
प्रकाश वीर शास्त्री आर्य समाज आंदोलन के एक प्रमुख नेता, विचारक और समाज सुधारक थे जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष में समर्पित कर दिया। उनका जन्म 7 अगस्त 1923 को पंजाब के होशियारपुर जिले के हरियां गांव में एक साधारण परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम प्रकाश चंद था और उनके पिता का नाम लाला मुरलीधर था जो एक किसान थे। उनकी माता श्रीमती विद्यावती एक धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं जिन्होंने बालक प्रकाश के मन में धर्म और नैतिकता के संस्कार रोपे।
प्रकाश वीर शास्त्री की प्रारंभिक शिक्षा गांव की पाठशाला में हुई और बाद में उन्होंने गुरुकुल कांगड़ी हरिद्वार में प्रवेश लिया जहां उन्होंने वैदिक शिक्षा प्राप्त की। गुरुकुल में उनका गहन संस्कार हुआ और वे महर्षि दयानंद सरस्वती के विचारों से अत्यधिक प्रभावित हुए। गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने शास्त्री की उपाधि प्राप्त की और तभी से वे प्रकाश वीर शास्त्री के नाम से जाने जाने लगे। उनका विवाह श्रीमती कमला देवी से हुआ जो एक सुशिक्षित और धार्मिक महिला थीं।
युवावस्था में ही प्रकाश वीर शास्त्री ने आर्य समाज के प्रचार कार्य में सक्रिय रूप से भाग लेना शुरू कर दिया। उन्होंने पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान सहित देश के विभिन्न भागों में घूम-घूमकर वैदिक धर्म का प्रचार किया। उन्होंने सैकड़ों व्याख्यान दिए और हजारों लोगों को आर्य समाज के सिद्धांतों से परिचित कराया। वे एक प्रभावशाली वक्ता थे और उनके प्रवचनों में तर्क, विवेक और शास्त्रीय ज्ञान का अद्भुत समन्वय होता था। उन्होंने जाति-पाति, छुआछूत, अंधविश्वास और सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध जोरदार आवाज उठाई।
प्रकाश वीर शास्त्री ने शुद्धि आंदोलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और हजारों लोगों को पुनः हिंदू धर्म में वापस लाने का कार्य किया। उन्होंने अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा दिया और स्त्री शिक्षा के प्रबल समर्थक रहे। उन्होंने विधवा विवाह का समर्थन किया और बाल विवाह का घोर विरोध किया। वे दहेज प्रथा के कट्टर विरोधी थे और उन्होंने अपने परिवार में भी इन सामाजिक कुरीतियों का पालन नहीं होने दिया। उनका मानना था कि समाज में वास्तविक परिवर्तन तभी संभव है जब लोग अंधविश्वासों को त्यागकर वैदिक मूल्यों को अपनाएं।
राजनीतिक क्षेत्र में भी प्रकाश वीर शास्त्री ने सक्रिय भागीदारी की। वे भारतीय जनसंघ से जुड़े और बाद में भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक बने। उन्होंने राज्य सभा के सदस्य के रूप में दो बार सेवा की और संसद में वे हमेशा राष्ट्रीय हित और हिंदू समाज के प्रश्नों को उठाते रहे। संसद में उनके भाषण तर्कपूर्ण और प्रभावशाली होते थे। उन्होंने राजनीति में रहते हुए भी अपने आर्य समाजी सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया और सदैव धर्मनिष्ठ जीवन जीते रहे।
प्रकाश वीर शास्त्री ने अनेक पुस्तकें और लेख लिखे जिनमें वैदिक धर्म, सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय चेतना के विषय प्रमुख थे। उन्होंने साप्ताहिक पत्रिका और समाचार पत्रों में नियमित रूप से लिखा और जनमानस को जागरूक करने का प्रयास किया। उनकी लेखनी सरल, स्पष्ट और प्रभावशाली थी। वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और वैदिक साहित्य का उन्हें गहन ज्ञान था। उन्होंने अनेक धार्मिक और सामाजिक संगठनों की स्थापना में योगदान दिया।
उन्होंने गौ संरक्षण आंदोलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और गौहत्या बंदी के लिए जोरदार अभियान चलाया। उन्होंने अनेक गौशालाओं की स्थापना में सहयोग किया और गाय के आर्थिक और धार्मिक महत्व को लोगों के सामने रखा। वे हिंदी भाषा के प्रबल समर्थक थे और राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी को प्रतिष्ठित करने के लिए निरंतर प्रयासरत रहे। उन्होंने धर्म और राजनीति के बीच एक स्वस्थ संतुलन बनाए रखा।
प्रकाश वीर शास्त्री का व्यक्तित्व अत्यंत सरल और निर्मल था। वे सादा जीवन उच्च विचार के सिद्धांत को चरितार्थ करते थे। धन-संपत्ति के प्रति उनमें कोई आसक्ति नहीं थी और उन्होंने अपना समस्त जीवन समाज सेवा में लगा दिया। वे प्रातःकाल उठकर योगाभ्यास और हवन करते थे और नियमित रूप से वेद मंत्रों का जाप करते थे। उनका आचरण और व्यवहार उनके उपदेशों के अनुकूल था जो उन्हें अन्य नेताओं से अलग बनाता था।
27 मार्च 2007 को नई दिल्ली में 83 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु से आर्य समाज आंदोलन को एक बड़ी क्षति हुई लेकिन उनके विचार और उनका कार्य आज भी लाखों लोगों को प्रेरित करता है। प्रकाश वीर शास्त्री का जीवन समर्पण, सेवा और सिद्धांतों की मिसाल है। उन्होंने साबित किया कि धर्म और राजनीति दोनों क्षेत्रों में ईमानदारी और सच्चाई के साथ कार्य करना संभव है। उनकी स्मृति आर्य समाज और हिंदू समाज के लिए सदैव प्रेरणादायक बनी रहेगी।(साेनेट)