
बाल मुकुन्द ओझा
सामाजिक समरसता के प्रेरक संत रविदास जयंती माघ महीने की पूर्णिमा को मनाई जाती है। इस साल ये दिन एक फरवरी को है। इस वर्ष उनका 649 वां जन्मदिवस मनाया जा रहा है। रविदास को रैदास नाम से भी जाना जाता है। रविदास का जन्म वाराणसी के पास के गांव में हुआ था। उनके पिता जूते बनाने का काम करते थे। रविदास भी अपने पिता की जूते बनाने में मदद करते थे। ज्ञानी लोगों की संगत और सांसारिक गतिविधियों में अधिक लीन रहने के कारण रविदास के पिता ने नाराज हो कर एक दिन उन्हें घर से निकाल दिया।
भारत भूमि को दुनियाभर में संत महात्माओं की जन्म स्थली के रूप में जाना और माना जाता है। यहाँ एक से एक संत हुए जिन्होंने देश और दुनिया को समता, समानता और प्रेम महोब्बत से रहने की सीख दी। ऐसे ही एक महान संत रविदास थे। रविदास ने देश में फैले ऊंच-नीच के भेदभाव और जात-पात की बुराईयों को दूर करते हुए भक्ति भावना से पूरे समाज को एकता के सूत्र में बाधने का काम किया है। रविदास समाज में फैले भेद-भाव, छुआछूत का जमकर विरोध करते थे। उन्होंने लोगों को अमीर-गरीब हर व्यक्ति के प्रति समान भावना रखने की सीख दी। उनका मानना था कि हर व्यक्ति को भगवान ने बनाया है, इसलिए सभी को एक समान ही समझा जाना चाहिए। वह लोगों को एक दूसरे से प्रेम और इज्जत करने की सीख दिया करते थे। रविदास बहुत दयालु थे। कहीं साधु-संत मिल जाएं तो वे उनकी सेवा करने से पीछे नहीं हटते थे। एक कथा के अनुसार एक बार एक महिला संत रविदास के पास से गुजर रही थी। रविदास लोगों के जूते सिलते हुए भगवान का भजन करने में मस्त थे। तभी वह महिला उनके पास पहुंची और उन्हें गंगा नहाने की सलाह दी। फिर क्या रविदास ने कहा कि जो मन चंगा तो कठौती में गंगा। यानी यदि आपका मन पवित्र है तो यहीं गंगा है। कहते हैं इस पर महिला ने संत से कहा कि आपकी कठौती में गंगा है तो मेरी झुलनी गंगा में गिर गई थी आप मेरी झुलनी ढ़ूढ़ दीजिए। इस पर रविदास ने अपनी चमड़ा भिगोने की कठौती में हाथ डाला और महिला की झुलनी निकालकर दे दी। इस चमत्कार से महिला हैरान रह गई और उनके प्रसिद्धि के चर्चे दूर-दूर तक फैल गए।
एक बार रविदास अपने मित्र के साथ खेल रहे थे। खेलने के बाद अगले दिन वो साथी नहीं आता है तो रविदास उसे ढूंढ़ने चले जाते हैं, लेकिन उन्हे पता चलता है कि उसकी मृत्यु हो गई। ये देखकर रविदास बहुत दुखी होते हैं और अपने मित्र को बोलते हैं कि उठो ये समय सोने का नहीं है, मेरे साथ खेलो। इतना सुनकर उनका मृत साथी खड़ा हो जाता है। कहा जाता है संत रविदास को बचपन से ही आलौकिक शक्तियां प्राप्त थी। लेकिन जैसे-जैसे समय निकलता गया उन्होंने अपनी शक्ति भगवान राम और कृष्ण की भक्ति में लगाई। इस तरह धीरे-धीरे लोगों का भला करते हुए वो संत बन गए।
संत रविदास आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके द्वारा बताये गये उपदेश और भक्ति की भावना हमे कल्याण का मार्ग दिखाते है। रविदास ने अपने जीवन के व्यवहारों से यह प्रमाणित कर दिया था कि इन्सान चाहे किसी भी कुल या जाति में जन्म ले ले लेकिन वह अपने जाति और जन्म के आधार पर कभी भी महान नहीं बनता है। जो व्यक्ति दूसरों के सुख दुःख में भागेदारी देता है, वहीं सच्चे अर्थों में महान होता है और ऐसे ही लोग युगों युगों तक लोगों के दिलों में जिन्दा रहते हैं। उनकी रचनाएं सामाजिक एकता और समाज सुधार से ओतप्रोत थी।
बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
डी .32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
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