
उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्य नाथ ने राजा महेन्द्र प्रताप सिंह की जयंती पर कहाकि ‘एक लक्ष्य-एक निष्ठ’ होकर माँ भारती की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने वाले महान स्वतंत्रता सेनानी, दूरदर्शी शिक्षाविद राजा महेन्द्र प्रताप सिंह ने आधुनिक भारत की नींव सुदृढ़ करने में अमूल्य योगदान दिया। शिक्षा के क्षेत्र में उनके दूरदर्शी विचार आज भी राष्ट्र के लिए प्रेरणास्रोत हैं। राजा महेन्द्र प्रताप सिंह की जयंती पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।
राजा महेन्द्र प्रताप का जन्म मुरसान नरेश राजा बहादुर घनश्याम सिंह के यहाँ 1 दिसम्बर सन 1886 ई. को हुआ था। राजा घनश्याम सिंह जी के तीन पुत्र थे, दत्तप्रसाद सिंह, बल्देव सिंह और खड़गसिंह, जिनमें सबसे बड़े दत्तप्रसाद सिंह राजा घनश्याम सिंह के उपरान्त मुरसान की गद्दी पर बैठे और बल्देव सिंह बल्देवगढ़ की जागीर के मालिक बन गए। खड़गसिंह जो सबसे छोटे थे वही हमारे चरित नायक राजा महेन्द्र प्रताप जी हैं। मुरसान राज्य से हाथरस गोद आने पर उनका नाम खंड़गसिंह से महेन्द्र प्रताप सिंह हो गया था, मानो खड़ग उनके व्यक्तित्व में साकार प्रताप बनकर ही एकीभूत हो गई हो। कुँवर बल्देव सिंह का राजा साहब (महेन्द्र प्रताप जी से) बहुत घनिष्ठ स्नेह था और राजा साहब भी उन्हें सदा बड़े आदर की दृष्टि से देखते थे। उम्र में सबसे छोटे होने के कारण राजा साहब अपने बड़े भाई को ‘बड़े दादाजी’ और कुँवर बल्देवसिंह जी को ‘छोटे दादाजी’ कहकर संबोधित किया करते थे।
जब राजा साहब केवल तीन वर्ष के ही थे, तभी उन्हें हाथरस नरेश राजा हरिनारायण सिंह जी ने गोद ले लिया था, किन्तु राजा साहब 7-8 वर्ष की अवस्था तक मुरसान में ही रहे। इसका कारण यह था कि राजा घनश्यामसिंह को यह डर था कि कहीं राजा हरिनारायण सिंह की विशाल सम्पत्ति पर लालच की दृष्टि रखने वाले लोभियों द्वारा बालक का कोई अनिष्ट न हो जाए।
राजा साहब पहले कुछ दिन तक अलीगढ़ के गवर्नमेन्ट स्कूल में और फिर अलीगढ़ के एम.ए.ओ. कॉलेज में पढ़े। यही कॉलेज बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के रूप में विकसित हुआ। राजा साहब को अलीगढ़ में पढ़ने सर सैयद अहमद ख़ाँ के आग्रह पर भेजा गया था, क्योंकि राजा साहब के पिताजी राजा घनश्याम सिंह की सैयद साहब से व्यक्तिगत मित्रता थी। इस संस्था की स्थापना के लिए राजा बहादुर ने यथेष्ट दान भी दिया था। उससे एक पक्का कमरा बनवाया गया, जिस पर आज भी राजा बहादुर घनश्याम सिंह का नाम लिखा हुआ है। राजा साहब स्वयं हिन्दू वातावरण में पले परन्तु एम.ए.