
जयपुर, 12 फरवरी (हि.स.)। राजस्थान हाईकोर्ट ने अलवर के न्यायिक कर्मचारी के मामले में कहा है कि उसके अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश रद्द किया जा चुका है तो उसे उस अवधि का पूरा वेतन दिया जाए। अदालत ने माना की ऐसी स्थिति में नो वर्क-नो पे का प्रावधान लागू नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही अदालत ने तीन में में याचिकाकर्ता को चार साल का वेतन और अन्य परिलाभ देने देने को कहा है। जस्टिस प्रवीर भटनागर की एकलपीठ ने यह आदेश केसी जैन की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए।
याचिका में अधिवक्ता सुनील समदडिया ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता अलवर जिला अदालत में मुंसरिम के पद पर कार्यरत था। याचिकाकर्ता को जून, 2006 में कई सालों पुराने आधारों का हवाला देते हुए अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी। इसे याचिकाकर्ता ने अपीलीय अधिकारी के समक्ष चुनौती दी। इस दौरान जुलाई, 2010 में उसने सेवानिवृत्ति की उम्र पूरी कर ली। याचिका में कहा गया कि 18 अगस्त, 2014 को अपीलीय अधिकारी ने उसे अनिवार्य सेवानिवृत्ति के आदेश को बिना आधारों का मानते हुए रद्द कर दिया। विभाग ने अपने स्तर पर आदेश जारी कर उसे अनिवार्य सेवानिवृत्त कर काम करने से रोका था। ऐसे में उसे इस जून, 2006 से जुलाई, 2010 तक की अवधि का बकाया वेतन दिया जाए। जिसका विरोध करते हुए राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि इन चार सालों ने याचिकाकर्ता ने अपने पद का कोई सरकारी काम नहीं किया था। ऐसे में उसे इस अवधि का वेतन नहीं दिया जा सकता। दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद अदालत ने याचिकाकर्ता को इन चार सालों की अवधि के वेतन का हकदार मानते हुए तीन माह में बकाया भुगतान करने को कहा है।