आपराधिक मामला विचाराधीन होने मात्र से नियुक्ति देने से इन्कार करना गैर कानूनी: हाईकोर्ट

न्याय

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जोधपुर, 01 जनवरी (हि.स.)। राजस्थान हाईकोर्ट ने आयुर्वेद कम्पाउंडर-नर्स जूनियर ग्रेड 2023 भर्ती मामले में दायर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि अकस्मात दुर्घटना का आपराधिक मामला विचाराधीन होने मात्र से नियुक्ति देने से इन्कार करना गैर कानूनी है। राजस्थान हाइकोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश मुन्नुरी लक्ष्मण की कोर्ट ने केवल कार्मिक विभाग परिपत्र को आधार बनाकर पेन्डिंग ट्रायल नियुक्ति से इन्कार कर देने के आदेश को निरस्त करते हुए आयुर्वेद विभाग को तीस दिन के भीतर नियुक्ति दिए जाने के आदेश जारी किए है।

याचिकाकर्ता सुरेश कुमार मीणा की ओर से अधिवक्ता यशपाल खि़लेरी व विनीता एडवोकेट ने हाईकोर्ट में रिट याचिका पेश कर बताया कि वर्ष 2020 में याचिकाकर्ता और उसका चचेरा भाई सुनील अपनी मोटरसाइकिल पर सुबह अपने गांव से बासोली शहर (जि़ला बून्दी) जा रहे थे कि अचानक सामने से तेज गति और लापरवाही से एक मोटरसाइकिल चलाते हुए एक व्यक्ति आया और याचिकाकर्ता की मोटरसाइकिल से भिड़ गया। इस भिड़ंत में दोनों ओर काफ़ी गंभीर चोटें लगी।

इस दुर्घटना के तुरन्त बाद घटनास्थल पर मौजूद गांववालों ने याचिकाकर्ता, उसके भाई और सामने वाले व्यक्ति राधेश्याम खटीक को नज़दीक के राजकीय अस्पताल में ले गए, जहां दोनो का इलाज चला। इलाज के दौरान सामने से टक्कर मारने वाले व्यक्ति की मृत्यु हो गयी और याचिकाकर्ता के भी मुहं व हाथों और दोनो पैरों मे काफ़ी चोटें आईं। याचिकाकर्ता ने इस दुर्घटना की रिपोर्ट उसी दिन संबंधित थाने में भेज दी थी। दुर्घटना में दोनों ओर से रिपोर्ट दर्ज की गई और अनुसंधान के बाद दोनों पक्षकार के खि़लाफ़ पुलिस में चालान पेश किया गया।। चूंकि सामने वाले दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति राधेश्याम खटीक की दुर्घटना में मृत्यु हो जाने से उसके खिलाफ आपराधिक मामले को समाप्त कर दिया गया लेकिऩ याचिकाकर्ता के खिलाफ दुर्घटना बाबत मामला आज दिन तक विचाराधीन है।

याचिकाकर्ता सुरेश कुमार मीणा ने राजस्थान सरकार की आयुर्वेद कम्पाउण्डर-नर्स जूनियर ग्रेड 2023 भर्ती प्रक्रिया के तहत चयन प्राप्त किया था, लेकिन उसके खिलाफ दुर्घटना का मामला 2020 से विचाराधीन था। इसी कारण आयुर्वेद विभाग ने उसकी नियुक्ति रोक दी थी, जबकि अन्य चयनित उम्मीदवारों को नियुक्ति दे दी गई थी। हाईकोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर कि याचिकाकर्ता के खिलाफ आपराधिक मामला विचाराधीन है, उसे नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने यह भी कहा कि यह निर्णय भारतीय कानूनी प्रक्रिया के खिलाफ है, क्योंकि ऐसे मामलों में यदि व्यक्ति निर्दोष साबित होता है तो उसकी नियुक्ति के अधिकार को फिर से बहाल किया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता यशपाल खिलेरी ने यह तर्क प्रस्तुत किया कि दुर्घटना के मामले में दोषी होना या नहीं होना अदालत के निर्णय पर निर्भर करता है। इसलिए केवल दुर्घटना के आपराधिक मामले को आधार बना कर उसे नौकरी से वंचित करना गलत है, खासकर जब उसे अन्य उम्मीदवारों के समान ही चयनित किया गया था। कोर्ट ने आयुर्वेद विभाग को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता को 30 दिन के भीतर नियुक्ति दे और यह भी सुनिश्चित करें कि उसे समकक्ष अभ्यर्थियों के समान सभी लाभ मिलें। साथ ही, न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि भविष्य में यह मामला ट्रायल में याचिकाकर्ता के खिलाफ जाता है तो उसकी नियुक्ति समाप्त की जा सकती है।

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