ओ. कॉलेज में पढ़े। इसका एक सुखद परिणाम यह हुआ कि मुस्लिम धर्म और मुसलमान बन्धुओं का निकट सम्पर्क उन्हें मिला और एक विशिष्ट वर्ग के (राजकुमारों की श्रेणी के) व्यक्ति होने के कारण तब उनसे मिलना और उनके सम्पर्क में आना सभी हिन्दू मुस्लिम विद्यार्थी एक गौरव की बात मानते थे। इसका परिणाम यह हुआ कि राजा साहब का मुस्लिम वातावरण तथा मुसलमान धर्म की अच्छाइयों से सहज ही परिचय हो गया और धार्मिक संकीर्णता की भावना से वह सहज में ही ऊँचे उठ गए। बाद में जब राजा साहब देश को छोड़ कर विदेशों में स्वतंत्रता का अलख जगाने गये, तब मुसलमान बादशाहों से तथा मुस्लिम देशों की जनता से उनका हार्दिक भाईचारा हर जगह स्वयं बन गया। हमारी राय से राजा साहब के व्यक्तित्व की यह विशेषता उन्हें इस शिक्षा संस्थान की ही देन है।
राजा साहब जब विद्यार्थी थे, उनमें जहाँ सब धर्मों के प्रति सहज अनुराग जगा वहाँ शिक्षा द्वारा जैसे-जैसे बुद्धि के कपाट खुले वैसे-वैसे ही अंग्रेज़ों की साम्राज्य लिप्सा के प्रति उनके मन में क्षोभ और विद्रोह भी भड़का। वृन्दावन के राज महल में प्रचलित ठाकुर दयाराम की वीरता के किस्से बड़े बूढ़ों से सुनकर जहाँ उनकी छाती फूलती थी, वहाँ जिस अन्याय और नीचता से गोरों ने उनका राज्य हड़प लिया था, उसे सुनकर उनका हृदय क्रोध और क्षोभ से भर जाता था और वह उनसे टक्कर लेने के मंसूबे बाँधा करते थे। जैसे-जैसे उनकी बुद्धि विकसित होती गई, वैसे अंग्रेज़ों के प्रति इनका विरोध भी मन ही मन तीव्र होता चला गया।
राजा साहब जब अलीगढ़ में विद्यार्थी थे, उनके छोटे भाई दादा (बीच के भाई) कुँवर बल्देव सिंह प्राय: उनसे मिलने अलीगढ़ आते रहते थे। एक दिन वह उन्हें अपने साथ अलीगढ़ के अंग्रेज़ पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट से मिलाने ले गए। उस समय राजा साहब 19 या 20 वर्ष के नवयुवक थे। जब पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट से मुलाकात हुई, तो कुँवर बल्देव सिंह ने उसे सलाम किया परन्तु राजा साहब ने ऐसा न करके उससे केवल हाथ मिलाया। बाद में जब बातचीत का सिलसिला चला तो राजा साहब ने पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट को किसी प्रसंग में यह भी हवाला दिया कि हमारे दादा अंग्रेज़ों से लड़े थे। यह सुनकर सुपरिन्टेन्डेन्ट कुछ समय के लिए सन्न रह गया और कुछ मिनटों तक विचार-मग्न रहा। जब बाद में बातचीत का प्रसंग बदला तब वह सामान्य स्थिति में आ सका। इस प्रकार निर्भीकतापूर्वक अपनी स्पष्ट बात कह देने की आदत राजा साहब में बचपन से ही रही।
राजा साहब के बड़े भाई कुँवर बल्देव सिंह जी की शादी फरीदकोट में बड़ी शान से हुई थी और उसे देखकर उनके मन में भी यह गुप्त लालसा जाग उठी थी कि मेरा विवाह भी ऐसी ही शान और तड़क-भड़क से हो। राजा साहब के विद्यार्थी जीवन में ही सन 1901 में जब वह केवल 14 वर्ष के थे, यह अवसर भी आ गया। जींद नरेश महाराज रणवीरसिंह जी की छोटी बहिन बलवीर कौर से उनकी सगाई बड़े समारोह से वृन्दावन में पक्की हो गई और विवाह की तैयारी होने लगी। परन्तु इसी बीच एक महान् दुर्घटना घट गई। जिस दिन राजा साहब का तेल चढ़ा था, उसी दिन दुर्भाग्य से मथुरा वृन्दावन मार्ग पर स्थित जयसिंहपुरा वाली कोठी में उनके पूज्य पिता राजा बहादुर घनश्यामसिंह जी का स्वर्गवास हो गया। इस दुर्घटना के कारण विवाह को भी स्थगित करने का भी विचार होने लगा, किन्तु अन्त में यही तय हुआ कि क्योंकि राजा महेन्द्र प्रताप गोद आ गये हैं, अत: देहरी बदल जाने के कारण अब विवाह नहीं रोका जा सकता।
