
– शरद मिश्र
25-26 वर्ष पूर्व समाज ग्लोबलाइजेशन के प्रभाव में आज जितना नहीं था, कुछ शुरुआत हो गई थी पर प्रभाव न्यूनतम था। मोबाइल फोन कुछ एक बड़े लोगों के पास हुआ करता था। स्मार्टफोन का तो नामोनिशान नहीं था। इंटरनेट घरों से बाहर यानी कुछेक साइबर कैफे और बड़े ऑफिसों में अपने बीज बो चुका था। टेक्नोलॉजी भी सामान्य रूप में बड़ों की पहुंच में हुआ करती थी। मल्टीप्लेक्स, मॉल इन सबका तो कोई स्थान ही नहीं था। सिंगल थिएटर और मेले मनोरंजन के साधन हुआ करते थे। कोई नई फिल्म आने पर शहर के प्रमुख चौराहों पर उस फिल्म के आकर्षक पोस्टर और बड़े-बड़े होर्डिंग लगाए जाते थे।
अब बात यहीं से शुरू होती है। फिल्मों के पोस्टर हर प्रकार के होते थे, कुछ गरिमापूर्ण और कुछ आपत्तिजनक। ए सर्टिफिकेट प्राप्त पिक्चरों के भी होर्डिंग चौराहों पर दिख जाते थे। मैं अपने कुछ मित्रों के साथ नियमित मॉर्निंग वॉक पर जाया करता था, लगभग वही समय छोटे बच्चों के स्कूलों का भी होता है। अभिभावक अपने बच्चों को लेकर चौराहों पर स्कूल बस, टेंपो, रिक्शा के इंतजार में खड़े होते थे और स्वाभाविक है वैसे आपत्तिजनक होर्डिंग को देखकर असहज महसूस करते थे। नियमित वॉक के दौरान इस दृश्य को मैं और हमारे मित्र भी देखते थे, कुछेक बार प्रमुख लोगों से इसकी शिकायत भी की। तब मैं अपने दोस्तों से चर्चा के दौरान कहता था कि ए सर्टिफिकेट फिल्म देखने जाने के लिए तो सीमा निर्धारित की गई है पर इस होर्डिंग के सड़क पर लगे होने से छोटे से लेकर बड़े तक सभी देख रहे हैं। यह तो बच्चों के अधिकारों का हनन है और किस पर क्या प्रभाव पड़ रहा होगा, यह समझना कठिन है।
उस दौर की अच्छी बात यह थी कि आज की तुलना में अभिभावक व समाज के बड़े-बुजुर्ग बच्चों को अधिक समय देकर उनसे विचार-विनिमय और प्रेरक बातें साझा किया करते थे, साथ ही आज की तुलना में संयुक्त परिवार की परंपरा अधिक थी। इसलिए बच्चों के मन में क्या चल रहा है, उसका आभास बड़ों को हो जाया करता था।
कल गाजियाबाद में तीन बच्चियों के नौवीं मंजिल से कूद कर जान देने की घटना ने मुझे यह पुरानी बात याद दिला दी।
आज घर-घर इंटरनेट, उस पर उपलब्ध हर प्रकार का कंटेंट और एकल तथा आत्म केंद्रित परिवार समाज के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।जिस प्रकार होर्डिग का बड़े-छोटे पर क्या असर होता था, इसका मूल्यांकन कठिन था पर उस दौर में न्यूनतम असर होने तथा तात्कालिक सामाजिक व्यवस्था के कारण उसके प्रभावों का समाधान किया जा सकना सरल था। वर्तमान परिस्थितियों के व्यापक प्रभाव और एकाकी जीवन शैली के दौर में समाधान अत्यंत कठिन है। मां-बाप काम पर चले गए, परिवार में बड़े-बुजुर्ग हैं नहीं। अगर कुछ हैं भी तो सब अपने-अपने में केंद्रित हैं। ऐसे में बच्चों के लिए बहुत बड़ी समस्या उत्पन्न हो रही है। उनके लिए जानकारी और मनोरंजन के लिए इंटरनेट सबसे सरल-सुलभ माध्यम है, जिसपर पूरी दुनिया की संस्कृति, ज्ञान के साथ अच्छा-बुरा सभी कंटेंट मौजूद है।
