अपने ही बोझ से ढहता ईरान का ‘मुल्ला तंत्र’

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– मृदुल कृष्ण

ईरान में 22 वर्षीय कुर्द युवती महसा अमीनी की पुलिस हिरासत में क्रूर पिटाई से हुई मौत ने साल 2022 में ऐसी आग लगाई जो आज भी सुलग रही है। हिजाब न पहनने के आरोप में तेहरान में गिरफ्तार हुई महसा कभी घर नहीं लौटीं। पुलिस ने दिल का दौरा बताकर उसकी मौत छिपाने की कोशिश की लेकिन परिवार और दुनिया ने इसे राज्य-प्रायोजित हत्या माना। उससे भी बढ़कर ईरान के लोगों ने इसे नृशंस हत्या माना, जो इस पूरी पटकथा का मूल पहलू है।

यूएन फैक्ट फाइंडिंग मिशन ने साल 2024 में कहा कि महसा की मौत राज्य की शारीरिक हिंसा से हुई। इसके बाद 19 मई 2023 की सुबह ईरान के शासन ने माजिद काजेमी (30 वर्ष), सालेह मीरहाशेमी (36 वर्ष) और सईद याघौबी (37 वर्ष) को फांसी पर लटका दिया। ये तीनों महसा अमीनी की मौत के बाद साल 2022 में पूरे ईरान में फैले विरोध प्रदर्शनों में शामिल थे। खासकर मध्य ईरान के इस्फहान शहर में। ईरानी न्यायपालिका ने इन पर मोहारेबेह (अल्लाह के खिलाफ युद्ध छेड़ना) का आरोप लगाया, जो मौत की सजा वाला अपराध है। आरोप था कि नवंबर 2022 में इस्फहान के विरोध प्रदर्शनों के दौरान इन तीनों ने कथित तौर पर बंदूक चलाई, जिसके परिणामस्वरूप एक पुलिस अधिकारी और दो बसिज मारे गए। इनकी गिरफ्तारी नवंबर 2022 में हुई और केवल दो महीने के भीतर जनवरी 2023 में मौत की सजा सुनाई गई। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने इस ट्रायल को पूरी तरह फर्जी और अन्यायपूर्ण करार दिया। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इसे टॉर्चर-आधारित बताया, जहां इन तीनों को गिरफ्तारी के बाद यातना दी गई ताकि जबरन कबूलनामा लिया जा सके। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने भी 19 मई 2023 को इन फांसियों पर गहरा दुख जताया और कहा कि ईरान में विरोध प्रदर्शनों से जुड़े लोगों को दबाने के लिए मौत की सजा का इस्तेमाल बढ़ रहा है।

महसा अब सिर्फ एक आम महिला नहीं, बल्कि ईरानी महिलाओं की आजादी की प्रतीक बन चुकी हैं। उनके नाम पर महिला, जीवन, स्वतंत्रता का नारा गूंज रहा है। पूरे ईरान में महिलाएं (और पुरुष भी) सड़कों पर उतर आई हैं, हिजाब फेंक रही हैं, अपने लंबे बाल काट रही हैं और दमन के बावजूद न्याय की मांग कर रही हैं। यह विरोध अब तक नए रूप में फैल चुका है। जिसमें दिसंबर 2025 से तेहरान के ग्रैंड बाजार में व्यापारियों की हड़ताल और कई शहरों में फैले प्रदर्शन शामिल हैं। जहां आर्थिक तबाही (रियाल अब खुले बाजार में लगभग 14 लाख से 15 लाख प्रति डॉलर के आसपास पहुंच चुका है) और पुराने दमन ने ‘मुल्ला तंत्र’ को गहरे संकट में डाल दिया है। शासन कठोर नियंत्रण और फांसी जैसे दमन से अपनी इस्लामी क्रांति की विरासत बचाने की कोशिश में जुटा है लेकिन ये प्रयास हताशा और अस्थिरता से भरे दिखते हैं। सामाजिक असंतोष, आर्थिक बदहाली और इजरायल-अमेरिका जैसे टकराव ने इस तानाशाही को भीतर से खोखला कर दिया है।