राजा महेन्द्र प्रताप जी का विवाह जींद में बड़ी शान से हुआ। दो स्पेशल रेल गाड़ियों में बारात मथुरा स्टेशन से जींद गई। इस विवाह पर जींद नरेश ने तीन लाख पिचहत्तर हज़ार (3,75,000) रुपये व्यय किए थे। यह उस सस्ते युग का व्यय है, जब 1 रुपये का 1 मन गेहूँ आता था। विवाह में इतना अधिक दहेज आया था कि वृन्दावन के महल का विशाल आँगन उससे खचाखच भर गया। इस दहेज का बहुत सा सामान महाराज ने इष्ट मित्रों और जनता को बांट दिया। विवाह के समय राजा साहब की आयु केवल 14 वर्ष की थी और उनकी महारानी उनसे तीन वर्ष बड़ी थीं। इस छोटी अवस्था में भी महाराज में दानवृत्ति और त्यागवृत्ति विद्यमान थी। वह राज्याधिकार प्राप्त होने पर भी यथावत बनी रही, वरन् कहना चाहिए कि उनमें परोपकार की भावना निरंतर विकसित होती रही।
मुरसान राज्य के संस्थापक नन्दराम सिंह अपने परदादा माखनसिंह की तरह असीम साहसिक तथा रणनीति और राजनीति में पारंगत थे। औरंगज़ेब को नन्दराम सिंह ने अपने कारनामों से इतना आतंकित कर दिया, जिससे मुग़ल दरबार में नन्दराम सिंह को फ़ौजदार की उपाधि देकर संतोष की साँस ली। नन्दराम सिंह ने पहली बार मुरसान का इलाका भी अपने अधिकार में कर लिया और वे एक रियासतदार के रूप में प्रसिद्ध हुए। इनके चौदह पुत्र थे, जिनमें से जलकरन सिंह, खुशालसिंह, जैसिंह, भोजसिंह, चूरामन, जसवन्तसिंह, अधिकरणसिंह और विजयसिंह इन आठ पुत्रों के नाम ही ज्ञात हो सके हैं। पहले जलकरनसिंह और उनकी मृत्यु के बाद खुशालसिंह नन्दराम सिंह के उत्तराधिकारी हुए। इन्होंने अपने पिता की उपस्थिति में ही मुरसान में सुदृढ़ क़िला बनवाया[2] और पिता के उपार्जित इलाके में भी वृद्धि की। सआदतुल्ला से बहुत सा इलाका छीन कर मथुरा, अलीगढ़, हाथरस के अंतवर्ती प्रदेश को भी इन्होंने अपने राज्य में मिला लिया, घोड़े और तोपों की संख्या में भी वृद्धि की। शेष भाइयों में से चूरामन, जसवंतसिंह, अधिकरणसिंह और विजयसिंह ने क्रमश: तोछीगढ़, बहरामगढ़ी, श्रीनगर और हरमपुर में अपना अधिकार स्थापित किया। नन्दराम सिंह ने अपनी आंखों से ही अपनी संतति के हाथों अपने राज्य-वैभव की वृद्धि होती देखी। यह 40 वर्ष राज्य करके सन 1695 ई. में स्वर्ग सिधार गए।
