ऋतुराज बसंत का शुभागमन:प्रकृति के नवश्रृंगार से संस्कृति−साधना तक

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-उदय कुमार सिंह

ऋतुओं के राजा बसंत का शुभागमन हो गया है। प्रकृति का यह अद्भुत और अनोखा उपहार अपने साथ उल्लास, उमंग और उत्साह का संदेश लेकर आया है। बसंत के आते ही सर्दी का सितम थम गया है, शीत का प्रकोप दूर हो गया है और मौसम सुहावना बन गया है। चारों ओर आनंद और उत्सव का वातावरण दिखाई देने लगा है।

कड़ाके की सर्दी और पतझड़ के कारण जिन पेड़ों के पत्ते झड़ गए थे, उनकी नंगी शाखाओं की फुनगियों पर लाल-लाल कोपलें फूट पड़ी हैं। प्रकृति में मानो नया उत्साह छा गया है। पहाड़ों की बर्फ पिघलने लगी है, वन-उपवन की शोभा बढ़ गई है और समस्त वातावरण में चार चांद लग गए हैं। घर-बार, बाग-बगीचे, घाटियां और वादियां फूलों से आच्छादित हो गई हैं। पर्वतीय प्रदेश नाना प्रकार के रंग-बिरंगे फूलों से महक उठे हैं। लाल-गुलाबी, नीले-पीले, बैंगनी और आसमानी रंगों की छटा मन को मोह लेती है। भौंरे मंडराने लगे हैं और रंग-बिरंगे फूलों को देखकर मयूर आनंद से नृत्य करने लगता है।

गांव-कस्बों में बसंत की रौनक

बसंत ऋतु में विशेषकर गांवों और कस्बों में अलग ही उल्लास देखने को मिलता है। खेत-खलिहानों, बाग-बगीचों में गजब की रौनक है। किसानों के चेहरे खिले हुए हैं। खेतों में सरसों के पीले-पीले फूल खिल गए हैं, गेहूं और जौ की बालियां हिलोरे मार रही हैं और हरी-भरी फसलें लहलहा रही हैं। पेड़ों पर झूले डाल दिए गए हैं। सखी-सहेलियां हर्षोल्लास के साथ गीत गा रही हैं और नृत्य के माध्यम से ग्रामीण जीवन को प्रफुल्लित कर रही हैं। इन गीतों में प्रकृति के प्रति प्रेम, अपनों के प्रति स्नेह, बच्चों के प्रति ममता और प्रियतम को बुलाने का भाव झलकता है।

कड़ाके की सर्दी के बाद आए बसंत ने नर-नारी ही नहीं, बल्कि समस्त प्राणी जगत, पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं में भी नई उम्मीद, नवीन उमंग और आशा का संचार कर दिया है। शिशिर के घोर संताप से संत्रस्त प्रकृति बसंत के शुभागमन के साथ अपना नूतन श्रृंगार कर लेती है। बसंत ऋतु फाल्गुन में जन्म लेती है, चैत्र में जवान होती है और वैशाख में विश्राम को चली जाती है। आदि और अनंत काल से बसंत मनुष्य को हंसाता-खिलखिलाता आया है और उसे यह संदेश देता है कि दुख और पीड़ा के बाद सुख और चैन का समय अवश्य आता है।

बसंत पंचमी: ज्ञान और नवआरंभ का पर्व

भारतवर्ष में बसंत पंचमी का विशेष महत्व है। भारतीय सनातन संस्कृति में यह हिंदू धर्म का महान और पावन पर्व माना गया है। बसंत पंचमी अपने आप में मनोहारी प्राकृतिक परिवर्तनों को समेटे हुए है। इस दिन जहां ऋतु परिवर्तन स्पष्ट दिखाई देता है, वहीं धर्मपरायण लोग विद्या की देवी मां सरस्वती की आराधना करते हैं। बसंत पंचमी को देश-विदेश में मां महासरस्वती के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है।

छात्र-छात्राएं, शिक्षक, विद्वान, लेखक, साहित्यकार और कला जगत से जुड़े लोग इस दिन मां सरस्वती की विधि-विधान से पूजा, अर्चना और उपासना करते हैं। इस दिन मां सरस्वती के साथ-साथ भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण-राधा, भगवान शिव, सूर्यदेव, बसंत स्वरूप कामदेव और रति का भी पूजन किया जाता है। मान्यता है कि कामदेव-रति का पुष्पों और अबीर-गुलाल से पूजन करने से गृहस्थ जीवन में सुख-शांति बनी रहती है।

पीले रंग का इस दिन विशेष महत्व है। पीला रंग ओज, ऊर्जा, सात्विकता और बलिदान का प्रतीक माना जाता है। इसलिए पीले वस्त्र धारण करना, पीले वस्त्रों का दान करना और पीले रंग की मिठाइयां व पकवान ग्रहण करना शुभ माना गया है। बसंत पंचमी को अबूझ मुहूर्त माना जाता है, इसलिए इस दिन विवाह, गृहप्रवेश, विद्यारंभ और अन्य मांगलिक कार्य संपन्न किए जाते हैं। कई क्षेत्रों में पतंगबाजी का उत्सव भी बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है।

