सोशल मीडिया के बेजा इस्तेमाल ने उजाड़ी बच्चों की जिंदगानी

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बाल मुकुन्द ओझा

भारत में भी कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के बेज़ा इस्तेमाल पर रोक लगाने की मांग अब जोर शोर से उठने लगी है। मद्रास हाई कोर्ट ने अपने हालिया फैसले में कहा है भारत सरकार 16 साल से कम उम्र के बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर कानून बनाएं। यह कानून आस्ट्रेलिया की तरह हो सकता है जहां 16 साल तक के बच्चों के सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर रोक है।  न्यायलय ने अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहा कि इंटरनेट पर घृणित सामग्री देखी जा रही है। अश्लीलता के साथ नशे की सामग्री भी सरे आम परोसी जा रही है। ये बच्चों के लिए ये जोखिम भरी है। इसलिए माता पिता की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है।

आज घर घर में बच्चे और युवा धड़ल्ले से मोबाइल पर स्क्रीनिंग कर रहे है। उन्हें इस बात की कोई चिंता नहीं है की यह उनके स्वास्थ्य और पढ़ाई के लिए कितना खतरनाक है। मीडिया में छोटे और किशोर आयु के बच्चों को मोबाइल लत के खतरे से लगातार आगाह किया जा रहा है। अनेक बच्चे इसके दुष्परिणामों के शिकार होकर अस्पतालों में अवसाद का इलाज़ करा रहे है। सेंसर टावर की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि अपने देश में गत वर्ष मोबाइल पर 1.12  ट्रिलियन घंटे स्क्रीनिंग की गई जो दुनियाभर में सर्वाधिक आंकी गई है। इससे पता चलता है 18 वर्ष की आयु सीमा के 40 करोड़ बच्चे में से हर तीसरा बच्चा मोबाइल अवसाद का शिकार है, जिनकी संख्या 13 करोड़ से अधिक बताई जा रही है। इसी भांति एक अन्य नई रिसर्च के मुताबिक मोबाइल, टैबलेट और लैपटॉप जैसे गैजेट्स न केवल बच्चों के स्वास्थ्य अपितु उनके शैक्षिक जीवन के लिए भी खतरा बन रहे है। टेक्नोलॉजी के इस दौर में बच्चे मोबाइल फोन, टैबलेट से ही अपनी पढ़ाई कर रहे हैं। खासकर कोविड में ऑनलाइन पढ़ाई के बाद उनके बीच स्क्रीन टाइम बहुत बढ़ा है। पांच हजार से ज्यादा कनाडाई बच्चों पर साल 2008 से 2023 तक चली एक रिसर्च बताती हैं कि बढ़ते स्क्रीन टाइम के कारण बच्चों में बेसिक मैथ्स और पढ़ने की समझ ठीक से विकसित नहीं हो पा रही है। यहां तक कि स्क्रीन टाइम की वजह से बच्चों के मार्क्स में 10 फीसदी तक कमी आई है। एक अन्य रिपोर्ट में यह सामने आया है कि 73 प्रतिशत स्कूली बच्चे अश्लील सामग्री देखते हैं। वहीं, 80 प्रतिशत बच्चे रोज़ाना सोशल मीडिया पर कम से कम 2 घंटे बिताते हैं। इसका सीधा असर उनकी पढ़ाई, सोचने-समझने की क्षमता और व्यवहार पर पड़ रहा है।मोबाइल आपका दोस्त है या दुश्मन। बिना विलंब किए इस पर गहनता से मंथन की जरुरत है। आजकल मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल बच्चों को इंटरनेट एडिक्शन की तरफ ले जा रहा है। एक स्टडी रिपोर्ट में एक बार फिर मोबाइल के खतरे से सावचेत किया गया है। रिपोर्ट में बताया गया है पैरेंट्स बिना सोचे-समझे सिर्फ दो-ढाई साल के बच्चों के हाथ में मोबाइल थमा देते हैं। इसके बाद बिना मोबाइल यूज किए बच्चा खाना तक नहीं खाता है। हालांकि इंफॉर्मेशन, टेक्नॉलोजी और एआई के दौर में मोबाइल का इस्तेमाल जरूरी है। लेकिन छोटे-छोटे बच्चों को मोबाइल देने की क्या जरूरत है? अगर आप भी मोबाइल एडिक्शन को सीरियसली नहीं ले रहे हैं, तो आपको बता दें कि सेलफोन आपके बच्चों का सबसे बड़ा दुश्मन बन रहा है। कच्ची उम्र में बच्चों को डिजिटल डिमेंशिया जैसी घातक बीमारी हो सकती है। टाइम ज्यादा होने का सबसे पहला असर बच्चों की आंखों की रोशनी पर पड़ रहा है। स्क्रीन को नजदीक और एकटक देखने से आंखें ड्राई होने लगती हैं यही हालात रहने पर आंखों की रोशनी कम होने लगती है। मोबाइल बच्चों का दोस्त है या दुश्मन। बिना विलंब किए अभिभावकों को इस पर गहनता से मंथन की जरुरत है। आजकल मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल बच्चों को इंटरनेट एडिक्शन की तरफ ले जा रहा है। इस तरह के एडिक्शन से मानसिक बीमारियां पैदा होती हैं और ऐसे में बच्चे कोई न कोई गलत कदम उठा लेते हैं। आजकल के बच्चे इंटरनेट लवर हो गए हैं। इनका बचपन रचनात्मक कार्यों की जगह डेटा के जंगल में गुम हो रहा है। पिछले कई सालों में सूचना तकनीक ने जिस तरह से तरक्की की है, इसने मानव जीवन पर गहरा प्रभाव डाला है बल्कि एक तरह से इसने जीवनशैली को ही बदल डाला है। बच्चे और युवा एक पल भी स्मार्टफोन से खुद को अलग रखना गंवारा नहीं समझते। इनमें हर समय एक तरह का नशा सा सवार रहता है। वैज्ञानिक भाषा में इसे इंटरनेट एडिक्शन डिस्ऑर्डर कहा गया है।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32 मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

                                                    

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