बांग्लादेश में लोकतंत्र पर गहराता संकट, हिंसा और असहिष्णुता बनी नई सामान्य स्थिति

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ढाका, 27 दिसंबर (हि.स.)। फरवरी 2026 में प्रस्तावित 13वें आम चुनाव से पहले बांग्लादेश गंभीर लोकतांत्रिक संकट से जूझ रहा है। अगस्त 2024 के बाद से देश में सांप्रदायिक हिंसा, भीड़तंत्र, अल्पसंख्यकों पर हमले, असहमति की आवाजों को दबाने और कट्टरपंथी इस्लामी ताकतों के उभार जैसी घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। अंतरिम सरकार के प्रमुख सलाहकार मोहम्मद यूनुस ने चुनाव को “स्वतंत्र और निष्पक्ष” कराने का वादा किया है, लेकिन जमीनी हालात चिंता बढ़ाने वाले हैं।

पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की सत्ता से विदाई और अवामी लीग पर प्रतिबंध को लोकतंत्र की बहाली के तौर पर पेश किया गया, लेकिन इसके बाद पैदा हुआ सत्ता शून्य कट्टरपंथी ताकतों के लिए अवसर बन गया। बांग्लादेश का लोकतंत्र ऐतिहासिक रूप से संघर्षों और बलिदानों से उपजा है, लेकिन देश में लोकतांत्रिक संस्थाएं अब भी नाजुक बनी हुई हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत और विश्वसनीय विपक्ष के अभाव में लोकतांत्रिक ढांचा कमजोर हुआ है। यदि हिंसा, धार्मिक ध्रुवीकरण और संस्थागत अस्थिरता पर तत्काल नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाला चुनाव लोकतंत्र को मजबूत करने के बजाय देश को और अस्थिर कर सकता है।

बांग्लादेश के सामने यह सबसे बड़ी परीक्षा है कि वह लोकतांत्रिक मूल्यों, बहुलतावाद और कानून के शासन को कैसे पुनर्स्थापित करता है। कट्टरपंथी समूह न सिर्फ राजनीतिक रूप से संगठित हो रहे हैं, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी असहिष्णुता को बढ़ावा दे रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद पैदा हुए सत्ता शून्य का लाभ कट्टरपंथी समूह उठा रहे हैं। राजनीतिक विपक्ष के कमजोर होने से लोकतांत्रिक संतुलन बिगड़ गया है, जिसका सीधा असर सामाजिक सौहार्द पर पड़ा है।

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