विकास की पटरी पर कुचला वन्यजीवन

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– डॉ सत्यवान सौरभ

दिसंबर 2025 में असम के होजाई ज़िले में सात हाथियों—जिनमें शावक भी शामिल थे—की रेल दुर्घटना में हुई मृत्यु कोई साधारण हादसा नहीं थी। यह घटना भारत के विकास मॉडल और पर्यावरणीय संवेदनशीलता के बीच बढ़ते टकराव का प्रतीक बनकर सामने आई। तेज़ रफ्तार ट्रेन की चपेट में आकर न केवल हाथियों की जान गई, बल्कि इंजन और कई डिब्बों के पटरी से उतरने से यह भी स्पष्ट हुआ कि ऐसी घटनाएँ केवल वन्यजीवों के लिए ही नहीं, बल्कि मानव जीवन और सार्वजनिक संपत्ति के लिए भी गंभीर खतरा हैं।

हाथी भारत का “राष्ट्रीय धरोहर पशु” है और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची–I में संरक्षित है। इसके बावजूद, हर वर्ष रेलवे ट्रैक पर हाथियों की मौतें यह सवाल उठाती हैं कि क्या हमारा विकास सचमुच सतत है, या वह प्रकृति की कीमत पर आगे बढ़ रहा है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, पिछले दो दशकों में सैकड़ों हाथी ट्रेन दुर्घटनाओं में मारे जा चुके हैं, जिनमें असम, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और झारखंड सबसे अधिक प्रभावित राज्य हैं।

भारत में रेलवे लाइनों, राष्ट्रीय राजमार्गों, बिजली ट्रांसमिशन लाइनों और अन्य रेखीय अवसंरचनाओं का तेज़ी से विस्तार हुआ है। यह विस्तार आर्थिक प्रगति के लिए आवश्यक माना गया, किंतु समस्या तब उत्पन्न होती है जब ये परियोजनाएँ वनों, घास के मैदानों और आर्द्रभूमियों को बिना पर्याप्त पारिस्थितिक योजना के काटती हुई आगे बढ़ती हैं। रेलवे ट्रैक विशेष रूप से घातक सिद्ध होते हैं क्योंकि ट्रेनें न तो दिशा बदल सकती हैं और न ही अचानक रुक सकती हैं। दूसरी ओर, हाथियों की दृष्टि क्षमता सीमित होती है और उनका भारी शरीर तेज़ प्रतिक्रिया में बाधक बनता है।

हाथी बड़े भूभाग में विचरण करने वाले जीव हैं और भोजन, पानी तथा प्रजनन के लिए पारंपरिक प्रवासी मार्गों पर निर्भर रहते हैं। जब रेलवे लाइनें इन गलियारों को काट देती हैं, तो हाथियों के सामने ट्रैक पार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। दुर्भाग्य से, अनेक दुर्घटना-प्रवण क्षेत्र आज भी आधिकारिक रूप से “हाथी गलियारे” घोषित नहीं किए गए हैं। असम का होजाई क्षेत्र इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है, जहाँ वर्षों से हाथियों की नियमित आवाजाही के बावजूद कानूनी संरक्षण का अभाव रहा है।

दुर्घटनाओं का एक प्रमुख कारण ट्रेनों की अत्यधिक गति भी है। पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में भी ट्रेनों की रफ्तार 90 से 110 किलोमीटर प्रति घंटा तक रहती है। इतनी गति पर हाथियों को देखकर ट्रेन रोक पाना लगभग असंभव हो जाता है। अस्थायी गति प्रतिबंध और चेतावनियाँ प्रायः कागज़ी साबित होती हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि रेलवे संचालन में अभी भी पर्यावरणीय सुरक्षा की तुलना में समय और दक्षता को अधिक प्राथमिकता दी जाती है।

दृश्यता की समस्या भी इन दुर्घटनाओं को बढ़ाती है। अधिकांश हाथी-रेल टकराव रात या तड़के होते हैं, जब कोहरा, वर्षा या घनी वनस्पति के कारण ट्रेन चालकों की दृष्टि सीमित हो जाती है। असम और पूर्वोत्तर भारत में यह स्थिति और भी गंभीर है, जहाँ मौसम की अनिश्चितता सामान्य बात है। इसके अतिरिक्त, रेलवे ट्रैक स्वयं हाथियों को आकर्षित करते हैं। यात्रियों द्वारा फेंका गया खाद्य अपशिष्ट, नमकयुक्त मिट्टी और पटरियों के आसपास पकती फसलें हाथियों को जोखिम वाले क्षेत्रों की ओर खींचती हैं, विशेषकर फसल कटाई के मौसम में।

