कलयुग के ये सबल हथियार – झूठ अफ़वाह और दुष्प्रचार                                     

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-तनवीर जाफ़री

  वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो व उनकी पत्नी का राजधानी कोराकस से गत तीन जनवरी को अपहरण कर ड्रग्स तस्करी को बढ़ावा देने के नाम पर जिसतरह उन्हें न्यूयॉर्क ले जाया गया और उसके फ़ौरन बाद जिसतरह ईरान पर अमेरिकी हमले की भूमिका तैयार करने के लिये ईरान में पिछले दिनों चले कथित सत्ता विरोधी प्रदर्शनों को प्रचारित व प्रसारित किया गया इन घटनाओं इनसे जुड़ी ज़मीनी सच्चाई ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या अब यह दुनिया पूरी तरह से झूठ,अफ़वाह व दुष्प्रचार की गिरफ़्त में आ चुकी है ? क्या आज की दुनिया में झूठ, दुष्प्रचार और अफ़वाहें बहुत बड़ी ताक़त बन चुकी हैं। इतनी बड़ी ताक़त कि इनके बल पर कहीं चुनाव परिणाम भी उलट सकते हैं ? अपने देश के विपक्ष या किसी देश की सत्ता को बदनाम किया जा सकता है ? कहीं गृह युद्ध की आग भड़काई जा सकती है ? इसी के बल पर किसी देश को परमाणु हथियार रखने वाला तो किसी को केमिकल हथियार रखने वाला देश बताकर उस देश को ही तहस नहस किया जा सकता है ? किसी स्वाभिमानी देश या शासक को नीचा दिखाने के लिये उसे तानाशाह या जनविरोधी कुछ भी बताकर वहां ख़ूनी इबारत लिखी जा सकती है ?

                 निश्चित रूप से झूठ,अफ़वाह और दुष्प्रचार सत्ता व राजनीति का हमेशा से ही प्रबल हथियार रहा है। ख़ुद जर्मन तानाशाह हिटलर इसे एक प्रभावी हथियार मानता था । हिटलर का मानना था कि  “हमेशा एक ही बात को दोहराओ, चाहे वो कितनी भी सरल क्यों न हो।” वह कहता था कि “प्रोपेगैंडा में सच्चाई को थोड़ा-सा मिलाकर झूठ को और प्रभावी बनाया जा सकता है।” और उसी का मत यह भी था कि “झूठ इतना बड़ा होना चाहिए कि कोई सोचे भी नहीं कि कोई इतना बड़ा झूठ बोल सकता है।” ख़ुद हिटलर ने इसी नीति का इस्तेमाल यहूदियों के विरुद्ध कर दुनिया का सबसे बड़ा नरसंहार अंजाम दे डाला। इसी तरह 2002-2003 का वह दौर याद कीजिये जब अमेरिका ने तत्कालीन इराक़ी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन पर रासायनिक हथियार और अन्य सामूहिक विनाश के हथियार रखने का गंभीर आरोप लगाया था। इस आरोप को अमेरिका ने इतना प्रचारित किया था कि इसी आधार पर मार्च 2003 में अमेरिका ने इराक पर हमला तक कर दिया। सद्दाम को अपदस्थ कर उसे सामूहिक हत्या के दूसरे मामले में फांसी के फंदे पर चढ़ा दिया।  बाद में रिपोर्ट आई कि  इराक़ के पास कोई सक्रिय या बड़े पैमाने पर रासायनिक हथियारों का भंडार नहीं मिला। कोई रासायनिक हथियार उत्पादन, कोई VX गैस का बड़ा भंडार, कोई मोबाइल बायोलॉजिकल लैब आदि कुछ भी नहीं मिला। यहां तक कि अमेरिका ने बाद में ख़ुद यह स्वीकार भी किया कि उसकी ख़ुफ़िया जानकारी ग़लत थी। इराक़ पर हमले का आदेश देने वाले तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने भी उस समय यही कहा था कि ‘वे भी निराश हैं’। कई अमेरिकी अधिकारी और पूर्व ख़ुफ़ियाप्रमुखों ने इसे “  ख़ुफ़ियाविफलता”  यानी intelligence failure भी कहा। परन्तु तब तक तो झूठ अफ़वाह और दुष्प्रचार का निशाना सद्दाम हुसैन बन चुके थे। उसके बाद इसी बहाने इराक़ से तेल दोहन से लेकर इराक़ को अस्थिर व तबाह करने तथा वहां अमेरिकी सैन्य बेस बनाने तक के कई खेल खेले गए।

