गांधी युग की पत्रकारिता सांस्कृतिक ,भविष्य की पत्रकारिता :रामबहादुर राय

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नई दिल्ली, 13 फरवरी (हि.स.)। आईजीएनसीए के अध्यक्ष रामबहादुर राय ने शुक्रवार को कहा कि गांधी युग की पत्रकारिता केवल राजनीतिक पत्रकारिता नहीं है बल्कि सांस्कृतिक, सामाजिक और भविष्य की पत्रकारिता भी है ।

रामबहादुर राय ने यह बात आज नई दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) में ‘समग्र भारतीय पत्रकारिता’ पुस्तक लोकार्पण एवं चर्चा कार्यक्रम के दौरान कही। इस पुस्तक के लेखक वरिष्ठ पत्रकार विजयदत्त श्रीधर हैं। यह पुस्तक तीन मुख्य भागों में विभाजित है, जो भारतीय पत्रकारिता के क्रमिक विकास को दर्शाती है। इसमें पहली सदी: 1780-1880, तिलक युग: 1881-1920 और गांधी युग: 1921-1948 शामिल हैं।

राय ने इस पुस्तक के दूसरे खंड का उल्लेख करते हुए कहा, “अगर हम गांधी युग की पत्रकारिता को समझ लें तो आज की पत्रकारिता की गिरावट अकेली गिरावट नहीं है बल्कि पूरी व्यवस्थागत गिरावट है जिसमें राजनीति भी शामिल है, समाज भी शामिल है, संस्कृति भी शामिल है और कारोबार भी शामिल है ।”

उन्होंने कहा, “हमें यह स्वीकार करना होगा कि पत्रकारिता में गिरावट कोई स्वतंत्र घटना नहीं है, बल्कि यह हमारे सामाजिक और राजनीतिक ताने-बाने में आई गिरावट का प्रतिबिंब है।”

उन्होंने कहा कि श्री अरबिंदो द्वारा 1909-10 में ‘वन्दे मातरम्’ के माध्यम से दी गई परिभाषा आज भी प्रासंगिक है, जो पत्रकारिता को जनहित और समस्या समाधान के एक सशक्त औजार के रूप में परिभाषित करती है।

प्रभात खबर के प्रधान संपादक अंकित शुक्ल ने राज्यसभा के उप सभापति हरिवंश की अनुपस्थिति में उनका वक्तव्य पढ़ते कहा कि ​यह ग्रंथ केवल मीडिया जगत तक सीमित नहीं है, बल्कि इतिहास, राजनीति और संस्कृति के जिज्ञासुओं के लिए भी एक अनमोल धरोहर है। यह पुस्तक भ्रम दूर करने और पत्रकारिता के छात्रों व विश्लेषकों को सही दिशा दिखाने में सक्षम है। यह हमारी समझ को विस्तार देने वाला एक अनिवार्य दस्तावेज है, जो हमें यह संदेश देता है कि तकनीक के साथ-साथ विचारों की मर्यादा को भी बचाना होगा।

अंकित शुक्ल ने कहा कि यह पुस्तक न केवल भ्रमित व्यक्तियों को सही मार्ग दिखाएगी, बल्कि वर्तमान में अपने पथ से विचलित होती पत्रकारिता को भी उसके आदर्शों और मूल स्वरूप की ओर वापस ले जाएगी।

विशिष्ट अतिथि के रूप में वरिष्ठ पत्रकार एवं माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति अच्युतानंद मिश्र ने कहा कि आज संपादकों के सामने जो चुनौतियां हैं, उनके मूल कारणों की पड़ताल जरूरी है। आज के दौर में जिस ‘मिशनरी’ संपादक की हम बात करते हैं, वह एक आदर्श मात्र रह गया है। आज के व्यावसायिक ढांचे में वैसा संपादक मिलना बहुत मुश्किल है।

उन्होंने कहा कि मेरा आप सभी से आग्रह है कि सबसे पहले हमें ‘मिशनरी विजन’ रखने वाले संपादकों की खोज करनी चाहिए। एक बार जब ऐसे समर्पित संपादक मिल जाएं, तभी हम आगे की रणनीति पर विचार कर सकते हैं।

लेखक श्रीधर ने कहा कि पत्रकारिता का उद्भव मात्र स्वतंत्रता संग्राम तक सीमित नहीं रहा बल्कि इसका वास्तविक ध्येय सामाजिक चेतना जागृत करना और राजनीतिक व्यवस्था में सुधार लाना रहा। उन्होंने कहा कि हमें ऐसी पत्रकारिता की जरूरत है जहां अलग-अलग विचारों का आदर हो। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए विचारों में मतभेद होना ठीक है, लेकिन मनभेद नहीं होना चाहिए।

अनंत विजय ने कहा कि इस पुस्तक का अध्ययन न केवल पत्रकार छात्रों को अपनी ज्ञान-संपदा से परिचित कराएगा, बल्कि उस ‘छपे हुए शब्दों’ के महत्व को भी समझाएगा जिसने जनमानस के बीच संवाद का एक अनौपचारिक और सशक्त आधार तैयार किया है।

व्योमेश शुक्ला ने कहा कि हम एक ऐसे दौर से गुजर रहे हैं जहां ‘संपादक’ नामक संस्था का प्रभाव धुंधला पड़ता जा रहा है। यह पुस्तक संपादक की गरिमा और उसकी प्रासंगिकता को पुनर्स्थापित करने की एक सार्थक कोशिश भी है।

इस मौके पर वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार अनंत विजय, विभागाध्यक्ष (कलानिधि) के प्रो. (डॉ.) रमेश चन्द्र गौड़, नागरिक प्रचारिणी के अध्यक्ष, लेखक एवम रंगकर्मी व्योमेश शुक्ला, वर्धा के महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के प्रो. कृपाशंकर चौबे सहित अन्य गणमान्य जन उपस्थित रहे।

इस कार्यक्रम की अध्यक्षता रामबहादुर राय ने की और प्रास्ताविक एवं संचालन प्रो कृपाशंकर चौबे ने किया।

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