मां सरस्वती: ज्ञान, वाणी और कला की अधिष्ठात्री

शास्त्रों के अनुसार मां सरस्वती का जन्म भगवान ब्रह्मा के मुख से हुआ है। वे वाणी की अधिष्ठात्री देवी हैं और वागेश्वरी, वाग्देवी, भारती, ब्राह्मी, शारदा आदि नामों से जानी जाती हैं। हंस पर विराजमान, कुंद के समान उज्ज्वल वर्ण, चंद्रमा के समान मुखमंडल, मंद मुस्कान और मस्तक पर चंद्ररेखा से सुशोभित मां सरस्वती श्वेत कमल पर आसीन हैं। उनके हाथों में पुस्तक, वीणा, अक्षयमाला और अमृतमय घट सुशोभित हैं।

मां सरस्वती समस्त विद्याओं की अधिष्ठात्री हैं। उनकी कृपा से ही प्राणी ज्ञान अर्जित करता है। उनका कलात्मक स्पर्श कुरूप को भी सुंदर बना देता है। वे अत्यंत दयालु और उदार हृदय वाली हैं, जिनमें असीम करुणा विद्यमान है।

मां सरस्वती का विग्रह: जीवन प्रबंधन का संदेश

मां सरस्वती का विग्रह केवल पूजन का विषय नहीं, बल्कि जीवन प्रबंधन का गहन संदेश भी देता है। उनके श्वेत वस्त्र यह सिखाते हैं कि हमारा ज्ञान और चरित्र दोनों निर्मल हों। कमलासन यह संदेश देता है कि संसार में रहते हुए भी झूठ, कपट, असंयम और कुसंग से दूर रहना चाहिए।

श्रुतिहस्ता में धारण किया गया सदग्रंथ यह बताता है कि हमारे हाथों से वही कर्म हों जो सत्य और धर्म के अनुरूप हों। स्फटिक माला मनन और आत्मचिंतन की प्रेरणा देती है। वीणावादिनी मां यह संदेश देती हैं कि जीवन एकांगी न हो, बल्कि अपनी सुप्त योग्यताओं को जागृत कर सफलता के मधुर राग रचे जाएं। हंसवाहिनी मां विवेकशील बुद्धि और सद्गुणों को ग्रहण करने की शिक्षा देती हैं, जबकि निकट स्थित मयूर कला, मधुरता और समभाव का प्रतीक है।

बसंत पंचमी पर मां सरस्वती पूजन

बसंत पंचमी मुख्यतः विद्यार्थियों और बुद्धिजीवियों का पर्व है। इस दिन प्रातः स्नान कर बसंती रंग के वस्त्र धारण कर कलश स्थापना के साथ मां सरस्वती की प्रतिमा या चित्र की विधिवत पूजा की जाती है। पीले पुष्प, अक्षत, कुमकुम, फल, मिठाइयां और दीप-धूप अर्पित किए जाते हैं। श्रद्धा और भक्ति से की गई पूजा से मां सरस्वती प्रसन्न होकर दुर्विचार और दुर्गुणों का शमन करती हैं तथा सत्य, अहिंसा, क्षमा, करुणा, प्रेम, बुद्धि, विद्या, वाणी और प्रतिभा का वरदान देती हैं।

23 जनवरी को होगी सरस्वती पूजा

पंचांग के अनुसार, माघ शुक्ल पंचमी तिथि की शुरुआत 22 जनवरी, गुरुवार के दिन रात में 2 बजकर 29 मिनट से होगी और इसका समापन 23 जनवरी, शुक्रवार को रात में 1 बजकर 47 मिनट पर होगा। ऐसे में शास्त्रों के अनुसार, बसंत पंचमी 23 तारीख को मनाई जाएगी और इसी दिन देवी सरस्वती की पूजा की जाएगी। ऐसा करने से जातक के ज्ञान, कला और बुद्धि में वृद्धि होती है। साथ ही, माता सरस्वती की कृपा प्राप्त हो सकती है।

बसंत पंचमी 2026 का शुभ संयोग

23 जनवरी, शुक्रवार के दिन यानी बसंत पंचमी पर चंद्रमा का गोचर मीन राशि में होने जा रहा है। वहीं, चंद्रमा से चतुर्थ भाव में गुरु के होने से गजकेसरी का शुभ संयोग बन रहा है। ज्ञान के कारक गुरु की राशि में बैठकर चंद्रमा का गजकेसरी योग बनाना अत्यंत शुभ है। यह छात्रों के लिए उत्तम संयोग बना रहा है। बसंत पंचमी पर सुबह 8 बजकर 33 मिनट से लेकर 11 बजकर 13 मिनट का समय शिक्षा आरंभ के लिए सबसे उत्तम रहेगा।

ऋतुराज बसंत और बसंत पंचमी हमें आशावादी, प्रफुल्लित और उत्साही बनने की प्रेरणा देते हैं। बसंत यह सिखाता है कि समय सदा एक-सा नहीं रहता। दुख और पीड़ा के बाद सुख और आनंद अवश्य आता है। प्रकृति की तरह मानव जीवन भी निरंतर परिवर्तनशील है, और हर परिवर्तन अपने साथ नई संभावनाएं लेकर आता है। बसंत ऋतु और मां सरस्वती की कृपा से जीवन ज्ञान, सौंदर्य, संतुलन और उल्लास से परिपूर्ण हो—यही इस पावन पर्व का संदेश है।

(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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