क्यों हमलावर हैं अमेरिका-इजरायल

अमेरिका और इजरायल के ईरान के प्रति आक्रामक रुख को समझने के लिए इतिहास में लौटना जरूरी है। यह दुश्मनी कोई अचानक नहीं बल्कि दशकों की जड़ों वाली है। ईरान और अमेरिका के रिश्तों में पहली बड़ी दरार 1979 की इस्लामी क्रांति से पहले ही पड़ चुकी थी, खासकर 1953 में। उस साल सीआईए और ब्रिटिश एमआई6 ने मिलकर ऑपरेशन अजाक्स (ऑपरेशन बूट) चलाया, जिसमें ईरान के लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देक को उखाड़ फेंका गया। मोसद्देक ने ब्रिटिश-नियंत्रित तेल कंपनी एंग्लो-ईरानियन ऑयल (अब बीपी) का राष्ट्रीयकरण किया था। इससे पश्चिमी हितों को खतरा महसूस हुआ। इस तख्तापलट के बाद शाह मोहम्मद रजा पहलवी को फिर से सत्ता सौंपी गई, जो अमेरिका का भरोसेमंद सहयोगी बन गया। शाह ने पुलिस के जरिए कठोर दमन किया, पश्चिमी जीवनशैली को बढ़ावा दिया और इजरायल के साथ गुप्त संबंध बनाए रखे। लेकिन यह अमेरिकी समर्थन ईरानी जनता में गहरा असंतोष पैदा कर गया। 1953 का तख्तापलट आज भी ईरानी प्रचार में अमेरिकी साम्राज्यवाद का प्रतीक है।

1979 में अयातुल्ला रुहोल्ला खुमैनी ने जनआंदोलन के जरिए शाह को सत्ता से बेदखल किया और इस्लामी गणराज्य की स्थापना की। खुमैनी ने अमेरिका को महान शैतान और इजरायल को छोटा शैतान करार दिया। क्रांति के तुरंत बाद तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर कब्जा कर 444 दिनों तक 52 अमेरिकी नागरिकों को बंधक बनाया गया, जिसने दुश्मनी को स्थायी बना दिया। खुमैनी ने ईरान को सिर्फ एक राष्ट्र नहीं, बल्कि पूरी इस्लामी दुनिया का क्रांतिकारी मार्गदर्शक घोषित किया। इस सोच के तहत फिलिस्तीन मुद्दे को केवल कूटनीतिक समर्थन तक सीमित नहीं रखा गया बल्कि इजरायल के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष को राज्य नीति का हिस्सा बनाया गया।

इजरायल के साथ ईरान का टकराव और इसराइल के अस्तित्व के प्रश्न से जुड़ा है। खुमैनी के नेतृत्व में ईरान ने खुद को न केवल एक देश की तरह बल्कि पूरी इस्लामी दुनिया के मार्गदर्शक के रूप में प्रस्तुत करना शुरू किया। इसी सोच के तहत उसने फिलिस्तीन मुद्दे को केवल कूटनीतिक समर्थन तक सीमित नहीं रखा बल्कि इज़रायल के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष को बढ़ावा दिया। लेबनान में हिज़्बुल्ला जैसे संगठनों को संगठित करना, उन्हें धन और हथियार उपलब्ध कराना इसी रणनीति का हिस्सा रहा है। इसके साथ ही गाज़ा पट्टी में सक्रिय हमास को भी ईरान लंबे समय से आर्थिक और सैन्य सहायता देता रहा है।

ईरान का परमाणु कार्यक्रम इस टकराव को और खतरनाक बना देता है। इज़रायल इसे अपने अस्तित्व पर सीधे खतरे के तौर पर देखता है। यही कारण है कि इज़रायल के लिए ईरान का मजबूत होना ‘करो या मरो’ जैसी स्थिति पैदा करता है।

इसके अलावा यमन, सीरिया और इराक में ईरान समर्थित सशस्त्र गुटों की मौजूदगी इस बात का संकेत है कि तेहरान 1979 की इस्लामी क्रांति के प्रभाव को पूरे अरब जगत में फैलाने की रणनीति पर काम कर रहा है। इसराइल के लिए यह जंग इसी समय जीतना बेहद जरूरी है क्योंकि यदि ईरान परमाणु सम्पन्न हुआ या अगले मध्यावधि चुनाव में अमेरिकी संसद में ट्रम्प ने बहुमत खो दिया तो शायद इजरायल भविष्य में ईरानी आक्रमण में अपना अस्तित्व हमेशा के लिए खो दे।

पिछला सैन्य विकल्प क्यों टला ?