राजा हरनारायण जी की मृत्यु के समय सन 1895 ई. में राजा साहब नावालिग थे, अत: राज्य का प्रबंध सरकार ने कोर्ट आफ़ वार्ड्स को सौंप दिया, परन्तु उनके वालिग होने से एक वर्ष पूर्व ही सन 1906 में रियासत उनके अधिकार में आ गई। इसका कारण यह हुआ कि रियासत कोरट होते समय राज्य के कर्मचारियों ने रियासत शीघ्र ही लौट सके, इस दृष्टि से राजा साहब की आयु एक वर्ष अधिक लिखा दी थी। इस भांति 20 वर्ष की आयु में ही राजा साहब का अधिकार रियासत पर हो गया और तभी उनकी पढ़ाई बन्द हो गई। अलीगढ़ में उनकी शिक्षा एफ़.ए. तक हुई। एफ़.ए. में वह साइन्स के विद्यार्थी थे। राजा साहब को हिसाब में विशेष योग्यता प्राप्त हुई, परन्तु अंग्रेज़ी उनकी बहुत अच्छी न थी। बी.ए. के प्रथम वर्ष में वह फ़ेल हो गए और तभी राज्य प्राप्ति के बाद उनकी पढ़ाई समाप्त हो गई।
इस प्रकार यद्यपि राजा साहब को राज्याधिकार प्राप्त हो गया था, परन्तु अंग्रेज़ों ने उन्हें राजा की उपाधि नहीं दी। राजा साहब के जन्मदाता मुरसान राजवंश में ‘राजा बहादुर’ की उपाधि परंपरागत और जन्मजात थी, जो गद्दी पर बैठने वाले को स्वयं प्राप्त हो जाती थी।[4] हाथरस राजवंश की स्थिति इससे भिन्न थी। यहाँ राजा की उपाधि अंग्रेज़ों द्वारा दी जाती थी। राजा साहब के पिता हरनारायण भी राजा साहब की भांति ही गोद आये थे, परन्तु उन्हें अंग्रेज़ी सरकार ने राजा स्वीकार कर लिया था। अत: उनके उपरान्त जब राजा महेन्द्र प्रताप मुरसान से गोद आये थे तो अंग्रेज़ों को राजा हरनारायण की भांति ही उन्हें भी राजा की उपाधि देनी चाहिए थी, परन्तु न तो राजा साहब ने कभी उस समय की अंग्रेज़ सरकार से यह उपाधि माँगी और न उन्होंने ही उन्हें अपनी ओर से यह सम्मान प्रदान किया।
राजा हरनारायण की मृत्यु के उपरान्त जनता ने स्वयं उन्हें अपने प्यार के कारण बचपन से ही राजा कहना प्रारम्भ कर दिया था और वह जनता के हृदयासन पर आज तक राजा के रूप में ही विद्यमान हैं। इस प्रकार राजा महेन्द्र प्रताप जी की ‘राजा की उपाधि’ जनता जनार्दन द्वारा प्रदत्त है। वह उन्हें अंग्रेज़ी दासता की विरासत से प्राप्त उपाधि नहीं है। सरकारी काग़ज़ों में अंग्रेज़ उन्हें सदा कुँवर ही लिखते रहे।
राजा महेन्द्र प्रताप का जीवन-क्रम आरम्भ से ही जहाँ एक तूफान के समान निरंतर वेगवान था, वहीं वह आस्था, विश्वास और परोपकार की सुरभि से सुरभित भी रहा। मौलिक चिन्तन, दृढ़ निश्चय, अदम्य उत्साह और एक-एक क्षण के सदुपयोग की प्रबल उत्कंठा उनमें किशोरावस्था से ही अपने राज्याधिकार प्राप्ति काल में भी विद्यमान थी। प्राचीनता के प्रति श्रद्धा और ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास रखते हुए भी नवीन युग की नव चेतना को बचपन से ही उन्होंने आगे बढ़कर अपनाया। अन्ध विश्वासों के लिए उनके मन में कभी कोई मोह नहीं रहा और कदाचित किसी आतंक से डरना उनकी जन्मघुट्टी में ही नहीं था। बचपन से ही यह ऐसे दृढ़ निश्चयी थे कि एक बार जो बात मन में जम गई, उससे हटना या विचलित होना, वह जानते ही नहीं।
