डिजिटल राजस्थान में बढ़ता अकेलापन

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भूपेश दीक्षित

जनस्वास्थ्य विशेषज्ञ

राजस्थान आज डिजिटल क्रांति के दौर में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में 5 करोड़ से अधिक लोग इंटरनेट का उपयोग कर रहे हैं। ‘पॉपुलेशन प्रोजेक्शन फॉर इंडिया एंड स्टेट्स’ रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2026 तक राजस्थान में 10 से 29 वर्ष आयु वर्ग की आबादी लगभग 3 करोड़ होगी। यह वह पीढ़ी है जिसके हाथों में प्रदेश का आर्थिक, सामाजिक और तकनीकी भविष्य होगा।

लेकिन डिजिटल प्रगति के इस उजले पहलू के साथ एक गंभीर चुनौती भी तेजी से उभर रही है। आज के युवा अपना अधिकांश समय स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेमिंग और स्क्रॉलिंग में बिता रहे हैं। इसका सीधा असर उनकी नींद, एकाग्रता, पढ़ाई, कार्यक्षमता और शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। डिजिटल कंटेंट कंपनियाँ ऐसे अल्गोरिथम बना रही हैं जो बच्चों और युवाओं को घंटों स्क्रीन से बांधे रखते हैं। समस्या तकनीक के उपयोग की नहीं बल्कि उसके अनियंत्रित और व्यसनी स्वरूप की है। ऑनलाइन शॉपिंग, रील्स, लाइक्स, कमेंट्स और स्टेटस अपडेट जैसी गतिविधियों ने युवाओं को आभासी दुनिया में तो जोड़ दिया है लेकिन वास्तविक समाज से दूर कर दिया है। परिणामस्वरूप अकेलापन, तनाव, अवसाद, भावनात्मक अस्थिरता और आत्महत्या के विचार तेजी से बढ़ रहे है। मानसिक स्वास्थ्य संकट अब केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं रह गया बल्कि एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुका है। राजस्थान राज्य अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2024 में प्रदेश में 5530 लोगों की मृत्यु आत्महत्या के कारण हुई यानी औसतन हर दिन लगभग 15 परिवार इस दर्द से गुजर रहे है। ये आंकड़े केवल संख्याएँ नहीं बल्कि टूटते सामाजिक ताने-बाने की चेतावनी हैं।

इसी पृष्ठभूमि में आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 एक बेहद महत्वपूर्ण संदेश देता है। सर्वेक्षण बताता है कि जिन राज्यों और उनके जिलों में जहाँ सामाजिक जुड़ाव मजबूत है जैसे बिहार और उत्तरप्रदेश, वहाँ आत्महत्या की दर कम है। वहीं जिन राज्यों में लोग परिवार और समुदाय से भावनात्मक रूप से दूर होते जा रहे हैं जैसे केरल और तमिलनाडु, वहाँ आत्महत्या दर अधिक है। इसका स्पष्ट अर्थ है कि डिजिटल कनेक्टिविटी मानवीय रिश्तों का विकल्प नहीं बन सकती।

राजस्थान के कोटा, सीकर और जयपुर जैसे शैक्षणिक केंद्रों में लाखों विद्यार्थी घर से दूर रहकर पढ़ते हैं। उनके पास ऑनलाइन संपर्क तो है लेकिन भावनात्मक सहारे का अभाव है जो अक्सर गहरे मानसिक तनाव को जन्म देता है और जिसके दुष्परिणाम हमें आत्महत्या के रूप में हमें देखने को मिल रहे है। स्क्रीन पर मिलने वाली क्षणिक सराहना वास्तविक अपनत्व का स्थान नहीं ले सकती। इस चुनौती से निपटने के लिए केवल काउंसलिंग अथवा हेल्पलाइन पर्याप्त नहीं हैं। जरूरत है व्यापक सामाजिक और शैक्षणिक हस्तक्षेप की जैसे स्कूलों में मेंटल एंड डिजिटल वेलनेस कार्यक्रम, मेंटरशिप प्रणाली, बड्डी सिस्टम, सहपाठी सहयोग समूह, खेल-कला गतिविधियाँ और परिवारों में खुला संवाद।

समस्या के समाधान हेतु आगामी राज्य बजट में तीन ठोस प्रमाण आधारित कदम उठाए जा सकते हैं। पहला, जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम का विस्तार, स्कूल-कॉलेज आधारित काउंसलिंग सेवाओं और सामुदायिक आउटरीच कार्यक्रमों के लिए वित्तीय प्रावधान। दूसरा, “मेंटल हेल्थ एंड डिजिटल वेलनेस मिशन” के तहत शिक्षक प्रशिक्षण और अभिभावक जागरूकता अभियान और तीसरा, युवा साथी केंद्रों और नेहरू युवा केंद्रों को मजबूत कर सामुदायिक संवाद और परामर्श की सुविधाओं में विस्तार।

राजस्थान के पास टेली-मानस, जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम, स्कूल हेल्थ प्रोग्राम और युवा साथ केंद्र जैसी व्यवस्थाएँ पहले से मौजूद हैं। आवश्यकता बस इतनी है कि नीति और बजट दोनों के केंद्र में सामाजिक जुड़ाव को प्राथमिकता दी जाए। क्योंकि जीवन बचाने का सबसे बड़ा सहारा दवाइयाँ, मोबाइल, इन्टरनेट या डिजिटल कनेक्टिविटी नहीं बल्कि मजबूत रिश्ते, सच्ची बातचीत और संवेदनशील समाज हैं। सरकार द्वारा जनहीत में उठाये जाने वाले इन्ही ठोस क़दमों से आयुष्मान स्वस्थ राजस्थान और विकसित राजस्थान 2047 का सपना साकार होगा।

भूपेश दीक्षित

जनस्वास्थ्य विशेषज्ञ एवं संयोजक – द राजस्थान मेंटल हेल्थ एंड सुसाइड प्रिवेंशन नेटवर्क

जयपुर (राजस्थान)

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