जब खुले बाजार में डॉलर के मुकाबले ईरानी रियाल ऐतिहासिक रूप से कमजोर हुआ तो इसका सीधा असर तेहरान के व्यापारिक वर्ग पर पड़ा। मुद्रा संकट के विरोध में शुरू हुए व्यापारियों के प्रदर्शन जल्द ही राजधानी से बाहर अन्य शहरों तक फैल गए। इसी अवसर की तलाश में बैठे ट्रम्प ने ईरान पर हमले का पूरी तरह मन बना लिया था। इसी बीच अचानक वैश्विक मीडिया विमर्श का केंद्र बदल गया और ईरान से जुड़ी खबरें पीछे चली गईं। हालांकि बाद में सामने आई रिपोर्टों से संकेत मिला कि यह बदलाव केवल सतही था। कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों के अनुसार, अमेरिकी प्रशासन के भीतर सैन्य कार्रवाई की तैयारियां अंतिम चरण में पहुंच चुकी थीं, इसके बावजूद निर्णायक कदम नहीं उठाया गया। इसकी एक अहम वजह इज़रायल द्वारा अमेरिका को रोका जाना बताया गया। इज़रायली खुफिया आकलनों के अनुसार, किसी भी अमेरिकी हमले की स्थिति में ईरान की ओर से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इज़रायल के रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाया जा सकता था। इससे इज़रायल को गंभीर सैन्य और नागरिक नुकसान उठाना पड़ सकता था। इन्हीं आशंकाओं के चलते यह युद्ध उस समय नहीं हो सका।

क्यों ढह जाना चाहिए ‘मुल्ला तंत्र’?

ईरान का ‘मुल्ला तंत्र’ केवल शासन व्यवस्था नहीं है बल्कि ऐसी वैचारिक व्यवस्था बन चुका है जिसने राज्य, धर्म और हिंसा को आपस में इस हद तक मिला दिया है कि आम नागरिक के लिए सम्मानजनक जीवन लगभग असंभव हो गया है। दुनिया के कई हिस्सों में धार्मिक कट्टरता मौजूद है, लेकिन ईरान में इसका संस्थागत रूप सबसे अधिक कठोर दिखाई देता है। यह कट्टरता समाज से नहीं बल्कि सत्ता में है, जहां एक इस्लामी मौलाना पूरे देश के राजनीतिक, न्यायिक और सैन्य निर्णयों पर नियंत्रण रखता है।

औपचारिक रूप से ईरान खुद को एक गणराज्य कहता है, जहां राष्ट्रपति, संसद और चुनाव की व्यवस्था मौजूद है। लेकिन व्यवहार में यह लोकतंत्र सर्वोच्च नेता के अधीन काम करने वाला एक भ्रम है। गार्जियन काउंसिल जैसी संस्थाएं चुनाव से पहले ही उम्मीदवारों को छांट देती हैं, जिससे वास्तविक राजनीतिक विकल्प जनता तक पहुंच ही नहीं पाते। इस व्यवस्था में नागरिक स्वतंत्रताएं बेहद सीमित हैं और असहमति का हश्र हत्या है।

महिलाओं के अधिकारों के सवाल पर यह इस्लामी हुकूमत विशेष रूप से कठोर रही है। अनिवार्य हिजाब कानूनों के उल्लंघन पर गिरफ्तारी, हिंसा और हिरासत में मौतों के कई मामले अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा दर्ज किए गए हैं। साल 2022 में महसा अमीनी की मौत कोई अपवाद नहीं थी, बल्कि वह उस दमनकारी व्यवस्था का प्रतीक बन गई, जिसमें राज्य निजी जीवन तक पर नियंत्रण का दावा करता है। यह कहना तथ्यात्मक रूप से अधिक सटीक होगा कि महिलाओं और लड़कियों पर हिंसा केवल “हिजाब न पहनने” तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यापक नैतिक पुलिसिंग और कानूनी दमन का परिणाम है।

