
गोरखपुर, 19 जनवरी (हि.स.)। महाराणा प्रताप केवल मेवाड़ के शासक नहीं थे, बल्कि वे भारतीय अस्मिता और आत्मसम्मान के जीवंत प्रतीक हैं। उन्होंने वैभव और सत्ता के प्रस्ताव ठुकराकर यह सिद्ध कर दिया कि स्वतंत्रता और स्वाभिमान किसी भी समझौते से ऊपर हैं। हल्दीघाटी का युद्ध पराजय नहीं, बल्कि राष्ट्रधर्म के लिए किया गया ऐतिहासिक संघर्ष था, जिसने आने वाली पीढ़ियों को आत्मगौरव का पाठ पढ़ाया।
उक्त बातें महाराणा प्रताप महाविद्यालय, जंगल धूसड़ में चल रहे भारत-भारती पखवाड़ा (12 से 26 जनवरी) के अंतर्गत ‘हिन्दुआ सूर्य महाराणा प्रताप की पुण्यतिथि’ पर आयोजित कार्यक्रम में दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुरम विश्वविद्यालय, गोरखपुर के विधि विभाग के सहायक आचार्य डॉ. शैलेष सिंह ने बतौर मुख्य वक्ता कही। विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि महाराणा प्रताप केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि वे स्वाभिमान, स्वतंत्रता, त्याग और राष्ट्रभक्ति की जीवंत प्रतिमूर्ति हैं। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि स्वतंत्रता का मूल्य सिंहासन से भी अधिक होता है। जब समकालीन शासक अकबर की अधीनता स्वीकार कर वैभवपूर्ण जीवन जी रहे थे, तब महाराणा प्रताप ने जंगलों में रहकर, घास की रोटियाँ खाकर भी स्वतंत्रता के मार्ग से विचलित होना स्वीकार नहीं किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महाविद्यालय के भूगोल विभाग के अध्यक्ष डॉ. विजय कुमार चौधरी ने कहा कि जब तक राष्ट्र में महाराणा प्रताप जैसे महापुरुषों की स्मृति जीवित है, तब तक भारत का स्वाभिमान भी अक्षुण्ण रहेगा।
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