वृन्दावन में श्रावण की हरियाली तीज का झूला-उत्सव भारत प्रसिद्ध है। वृन्दावन के अधिष्टाता भगवान बाँके बिहारी जी वर्ष में केवल उसी दिन झूला झूलते हैं। इसी हरियाली तीज के अवसर पर महाराज ने अपने प्रथम पुत्र का जन्मोत्सव मनाने का निर्णय लिया। समस्त इष्ट मित्र व संबंधियों को आमंत्रण भेज दिये गए। महामना मालवीय जी सहित राजा साहब के संबंधी और मित्र गहने कपड़े और भेंट की सामग्री लेकर जन्मोत्सव में बड़े उत्साह से पधारे। सभी का यथायोग्य स्वागत सम्मान किया गया। एक विशाल यज्ञ मंडप में पंडितों ने यज्ञ कराया। यज्ञ के उपरान्त एक बधाई सभा हुई। इस सभा में राजा साहब ने भाषण देते हुए कहा कि मेरे आज जो पुत्र हुआ है, वह एक औद्योगिक शिक्षण संस्थान है। आप सब उसे आशीर्वाद दें। यह सुनकर सभा में हलचल मच गई। कुछ व्यक्ति राजा साहब की सराहना करने लगे तो कुछ इस प्रकार की गलतफहमी पैदा करने के लिए नाराज भी हुए। राजा साहब के एक वयोपृद्ध ग़रीब अध्यापक अल्ताज अली जो बच्चे के लिए बड़े उल्लास से जेबर व कपड़ा लेकर आये थे, राजा साहब को डांटने लगे। राजा साहब की दोनों माताएं यह समाचार सुनकर दु:खी हो गईं। उधर सभा में विद्यालय के नामकरण पर विचार होने लगा। यह सुझाव भी आया कि राजा साहब के पूज्य पिताजी के नाम पर विद्यालय का नाम हो, किसी ने कहा, स्वयं राजा साहब के नाम पर विद्यालय का नामकरण हो। किसी ने कहा ‘जाट विद्यालय’ हो, पर राजा साहब ने कहा श्री कृष्ण को प्रेमावतार भी कहते हैं और यह उन्हीं की लीला भूमि है, इसीलिए इसका नाम ‘प्रेम महाविद्यालय’ रखना चाहिए। सबने बड़े हर्ष से यह प्रस्ताव स्वीकार किया और इस विचार की प्रशंसा की।
राजा साहब अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति प्रेम विद्यालय को दान करना चाहते थे, परन्तु महामना मालवीय जी के यह समझाने पर कि यह पुश्तैनी रियासत है, आप सब दान नहीं दे सकते, राजा साहब ने अपनी आधी सम्पत्ति (पांच गांव और दो महल) विद्यालय को दान कर दिये। अपनी माताओं के निवास के लिए विद्यालय को दान दी गई सम्पत्ति में से ही राजा साहब ने 10,000 रुपये देकर अपनी ही केलाकुंज को विद्यालय से पुन: ख़रीदा और वहाँ माताओं के रहने की व्यवस्था की। एक ट्रस्ट बनाकर सन 1909 में विद्यालय के लिए सम्पत्ति की रजिस्ट्री करा दी गई और महारानी विक्टोरिया के जन्म दिन पर इस विद्यालय को शुरू किया गया।
अपने शासन काल में राजा साहब ने शिक्षा संस्थाओं और ग़रीबों की ओर विशेष ध्यान दिया। उनके लिए आपके द्वार सदा खुले रहते थे। अलीगढ़ के डी.ए.बी. कॉलेज और कायस्थ पाठशाला के लिए आपने भूमि दान में दी थी और हिन्दू विश्वविद्यालय, काशी को भी भेंट दी थी। इसलिए आप विश्वविद्यालय के बोर्ड के सदस्य भी थे। बुलन्दशहर ज़िले में राजा साहब की काफ़ी बड़ी जमींदारी थी। वहाँ भी आपने अनेक संस्थाओं को हृदय खोलकर दान दिए। राजा साहब ने मथुरा के ज़िलाधिकारी को उस सस्ते जमाने में दस हज़ार रुपये दान दिए थे कि इस रकम से बैंक खोलकर उससे उनके मथुरा ज़िले के प्रजाजन किसानों को सहायता दी जाये। इसी प्रकार आपने 25 हज़ार रुपया देकर मथुरा ज़िले के अपनी ज़मीदारी के गांवों में प्रारंभिक पाठशालाऐं भी खुलवाईं।