आर्थिक मोर्चे पर भी ‘मुल्ला तंत्र’ की प्राथमिकताएं जनता के हितों के लिए नहीं बल्कि अपनी सोच के विस्तार के लिए हैं। ईरान की बड़ी आबादी महंगाई, बेरोजगारी और मुद्रा अवमूल्यन से जूझ रही है, जबकि सरकारी संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने की रणनीति में झोंक दिया गया। लेबनान में हिज़्बुल्ला, गाज़ा में हमास, यमन में हूती विद्रोही और सीरिया में असद शासन को समर्थन, ये सभी नीतियां ईरानी जनता पर आर्थिक बोझ बढ़ाती हैं। इन गतिविधियों ने न केवल क्षेत्र में अस्थिरता फैलाई बल्कि ईरान को अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के और करीब धकेल दिया। इसके अलावा अमेरिकी और पश्चिमी प्रतिबंधों ने ईरानी अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। जब आम नागरिक इस आर्थिक बदहाली और राजनीतिक दमन के खिलाफ सड़कों पर उतरता है तो राज्य की प्रतिक्रिया गोलियों, गिरफ्तारियों और इंटरनेट बंदी के रूप में सामने आती है।

क्या ईरान को बचा सकेंगे रूस और चीन

रूस और चीन की भूमिका को लेकर मौजूदा वैश्विक हालात एक बार फिर सोवियत संघ के पतन के बाद के उस दौर की याद दिलाते हैं, जब अमेरिका की शक्ति निर्विवाद मानी जाती थी। यूक्रेन युद्ध के तीन वर्षों के बावजूद रूस की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमराई नहीं है, जिसमें चीन और भारत के साथ उसके ऊर्जा और व्यापारिक संबंधों की अहम भूमिका रही है। इसके बावजूद यह स्थिरता रणनीतिक ताकत के रूप में उतनी प्रभावी नहीं दिखती, जितनी वैश्विक शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक होती है। हाल के समय में वेनेजुएला और सीरिया जैसे देशों में रूस समर्थित राष्ट्राध्यक्षों के हश्र इस बात का संकेत है कि वह अब अमेरिका को सीधे चुनौती देने की स्थिति में नहीं है। इसी पृष्ठभूमि में अमेरिका का अपने नाटो सहयोगियों पर अधिक दबाव बनाना और यूरोप से अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद उठाने की अपेक्षा करना समझ में आता है, भले ही व्यावहारिक रूप से यूरोप अभी भी अमेरिकी सैन्य छत्र के बिना रूस का सामना नहीं कर सकता।

चीन की स्थिति इससे भी अधिक स्पष्ट समझ आती है। वह अमेरिका के साथ प्रत्यक्ष टकराव से अब तक बचता आया है और ताइवान इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है। चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है लेकिन सैन्य कार्रवाई से इसलिए पीछे रहता है क्योंकि इससे अमेरिका के साथ सीधा संघर्ष तय है। जब चीन अपने निजी मुद्दे पर भी अमेरिका से भिड़ने से बच रहा है तो ईरान के मामले में वह सिर्फ मौखिक विरोध ही करता नजर आएगा। इस संदर्भ में रूस और चीन दोनों ही ईरान को कूटनीतिक समर्थन और सीमित आर्थिक सहयोग तो दे सकते हैं लेकिन किसी बड़े अमेरिकी या इज़रायली सैन्य कदम के सामने प्रत्यक्ष सहयोग से बचेंगे।

