कवि और फिल्म गीतकार पंडित प्रदीप: एक कालजयी व्यक्तित्व

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आज जिनकी पुण्यतिथि है

कवि प्रदीप अपने परिवार के साथ

​पंडित प्रदीप, जिनका मूल नाम रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी था, भारतीय सिनेमा के एक ऐसे कालजयी कवि और गीतकार थे, जिन्होंने अपने गीतों के माध्यम से देशभक्ति और मानवीय मूल्यों को जन-जन तक पहुँचाया। उनके गीत न केवल मनोरंजन का साधन बने, बल्कि उन्होंने राष्ट्रीय चेतना जगाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ जैसा उनका गीत आज भी हर भारतीय की आँखों में आँसू ले आता है। पाँच दशकों से अधिक के अपने करियर में, उन्होंने लगभग 71 फिल्मों के लिए 1700 से अधिक गीतों की रचना की।

​📝 जीवन परिचय (Birth and Early Life)

​कवि प्रदीप का जन्म 6 फ़रवरी, 1915 को मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले के बड़नगर नामक कस्बे में हुआ था। वह उदीच्य ब्राह्मण परिवार से थे और उनके पिता का नाम नारायण भट्ट था। बचपन से ही उन्हें साहित्यिक और राष्ट्रीय संस्कारों का वातावरण मिला, जिससे उनकी काव्य-प्रतिभा को बल मिला।
​शिक्षा और साहित्यिक यात्रा

​प्राथमिक शिक्षा उन्होंने मध्य प्रदेश में ही प्राप्त की।

​स्नातक की डिग्री उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से प्राप्त की।

​लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद, उन्होंने अध्यापक प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में भी प्रवेश लिया।

​विद्यार्थी जीवन से ही वे काव्य-रचना और वाचन में गहरी रुचि रखते थे। वे कवि सम्मेलनों में अपनी कविताएँ सुनाते थे और श्रोताओं की खूब प्रशंसा पाते थे।

​इलाहाबाद में (1933-1935) का काल उनके लिए साहित्यिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा।

​लखनऊ में उनकी भेंट उस समय के प्रखर कवि गिरिजा शंकर दीक्षित से हुई, जो उनके शिक्षक भी थे, और यहीं से उनके गीत-लेखन की यात्रा शुरू हुई।

​सिनेमा जगत में प्रवेश
​शिक्षक बनने की तैयारी के दौरान, उन्होंने एक गीत लिखा था – “चल चल रे नौजवान”। उनके शिक्षक दीक्षित जी ने यह गीत मुंबई भेज दिया, और संयोग से यह गीत 1940 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘बंधन’ में शामिल हो गया। फिल्म और यह गीत दोनों ही बहुत लोकप्रिय हुए, और इस एक गीत ने पंडित प्रदीप को रातों-रात देश भर में पहचान दिला दी। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और हिंदी सिनेमा को कई अमर गीत दिए।

​🇮🇳 देशभक्ति के गीत और राष्ट्रीय चेतना

​पंडित प्रदीप को मुख्य रूप से उनके देशभक्ति गीतों के लिए जाना जाता है, जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और उसके बाद राष्ट्र-निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
​स्वतंत्रता संग्राम के दौरान

​’दूर हटो ऐ दुनिया वालों, हिंदुस्तान हमारा है’ (फिल्म: किस्मत, 1943) उनका एक ऐसा ओजस्वी गीत था, जो ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान एक राष्ट्रीय नारा बन गया। इस गीत के अर्थ से तत्कालीन ब्रिटिश सरकार इतनी क्रोधित हुई कि उन्होंने प्रदीप जी की गिरफ्तारी के आदेश दे दिए, जिसके कारण उन्हें कुछ समय के लिए भूमिगत होना पड़ा।

​फिल्म ‘बंधन’ (1940) का गीत “चल चल रे नौजवान” भी युवा पीढ़ी में जोश भरने वाला एक प्रमुख गीत था।

