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ग्रामीण स्कूलों में शिक्षिकाओं की कमी

– डॉ. प्रियंका सौरभ

भारत में शिक्षा की गुणवत्ता और समानता हमेशा से एक चुनौती रही है। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच, संसाधनों, शिक्षक उपलब्धता और शिक्षा के अवसरों में व्यापक अंतर दिखाई देता है। इस असमानता का सबसे स्पष्ट उदाहरण प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों की तैनाती और लिंग संतुलन में देखा जा सकता है।

शहरों के प्राथमिक स्कूलों में अक्सर 10 से 18 शिक्षक तैनात होते हैं, जिनमें अधिकांश महिलाएं होती हैं। वहीं, ग्रामीण क्षेत्र के प्राथमिक स्कूलों में औसतन 3–4 शिक्षक ही होते हैं और उनमें से एक भी महिला नहीं होती। यही वह असमानता है, जो न केवल शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित करती है बल्कि समाज में लिंग समानता की दिशा में भी बड़ी बाधा बनती है।

भारत में शिक्षक भर्ती में महिलाओं के लिए 50% आरक्षण का प्रावधान है। यह कानून स्पष्ट रूप से महिलाओं को समान अवसर देने की दिशा में उठाया गया कदम है। लेकिन सवाल यह उठता है कि जब भर्ती में आरक्षण है, तो पोस्टिंग में यह क्यों लागू नहीं होता? ग्रामीण क्षेत्र में पुरुष शिक्षकों की तैनाती क्यों अधिक होती है और महिलाओं को वहां सेवा देने के लिए क्यों नहीं प्रोत्साहित किया जाता?

इसका उत्तर जटिल है। सबसे पहले, सुरक्षा और सुविधाओं की कमी एक बड़ा कारण है। सुदूर और दूर-दराज के गांवों में रहने की सुविधा सीमित होती है। कई महिला शिक्षक वहां तैनाती के लिए अनिच्छुक रहती हैं। परिवहन की समस्या, सुरक्षित आवास की कमी, सामाजिक और पारिवारिक प्रतिबंध जैसे कारक भी उनके निर्णय को प्रभावित करते हैं।

दूसरी ओर, सरकारी नीतियाँ इस असमानता को सीधे संबोधित नहीं करती हैं। भर्ती में आरक्षण को तो लागू किया जाता है, लेकिन पोस्टिंग में “इच्छा” और “सुविधा” को प्राथमिकता दी जाती है। परिणामस्वरूप, ग्रामीण क्षेत्रों में पुरुष शिक्षकों की संख्या अधिक रहती है। यही वह दोहरा मापदंड है, जो महिलाओं के समानता के अधिकारों और शिक्षा के मूल सिद्धांत के खिलाफ जाता है।

सामाजिक दृष्टि से यह असमानता और भी चिंताजनक है। महिला शिक्षक केवल शैक्षिक कर्तव्य नहीं निभाती हैं; वे बच्चों के लिए रोल मॉडल होती हैं। विशेष रूप से लड़कियों के लिए, महिला शिक्षक शिक्षा में प्रेरणा और विश्वास का स्रोत होती हैं। ग्रामीण स्कूलों में महिला शिक्षकों की अनुपस्थिति का मतलब है कि लड़कियां उच्च शिक्षा और करियर के विकल्पों के प्रति प्रेरित नहीं हो पातीं।

इसके अलावा, शिक्षकों की संख्या और लिंग संतुलन का प्रभाव बच्चों की सीखने की क्षमता पर भी पड़ता है। शोधों से पता चलता है कि लिंग संतुलन वाले कक्षा वातावरण में बच्चों की सामाजिक और भावनात्मक विकास बेहतर होता है। वे सहकर्मी सहयोग, समानता की भावना और सामाजिक संवेदनशीलता सीखते हैं। यदि ग्रामीण स्कूलों में केवल पुरुष शिक्षक हैं, तो यह अनुभव बच्चों से छूट जाता है।

कानूनी और संवैधानिक दृष्टि से भी यह असमानता चुनौतीपूर्ण है। भारतीय संविधान की धारा 14 और 15 हर नागरिक को समानता का अधिकार देती है और लिंग के आधार पर भेदभाव से बचाती है। भर्ती में 50% आरक्षण तो महिलाओं को समान अवसर देता है, लेकिन पोस्टिंग में इसे नजरअंदाज करना संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत है। यह नीति केवल कानूनी रूप से नहीं बल्कि नैतिक रूप से भी असंगत है।

सरकार की इस दोहरी नीति का असर स्पष्ट है। शहरी स्कूलों में महिलाएं भरपूर तैनात हैं, इसलिए 50% आरक्षण दिखाई देता है। वहीं, ग्रामीण स्कूलों में महिला शिक्षकों की कमी, उनके आरक्षण का वास्तविक लाभ न के बराबर कर देती है। यह नीति न केवल ग्रामीण शिक्षा को कमजोर करती है, बल्कि सामाजिक और लैंगिक समानता के मूल सिद्धांत को भी कमजोर करती है।

इस असमानता को दूर करने के लिए ठोस कदम जरूरी हैं। महिला शिक्षकों को आकर्षित करने के लिए विशेष भत्ता, सुरक्षित और संरचित आवास, परिवहन सुविधा और स्वास्थ्य सुविधाएँ सुनिश्चित की जानी चाहिए। अगर महिलाओं को सुरक्षा और सुविधा मिलेगी, तो वे ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा देने के लिए अधिक इच्छुक होंगी।

भर्ती के साथ-साथ पोस्टिंग नीति में भी महिलाओं का 50% प्रतिनिधित्व अनिवार्य होना चाहिए। इसे लागू करने के लिए सरकार को विशेष निर्देश जारी करने होंगे और तैनाती की निगरानी करनी होगी। स्थानीय समुदाय के सहयोग से महिला शिक्षकों की सेवा को सरल और सुरक्षित बनाया जा सकता है। ग्राम स्तर पर महिला शिक्षकों के लिए सहायता समूह और स्थानीय सुरक्षा नेटवर्क बनाए जा सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्र में सेवा देने वाली महिला शिक्षिकाओं के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम और पेशेवर विकास के अवसर सुनिश्चित करने होंगे। यह उन्हें आत्मनिर्भर बनाएगा और ग्रामीण शिक्षा में उनका योगदान बढ़ाएगा।

ग्रामीण समाज में महिलाओं के काम करने के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण बदलना आवश्यक है। महिलाओं की शिक्षा और पेशेवर भूमिका को सम्मान और समर्थन मिलना चाहिए। यदि इन कदमों को अपनाया जाए तो न केवल ग्रामीण स्कूलों में महिला शिक्षकों की कमी दूर होगी, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता और बच्चों के विकास पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। यह नीति ग्रामीण शिक्षा में समानता और गुणवत्ता का संदेश भी भेजेगी।

भर्ती में आरक्षण का होना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक समानता तभी संभव है जब पोस्टिंग में भी लिंग संतुलन और सुविधा आधारित नीति लागू हो। ग्रामीण क्षेत्रों में केवल पुरुष शिक्षकों की उपस्थिति यह स्पष्ट करती है कि आरक्षण का लाभ महिलाओं तक सही मायने में नहीं पहुँच रहा है। अगर हम चाहते हैं कि भारत की शिक्षा प्रणाली सभी बच्चों के लिए समान अवसर और उच्च गुणवत्ता प्रदान करे, तो यह समय है कि सरकार इस असमानता को दूर करने के लिए स्पष्ट और ठोस नीति सुधार करे।#education#girl

(लेखिका, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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