सोमनाथ (गुजरात), 11 जनवरी (हि.स.)। प्रभास पाटन की पवित्र धरती अनेक ऐतिहासिक धरोहरों को संजोए हुए है। यहां मिले ताम्रपत्र, अभिलेख और शिलालेख इस क्षेत्र के गौरवशाली और स्वर्णिम अतीत की गवाही देते हैं। आज भी वीरता की कहानियां सुनाने वाले पाळिया इस भूमि के पराक्रम के प्रमाण हैं। प्रभास पाटन और सोमनाथ मंदिर के इतिहास से जुड़े कई प्रमाण यहां अलग-अलग स्थानों पर मिलते हैं। सोमनाथ और प्रभास क्षेत्र के शिलालेख और ताम्रपत्र प्रभास पाटन संग्रहालय में सुरक्षित रखे गए हैं। अनेक आक्रमणों में नष्ट हुए मंदिरों के अवशेष भी वहां सुरक्षित हैं। यह संग्रहालय वर्तमान में प्राचीन सूर्य मंदिर में संचालित हो रहा है। ऐसा ही एक ऐतिहासिक शिलालेख संग्रहालय के पास, पुराने राम मंदिर के निकट भद्रकाली फळिया में स्थित है।
यह शिलालेख सोमपुरा ब्राह्मण दीपकभाई दवे के घर के आंगन में बने भद्रकाली मंदिर की दीवार पर आज भी लगा हुआ है। संग्रहालय की क्यूरेटर तेजल परमार के अनुसार यह शिलालेख ई.स. 1169 में खुदवाया गया था। इसे राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित किया गया है। यह शिलालेख अणहिलवाड़ पाटन के राजा कुमारपाल के गुरु श्रीमद भावबृहस्पति की प्रशंसा में लिखा गया है।
इस शिलालेख में सोमनाथ मंदिर के पौराणिक और मध्यकालीन इतिहास का वर्णन है। इसमें बताया गया है कि सतयुग में चंद्रदेव ने सोने का मंदिर बनवाया, त्रेतायुग में रावण ने चांदी का मंदिर, द्वापर युग में श्रीकृष्ण ने लकड़ी का मंदिर, और कलियुग में राजा भीमदेव सोलंकी ने पत्थर का भव्य मंदिर बनवाया।
इतिहास से पता चलता है कि भीमदेव सोलंकी ने पुराने मंदिर के अवशेषों पर चौथा मंदिर बनवाया था। बाद में कुमारपाल ने उसी स्थान पर पांचवां मंदिर बनवाया। सोलंकी शासनकाल में प्रभास पाटन धार्मिक के साथ-साथ कला, स्थापत्य और साहित्य का भी केंद्र बना। सिद्धराज जयसिंह की न्यायप्रियता और कुमारपाल की धर्मनिष्ठा ने सोमनाथ मंदिर को विशेष गौरव दिलाया। यह आज भी गुजरात के स्वर्णकाल की याद दिलाता है।
प्रभास पाटन की धरती केवल अवशेष ही नहीं, बल्कि सनातन धर्म का गौरव भी अपने भीतर समेटे हुए है। भद्रकाली फळिया का यह शिलालेख आज भी सोलंकी शासकों और विद्वान भावबृहस्पति के समर्पण की याद दिलाता है। यह भूमि अपनी ऐतिहासिक विरासत के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों को हमारे स्वर्णिम अतीत की झलक दिखाती रहेगी। सोमनाथ का अडिग शिखर इस बात का प्रमाण है कि समय चाहे कितना भी बदल जाए, भक्ति और स्वाभिमान हमेशा अमर रहते हैं।
मकर संक्रांति का पर्व भारतीय संस्कृति में केवल एक तिथि नहीं, बल्कि ऋतु परिवर्तन, सामाजिक सहभागिता और लोकजीवन की जीवंत अभिव्यक्ति है। यह वह समय है जब सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर अग्रसर होता है और प्रकृति के साथ-साथ मानव जीवन में भी नई ऊर्जा का संचार होता है। इस पर्व से जुड़ी पतंगबाज़ी की परंपरा सदियों से चली आ रही है, जिसने समय के साथ स्वयं को केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और स्वास्थ्य संबंधी आयामों को भी अपने भीतर समाहित किया है। आज पतंग उड़ाना सिर्फ़ छतों पर खड़े होकर डोर खींचने का खेल नहीं, बल्कि सामूहिक उत्सव, मानसिक प्रसन्नता और शारीरिक सक्रियता का प्रतीक बन चुका है।
