भारत में मोटापा एक सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनकर उभरा है और यह केवल एक सौंदर्य संबंधी समस्या नहीं है

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केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने भारत अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान महोत्सव (आईआईएसएफ) में “मोटापे पर चिकित्सक-वैज्ञानिक संवाद” विषय पर पैनल चर्चा में कहा, “मोटापा भारत में एक जन स्वास्थ्य चुनौती बनकर उभरा है और यह केवल सौंदर्य संबंधी समस्या नहीं है। इस चुनौती का समाधान वैज्ञानिक सटीकता एवं नीतिगत अनुशासन के साथ करने की आवश्यकता है।”

इस सत्र का आयोजन नैदानिक ​​चिकित्सा, जैव चिकित्सा अनुसंधान और लोक नीति के प्रमुख विशेषज्ञों की उपस्थिति में किया गया। इस सत्र में भारत में बढ़ते चयापचय चुनौतियों पर एक बहु-विषयक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया। मंत्री ने आईआईएसएफ में खचाखच भरे दर्शकों को संबोधित करते हुए इस बात पर बल दिया कि कैसे सामाजिक व्यवहार, बाज़ार और गलत सूचनाओं ने भारत में मोटापे के परिदृश्य को जटिल बना दिया है। 

मंच पर भारत के वैज्ञानिक एवं चिकित्सा समुदाय के प्रमुख विशेषज्ञ उपस्थित थे, जिनमें एनएबीआई के कार्यकारी निदेशक डॉ. अश्वनी पारीक; डॉ. विनोद कुमार पॉल और डॉ. वी.के. सारस्वत, सदस्य नीति आयोग; प्रो. उल्लास कोल्थुर, सीडीएफडी के निदेशक; टीएचएसटीआई के कार्यकारी निदेशक डॉ. गणेशन कार्तिकेयन; और वरिष्ठ एंडोक्रिनोलॉजिस्ट डॉ. संजय भदादा और डॉ. सचिन मित्तल शामिल थे।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारतीय समाज में मोटापे को एक बीमारी के बजाय एक सौंदर्य संबंधी समस्या के रूप में देखा जाता है जिसके कारण इस पर वैज्ञानिक चर्चा में देरी हुई है। उन्होंने कहा, “दशकों से, हमारे चिकित्सा सम्मेलनों में मधुमेह एवं चयापचय संबंधी विकारों पर चर्चा होती रही है लेकिन मोटापे पर कभी नहीं हुई। पिछले 15 वर्षों में हमने इसे एक गंभीर चिकित्सा प्रासंगिकता वाला विषय के रूप में देखना शुरू किया है।”

मंत्री ने भारत की अनोखी शारीरिक विशेषताओं को उजागर किया। उन्होंने विशेष रूप से पूर्वी आबादी में केंद्रीय या आंतरिक मोटापे की उच्च व्यापकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीयों के लिए, कमर की माप वजन से ज्यादा महत्वपूर्ण कहानी बताती है और इस बात पर बल दिया कि यद्यपि समग्र शरीर का वजन सामान्य प्रतीत होता है, फिर भी आंतरिक वसा एक स्वतंत्र जोखिम कारक है।

जीएलपी-आधारित दवाओं का व्यापक और फैशनेबल उपयोग पर बात करते हुए, मंत्री ने विवेकपूर्ण उपयोग के साथ सावधानी बरतने का आग्रह किया और इस बात पर बल दिया कि कभी-कभी दीर्घकालिक प्रभाव कई वर्षों बाद स्पष्ट होते हैं। उन्होंने पिछले सार्वजनिक-स्वास्थ्य गलत निर्णयों को याद किया जैसे कि 1970 और 80 के दशक में रिफाइंड तेलों में अनियमित बदलाव, जिसने बाद में प्रतिकूल परिणाम सामने आए। उन्होंने कहा कि सही नैदानिक निष्कर्ष दशकों से परिणामों का अवलोकन करने से प्राप्त हो सकता है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने तेजी से या दवा के माध्यम से वजन घटने से जुड़ी सार्कोपेनिया और ओज़ेम्पिक फेस जैसी उभरती चिंताओं का भी उल्लेख किया तथा कहा कि शारीरिक प्रभाव का पूरा स्पेक्ट्रम अभी भी पूरी तरह से समझा नहीं गया है।

