया। इस वर्ष  विश्व खाद्य दिवस हम ऐसे समय में मनाने जारहे है जब भारत भूख और गरीबी के दल दल से बाहर निकलने के लिए प्रयासरत है।

दुनिया भर में हर साल जितना भोजन तैयार होता है उसका लगभग एक-तिहाई बर्बाद हो जाता है। बर्बाद किया जाने वाला खाना इतना होता है कि उससे दो अरब लोगों के भोजन की ज़रूरत पूरी हो सकती है। दुनिया भर में भूखे पेट सोने वालों की संख्या में कमी नहीं आई है। यह संख्या आज भी तेजी से बढ़ती जा रही है। अब तो यह मानने वालों की तादाद कम नहीं है कि जब तक धरती और आसमान रहेगा तब तक आदमजात अमीरी और गरीबी नामक दो वर्गों में बंटा रहेगा। शोषक और शोषित की परिभाषा समय के साथ बदलती रहेगी मगर भूख और गरीबी का तांडव कायम रहेगा। अमीरी और गरीबी का अंतर कम जरूर हो सकता है मगर इसके लिए हमें अपनी मानसिकता बदलनी पड़ेगी। प्रत्येक संपन्न देश और व्यक्ति को संकल्पबद्धता के साथ गरीब की रोजी और रोटी का माकूल प्रबंध करना होगा। बिना इसके खाध दिवस मनाना बेमानी और गरीब के साथ एक क्रूर मजाक होगा। भारत में गरीबी उन्मूलन और खाद्य सहायता कार्यक्रमों पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद कुपोषण लगातार एक बड़ी समस्या बनी हुई है। भूख के कारण कमजोरी के शिकार बच्चों में बीमारियों से ग्रस्त होने का खतरा लगातार बना रहता है।

    −बाल मुकुन्द ओझा                                                   

  वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार 

   D 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

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