पतंग उड़ाने की परंपरा भारत में अत्यंत प्राचीन मानी जाती है। ऐतिहासिक संदर्भों और लोककथाओं में इसके उल्लेख मिलते हैं। कभी यह राजदरबारों में कौशल और रणनीति का प्रतीक रही, तो समय के साथ आम जनजीवन में रच-बस गई। मकर संक्रांति, बसंत पंचमी और अन्य पर्वों पर आसमान का रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाना, भारतीय समाज की सामूहिक चेतना और उत्सवधर्मिता को दर्शाता है। हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों में यह पर्व केवल परंपरा नहीं, बल्कि एक बड़े सामाजिक आयोजन का रूप ले लेता है।
पतंगबाज़ी का सबसे सुंदर पक्ष उसका सामाजिक स्वरूप है। यह लोगों को घरों से बाहर निकालकर एक-दूसरे से जोड़ती है। छतों के बीच संवाद, बच्चों की खिलखिलाहट, युवाओं की प्रतिस्पर्धा और बुज़ुर्गों की स्मृतियों से उपजी मुस्कान—ये सभी दृश्य इस पर्व को जीवंत बनाते हैं। “वो काटा… वो मारा” की गूंज केवल खेल का उत्साह नहीं, बल्कि सामूहिक सहभागिता की आवाज़ होती है। आज के समय में, जब सामाजिक संवाद सिमटता जा रहा है, ऐसे पर्व मानवीय रिश्तों को सहेजने का अवसर प्रदान करते हैं।
मकर संक्रांति के अवसर पर आयोजित पतंग महोत्सवों और सामूहिक आयोजनों ने इस परंपरा को नए आयाम दिए हैं। कई स्थानों पर स्थानीय प्रशासन, सामाजिक संगठन और स्वयंसेवी संस्थाएँ मिलकर ऐसे कार्यक्रम आयोजित करती हैं, जिनका उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संरक्षण और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना भी होता है। इन आयोजनों में महिलाएँ, बच्चे और बुज़ुर्ग समान रूप से भाग लेते हैं, जिससे यह पर्व किसी एक वर्ग तक सीमित न रहकर समाज के हर हिस्से का उत्सव बन जाता है।
अक्सर पतंगबाज़ी को केवल मौसमी खेल समझ लिया जाता है, लेकिन इसके स्वास्थ्य संबंधी लाभ भी कम नहीं हैं। पतंग उड़ाते समय शरीर के कई अंग सक्रिय रहते हैं। हाथों, कंधों और आँखों का समन्वय होता है, जिससे शारीरिक सक्रियता बनी रहती है। खुले वातावरण में समय बिताने से शरीर को सूर्य की ऊर्जा मिलती है और मानसिक थकान कम होती है। चिकित्सकों और मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसे सामूहिक और आनंददायक आयोजन तनाव को कम करने में सहायक होते हैं।
मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से भी पतंग उड़ाना अत्यंत उपयोगी है। खुले आसमान में रंग-बिरंगी पतंगों को उड़ते देखना मन को प्रसन्नता और शांति देता है। यह व्यक्ति को वर्तमान क्षण से जोड़ता है और एक प्रकार के सहज ध्यान का अनुभव कराता है। आज के तेज़ रफ्तार और तनावपूर्ण जीवन में ऐसे अनुभव मानसिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
बच्चों के लिए पतंगबाज़ी केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सीखने की प्रक्रिया भी है। इससे उनमें धैर्य, संतुलन, समन्वय और प्रतिस्पर्धा की भावना विकसित होती है। हवा की दिशा को समझना, डोर का सही तनाव बनाए रखना और सही समय पर निर्णय लेना—ये सभी कौशल बच्चों की निर्णय क्षमता को मजबूत करते हैं। साथ ही, जब यह गतिविधि परिवार के साथ मिलकर की जाती है, तो बच्चों में सामाजिक मूल्य और सांस्कृतिक जुड़ाव भी गहराता है।