राजा साहब ने राजनीति में भी अपना दबदबा बनाया और स्वतंत्र रूप से 1957 का मथुरा संसदीय क्षेत्र से लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुँचे।
राजा साहब में देश भक्ति की भावना आरम्भ से ही थी। सन 1906 में आप अपने साले जींद नरेश के विरोध के बावजूद भी कलकत्ता कांग्रेस में शामिल हुए थे। इसके उपरान्त प्रेम महाविद्यालय के छात्रों के एक दल के साथ एक स्पेशल बैगन बुक कराकर आप सन 1910 की प्रयाग कांग्रेस में भी सम्मिलित हुए। सब विद्यार्थियों को एकसी तनीदार नीची बगलबन्दी धारण करा कर ब्रजवासी वेषभूषा में यह दल प्रयाग पहुँचा था। इस वर्ष कांग्रेस अधिवेशन के साथ उसी मंडप में महाराज एक शिक्षण सम्मेलन भी करना चाहते थे, परन्तु श्री मोतीलाल नेहरू उन्हें कांग्रेस का पंडाल उपयोग के लिए देने को सहमत न हुए। तब राजा साहब ने 500 रुपये में एक नया शामियाना ख़रीदा, जिसमें लगभग 400 व्यक्ति बैठ सकते थे और कांग्रेस के साथ ही प्रयाग में एक अखिल भारतीय शिक्षा सम्मेलन भी आयोजित किया गया, जिसकी अध्यक्षता झालावाड़ नरेश ने की थी।
सन 1914 से पहले तुर्की संसार के चार बड़े साम्राज्यों में से एक था, परन्तु सन 1912 में ही उसके विघटन के लक्षण प्रकट होने लगे। बुल्गारिया और ग्रीस से तुर्की का युद्ध राजा साहब के ठीक होने के बाद ही प्रारम्भ हो गया था और अलीगढ़ के कुछ मुस्लिम छात्रों के साथ डॉक्टर अंसारी वहाँ तुर्की के घायलों की सेवा करने के लिए गये हुए थे। राजा साहब ने जब यह सुना तो आप भी तुरन्त घायलों की सेवा करने के लिए 9 दिन की यात्रा करके तुर्की जा पहुँचे। कोन्सटेण्टीनोपिल पहुँच कर आपने जब तुर्की में प्रवेश करना चाहा तो आप रोक दिये गए। कठिनाई से आपको कुछ समय वहाँ ठहरने की आज्ञा मिली। डॉक्टर अंसारी के दल को वहाँ आपने खोजा, परन्तु वह युद्ध मोर्चे पर जा चुका था, इसलिए आपने स्वयं ही वहाँ के एक अधिकारी को अपनी सेवाएं प्रस्तुत कीं। उसने आपको गौर से देखा और नाम पूछा तो आपने उसे महेन्द्र प्रताप सिन्हा नाम बतला दिया। चेष्टा करने पर भी वह अधिकारी स्वयं इस नाम का उच्चारण नहीं कर सका तो उसने पूछा ‘परन्तु यह मुस्लिम नाम तो नहीं है।’ उसका यह उत्तर सुनकर राजा साहब फिर वहाँ नहीं ठहरे। उन्हें वहाँ रहते हुए पूरे नौ दिन हो चुके थे। रात्रि भर उनके होटल में मोर्चे पर आग उगलती तोपों की धांय-धांय की आवाज़ सुनाई पड़ती थी। बन्दरगाह पर भी सब कमरे घायलों से पटे पड़े थे, परन्तु मुसलमान न होने के कारण वहाँ उनकी सेवा भावना का महत्त्व नहीं आँका गया। 9 दिन की वापसी की यात्रा करके पुन: वृन्दावन लौट आये। इस प्रकार तुर्की की इस यात्रा में उन्हें तीन 9 अर्थात् 27 दिन लगे।