                    अमेरिका द्वारा वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलास मदुरो पर भी मुख्य रूप से नारको-टेररिज़्म,कोकीन आयात की साज़िश , मशीन गन और विनाशकारी उपकरणों का क़ब्ज़ा और उपयोग तथा मनी लॉन्ड्रिंग और हथियारों की साज़िश जैसे आरोप लगाए हैं। परन्तु उन्होंने मादुरो की गिरफ़्तारी के फ़ौरन बाद ट्रंप ने कहा – कि अमेरिका वेनेज़ुएला को संचालित करेगा , ख़ासकर इसके तेल भंडार और तेल उद्योग को। जब तक  कि वहां सुरक्षित और उचित व्यवस्था नहीं हो जाती । ट्रंप ने यह भी कहा कि बड़ी अमेरिकी तेल कंपनियां अरबों डॉलर निवेश करेंगी, देश के ख़राब हो चुके तेल इंफ्रास्ट्रक्चर को ठीक करेंगी, और उत्पादन बढ़ाएंगी। उन्होंने यह भी कहा कि वेनेज़ुएला के पास दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार (लगभग 303 अरब बैरल) हैं, और अमेरिका अब इनका नियंत्रण लेगा, तेल बेचेगा, और इससे होने वाली कमाई अमेरिका व वेनेज़ुएला के लोगों के फ़ायदे में इस्तेमाल होगी। गोया क्या सद्दाम की ही तरह निकोलास मदुरो पर लगाया गया आरोप भी झूठ अफ़वाह और दुष्प्रचार पर आधारित था। असल मक़सद वेनेज़ुएला के तेल भंडार पर नियंत्रण ही था ?

                   इसी तरह पिछले दिनों ईरान में हुये विरोध प्रदर्शनों को भी पश्चिम मीडिया ख़ासकर इस्राईल व अमेरिका द्वारा बढ़ा चढ़ाकर प्रचारित किया जाने लगा। ईरान में 2022 में हुये महसा अमीनी आंदोलन से लेकर हाल के आर्थिक विरोध प्रदर्शनों तक को लेकर पश्चिमी मीडिया में बढ़ा-चढ़ाकर प्रचारित करने के काफ़ी सबूत और आरोप मिलते हैं, और इसमें अमेरिका व इज़राइल की भूमिका प्रमुखता से दिखाई देती है। उदाहरण के तौर पर पिछले दिनों के ईरान के प्रदर्शन महंगाई और मुद्रा संकट को लेकर यानी आर्थिक कारणों से शुरू हुये थे उन्हीं प्रदर्शनों में सत्ता बदलने की मांग होने लगी। आरोप है कि अमेरिका-इज़राइल फ़ंडिंग पर चलने वाले कई पश्चिमी मीडिया ने इन प्रदर्शनों में हुई मौतों की संख्या को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बताया। यहाँ तक कि 2,000 से लेकर 20,000 प्रदर्शनकारियों तक की मौत होने के झूठे आंकड़े दे दिए गये । अल जज़ीरा की एक रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि इज़राइल से जुड़े नेटवर्क ने हैशटैग और नैरेटिव को कृत्रिम बढ़ावा दिया, ताकि ऐसा लगे कि विरोध बहुत बड़ा है और जनता में “व्यापक सहमति” है। यह “astroturfing” कहा जाता है। इज़राइली चैनल 12 के विश्लेषक एहुद यारी ने ख़ुद माना कि इज़राइली मीडिया ने ईरान के वर्तमान शासन के पतन की अफ़वाहें बहुत बढ़ा-चढ़ाकर फैलाईं, और बाद में मुआफ़ी मांगी कि प्रदर्शन कम हो गए हैं और सरकार के नियंत्रण में हैं । रूस और चीन की मीडिया ने भी इसे ईरान विरोधी प्रोपेगंडा व “पश्चिमी दुष्प्रचार” बताया। जबकि ठीक इसके विपरीत पूरे ईरान में लाखों लोग वर्तमान ईरानी सत्ता ख़ासकर सुप्रीम लीडर आयतुल्ला अली ख़ामनेई के समर्थन में व अमेरिका इस्राईल के विरोध में सड़कों पर उतरे। उसे इसी पश्चिमी मीडिया द्वारा नज़रअंदाज़ किया गया। लिहाज़ा कहना ग़लत नहीं होगा कि झूठ अफ़वाह और दुष्प्रचार आज पहले से कहीं ज़्यादा शक्तिशाली और ख़तरनाक हथियार बन चुका है। और दुर्भाग्य से सच और झूठ की इस लड़ाई में निःसंदेह झूठ,अफ़वाह और दुष्प्रचार काफ़ी तेज़ और बहुत आगे चल रहा है। 

  तनवीर जाफ़री, वरिष्ठ पत्रकार

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