हालाँकि, जहाँ पतंगबाज़ी आनंद और उत्साह का पर्व है, वहीं इससे जुड़ी सुरक्षा चुनौतियाँ भी सामने आती हैं। बीते वर्षों में चाइनीज़ मांझा और नायलॉन डोर के प्रयोग से कई गंभीर दुर्घटनाएँ हुई हैं। यह न केवल मनुष्यों के लिए, बल्कि पक्षियों और अन्य जीव-जंतुओं के लिए भी घातक सिद्ध हुआ है। सड़क दुर्घटनाएँ, गले में कट लगने की घटनाएँ और पक्षियों की मौत—ये सभी इस परंपरा के विकृत स्वरूप की ओर संकेत करते हैं।
सरकार और प्रशासन द्वारा इस दिशा में नियम बनाए गए हैं, लेकिन केवल नियम पर्याप्त नहीं हैं। समाज में जागरूकता फैलाना और जिम्मेदारी का भाव विकसित करना अत्यंत आवश्यक है। सूती डोर का उपयोग, खुले और सुरक्षित स्थानों का चयन, बच्चों की निगरानी और समय-सीमा का ध्यान—ये सभी कदम पतंगबाज़ी को सुरक्षित बना सकते हैं। यह ज़रूरी है कि उत्सव की खुशी किसी के लिए दुख का कारण न बने।
पर्यावरणीय दृष्टि से भी पतंगबाज़ी पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। पतंगों के अवशेष पेड़ों, बिजली के तारों और सड़कों पर फँसकर पर्यावरण के लिए समस्या बन जाते हैं। प्लास्टिक और नायलॉन से बनी पतंगें लंबे समय तक नष्ट नहीं होतीं और जीव-जंतुओं के लिए खतरा पैदा करती हैं। ऐसे में पर्यावरण-अनुकूल पतंगों और प्राकृतिक रंगों के उपयोग को बढ़ावा देना समय की माँग है।
कई सामाजिक संगठन और स्वयंसेवी समूह इस दिशा में सकारात्मक प्रयास कर रहे हैं। वे बच्चों और युवाओं को सुरक्षित और पर्यावरण-संवेदनशील पतंगबाज़ी के लिए प्रेरित कर रहे हैं। स्कूलों और सामाजिक मंचों पर जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं, ताकि परंपरा और प्रकृति के बीच संतुलन बना रहे।
बदलते समय के साथ पतंगबाज़ी का स्वरूप भी बदल रहा है। अब यह केवल छतों तक सीमित नहीं रही। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने इसे एक वैश्विक पहचान दी है। पतंग महोत्सवों की तस्वीरें और वीडियो दुनिया भर में साझा किए जा रहे हैं। विदेशों में बसे भारतीय समुदाय भी मकर संक्रांति के अवसर पर पतंग उत्सव आयोजित कर अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहते हैं।
यह परिवर्तन दर्शाता है कि परंपराएँ स्थिर नहीं होतीं, वे समय के साथ स्वयं को ढालती हैं। पतंगबाज़ी भी इसी परिवर्तन का उदाहरण है, जहाँ परंपरा, मनोरंजन, स्वास्थ्य और आधुनिकता एक साथ उड़ान भरते हैं। यह पर्व हमें सिखाता है कि आनंद और जिम्मेदारी एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।
अंततः, मकर संक्रांति और उससे जुड़ी पतंगबाज़ी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि जीवन को उत्सव की तरह देखने का दृष्टिकोण है। यह हमें सामूहिकता, संतुलन और आनंद का महत्व समझाती है। जब हम परंपरा को समझदारी और जिम्मेदारी के साथ अपनाते हैं, तो वह अतीत की स्मृति भर नहीं रहती, बल्कि वर्तमान और भविष्य की प्रेरणा बन जाती है। आसमान में उड़ती पतंगें हमें यही संदेश देती हैं कि सीमाएँ केवल ज़मीन पर होती हैं, सपनों के लिए आकाश हमेशा खुला रहता है—बस डोर थामने का हुनर और संतुलन बनाए रखने की समझ होनी चाहिए।
– दशमोत्तर छात्रवृत्ति एवं शुल्क प्रतिपूर्ति योजना की नियमावली 2023 में हुआ संशोधन
लखनऊ, 11 जनवरी (हि.स.)। दशमोत्तर छात्रवृत्ति एवं शुल्क प्रतिपूर्ति योजना का लाभ केवल वास्तविक और पात्र विद्यार्थियों तक पहुंचाने के लिए समाज कल्याण विभाग निरंतर प्रयासरत है। इसी क्रम में शासन द्वारा योजना की नियमावली 2023 में जरूरी संशोधन किए गए हैं। यह संशोधन अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति और सामान्य वर्ग दोनों श्रेणियों के विद्यार्थियों पर लागू होगा।
