दबे-कुचलों की आवाज थे फैज अहमद फैज

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फैज़ अहमद फैज़ केवल एक कवि नहीं थे, बल्कि वे दबे-कुचले लोगों की धड़कन और सत्ता के अहंकार के सामने एक बुलंद ललकार थे। उनकी शायरी में जो नफ़ासत है, वही बगावत भी है। ‘इंकलाब की आवाज़’ की थीम पर आधारित यह लेख फैज़ के जीवन, उनकी विचारधारा और उनकी उन अमर रचनाओं का विश्लेषण है जिन्होंने सरहदों की दीवारें गिरा दीं।

​फैज़ अहमद फैज़: इंकलाब की रूहानी आवाज़

​फैज़ अहमद फैज़ का जन्म 1911 में सियालकोट (अविभाजित भारत) में हुआ था। उनकी परवरिश एक ऐसे माहौल में हुई जहाँ साहित्य और राजनीति का संगम था। लेकिन फैज़ की असली पहचान तब बनी जब उन्होंने अपनी कलम को केवल ‘महबूब के हुस्न’ तक सीमित न रखकर ‘इंसानियत के दर्द’ से जोड़ दिया। उन्होंने उर्दू शायरी की पारंपरिक विधा ‘ग़ज़ल’ को एक नया राजनीतिक आयाम दिया। उनके लिए इंकलाब केवल सत्ता का परिवर्तन नहीं था, बल्कि रूह की आज़ादी और बराबरी का सपना था।

​इश्क से इंकलाब तक का सफर

​फैज़ की शुरुआती शायरी में रोमानियत थी, लेकिन जल्द ही उन्हें अहसास हुआ कि जिस दुनिया में भूख, नफ़रत और गुलामी हो, वहाँ केवल हुस्न की बातें करना बेईमानी है। उनकी मशहूर नज़्म “मुझसे पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग” इसी वैचारिक परिवर्तन का दस्तावेज है। इसमें वे साफ़ कहते हैं:

​”अनगिनत सदियों के तारीक (अंधेरे) बहीमाना तिलिस्म,
रेशम-ओ-अतलस-ओ-कमख़ाब में बुनवाए हुए,
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म…”

​यहाँ से फैज़ का महबूब बदल गया। अब उनका महबूब वह मजलूम इंसान था जो कारखानों और खेतों में पिस रहा था।

​क्रांतिकारी रचनाएं और उनका प्रभाव

​फैज़ की रचनाओं ने जेल की सलाखों को भी संगीत में बदल दिया। उन्होंने अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा कैद में गुजारा, लेकिन उनकी आवाज़ कभी कमज़ोर नहीं पड़ी।

​1. हम देखेंगे (नज़्म-ए-बगावत)

​यह फैज़ की सबसे ताकतवर और मशहूर रचना मानी जाती है। इसे उन्होंने जनरल जिया-उल-हक के तानाशाही शासन के खिलाफ लिखा था। इसमें इस्लामी बिम्बों (Metaphors) का इस्तेमाल करके उन्होंने लोकतंत्र की वापसी का आह्वान किया।

​प्रमुख पंक्तियाँ: ​”लाज़िम है कि हम भी देखेंगे, जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से, सब बुत उठाए जाएंगे, हम अहल-ए-सफ़ा, मरदूद-ए-हरम, मसनद पे बिठाए जाएंगे…”

​”लाज़िम है कि हम भी देखेंगे,
जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से, सब बुत उठाए जाएंगे,
हम अहल-ए-सफ़ा, मरदूद-ए-हरम, मसनद पे बिठाए जाएंगे…”

​यह नज़्म आज भी दक्षिण एशिया में हर उस आंदोलन का हिस्सा होती है जहाँ लोग अपने हक की लड़ाई लड़ रहे होते हैं।

​2. सुबह-ए-आज़ादी (बँटवारे का दर्द)

​1947 में जब भारत और पाकिस्तान आज़ाद हुए, तो खुशियों के साथ-साथ खून-खराबा भी हुआ। फैज़ ने उस अधूरी आज़ादी पर कटाक्ष करते हुए लिखा:

​”ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शब-गजीदा सहर,
वो इंतज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं…”

​यह नज़्म बताती है कि फैज़ के लिए आज़ादी का मतलब सिर्फ झंडा बदलना नहीं था, बल्कि आम आदमी के जीवन में उजाला लाना था।

​3. बोल (अभिव्यक्ति की आज़ादी)

​जब जुल्म बढ़ता है, तो सबसे पहले ज़ुबान पर ताले लगाए जाते हैं। फैज़ की नज़्म ‘बोल’ हर उस इंसान के लिए प्रेरणा है जो सच कहने से डरता है।

​”बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे,
बोल ज़बाँ अब तक तेरी है…”

​सलाखों के पीछे से इंकलाब

​1951 में फैज़ को ‘रावलपिंडी साजिश केस’ में गिरफ्तार किया गया और उन्हें मौत की सजा तक सुनाई जा सकती थी। लेकिन जेल की तन्हाई ने उनकी शायरी को और धार दे दी। ‘ज़िंदाँ-नामा’ और ‘दस्त-ए-सबा’ जैसी कृतियाँ इसी दौर की उपज हैं। वे लिखते हैं:

​”मता-ए-लौह-ओ-क़लम छिन गई तो क्या ग़म है,
कि खून-ए-दिल में डुबो ली हैं उँगलियाँ मैंने…”

​उनकी यह जिजीविषा उन्हें दुनिया के महान क्रांतिकारी कवियों जैसे पाब्लो नेरुदा और नाज़िम हिकमत की कतार में खड़ा करती है। उन्हें लेनिन शांति पुरस्कार से भी नवाजा गया, जो उनके अंतरराष्ट्रीय कद को दर्शाता है।

​फैज़ के इंकलाब की प्रासंगिकता

​आज के दौर में भी, जब दुनिया वैचारिक मतभेदों और तानाशाही प्रवृत्तियों से जूझ रही है, फैज़ की आवाज़ प्रासंगिक बनी हुई है। उनकी शायरी हमें सिखाती है कि इंकलाब केवल सड़कों पर नहीं, बल्कि सोच में भी होना चाहिए। वे नफरत के दौर में मोहब्बत और उम्मीद की बात करते हैं:

​”दिल ना-उम्मीद तो नहीं, नाकाम ही तो है,
लंबी है ग़म की शाम, मगर शाम ही तो है।”

​फैज़ की महानता इस बात में है कि उन्होंने कभी भी हथियार नहीं उठाए, लेकिन उनकी कलम ने जो घाव और जो मरहम दिए, वे किसी भी क्रांति से कम नहीं थे। वे उर्दू अदब के वह सूरज हैं जिसकी रोशनी कभी कम नहीं होगी।

​निष्कर्ष

​फैज़ अहमद फैज़ केवल एक शायर नहीं थे, वे एक जज्बा थे। उन्होंने दिखाया कि कैसे एक कलाकार अपनी कला को समाज के प्रति जवाबदेह बना सकता है। उनकी ‘इंकलाब की आवाज़’ में न तो कड़वाहट थी और न ही व्यक्तिगत रंजिश; उसमें तो बस एक बेहतर दुनिया की ख्वाहिश थी। जब तक दुनिया में नाइंसाफी रहेगी, फैज़ की नज़्मों की गूँज सुनाई देती रहेगी

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