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अनेक ऐसे वीर योद्धा और देशभक्त हुए, जिनका योगदान इतिहास के प्रचलित पन्नों में अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है, लेकिन जनता के संघर्ष और स्वतंत्रता की चेतना में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। राजा महेंद्र सिंह भी ऐसे ही एक वीर स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्होंने ब्रिटिश हुकूमत की अत्याचारपूर्ण नीतियों के विरुद्ध न केवल अपनी आवाज़ बुलंद की, बल्कि लोगों को एकजुट कर आंदोलन की नई दिशा भी प्रदान की। ग्रामीण भारत की सामाजिक संरचना, किसानों की पीड़ा, स्वाभिमान और स्वतंत्रता की चाह—इन सभी भावनाओं को समेटकर राजा महेंद्र सिंह ने पूरे क्षेत्र में संघर्ष की लौ प्रज्वलित की।
राजा महेंद्र सिंह का जन्म एक ऐसे कुल में हुआ था, जो पारंपरिक रूप से सम्मानित था, लेकिन उनके जीवन का उद्देश्य विलासिता नहीं, बल्कि जनता का उत्थान बन गया। स्वभाव से सरल, विचारों से प्रखर और व्यवहार में दृढ़ता—इन गुणों ने उन्हें जनता के बीच अत्यंत लोकप्रिय बना दिया। बचपन से ही उन्होंने ब्रिटिश शासन की नीतियों को बारीकी से देखा। किसानों पर अत्याचार, लगान की भारी मार, पुलिसिया जुल्म और अंग्रेज अधिकारियों की मनमानी ने उनके मन पर गहरा प्रभाव छोड़ा। यही कारण था कि युवावस्था में ही उनकी चेतना स्वतंत्रता के मार्ग पर अग्रसर हो गई।
महात्मा गांधी द्वारा शुरू किए गए असहयोग आंदोलन और नमक सत्याग्रह ने राजा महेंद्र सिंह को अत्यधिक प्रभावित किया। गांधीजी की सरलता, सत्य और अहिंसा के सिद्धांत तथा जन-सरोकारों से जुड़े आंदोलनों ने उन्हें यह विश्वास दिलाया कि ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष केवल हथियारों से नहीं, बल्कि जनता की एकता और नैतिक शक्ति से भी जीता जा सकता है। इसी सोच के साथ राजा महेंद्र सिंह ने अपने क्षेत्र में आंदोलन को संगठित करना शुरू किया। उन्होंने किसानों, मजदूरों, युवाओं और महिलाओं को एकजुट किया तथा जनसभाओं के माध्यम से ब्रिटिश नीतियों के विरुद्ध जागरूकता फैलानी शुरू की।
उनका नेतृत्व लोगों के लिए ऊर्जा का स्रोत बन गया। जब अंग्रेज सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए कड़े कदम उठाए, तब राजा महेंद्र सिंह ने निर्भीक होकर जनता का साथ दिया। वे जानते थे कि अंग्रेजी शासन जनता को भयभीत करके ही शासन करना चाहता है, इसलिए उन्होंने लोगों में निर्भीकता भरने का काम किया। कई बार प्रशासन ने उन पर झूठे मुकदमे लगाए, नजरबंद किया, जुर्माने लगाए और धमकियां दीं, लेकिन वे अपने उद्देश्य से डिगे नहीं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि स्वतंत्रता का मार्ग कठिन अवश्य है, परंतु यदि हम पीछे हटे, तो आने वाली पीढ़ियां हमें क्षमा नहीं करेंगी।