अपने यहां कहावत है- “कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर बानी।“ इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री दुनिया के किसी स्थान की परिस्थिति, मनःस्थिति, देशकाल, उद्देश्य के हिसाब से सामयिक हो सकती है लेकिन जहां से आप एक्सेस कर रहे हैं, उस परिवेश के अनुकूल हो, यह नहीं कहा जा सकता। उद्देश्य का जिक्र मैंने इसलिए किया कि इंटरनेट ने पूरी दुनिया को बहुत बड़ा बाजार उपलब्ध कराया है और आईटी व मार्केटिंग क्षेत्र के विशेषज्ञ व्यावसायिक होड़ में नए-नए प्रयोग कर रहे हैं। वह जानते हैं कि सबसे ज़ादा यूज़र बच्चे एवं युवा हैं और वह उन्हें लेकर अपने प्रोजेक्ट बनाते हैं। नए-नए गेम, सोशल मीडिया व अन्य आकर्षक प्रलोभनों द्वारा बच्चों और युवाओं को प्रभावित करने का भरसक प्रयास करते हैं। बच्चे और युवा भी इन आकर्षणों में इतने गहरे उतर जाते हैं कि आभासी दुनिया ही उन्हें यथार्थ नजर आने लगती है और अंत में बहुत देर हो जाती है। अभिभावक के पास समय की कमी, समाज की एक-दूसरे के प्रति उदासीनता बच्चों पर नजर रखने में कुछ कमी लाती है। वहीं, इंटरनेट के माध्यम से एक वर्ग बच्चों पर नजर लगाए रहता है।
एल्गोरिदम तो आप जानते ही हैं, कोई कंटेंट आपने एक बार देख लिया तो वह कंटेंट और उससे संबंधित कंटेंट बार-बार आपके सामने दिखाई पड़ेगा और बार-बार आपके सामने जब कोई चीज आती है तो स्वाभाविक है उसके प्रति कौतूहलता जगाती है, वहीं हम भ्रम जाल में फ़ंसते चले जाते हैं और फिर चक्रव्यूह से निकलना असंभव हो जाता है। बच्चे भी अपनी समस्याओं का समाधान पेरेंट्स की अनुपस्थिति में अपने हमउम्र साथियों से ही करने का प्रयास करते हैं जो स्वयं ही अभी पूरी तरह से किसी भी समस्या से उबरने के लिए तैयार नहीं है और बड़ों के पास समस्या के समाधान के लिए समय नहीं है।
मैं तकनीकी का विरोधी नहीं हूं और बिना उसके अब दुनिया की कल्पना बेमानी है। आईटी ने हम लोगों के जीवन को बहुत सरल किया है। एआई नए तरीके से उपयोगी बन रहा है। मेरा जोर केवल इस बात पर है कि सबसे उपयोगी काम मान बच्चों के साथ अधिकतम समय साझा करते हुए विचार-विमर्श करना और पारंपरिक जीवन मूल्यों का स्मरण कराते रहना सबसे जरूरी है। आभासी दुनिया के अतिरिक्त सामाजिक दुनिया और ऑनलाइन गेमिंग के अलावा ऑन फील्ड गेमिंग पर सभी अभिभावकों को ध्यान देना चाहिए। आत्मकेंद्रित और आत्ममुग्धता से ऊपर उठकर बच्चों को पारिवारिक, सामाजिक आयोजनों में उल्लासपूर्वक सम्मिलित होने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
बच्चों पर आपका दबाव नहीं प्रभाव हो और वह तब होगा जब आप उनके साथ अधिकतम समय व्यतीत करेंगे। बच्चों को यह हमेशा सिखाते रहें कि “बड़े भाग मानुष तन पावा” यानी हमें मनुष्य देह बड़े भाग्य से प्राप्त हुई है। इस देह पर परिवार व समाज सभी का हक है और तुम अकेले नहीं हो।
अंत में -हे नाथ हम पर ऐसी कृपा हो, जीवन निरर्थक जाने ना पाए..।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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