समाज कल्याण उपनिदेशक आनंद कुमार सिंह ने बताया कि इस संशोधन का उद्देश्य निजी शिक्षण संस्थानों को रूप से तकनीकी पारदर्शी और स्पष्ट बनाना है, जिससे पात्र विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति एवं शुल्क प्रतिपूर्ति का लाभ सुनिश्चित किया जा सके। साथ ही मैनेजमेंट कोटा, स्पॉट एडमिशन और अन्य गैर-पारदर्शी प्रवेश प्रक्रियाओं के माध्यम से छात्रवृत्ति के दुरुपयोग पर प्रभावी रोक लगाई जा सके।
अनुसूचित जाति-जनजाति के छात्रों के लिए व्यवस्था
संशोधित नियमों के अनुसार, अब निजी शिक्षण संस्थानों में व्यावसायिक या तकनीकी पाठ्यक्रम में अध्ययनरत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों को छात्रवृत्ति एवं शुल्क प्रतिपूर्ति का लाभ तभी दिया जाएगा, जब उनका प्रवेश पूरी तरह पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से हुआ हो। इसके अंतर्गत संस्थान द्वारा सार्वजनिक विज्ञापन जारी कर आवेदन आमंत्रित करना, रैंक सूची तैयार करना और चयन सूची प्रकाशित करना अनिवार्य किया गया है। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया गया है कि छात्रों से केवल सक्षम प्राधिकारी अथवा शुल्क नियामक समिति द्वारा अनुमोदित शुल्क ही लिया जाए।
सामान्य वर्ग के छात्रों को भी समान लाभ
संशोधित नियमों के तहत सामान्य वर्ग के छात्रों को भी समान रूप से शुल्क प्रतिपूर्ति का लाभ मिलेगा, बशर्ते उनका प्रवेश पारदर्शी प्रक्रिया के अंतर्गत हुआ हो और उनसे अनुमोदित शुल्क ही लिया गया हो।
उपनिदेशक आनंद कुमार सिंह ने स्पष्ट किया कि मैनेजमेंट कोटा, स्पॉट एडमिशन के अलावा किसी भी प्रकार की गैर-पारदर्शी प्रवेश प्रक्रिया के माध्यम से प्रवेश लेने वाले छात्रों को योजना का लाभ नहीं दिया जाएगा। साथ ही संस्था द्वारा निर्धारित से अधिक फीस वसूले जाने की स्थिति में भी लाभ देय नहीं होगा।
लखनऊ, 11 जनवरी (हि.स.)। मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना के अंतर्गत कुछ कोर्स कोऑर्डिनेटरों द्वारा फर्जी अभिलेखों के आधार पर नियुक्ति प्राप्त किए जाने के मामले सामने आने के बाद समाज कल्याण विभाग के राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) असीम अरुण ने सख्त रुख अपनाया है।
भविष्य में ऐसी किसी भी अनियमितता को रोकने के उद्देश्य से समाज कल्याण विभाग में आउटसोर्सिंग से जुड़े मामलों में स्पष्ट शासनादेश जारी करने के निर्देश दिए हैं। इसके माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाएगा कि आउटसोर्सिंग के जरिए की जाने वाली सभी नियुक्तियां पूरी तरह निर्धारित नियमों, मानकों और प्रक्रिया के अनुरूप हों।
शासनादेश में यह साफ किया जाएगा कि आउटसोर्सिंग के माध्यम से नियुक्त सभी कार्मिकों के शैक्षिक और अन्य जरूरी डॉक्यूमेंट्स की पूरी जांच अनिवार्य होगी। इसके साथ ही सभी कर्मचारियों का पुलिस वेरिफिकेशन भी कराया जाएगा।
राज्यमंत्री ने वर्तमान में विभाग में कार्यरत आउटसोर्सिंग कर्मियों के डॉक्यूमेंट्स की भी अगले तीन महीने के अंदर जांच पूरी करने के निर्देश दिए, जिससे किसी भी प्रकार की गड़बड़ी की संभावना न रहे।
