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चिली के जंगलों में आग ने मचाई तबाही

बाल मुकुन्द ओझा

चिली इस समय भयावह आपदा की चपेट में है। दक्षिण अमेरिकी देश चिली के जंगल में लगी आग की चपेट में आकर अब तक 19 लोगों की मौत हो चुकी है। चिली फिलहाल भीषण लू की चपेट में है। जंगल की आग ने तबाही मचा दी है, जिसके वजह से वहां इमरजेंसी की घोषणा करनी पड़ी है। अधिकारियों ने रविवार को इसकी पुष्टि की। आग लगने के कारणों का अब तक पता नहीं चला है। आग की वजह से अब तक 50 हजार से ज्यादा लोगों को बेघर होना पड़ा है। कई कस्बों में घर, गाड़ियां और पूरी बस्तियां जलकर खाक हो गईं। आग न्युब्ले और बायोबियो इलाकों में फैली है, जो राजधानी सैंटियागो से करीब 500 किलोमीटर दक्षिण में हैं। तेज हवाओं के चलते लगातार दो दिनों से आग फैल रही है। करीब 4 हजार दमकलकर्मी आग बुझाने में लगे हैं। चिली हाल के वर्षों में बार-बार भीषण जंगल की आग झेल चुका है। इसे जलवायु परिवर्तन से जोड़कर देखा जा रहा है, जहां चरम मौसम, सूखा और बाढ़ की घटनाएं बढ़ी हैं। फरवरी 2024 में सैंटियागो के उत्तर-पश्चिम में स्थित विना डेल मार शहर के पास एक साथ कई आग लगी थीं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक हादसे में 138 लोगों की मौत हुई थी। उस समय करीब 16 हजार लोग प्रभावित हुए थे। आग की वजह से अब तक 50 हजार से ज्यादा लोगों को बेघर होना पड़ा है। कई कस्बों में घर, गाड़ियां और पूरी बस्तियां जलकर खाक हो गईं।

काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर  के एक अध्ययन में बताया  गया कि पिछले दो दशकों में जंगलों में आग के हादसों में दस गुना वृद्धि हुई है।  विशेषज्ञों के अनुसार जंगल में आग लगने के कई कारण होते हैं। इनमें गर्मी के अलावा ईंधन और ऑक्सीजन मुख्य कारक है।  जंगल में पेड़ों के सूखे पत्ते और टहनियां ईंधन का काम करते हैं। एक छोटी सी चिंगारी हीट का काम करती है। ऐसे में अगर हवा तेज चल रही हो तो एक जगह लगी आग पूरे जंगल को तबाह करने के लिए काफी है। अगर गर्मियों का मौसम है, तो सूखा पड़ने पर ट्रेन के पहिए से निकली एक चिंगारी भी आग लगा सकती है। इसके अलावा कभी-कभी आग प्राकृतिक रूप से भी लग जाती है। ये आग ज्यादा गर्मी की वजह से या फिर बिजली कड़कने से लगती है। जंगलों में आग लगने की ज्यादातर घटनाएं इंसानों के कारण होती हैं, जैसे आगजनी, कैम्पफायर, बिना बुझी सिगरेट फेंकना, जलता हुआ कचरा छोड़ना, माचिस या ज्वलनशील चीजों से खेलना आदि। जंगलों में आग लगने के मुख्य कारण बारिश का कम होना, सूखे की स्थिति, गर्म हवा, ज्यादा तापमान भी हो सकते हैं। इन सभी कारणों से जंगलों में आग लग सकती है।

दरअसल जंगलों की आग से न केवल प्रकृति झुलसती है, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारे व्यवहार पर भी सवाल खड़ा होता है। गर्मियों के मौसम में जंगलों में आग लगने की घटनाएं अक्सर प्रकाश में आती रहती हैं। जंगलों में लगी आग से जान-माल के साथ-साथ पर्यावरण को भारी नुकसान होता है। पेड़-पौधों के साथ-साथ  जीव-जन्तुओं की विभिन्न प्रजातियां जलकर राख हो जाती हैं। जंगलों में विभिन्न पेड़-पौधे और जीव-जन्तु मिलकर समृद्ध जैवविविधता की रचना करते हैं। पहाड़ों की यह समृद्ध जैवविविधता ही मैदानों के मौसम पर अपना प्रभाव डालती हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि ऐसी घटनाओं के इतिहास को देखते हुए भी कोई ठोस योजना नहीं बनाई जाती है।

जंगलों में यदि आग विकराल रूप धारण कर लेती है, तो उसे बुझाना आसान नहीं होता है। कई बार जंगल की आग के प्रति स्थानीय लोग भी उदासीन रहते हैं। दरअसल हमारे देश में ऐसी आग बुझाने की न तो कोई उन्नत तकनीक है और न ही कोई स्पष्ट कार्ययोजना। विदेशों में जंगल की आग बुझाने के लिए युद्ध स्तर पर कार्य होता है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने जंगलों की आग पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था कि पर्यावरण मंत्रालय और अन्य प्राधिकरण वन क्षेत्र में आग लगने की घटना को हल्के में लेते हैं। जब भी ऐसी घटनाएं घटती हैं, तो किसी ठोस नीति की आवश्यकता महसूस की जाती है। लेकिन बाद में सब कुछ भुला दिया जाता है।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

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