भारत का स्टैंड एवं प्रभाव

ईरान संकट के मामले में नई दिल्ली ने अब तक सतर्क और तटस्थ रुख अपनाया है। अमेरिका के साथ रणनीतिक निकटता के बावजूद भारत ने ईरान के खिलाफ किसी संभावित सैन्य कार्रवाई का न तो समर्थन किया है और न ही खुला विरोध किया है। ईरान को मौखिक समर्थन की कीमत भारत को भी आर्थिक मोर्चे पर चुकानी पड़ सकती है। हाल के दिनों में जब ईरान पर हमले की आशंका प्रबल हुई तब भारत की आधिकारिक प्रतिक्रिया केवल अपने नागरिकों को सतर्क रहने और वापस लौटने की सलाह तक सीमित रही। अमेरिकी दबाव से बचने के लिए भारत ने चाबहार बंदरगाह से जुड़ी अपनी आर्थिक गतिविधियों को भी काफी हद तक सीमित कर दिया जबकि यह परियोजना भारत की क्षेत्रीय रणनीति के लिहाज से अहम है। हालांकि ईरान को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में भारत द्वारा दिए गए समर्थन को सिर्फ सांकेतिक समर्थन कहा जा सकता है क्योंकि यह संगठन बिना दांत के शेर जैसा है। इसमें अमेरिका और पश्चिम से किसी आर्थिक नाकेबंदी का भी खतरा नहीं है। जबकि दूसरी और प्रभावी बातों की चर्चा की जाए तो भारत ने अमेरिकी टैरिफ से बचने के लिए चाबहार पोर्ट पर अपनी गतिविधियां बहुत हद तक काम कर ली लीं। जबकि वह भारत द्वारा ही बनाया गया प्रोजेक्ट है।

ईरान संकट के गहराने की स्थिति में वैश्विक ऊर्जा बाजार में उथल-पुथल तय मानी जा रही है। कच्चे तेल की कीमतों में संभावित बढ़ोतरी का सीधा असर भारत समेत दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। हालांकि यदि अमेरिका और इज़रायल, ईरान में व्यवस्था परिवर्तन कराने में सफल होते हैं तो इसके दीर्घकालिक परिणाम भारत के लिए लाभकारी भी हो सकते हैं। 9/11 के बाद लंबे समय तक पाकिस्तान को अमेरिकी आर्थिक सहयोग मिलता रहा लेकिन अफगानिस्तान से अमेरिका के हटने के बाद यह समर्थन काफी हद तक कमजोर पड़ा। ईरान संकट के बहाने पाकिस्तान के लिए दोबारा रणनीतिक महत्व बढ़ने के संकेत जरूर दिखते हैं लेकिन यदि ईरान में मौजूदा इस्लामी शासन का अंत होता है तो अमेरिका पाकिस्तान से भी धीरे-धीरे हाथ खींच लेगा।

ईरान में व्यवस्था परिवर्तन की स्थिति में एक अमेरिकी समर्थित और अपेक्षाकृत धर्मनिरपेक्ष सरकार के उभरने की संभावना बनेगी जिसकी पाकिस्तान के इस्लामी कट्टरपंथ और आतंकवादी नेटवर्क के प्रति सहानुभूति नहीं होगी। जब वर्तमान ईरानी शासन और पाकिस्तान के बीच सीमा सुरक्षा जैसे मुद्दों पर टकराव हो चुके हैं जबकि दोनों ही सरकारें कट्टर इस्लाम के मुद्दे पर एक जैसी दिखाई देती हैं, ऐसे में धर्मनिरपेक्ष स्वभाव वाली नई व्यवस्था इन मामलों में कहीं अधिक कठोर रुख अपना सकती है। ऐसी स्थिति में पाकिस्तान खुद को एक ओर भारत, दूसरी ओर ईरान और तीसरी ओर तालिबान के दबाव में घिरा हुआ पाएगा। अमेरिकी सहायता के अभाव और आंतरिक संकटों के बीच पाकिस्तान के लिए बलूचिस्तान पर नियंत्रण बनाए रखना भी लंबे समय तक आसान नहीं रहेगा। यह रणनीतिक रूप से भारत के हित में जाता दिखाई देता है।

नई सरकार के गठन के बाद अमेरिका ईरान को स्थिर करने के लिए व्यापक छूट देगा। तेल निर्यात को तेजी से बढ़ाने की अनुमति दी जाएगी ताकि जनता का भरोसा नई सत्ता पर कायम हो सके। इससे वैश्विक तेल कीमतों में गिरावट आ सकती है जिसका सीधा लाभ भारत को मिलेगा। भारत को इस नए ईरान के साथ व्यापार करने में अमेरिकी प्रतिबंधों या टैरिफ का सामना नहीं करना पड़ेगा। ईरान और भारत के बीच साझेदारी बेहतर स्तर पर पहुंचेगी और भारत के मध्य एशिया व्यापारिक कॉरिडोर को स्थिरता मिलेगी। इसके साथ ही चीन से ईरान की नजदीकियां लगभग समाप्त हो जाएंगी जिससे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में भी बदलाव आएगा।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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