​युद्ध और राष्ट्रीय समर्पण

​उनका सबसे प्रसिद्ध और भावुक गीत “ऐ मेरे वतन के लोगों, ज़रा आँख में भर लो पानी” है। उन्होंने यह गीत 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान शहीद हुए सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए लिखा था।

​इस गीत को लता मंगेशकर ने 26 जनवरी 1963 को दिल्ली के रामलीला मैदान में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की उपस्थिति में गाया था। कहा जाता है कि गीत सुनकर नेहरू जी की आँखें भर आई थीं।

​पंडित प्रदीप ने इस गीत का सम्पूर्ण राजस्व युद्ध विधवा कोष में जमा करने की अपील की थी।

​🎶 लोकप्रिय और अमर गीतों के मुखड़े

​पंडित प्रदीप ने केवल देशभक्ति गीत ही नहीं लिखे, बल्कि उन्होंने सामाजिक, भक्ति और भावनात्मक विषयों पर भी कई यादगार रचनाएँ दीं।
​देशभक्ति और राष्ट्रीय गौरव के गीत:

​”चल चल रे नौजवान” (फिल्म: बंधन, 1940)

​”दूर हटो ऐ दुनिया वालों, हिंदुस्तान हमारा है” (फिल्म: किस्मत, 1943)

​”आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ झाँकी हिंदुस्तान की” (फिल्म: जागृति, 1954)

​”दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल” (फिल्म: जागृति, 1954)

​”ऐ मेरे वतन के लोगों, ज़रा आँख में भर लो पानी” (गैर-फिल्मी गीत)

​सामाजिक और दार्शनिक गीत:

​”कितना बदल गया इंसान, कितना बदल गया इंसान” (फिल्म: नास्तिक, 1954)

​”देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान, कितना बदल गया इंसान” (फिल्म: नास्तिक, 1954)

​”पिंजरे के पंछी रे, तेरा दर्द न जाने कोई” (फिल्म: नागमणि, 1957)

​”आज मौसम सलोना सलोना रे” (फिल्म: झूला)

​भक्ति और भावनात्मक गीत:

​”यहाँ वहाँ जहाँ तहाँ मत पूछो कहाँ कहाँ है संतोषी माँ” (फिल्म: जय संतोषी माँ, 1975) – यह गीत उन्होंने फिल्म के लिए स्वयं गाया भी था।

​”भर दे रे झोली, भगत भर दे रे झोली” (फिल्म: नास्तिक, 1954)

​”सूनी पड़ी रे सितार” (फिल्म: कंगन)

​🏆 सम्मान और विरासत

​पंडित प्रदीप को उनके अतुलनीय योगदान के लिए भारत सरकार द्वारा सन 1997-98 में सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
​कवि प्रदीप ने जीवन मूल्यों को धन-दौलत से हमेशा ऊपर रखा। उनकी सादगी और जन्मजात कवित्व शक्ति ने उन्हें ‘राष्ट्र कवि’ का दर्जा दिलाया। उन्होंने सिनेमा को एक माध्यम बनाकर आम लोगों के लिए लिखा। उन्होंने कहा था कि वे पहले रोमांटिक कविताएँ लिखते थे, लेकिन समय के साथ उनकी रचनाओं में देश के प्रति संजीदगी बढ़ती गई।
​पंडित प्रदीप का निधन 11 दिसंबर, 1998 को हुआ, लेकिन उनके गीत आज भी भारत की आत्मा में गूंजते हैं और आने वाली पीढ़ियों को देशभक्ति और मानवीय मूल्यों की प्रेरणा देते रहेंगे।
​आप कवि प्रदीप के देशभक्ति गीत ‘दूर हटो ऐ दुनियावालों, हिंदुस्तान हमारा है’ पर एक वीडियो यहां देख सकते हैं: दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिंदुस्तान हमारा है। (जैमिनी)

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