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प्रयागराज में पूर्ण कुंभ को महाकुंभ कहा हरिद्वार में अर्धकुंभ को कहा जाएगा पूर्ण कुंभ
अर्द्धकुंभ परम्परा का शास्त्रीय महत्व कोई नहीं
प्रयागराज और हरिद्वार में मनाया जाता है यह पर्व
नासिक और उज्जैन में अर्द्धकुंभ नहीं पड़ता
राजा हर्षवर्धन के दान से पड़ी अर्धकुंभ की परंपरा
उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है । सनातन जगत को यहभूमि ऋषि मुनियों के तप की ऊर्जा सदा प्रदान करती रही है । कुंभ आदि पर्व जन पर्व हैं । लेकिन नए निजाम में संत पर्व बनकर रह गए हैं । तो कल हरिद्वार में मुख्यमंत्री की उपस्थिति में संतों ने तय कर लिया कि 2027 में पड़ने वाले अर्धकुंभ को कुंभ कहा जाएगा । अर्धकुंभ पर पहली बार अखाड़ों के शाही स्नान भी होंगे ।
सभी जानते हैं बारह वर्ष बाद एक एक कर चारों कुंभ नगरों में पड़ने वाला पूर्ण कुंभ सनातन संस्कृति का सबसे बड़ा वैदिक पर्व है । सनातन धर्म के पर्वों में कुंभ ही ऐसा एक मात्र पर्व है जिसका वर्णन अथर्ववेद और ऋग्वेद में उपलब्ध है । अन्य पर्वों का विवरण पौराणिक अधिक और वैदिक बहुत कम मिलता है । लेकिन वेद पुराणों में अर्धकुंभ तथा महाकुंभ का कोई विवरण उपलब्ध नहीं । सूर्य , बृहस्पति , चंद्रमा और शनि की युति 12 साल बाद कुंभ महापर्व को जन्म देती है । लेकिन इन ग्रहों की ऐसी एक भी युति नहीं है जो अर्धकुंभ पर पड़कर उसे शास्त्रीय बनाती हो ।
फिर भी प्रयागराज और हरिद्वार में अर्धकुंभ मनाया जाता है । प्रयागराज में नागा संन्यासी भी कुंभ की तरह अर्धकुंभ में भाग लेते हैं , लेकिन हरिद्वार अर्धकुंभ में कोई भी अखाड़ा स्नान या शिविर लगाने नहीं आता । वास्तव में अर्धकुंभ कोई पौराणिक महापर्व नहीं है , अपितु राजा हर्षवर्धन के दान से जुड़ा पर्व है । राजा हर्षवर्धन महादानी थे । वे प्रत्येक 6 वर्ष बाद प्रयागराज जाकर अपना सर्वस्व खजाना दान कर देते थे । उसे ही लेने के लिए हर छह वर्ष बाद देश भर से साधु संत प्रयागराज पहुंचते थे । वे अर्धकुंभ में भी सर्वस्व लुटा देते थे ।
उसी दान से प्रयाग में अर्धकुंभ शुरू हुआ । कालांतर में उसी की देखा देखी हरिद्वार में भी अर्धकुंभ भरने लगा । इसके अलावा एक भी कारण नहीं जो हरिद्वार में अर्धकुंभ की परंपरा को पुष्ट करे । हरिद्वार कुंभ 2021 में पड़ा था और अब 2027 में अर्धकुंभ पड़ेगा । आश्चर्य की बात है अर्धकुंभ को अब कुंभ का नाम देकर आकर्षण पैदा किया जा रहा है । इस सवाल का जवाब भी किसी के पास नहीं कि नासिक और उज्जैन में अर्द्धकुंभ क्यों नहीं भरता ? इस बात का भी कोई उत्तर नहीं कि हरिद्वार अर्धकुंभ में 13 अखाड़ों में से एक भी अखाड़ा अब तक स्नान करने क्यों नहीं आता था ।
कुंभ महापर्व प्रत्येक कुंभ नगर में 12 वर्ष बाद मुख्य रूप से बृहस्पति और सूर्य के कारण पड़ता है । हरिद्वार कुंभ में गुरु कुंभ राशि और सूर्य मेष राशि में आते हैं । सूर्य तो प्रत्येक वर्ष 14 अप्रैल को बैसाखी के अवसर पर एक महीने ले लिए मेषस्थ होते हैं , परंतु बृहस्पति 12 वर्ष के बाद एक वर्ष के लिए कुंभ राशि में आते हैं । सूर्य हर महीने राशि बदलते हैं जबकि बृहस्पति एक वर्ष में । फलस्वरूप कुंभ मेला बारह साल बाद भरता है । अब आश्चर्य की बात यह है कि छठे वर्ष जब बृहस्पति कुंभस्थ होते ही नहीं तो अर्द्धकुंभ कैसा ?
जाहिर है प्रयागराज के अर्धकुंभ का हरिद्वार में अनुसरण किया गया है । बगैर अखाड़ों के आए ही अर्धकुंभ सामान्य बैसाखी मेले की तरह बीत जाता था । यह भी आश्चर्य जनक है कि जिस प्रकार प्रयागराज कुंभ को बिना किसी शास्त्रीय आधार महाकुंभ नाम दे दिया गया , उसी प्रकार 2027 के हरिद्वार अर्धकुंभ को अब बिना किसी ज्योतिषीय अथवा शास्त्रीय आधार कुंभ नाम दिया गया है । प्रयागराज जाकर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री। स्वयं यह घोषणा कर आए थे । अब अर्धकुंभ की बजाय कुंभ मनाने और चार शाही स्नान करने का फैसला विगत दिवस ले लिया गया ।
,,,,,कौशल सिखौला