राज्यमंत्री असीम अरुण ने रविवार को कहा कि समाज कल्याण विभाग में किसी भी तरह की गड़बड़ी स्वीकार नहीं की जाएगी। आउटसोर्सिंग के माध्यम से की जाने वाली सभी नियुक्तियां पूरी तरह पारदर्शी और नियमों के अनुसार होंगी। जहां भी अनियमितता मिलेगी, वहां सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।
देश में हर साल 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद जयंती के अवसर पर राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है। राष्ट्रीय युवा दिवस 2026 की थीम उठो, जागो और अपनी शक्ति को पहचानो है, जो युवाओं को देश के विकास में सक्रिय भूमिका निभाने की तरफ प्रेरित करती है। यह दिन पहली बार 1984 में मनाया गया था, जब भारत सरकार ने स्वामी विवेकानंद की जयंती को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया था। स्वामी विवेकानंद ने अपने विचारों से दुनियाभर में पहचान बनाई। उनका मानना था कि शिक्षा का मतलब सिर्फ जानकारी करना नहीं बल्कि व्यक्तिगत विकास और सामाजिक प्रगति है। स्वामी विवेकानंद सही अर्थों में युवाओं के प्रेरणास्रोत और आदर्श व्यक्तित्व थे। विवेकानंद कहा करते थे कि उनकी आशाएं देश के युवा वर्ग पर ही टिकी हुई हैं। विवेकानंद ने देशवासियों से कहा था कि इस बात पर तुम गर्व करो कि तुम एक भारतीय हो और अभिमान के साथ यह घोषणा करो कि हम भारतीय हैं और हर भारतीय हमारा भाई है। उनके विचार आज भी लोगों को प्रभावित करते हैं। वे आधुनिक मानव के आदर्श प्रतिनिधि थे और खासकर भारतीय युवाओं के लिए उनसे बढ़कर भारतीय नवजागरण का अग्रदूत अन्य कोई नेता नहीं हो सकता। स्वामी जी के ओजस्वी विचार आज भी देश के करोड़ों युवाओं के लिए मार्गदर्शन का काम करते हैं और यह दिवस उसी चेतना को जगाने का एक सशक्त माध्यम है।
युवा में है बदलाव की असीम शक्ति युवा वर्ग अपने अधिकारों व लक्ष्य से परिचित होता है तो वह देश की दशा बदल सकता है। युवा देश का वर्तमान हैं, तो भूतकाल और भविष्य के सेतु भी हैं। राष्ट्र के निर्माण में युवाओं का अमूल्य योगदान है। युवा देश और समाज को नए शिखर पर ले जाते हैं। युवा देश का वर्तमान हैं, तो भूतकाल और भविष्य के सेतु भी हैं। युवा देश और समाज के जीवन मूल्यों के प्रतीक हैं।
युवा नेतृत्व को लेकर आज व्यापक बहस छिड़ी है। युवा किसी भी देश और समाज में बदलाव के मुख्य वाहक होते हैं। युवा आबादी ही देश की तरक्की को रफ्तार प्रदान कर सकती है। भारत विश्व में सब से अधिक युवा आबादी वाला देश है। हमारे यहां 135 करोड़ की जनसंख्या में 65 प्रतिशत युवा हैं। लेकिन देश के सियासी नेतृत्व की बागडोर 60 साल से ऊपर के नेताओं के हाथों में है। युवाओं की क्षमताओं का पूरा इस्तेमाल करने से ही समाज में बदलाव आएगा। युवा भी खुद की ताकत को पहचाने और उसी के अनुरूप अपना रास्ता चुनें। युवा अपनी काबिलियत और नई सोच के बूते पर रोजगार सृजनकर्ता बन सकते हैं। युवा नई बुनियाद रखकर सामाजिक बदलाव के प्रणेता बन सकते हैं। विश्व के कई अन्य देशों की तुलना में भारत की जनसंख्या की औसत आयु 29 वर्ष है। भारत दुनिया के युवा जनसांख्यिकीय के पांचवें हिस्से का घर है।