रेलवे ट्रैक का डिज़ाइन भी कई बार समस्या को बढ़ाता है। ऊँचे तटबंध, कंक्रीट की दीवारें और बाड़ें हाथियों को ट्रैक पर फँसा देती हैं। शावक जल्दी बाहर नहीं निकल पाते, जिससे पूरा झुंड धीमा हो जाता है और दुर्घटना की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। इसके साथ ही, वन विभाग और रेलवे के बीच समुचित समन्वय की कमी भी एक बड़ी चुनौती है। गश्ती दल द्वारा हाथियों की उपस्थिति की सूचना अक्सर समय पर रेलवे नियंत्रण कक्ष तक नहीं पहुँच पाती, जिससे दुर्घटनाएँ रोकी नहीं जा पातीं।

हर बड़ी दुर्घटना के बाद जाँच, मुआवज़ा और अस्थायी प्रतिबंध जैसे कदम उठाए जाते हैं, किंतु ये सभी प्रतिक्रियात्मक उपाय हैं। पर्यावरण प्रभाव आकलन अक्सर औपचारिकता बनकर रह जाता है और परियोजना स्वीकृति के बाद पशु व्यवहार में आए परिवर्तनों को गंभीरता से नहीं लिया जाता। आवश्यकता इस बात की है कि संरक्षण को विकास की राह में बाधा नहीं, बल्कि उसका अनिवार्य हिस्सा माना जाए।

हाथियों की सुरक्षा के लिए सभी ज्ञात प्रवासी गलियारों को कानूनी संरक्षण देना आवश्यक है, चाहे वे पहले से अधिसूचित हों या नहीं। ऐसे सभी क्षेत्रों में स्थायी गति सीमा लागू की जानी चाहिए। तकनीकी समाधान के रूप में AI आधारित इंट्रूज़न डिटेक्शन सिस्टम, जो हाथियों की गतिविधि पहचानकर समय से ट्रेन चालकों को चेतावनी देते हैं, अत्यंत प्रभावी सिद्ध हो सकते हैं। इन प्रणालियों का सीमित प्रयोग पर्याप्त नहीं है; इन्हें राष्ट्रव्यापी स्तर पर अपनाने की आवश्यकता है।

इसके साथ ही, वैज्ञानिक रूप से डिज़ाइन किए गए अंडरपास, ओवरपास और मिट्टी के रैंप हाथियों के सुरक्षित पारगमन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार, ऐसे ढाँचों से हाथियों की मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी संभव है। पटरियों के किनारे फलदार पेड़ों की कटाई, नियमित सफाई और ट्रेनों में शून्य–कचरा नीति अपनाना भी उतना ही आवश्यक है। “प्लान बी” जैसी योजनाएँ, जिनमें मधुमक्खियों की आवाज़ से हाथियों को दूर रखा जाता है, व्यवहारिक और मानवीय समाधान प्रस्तुत करती हैं।

अंतरराष्ट्रीय अनुभव बताते हैं कि जब संरक्षण को गंभीरता से लिया जाता है, तो विकास और वन्यजीवन के बीच संतुलन संभव है। कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और नीदरलैंड जैसे देशों ने वन्यजीव पारगमन संरचनाओं और कठोर गति नियंत्रण से दुर्घटनाओं में भारी कमी लाई है। भारत भी इन मॉडलों को अपनी परिस्थितियों के अनुरूप अपना सकता है।

हाथियों की मौत केवल नैतिक विफलता नहीं है, बल्कि आर्थिक नुकसान भी है। ट्रेन दुर्घटनाएँ, मानवीय क्षति, संपत्ति का नुकसान और सेवा बाधाएँ—इन सबकी लागत निवारक उपायों से कहीं अधिक होती है। अंततः, रेलवे ट्रैक पर हाथियों की मौत तकनीकी नहीं, बल्कि नीतिगत असफलता का परिणाम है।

भारत को यह तय करना होगा कि उसका विकास प्रकृति को रौंदते हुए आगे बढ़ेगा या उसके साथ सह-अस्तित्व स्थापित करेगा। पर्यावरण–प्रथम इंजीनियरिंग, कानूनी संरक्षण और तकनीकी नवाचार के माध्यम से ही यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि प्रगति की रेलगाड़ी, वन्यजीवन को कुचलती न चले।

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