मंत्री के संबोधन का एक बड़ा हिस्सा गलत सूचनाओं से उत्पन्न खतरे पर केंद्रित रहा। उन्होंने चेतावनी दी कि अयोग्य चिकित्सक एवं स्वयंभू आहार विशेषज्ञ भारत के चयापचय संकट को और बदतर बना रहे हैं। उन्होंने कहा, “भारत में चुनौती जागरूकता की कमी नहीं बल्कि भ्रामक सूचनाओं का तेज़ी से बढ़ना है। प्रत्येक कॉलोनी में एक आहार विशेषज्ञ तो है लेकिन उनकी योग्यता की जांच करने की कोई व्यवस्था नहीं है। अनियंत्रित सलाह और बिना जांचे-परखे नुस्खे मोटापे से भी ज़्यादा नुकसान पहुंचा सकते हैं।” उन्होंने नीति निर्माताओं से ऐसे उपाय तैयार करने का आग्रह किया जो मरिजों भ्रामक हस्तक्षेपों से सुरक्षित रखें।

उन्होंने भारत में चयापचय संबंधी जटिलताओं के बढ़ते दायरे की भी बात की। उन्होंने कहा, “पहले ओपीडी में आने वाले हर तीसरे मरीज़ को मधुमेह का पता ही नहीं चलता था; आज हर तीसरे मरीज़ को फैटी लिवर है। यह दायरा बढ़ रहा है, और हमें इससे निपटने के लिए कहीं ज़्यादा वैज्ञानिक एवं विनियमित तंत्र की आवश्यकता है।”

अपने भाषण का समापन मार्क ट्वेन के अर्थशास्त्र पर प्रसिद्ध उद्धरण से तुलना करते हुए, डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा, “मोटापा जैसा गंभीर विषय केवल एंडोक्राइनोलॉजिस्टों के लिए छोड़ने लायक नहीं है। यह एक सामाजिक समस्या है जो संस्कृति, आदतों, बाजार और गलत जानकारी से उत्पन्न होती है और इसके दायरे को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है।”

सत्र का समापन भारत में तेजी से विकसित हो रही चयापचय स्वास्थ्य चुनौती से निपटने के लिए चिकित्सकों, शोधकर्ताओं, नीति निर्माताओं और जनता से गहन सहयोग की अपील के साथ हुआ।

केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने भारत अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान महोत्सव (आईआईएसएफ) में “मोटापे पर चिकित्सक-वैज्ञानिक संवाद” विषय पर पैनल चर्चा में कहा, “मोटापा भारत में एक जन स्वास्थ्य चुनौती बनकर उभरा है और यह केवल सौंदर्य संबंधी समस्या नहीं है। इस चुनौती का समाधान वैज्ञानिक सटीकता एवं नीतिगत अनुशासन के साथ करने की आवश्यकता है।”

इस सत्र का आयोजन नैदानिक ​​चिकित्सा, जैव चिकित्सा अनुसंधान और लोक नीति के प्रमुख विशेषज्ञों की उपस्थिति में किया गया। इस सत्र में भारत में बढ़ते चयापचय चुनौतियों पर एक बहु-विषयक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया। मंत्री ने आईआईएसएफ में खचाखच भरे दर्शकों को संबोधित करते हुए इस बात पर बल दिया कि कैसे सामाजिक व्यवहार, बाज़ार और गलत सूचनाओं ने भारत में मोटापे के परिदृश्य को जटिल बना दिया है। 

मंच पर भारत के वैज्ञानिक एवं चिकित्सा समुदाय के प्रमुख विशेषज्ञ उपस्थित थे, जिनमें एनएबीआई के कार्यकारी निदेशक डॉ. अश्वनी पारीक; डॉ. विनोद कुमार पॉल और डॉ. वी.के. सारस्वत, सदस्य नीति आयोग; प्रो. उल्लास कोल्थुर, सीडीएफडी के निदेशक; टीएचएसटीआई के कार्यकारी निदेशक डॉ. गणेशन कार्तिकेयन; और वरिष्ठ एंडोक्रिनोलॉजिस्ट डॉ. संजय भदादा और डॉ. सचिन मित्तल शामिल थे।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारतीय समाज में मोटापे को एक बीमारी के बजाय एक सौंदर्य संबंधी समस्या के रूप में देखा जाता है जिसके कारण इस पर वैज्ञानिक चर्चा में देरी हुई है। उन्होंने कहा, “दशकों से, हमारे चिकित्सा सम्मेलनों में मधुमेह एवं चयापचय संबंधी विकारों पर चर्चा होती रही है लेकिन मोटापे पर कभी नहीं हुई। पिछले 15 वर्षों में हमने इसे एक गंभीर चिकित्सा प्रासंगिकता वाला विषय के रूप में देखना शुरू किया है।”