राजा महेंद्र सिंह का संबंध केवल राजनीतिक आंदोलन से ही नहीं था, बल्कि वे सामाजिक सुधारों के पक्षधर भी थे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्होंने शिक्षा, स्वच्छता, महिलाओं के अधिकार और जातीय सौहार्द के विषयों पर भी काम किया। उनका मानना था कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं, बल्कि सामाजिक सुधार भी आवश्यक है, अन्यथा स्वतंत्रता अधूरी रहेगी। उनकी प्रेरणा से कई विद्यालय स्थापित हुए, कई ग्रामीण क्षेत्रों में स्वावलंबन के प्रयास शुरू किए गए और लोगों को सामाजिक कुरीतियों से मुक्त होने के लिए प्रेरित किया गया।
भारत छोड़ो आंदोलन के समय राजा महेंद्र सिंह की सक्रियता अपने चरम पर थी। अंग्रेज सरकार ने इस आंदोलन को देश के लिए खतरनाक मानते हुए बड़ी संख्या में नेताओं को गिरफ्तार किया, परंतु राजा महेंद्र सिंह जैसे क्षेत्रीय नेताओं ने जनता में संघर्ष की ज्योति बुझने नहीं दी। उन्होंने गुप्त बैठकों के माध्यम से ग्रामीणों को संगठित रखा, संदेशों का आदान-प्रदान कराया और आंदोलन के उद्देश्यों को जीवित बनाए रखा। कई बार वे अंग्रेजी पुलिस की नजरों से बचते हुए दूर-दूर तक यात्रा करते रहे, ताकि विभिन्न गांवों और कस्बों को आंदोलन से जोड़ा जा सके।
उनका योगदान केवल स्थानीय आंदोलन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर भी अनेक सम्मेलनों में भाग लिया। उनका उद्देश्य यह था कि ग्रामीण भारत की आवाज़ राष्ट्रीय नेतृत्व तक पहुंचे और स्वतंत्रता संघर्ष में गांवों की भूमिका को उचित स्थान मिले। उन्होंने बार-बार कहा कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है, इसलिए स्वतंत्रता की लड़ाई भी गांवों से ही ऊर्जा लेगी। इस दृष्टिकोण को राष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा गया।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी राजा महेंद्र सिंह का योगदान सामाजिक और राष्ट्रीय उत्थान में जारी रहा। उन्होंने राजनीति को सेवा का माध्यम माना, न कि सत्ता का साधन। वे चाहते थे कि देश में लोकतंत्र मजबूत हो, शिक्षा का प्रसार हो और ग्रामीण विकास को सर्वोपरि महत्व मिले। लोगों के प्रति उनकी निष्ठा और सरल जीवनचर्या ने उन्हें एक आदर्श नेता के रूप में स्थापित किया।
अंततः राजा महेंद्र सिंह की स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका यह सिद्ध करती है कि इतिहास केवल उन नामों से नहीं बनता जो पुस्तकों में छपते हैं, बल्कि उन असंख्य लोगों से भी बनता है जिन्होंने अपने साहस, त्याग और संकल्प से स्वतंत्रता की नींव रखी। राजा महेंद्र सिंह जैसे स्वतंत्रता सेनानी हमें यह संदेश देते हैं कि राष्ट्र के लिए किया गया प्रत्येक छोटा योगदान भी अत्यंत मूल्यवान होता है। उनका जीवन संघर्ष, समर्पण और देशभक्ति का अद्भुत उदाहरण है, जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।
नीचे Raja Mahendra Pratap Singh — (जिसे आपने “राजा महेंद्र सिंह” के रूप में पुकारा) — के जन्म और मृत्यु के तथ्य दिए जा रहे हैं:
जन्म: 1 दिसंबर 1886
मृत्यु (निधन): 29 अप्रैल 1979