आरएमएल में की गई घुटने की अनूठी सर्जरी, 30 साल की महिला के पैरो को मिली नई जिंदगी

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नई दिल्ली, 22 जनवरी (हि.स.)। तीस वर्षीय महिला के घुटने में एक चोट के दौरान मेनिस्कस क्षतिग्रस्त हो गया। घुटने के जोड़ पर कॉटिलेज और हड्डी के बीच का यह वह स्थान होता है जो घुटने को घुमाने के लिए कुशन का काम करता है। मेनिस्कस क्षतिग्रस्त होने पर लंबे समय तक यदि इलाज न किया जाएं तो मरीज को आर्थराइटिस भी हो सकती है, क्योंकि मेनिस्कस के सही न होने की वजह से घुटनों में पर्याप्त खून की सप्लाई नहीं हो पाती।

विदेशों में घुटनों में इस तरह की क्षति होने पर मेनिस्कस को रिप्लेस का दिया जाता है, क्योंकि वहां मेनिस्कस भी डोनेट किए जाते हैं, लेकिन भारत में अभी ऐसा नहीं, ऐसी स्थिति में आरएमएल अस्पताल के डॉक्टरों ने युवती को आर्थराइटिस होने से बचाने के लिए उसके ही शरीर के टेंडेंड को मेनिस्कस की जगह प्रत्यारोपित कर दिया, क्योंकि महिला पहले भी एक सर्जरी करा चुकी थी, बावजूद इसके मेनिस्कस की क्षति ठीक नहीं हुई थी, इसके उसके घुटने में विकृति आ गयी थी या घुटना टेढ़ा हो गया था, जिसे चिकित्सकों की टीम ने ओपेन सर्जरी कर फ्रेम लगाकर सही किया।

राम मनोहर लोहिया अस्पताल के हड्डी रोग विभाग के एचओडी डॉ राहुल खरे ने बताया कि घुटनों को सुरक्षित रखने में मेनिस्कस का अहम रोल होता है। इसके क्षतिग्रस्त होने पर कार्टिलेज और हड्डी के बीच स्पेस कम हो जाता है और घुटने आपस में रगड़ खाने लगते हैं, ऐसी स्थिति में मरीज को तेज दर्द, घुटनों का अलग होना या फिर सूजन बनी रहती है। महिला की प्रारंभिक जांच में पता चला कि मेनिस्कस रिपयेर की सर्जरी जिस भी अस्पताल में कराई गई है वह पूरी तरह सही नहीं हो पाई, जिसकी वजह से युवती के घुटने टेढ़े हो गए। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मेनिस्कस के खराब होने से घुटनों को पर्याप्त खून की सप्लाई नहीं हो पाती। उन्होंने बताया कि कम उम्र होने की वजह से ऐसी स्थिति में मरीज को घुटना बदलने की सलाह भी नहीं दी जा सकती थी, जो कि अमूमन साठ साल की उम्र के बाद की जाती है।

ऐसे में चिकित्सकों ने मरीज के ही शरीर की टिशू को मेनिस्कस की जगह प्रत्यारोपित करने का निर्णय लिया। इस तरह के ऑपरेशन को देश में पहली बार किया गया।

डॉ. राहुल ने बताया कि चिकित्सकों कि इस प्रक्रिया को मेनिस्कसटॉमी कहते हैं, मरीज के शरीर से ही क्योंकि टेंडेंट को लिया गया है, इसलिए शरीर की अन्य कोशिकाएं इसे आसानी से स्वीकार कर लेती हैं। मेनिस्कसटा़मी को आर्थोस्कोपेी विधि से किया गया, जबकि युवती के घुटने की विकृति या डिफारमेशन को सही करने के लिए ओपेन सर्जरी का चयन किया गया, कुछ समय तक युवती को घुटने पर पूरा बोझ नहीं डालने के लिए कहा गया है कि जबकि एक से दो महीने बाद टेंडेंड मेनिस्कस की जगह ले लेगा और युवती अपने दोनों पैरो पर फिर से चलने लगेगी। इस प्रक्रिया को घुटनों के बायोकेमिस्ट को खराब होने से बचाने, घुटने के बीच कार्टिलेस के जोड़ पर लोड को कम करने और घुटना प्रत्यारोपण की सर्जरी से बचाने के लिए किया गया।

यह ऑपरेशन 13 जनवरी 2026 को अटल बिहारी वाजपेयी मेडिकल इंस्टीट्यूट और राम मनोहर लोहिया अस्पताल के सहायक प्रोफेसर डॉ. प्रणय गुप्ता, डॉ. रवि रंजन और डॉ. मोहित राज ने, विभागाध्यक्ष डॉ. राहुल खरे के मार्गदर्शन में किया।

डॉक्टरों की टीम ने अस्पताल के निदेशक डॉ. अशोक कुमार, मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. विवेक देवान और मरीज का सहयोग के लिए धन्यवाद किया और मरीज के अच्छे स्वास्थ्य की उम्मीद जताई।

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