बेगम अख्तर : ठुमरी की मल्लिका और शास्त्रीय संगीत की अमर साधिका

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भारतीय संगीत की दुनिया में जब भी ठुमरी, ग़ज़ल और दादरा की चर्चा होती है, तो सबसे पहले जिस नाम की याद आती है, वह है बेगम अख्तर। उनकी गायकी में दर्द की गहराई, सुरों की मिठास और भावों की सच्चाई थी। वे न केवल एक महान गायिका थीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप में ग़ज़ल और ठुमरी को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने वाली अग्रदूत भी थीं। उन्हें संगीत प्रेमी ससम्मान “मल्लिका-ए-ग़ज़ल” यानी ग़ज़लों की रानी के नाम से जानते हैं।

प्रारंभिक जीवन

बेगम अख्तर का जन्म 7 अक्टूबर 1914 को उत्तर प्रदेश के फैजाबाद (अब अयोध्या) में हुआ था। उनका असली नाम अख्तरी बाई फ़ैज़ाबादी था। बचपन से ही उनके भीतर संगीत के प्रति गहरी रुचि थी। परिवार में विरोध के बावजूद उन्होंने संगीत को ही अपना जीवन बना लिया। उनके संगीत गुरु उस्ताद इमरात खान, उस्ताद अताउल्ला खान, और बाद में उस्ताद झंडे खाँ साहब रहे, जिन्होंने उन्हें ठुमरी, दादरा और ग़ज़ल गायन की बारीकियाँ सिखाईं।

संगीत यात्रा की शुरुआत

अख्तरी बाई ने किशोरावस्था में ही मंच पर गाना शुरू कर दिया था। उनकी पहली सार्वजनिक प्रस्तुति पटना में हुई, जहाँ सरोजिनी नायडू जैसी हस्तियों ने उनकी सराहना की। इसके बाद उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। उस दौर में महिलाओं के लिए मंच पर आना आसान नहीं था, परंतु अख्तरी बाई ने समाज की परंपराओं को तोड़कर यह सिद्ध कर दिया कि प्रतिभा किसी बंधन की मोहताज नहीं होती।

फिल्मों से संगीत तक

1930 के दशक में अख्तरी बाई ने कुछ फिल्मों में अभिनय भी किया। उन्होंने “एक दिन का बादशाह” (1933), “नल-दमयंती” (1933) और “रoti” (1942) जैसी फिल्मों में काम किया। “रोटी” फिल्म में उन्होंने अभिनय के साथ-साथ गीत भी गाए, जो अत्यंत लोकप्रिय हुए।
लेकिन फिल्मों की दुनिया उन्हें रास नहीं आई। उन्होंने निश्चय किया कि वे अपने जीवन को केवल संगीत के लिए समर्पित करेंगी। इसी समय वे “बेगम अख्तर” के नाम से प्रसिद्ध हुईं।

विवाह और व्यक्तिगत जीवन

1945 में उन्होंने लखनऊ के जाने-माने वकील इसरार अहमद अब्बासी से विवाह किया। विवाह के बाद उन्होंने कुछ समय के लिए गायन से दूरी बना ली, लेकिन संगीत से उनका गहरा संबंध कभी नहीं टूटा। गायन छोड़ने के कारण वे मानसिक रूप से बहुत विचलित हो गईं, और डॉक्टरों की सलाह पर उन्हें फिर से संगीत की ओर लौटने की अनुमति मिली।
इसके बाद उनका गायन और भी परिपक्व, संवेदनशील और भावनाओं से भरपूर हो गया।

गायकी की विशेषता

बेगम अख्तर की गायकी का सबसे बड़ा गुण था भावनात्मक गहराई। उनके स्वर में एक अद्भुत दर्द और आत्मीयता थी। जब वे “दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे” या “ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया” जैसी ग़ज़लें गातीं, तो श्रोता उनके साथ-साथ उस दर्द को महसूस करते थे।

उनकी ठुमरी में बनारस, लखनऊ और पटियाला घराने की झलक मिलती थी। उन्होंने ठुमरी को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक साहित्यिक और भावनात्मक कला बना दिया। वे हर शब्द को जीती थीं — उनके सुर, शब्दों के अर्थ और भावों के साथ चलते थे।

उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ थीं –

“हमरी अटरिया पे आओ संवरिया”

“चराग़ दिल का जला के गया कौन”

“ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया”

“दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे”

“कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता”

“वो जो हममें तुममें क़रार था”

इन गीतों ने उन्हें अमर बना दिया।

पुरस्कार और सम्मान

बेगम अख्तर को संगीत के क्षेत्र में अनेक सम्मान प्राप्त हुए। उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री (1968) और पद्मभूषण (1975) से सम्मानित किया। इसके अतिरिक्त उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भी मिला। इन सम्मानों ने उनके योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दी।

अंतिम समय और निधन

1974 में जब वे अहमदाबाद में एक कार्यक्रम के दौरान गा रही थीं, तब उन्हें अस्वस्थता महसूस हुई। इसके बावजूद उन्होंने कार्यक्रम अधूरा नहीं छोड़ा। उसी वर्ष 30 अक्टूबर 1974 को उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु के बाद पूरा संगीत जगत शोक में डूब गया।

बेगम अख्तर की विरासत

बेगम अख्तर ने भारतीय संगीत को जो दिशा दी, वह आज भी अडिग है। उन्होंने ग़ज़ल और ठुमरी को केवल दरबारी या पारंपरिक कला नहीं रहने दिया, बल्कि उसे आम जनता के दिलों तक पहुँचाया। उन्होंने महिला गायिकाओं के लिए एक राह खोली, जिसमें संगीत को सामाजिक बंधनों से मुक्त किया गया।

उनकी शिष्या शुभा मुद्गल, चित्रा सिंह, रीता गांगुली, गुलाम अली जैसे कलाकारों ने उनकी शैली से प्रेरणा पाई। आज भी जब उनकी आवाज़ गूंजती है, तो लगता है जैसे कोई दिल के सबसे गहरे कोने से पुकार रहा हो।

निष्कर्ष

बेगम अख्तर केवल एक गायिका नहीं थीं, बल्कि एक युग थीं — एक ऐसी शख्सियत जिन्होंने संगीत को अपने जीवन का धर्म बना लिया। उनके गीतों में प्रेम है, पीड़ा है, समर्पण है और आत्मा की सच्चाई है।
उनकी आवाज़ में जो तड़प थी, वह शायद उनके जीवन की वास्तविकता का प्रतिबिंब थी। बेगम अख्तर ने अपने सुरों से भारतीय संगीत को अमर कर दिया। वे भले ही अब इस संसार में नहीं हैं, लेकिन उनकी ग़ज़लें, उनकी ठुमरियाँ आज भी हर संगीतप्रेमी के दिल में गूंजती हैं।

बेगम अख्तर सचमुच भारतीय संगीत की वह “मल्लिका” थीं, जिनकी गूँज समय की सीमाओं को पार कर अमर हो चुकी है।

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