देश में बेरोजगारी दर तेजी से बढ़ी है। इस साल उच्च मुद्रास्फीति पर काबू पाना और लाखों लोगों के लिए रोजगार सृजित करना सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। आज सबसे बड़ी चुनौती युवाओं को रोजगार देने व आत्मनिर्भर बनाने की है। आज का युवा अपने हक की लड़ाई लड़ रहा है। शिक्षा, रोज़गार और बेहतर भविष्य के लिए आज का युवा जागरूक है और लड़ रहा है। युवा वर्ग महंगी फीस, कोचिंग और फॉर्म पर फॉर्म भरता है। भर्तियों के दौरान पेपर लीक होना आम बात हो गई है। माँ-बाप अपनी ज़मीन जायदाद गिरवी रखकर अपने बच्चों को पढ़ाते हैं लेकिन अंत में उन्हें मिलती है बेरोज़गारी। ऐसे में युवा अवसाद की तरफ जाता है, जो एक बहुत बड़ी चुनौती है। युवा वर्ग करप्शन फ्री इंडिया चाहता है। आज देश भ्रष्टाचार से आहत है। युवा ही देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति की राह दिखा सकता है। ऐसे में देश में युवा नेतृत्व की मांग बढ़ी है।
पिछले दिनों सनकी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के निर्देश पर जिस तरह वेनेज़ुएला पर सैन्य कार्रवाई करते हुये अमेरिकी सेना ने वेनेज़ुएला की राजधानी कराकस से वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो व उनकी पत्नी का बलात अपहरण कर उन्हें न्यूयार्क ले जाया गया उसने पूरी दुनिया को न केवल अचंभे में डाल दिया है बल्कि इस घटना ने एक नई विश्व व्यवस्था व नये वैश्विक शक्ति संतुलन के गठन की संभावना को भी प्रबल कर दिया है। कितना आश्चर्य है कि नोबल शांति पुरस्कार की चाहत रखने वाले राष्ट्रपति ट्रंप अमेरिकी शक्तियों का दुरुपयोग कर इस दुनिया को जंगल राज की तरह चलाना चाह रहे हैं ? वेनेज़ुएला पर की गयी ग़ैर क़ानूनी अमेरिकी कार्रवाई कई संकेतों की ओर इशारा कर रही है। एक तो यह कि क्या यह विश्व की उदारवादी सोच रखने वाली ताक़तों को विश्व की पूंजीवादी व अतिवादी व्यवस्था की ओर से दी जाने वाली यह एक सीधी चुनौती है ? ग़ौरतलब है कि ट्रंप परिवार की गिनती भी अमेरिका के बड़े पूंजीवादी घरानों में की जाती है। या फिर यह चीन व रूस जैसे देशों एक साथ ललकारने की ट्रंप की नीति का हिस्सा है ? और अब कोलंबिया, क्यूबा, मैक्सिको और ईरान जैसे देशों पर अमेरिकी सैन्य या आर्थिक दबाव की आशंका व्यक्त की जा रही है।साथ ही अमेरिका द्वारा ग्रीनलैंड पर भी अधिग्रहण की धमकी दी जा चुकी है।
ऐसे में दुनिया के सामने दो ही विकल्प बचे हैं एक तो यह कि दूसरे देशों की स्वतंत्रता व संप्रभुता का सम्मान करने वाले सभी देश वेनेज़ुएला पर अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का विरोध करते हुये हर स्तर पर एकजुट होकर अमेरिका का मुक़ाबला करें। दूसरा यह कि ‘जिसकी लाठी उसी की भैंस’ वाली अमेरिकी नीति का ही अनुसरण करते हुये पूरी दुनिया ही जंगल राज में बदल जाये। हर ताक़तवर देश अपनी पड़ोसी कमज़ोर देश को निगलने की मानवता व न्याय विरोधी रक्तरंजित योजना पर काम करे। उदाहरण के तौर पर चीन ताइवान को हड़प ले और रूस यूक्रेन पर अपना आधिपत्य स्थापित कर ले ? इस्राईल, फ़िलिस्तीन लेबनान सीरिया पर नियंत्रण कर अपने वृहत्तर इस्राईल के नापाक मंसूबे पर आगे बढ़े ? और इन्हीं ख़तरनाक संभावनाओं के बीच एक उपाय यह भी है कि ईरान परमाणु परीक्षण के द्वारा उत्तर कोरिया की तरह एक ऐसी आत्म रक्षक व “निवारक” रणनीति पर काम करे जो अमेरिका को भी युद्ध से पीछे हटने पर मजबूर कर दे ? तो क्या लंबे समय से चले आ रहे तमाम ईरान विरोधी प्रतिबंधों के बावजूद उस के सामने इस समय वैसी ही स्थिति पैदा हो चुकी है कि आत्मरक्षा के लिये अब उसे परमाणु संपन्न देशों के क्लब में शामिल होना ज़रूरी हो गया है ?
