
प्रयागराज, 05 फ़रवरी (हि.स.)। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक आदेश में कहा है कि मुकदमे की निष्पक्ष सुनवाई के लिए आरोपित को पुलिस के कागजात दिया जाना अनिवार्य है। यह कहते हुए कोर्ट ने एक आरोपित के खिलाफ तय किए गए आरोपों को रद्द कर दिया है।
कोर्ट ने कहा कि आरोपित को पुलिस रिपोर्ट और संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराना कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि निष्पक्ष सुनवाई का मूल तत्व है। कोर्ट ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 230 का पालन किए बिना की गई कार्यवाही निष्पक्ष और स्वतंत्र सुनवाई के सिद्धांत के विरुद्ध है।
इटावा के जविजेंद्र कुमार की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना ने याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि बीएनएसएस की धारा 230 का अनुपालन अनिवार्य है। इसके उल्लंघन में किया गया कोई भी ट्रायल कानूनन टिकाऊ नहीं हो सकता।
याची के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 137(2), 87, 352 और 65(1) के साथ पॉक्सो एक्ट और एससी/एसटी एक्ट के तहत आरोप लगाए गए थे। ट्रायल कोर्ट ने 6 जनवरी 2025 को आरोप पत्र पर संज्ञान लिया था और 4 अप्रैल 2025 की तिथि आरोप तय करने के लिए निर्धारित की। हाइकोर्ट में आरोपित की ओर से दलील दी गई कि इटावा स्थित पॉक्सो मामलों की विशेष अदालत ने बीएनएसएस की धारा 230 के तहत अनिवार्य रूप से दिए जाने वाले पुलिस कागजात और दस्तावेज आरोपित को उपलब्ध नहीं कराए। इन दस्तावेजों के बिना उसको बीएनएसएस की धारा 261 और 262 के तहत आरोपमुक्ति का आवेदन दाखिल करने के वैधानिक अधिकार से वंचित कर दिया गया। राज्य सरकार व अन्य विपक्षी की ओर से कहा गया कि पुलिस कागजात की कॉपी आरोपित को दी गई थी, ऑर्डर शीट पर उसके हस्ताक्षर इस बात का प्रमाण हैं। यह भी तर्क दिया गया कि आरोपी की उपस्थिति में ही संज्ञान लिया गया था और उसे आरोपमुक्ति का आवेदन करने के लिए पर्याप्त समय दिया गया लेकिन उसने ऐसा नहीं किया, जिसके बाद आरोप तय कर दिए गए।
रिकॉर्ड और आदेश के अवलोकन के बाद हाइकोर्ट ने कहा कि आदेश के हाशिये पर आरोपित के हस्ताक्षर हैं लेकिन आदेश में कहीं भी यह उल्लेख नहीं है कि धारा 230 के तहत पुलिस रिपोर्ट और दस्तावेज उपलब्ध कराए गए हैं। केवल हस्ताक्षर के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि वैधानिक प्रक्रिया का पालन किया गया।
हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 230 का अनुपालन कोई साधारण औपचारिकता नहीं, बल्कि निष्पक्ष सुनवाई का सार है। यह प्रावधान मजिस्ट्रेट को यह दायित्व सौंपता है कि वह आरोपी को बिना देरी के पुलिस रिपोर्ट और बयान उपलब्ध कराए और किसी भी स्थिति में यह अवधि आरोपित के पेश होने के 14 दिनों से अधिक न हो।
