
जयपुर, 10 फ़रवरी (हि.स.)। राजस्थान हाईकोर्ट ने जूनियर इंजीनियर भर्ती-2020 से जुडे मामले में कहा है कि विश्वविद्यालय की ओर से परीक्षा परिणाम और अंक तालिका देरी से जारी करने के आधार पर पात्र अभ्यर्थी को चयन से वंचित नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही अदालत ने मामले में एकलपीठ के आदेश को सही मानते हुए कर्मचारी चयन बोर्ड की ओर से पेश अपील को खारिज कर दिया है। एक्टिंग सीजे संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस संगीता शर्मा की खंडपीठ ने यह आदेश दिए। अदालत ने दोनों पक्षों की बहस सुनकर गत 2 फरवरी का अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। अदालत ने कहा कि भर्ती प्रक्रिया में व्यावहारिक और न्यायसंगत दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है, विशेषकर तब जबकि कोविड-2019 जैसे असाधारण हालात हों।
मामले से जुडे अधिवक्ता एमएफ बेग ने बताया कि कर्मचारी चयन बोर्ड ने सार्वजनिक निर्माण विभाग में जूनियर सिविल इंजीनियर के 276 पदों पर साल 2020 में भर्ती निकाली थी। भर्ती विज्ञापन में शर्त थी कि अभ्यर्थी के पास संबंधित विषय में इंजीनियरिंग या समकक्ष योग्यता होनी चाहिए। वहीं संबंधित पाठ्यक्रम के अंतिम वर्ष में अध्ययनरत उम्मीदवार भी आवेदन कर सकते हैं, बशर्ते परीक्षा से पहले वे योग्यता पूरी कर लें। एकलपीठ में याचिकाकर्ता रहे लोकेश कुमार ने भर्ती परीक्षा में शामिल होकर मेरिट में स्थान प्राप्त किया, लेकिन उसके यह कहते हुए नियुक्ति नहीं दी गई कि उसका परिणाम बाद में घोषित हुआ है। इसे चुनौती देते हुए एकलपीठ के समक्ष कहा गया कि उसने बीटेक का आठवां सेमेस्टर साल 2019 में ही पास कर लिया था, लेकिन प्रथम सेमेस्टर का एक बैक पेपर शेष था। वहीं कोविड के हालातों को देखते हुए आरटीयू ने अगस्त और सितंबर 2021 में निर्णय लिया कि जिनकी परीक्षाएं आयोजित नहीं हो सकीं हैं, उन्हें पास मानते हुए अगले सेमेस्टर में भेजा जाएगा। ऐसे में याचिकाकर्ता को भी बैक पेपर में पास मान लिया गया, लेकिन डिग्री का संपूर्ण परिणाम अक्टूबर, 2021 में आया और अंकतालिका दिसंबर, 2021 में जारी की गई। इसके आधार पर अपीलार्थी बोर्ड ने कट ऑफ तारीख 12 सितंबर, 2021 के लिए पात्र नहीं माना। एकलपीठ ने मामले में सुनवाई करते हुए उसे मेरिट के आधार पर नियुक्ति देने को कहा। इस आदेश के खिलाफ चयन बोर्ड में खंडपीठ में अपील की। जिसे अब अदालत ने खारिज कर दिया।