मंत्री ने भारत की अनोखी शारीरिक विशेषताओं को उजागर किया। उन्होंने विशेष रूप से पूर्वी आबादी में केंद्रीय या आंतरिक मोटापे की उच्च व्यापकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीयों के लिए, कमर की माप वजन से ज्यादा महत्वपूर्ण कहानी बताती है और इस बात पर बल दिया कि यद्यपि समग्र शरीर का वजन सामान्य प्रतीत होता है, फिर भी आंतरिक वसा एक स्वतंत्र जोखिम कारक है।

जीएलपी-आधारित दवाओं का व्यापक और फैशनेबल उपयोग पर बात करते हुए, मंत्री ने विवेकपूर्ण उपयोग के साथ सावधानी बरतने का आग्रह किया और इस बात पर बल दिया कि कभी-कभी दीर्घकालिक प्रभाव कई वर्षों बाद स्पष्ट होते हैं। उन्होंने पिछले सार्वजनिक-स्वास्थ्य गलत निर्णयों को याद किया जैसे कि 1970 और 80 के दशक में रिफाइंड तेलों में अनियमित बदलाव, जिसने बाद में प्रतिकूल परिणाम सामने आए। उन्होंने कहा कि सही नैदानिक निष्कर्ष दशकों से परिणामों का अवलोकन करने से प्राप्त हो सकता है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने तेजी से या दवा के माध्यम से वजन घटने से जुड़ी सार्कोपेनिया और ओज़ेम्पिक फेस जैसी उभरती चिंताओं का भी उल्लेख किया तथा कहा कि शारीरिक प्रभाव का पूरा स्पेक्ट्रम अभी भी पूरी तरह से समझा नहीं गया है।

मंत्री के संबोधन का एक बड़ा हिस्सा गलत सूचनाओं से उत्पन्न खतरे पर केंद्रित रहा। उन्होंने चेतावनी दी कि अयोग्य चिकित्सक एवं स्वयंभू आहार विशेषज्ञ भारत के चयापचय संकट को और बदतर बना रहे हैं। उन्होंने कहा, “भारत में चुनौती जागरूकता की कमी नहीं बल्कि भ्रामक सूचनाओं का तेज़ी से बढ़ना है। प्रत्येक कॉलोनी में एक आहार विशेषज्ञ तो है लेकिन उनकी योग्यता की जांच करने की कोई व्यवस्था नहीं है। अनियंत्रित सलाह और बिना जांचे-परखे नुस्खे मोटापे से भी ज़्यादा नुकसान पहुंचा सकते हैं।” उन्होंने नीति निर्माताओं से ऐसे उपाय तैयार करने का आग्रह किया जो मरिजों भ्रामक हस्तक्षेपों से सुरक्षित रखें।

उन्होंने भारत में चयापचय संबंधी जटिलताओं के बढ़ते दायरे की भी बात की। उन्होंने कहा, “पहले ओपीडी में आने वाले हर तीसरे मरीज़ को मधुमेह का पता ही नहीं चलता था; आज हर तीसरे मरीज़ को फैटी लिवर है। यह दायरा बढ़ रहा है, और हमें इससे निपटने के लिए कहीं ज़्यादा वैज्ञानिक एवं विनियमित तंत्र की आवश्यकता है।”

अपने भाषण का समापन मार्क ट्वेन के अर्थशास्त्र पर प्रसिद्ध उद्धरण से तुलना करते हुए, डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा, “मोटापा जैसा गंभीर विषय केवल एंडोक्राइनोलॉजिस्टों के लिए छोड़ने लायक नहीं है। यह एक सामाजिक समस्या है जो संस्कृति, आदतों, बाजार और गलत जानकारी से उत्पन्न होती है और इसके दायरे को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है।”

सत्र का समापन भारत में तेजी से विकसित हो रही चयापचय स्वास्थ्य चुनौती से निपटने के लिए चिकित्सकों, शोधकर्ताओं, नीति निर्माताओं और जनता से गहन सहयोग की अपील के साथ हुआ।

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