दम तोड़ रही हैं जीवनदायी नदियां

0
6

बाल मुकुन्द ओझा

नदियां कभी हमारी पहचान थी। आदिकाल से जीवनदायिनी रही हमारी पवित्र नदियां आज दम तोड़ रही हैं। नदियों और झीलों के रूप में पानी के प्रचुर प्राकृतिक स्रोतों पर विचार करते हुए देखे तो भारत एक समृद्ध देश है। नदियां न केवल करोड़ों लोगों के लिए पेयजल, सिंचाई और आजीविका का मुख्य स्रोत हैं, बल्कि अपने प्राकृतिक सौंदर्य से देश की पहचान भी बनाती है। भारत में आठ मुख्य नदी प्रणाली हैं, जिनमें 400 से ज़्यादा नदियां बहती हैं। बहुत-से जन-जीवन इन नदियों के पानी पर आश्रित हैं। ऐसे में अगर नदियां ही मैली होंगी तो उनके लिए गुज़ारा करना बहुत मुश्किल हो जाएगा। नदियों की साफ-सफाई और ज़रूरतों पर ध्यान न देने से नदियां सूख जाती हैं और इससे मौसम चक्र भी प्रभावित होता है। देश को नदियों की भूमि के रूप में उल्लेखित किया जा सकता है, भारत के लोग नदियों की पूजा देवी और देवताओं के रूप में करते हैं। लेकिन क्या विडंबना है कि नदियों के प्रति हमारा गहन सम्मान और श्रद्धा होने के बावजूद, हम उसकी पवित्रता, स्वच्छता और भौतिक कल्याण बनाए रखने में सक्षम नहीं हैं। हमारी मातृभूमि पर बहने वाली गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र और कावेरी या कोई अन्य नदी हो, कोई भी प्रदूषण से मुक्त नहीं है। नदियों के प्रदूषण के कारण पर्यावरण में मनुष्यों, पशुओं, मछलियों और पक्षियों को प्रभावित करने वाली गंभीर जलजनित बीमारियाँ और स्वास्थ्य सम्बंधित समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं।

 हमारी पवित्र नदियां आज कूड़ा घर बन जाने से कराह रही हैं, दम तोड़ रही हैं। गंगा, यमुना, घाघरा, बेतवा, सरयू, गोमती, काली, आमी, राप्ती, केन एवं मंदाकिनी आदि नदियों के सामने खुद का अस्तित्व बरकरार रखने की चिंता उत्पन्न हो गई है। बालू के नाम पर नदियों के तट पर कब्जा करके बैठे माफियाओं एवं उद्योगों ने नदियों की सुरम्यता को अशांत कर दिया है। प्रदूषण फैलाने और पर्यावरण को नष्ट करने वाले तत्वों को संरक्षण हासिल है। वे जलस्रोतों को पाट कर दिन-रात लूट के खेल में लगे हुए हैं। केंद्र ने भले ही उत्तर प्रदेश सरकार की सात हजार करोड़ रुपये की महत्वाकांक्षी परियोजना अपर गंगा केनाल एक्सप्रेस-वे पर जांच पूरी होने तक तत्काल रोक लगाने के आदेश दे दिए हों, लेकिन नदियों के साथ छेड़छाड़ और अपने स्वार्थों के लिए उन्हें समाप्त करने की साजिश निरंतर चल रही है। गंगा एक्सप्रेस-वे से लेकर गंगा नदी के इर्द-गिर्द रहने वाले 50 हजार से ज्यादा दुर्लभ पशु-पक्षियों के समाप्त हो जाने का ख़तरा भले ही केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की पहल पर रुक गया हो, लेकिन समाप्त नहीं हुआ। गंगा और यमुना के मैदानी भागों में माफियाओं एवं सत्ताधीशों की मिलीभगत साफ दिखाई देती है। नदियों के मुहाने और पाट स्वार्थों की बलिवेदी पर नीलाम हो रहे हैं।

नदियाँ प्रकृति की दी हुई वे नियामत हैं, जो अपने आंचल में ढेर सारा पानी प्रवाहित कर करोड़ों जीवों की प्यास शांत करती हैं। किसानों को अन्न जल से नवाजती हैं। अपनी इसी मातृ वत्सला वृत्ति के कारण नदियों को माँ स्वरुप सम्मान प्राप्त है, लेकिन विकास की अंधी हवस ने हमें माँ के प्रति अपने दायित्वों से विमुक्त कर दिया है। तभी आदि देव दिवाकर व भगवती गोदावरी की पुत्री सई नदी (जिसका जिक्र रामचरित मानस में भी किया गया है) काल कवलित हो रही है। कभी गंगा के समान पवित्र मानकर लोग इसके पानी का प्रयोग भोजन बनाने में करते थे। आज गंदी व प्रदूषण के कारण खाने की बात तो छोडिये लोग नहाने से भी डर रहे हैं ।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here