आलोक पुराणिक
मौज लेनेवाले, व्यंग्य करने वाले हर दौर में हुए हैं।
औरंगजेब इस मुल्क के ऐसे बादशाह हैं, जो मर तो गये हैं, पर मरे नहीं हैं। 1707 में औरंगजेब की मौत हुई, पर बराबर इस या उस वजह से औरंगजेब चर्चा में आते रहते हैं। औरंगजेब ने बाप को कैद रखा और भाईयों का कत्ल कराया। एक क्रूर हत्यारे के तौर पर बदनाम औरंगजेब को चाहनेवाले भी कम नहीं हैं। शायर इकबाल औरंगजेब के परम प्रशंसक थे। औरंगजेब से वैचारिक प्रेरणा लेनेवाले कई लोग अब भी मिल जायेंगे।
खैर, औरंगजेब के वक्त के सिक्कों पर दर्ज था-
सिक्का जद देर जहां चू मीर मुनीर
शाह औरंगजेब आलमगीर
इसका मतलब हुआ कि दुनिया में यह सिक्का ऐसे चमक रहा है, जैसे औरंगजेब आलमगीर चमक रहे हैं.
इसकी जो पैरोडी बनायी गयी, उसे सुनकर आप को लग सकता है कि यह किसी दिल्लीवाले ने बनायी होगी, दिल्ली वाले पनीर के प्रेमी होते हैं, इस दो लाइन की पैरोडी में पनीर आता है-
सिक्का जद बा कुर्स ए पनीर
औरंगजेब बिरादर कुश, पिदार गीर
यानी औरंगजेब का सिक्का पनीर पर चला, औरंगजेब अपने भाई का हत्यारा और पिता को कैदी बनानेवाला।
औरंगजेब का यह मजाक उस वक्त के ईरान के शाह अब्बास ने 1663 में बनाया था। बादशाहों के सिक्कों पर लिखे की पैरोडी बनाने वाले कई थे, कई का जिक्र हुमायूं टोंब की हेरिटेज-लिटरेचर वाक में होगा।
खैर, बाप पर एक शेर सुनिये-
हमें पढ़ाओ न रिश्तों की कोई और किताब
पढ़ी है बाप के चेहरे की झुर्रियाँ हम ने
मेराज फ़ैज़ाबादी