ग़ौर तलब है कि गत 13 जून – 24 जून 2025 के मध्य चला बारह दिवसीय ईरान-इज़राइल युद्ध उस समय शुरू हुआ था जब इज़राइल ने ईरान के कई सैन्य और परमाणु ठिकानों पर बमबारी की थी और ईरान के कई प्रमुख सैन्य अधिकारियों , परमाणु वैज्ञानिकों व प्रमुख राजनेताओं की हत्या कर दी थी साथ ही अनेक नागरिकों को भी मार दिया था। इज़राइल ने उस समय ईरान की वायु सुरक्षा को भी नुक़्सान पहुँचाया था और कई जगह तो इसे पूरी तरह नष्ट भी कर दिया था। इतना ही नहीं बल्कि अमेरिका ने भी इस्राईल के समर्थन में 22 जून को तीन ईरानी परमाणु स्थलों पर बमबारी की। परन्तु बाद में मुंहतोड़ जवाबी कार्रवाई करते हुये ईरान ने 550 से अधिक बैलिस्टिक मिसाइलों और 1,000 से अधिक आत्मघाती ड्रोनों के साथ बड़े पैमाने पर इस्राईल में राजधानी तेल अवीव सहित कई शहरों पर भीषण हमले किये। कम से कम बारह सैन्य, ऊर्जा और सरकारी स्थलों को निशाना बनाया। यहाँ तक कि कई अमेरिकी सैन्य लक्ष्यों को भी निशाना बनाया। उस दौरान भी पश्चिमी मीडिया ईरानी सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामनेई को लेकर बार बार तरह तरह की अफ़वाह उड़ा रहा था। कभी उन्हें भूमिगत बता देता था तो कभी उनके ईरान छोड़कर भाग जाने की ख़बर फैला देता था। उस समय भी आयतुल्लाह ख़ामनेई जनता को संबोधित करने के लिये सार्वजनिक रूप से दिखाई देते थे और पिछले दिनों भी बिल्कुल वैसा ही दृश्य देखने को मिला। इस बार भी ‘भूमिगत’ होने व ‘मास्को भागने की तैयारी’ जैसी अफ़वाहों के बीच गत शुक्रवार को पुनः आयतुल्लाह ख़ामनेई जनता के सामने आये तथा बेख़ौफ़ होकर ख़ुद अमेरिका को ही हिदायत व नसीहत करते सुने गए।
परन्तु ट्रंप के नेतृत्व वाला वर्तमान अमेरिका वेनेज़ुएला की घटना के बाद तो पूरी तरह बेनक़ाब हो चुका है। दुनिया में सबसे अधिक तेल भण्डार रखने वाले अमेरिका को विश्व के अन्य तेल उत्पादक देशों से अपनी शर्तों पर तेल चाहिये। चाहे इसके लिये कोई भी बहाना बनाकर किसी राष्ट्रपति का अपहरण तक क्यों न करना पड़े। ज़ाहिर है ईरान भी वेनेज़ुएला की ही तरह दुनिया के उन गिने चुने तेल उत्पादक देशों में एक है जो अमेरिका को ‘सर्वशक्तिमान ‘ भी नहीं मानता और न ही उसकी ‘वैश्विक थानेदारी ‘ को स्वीकार करता है। जबकि 1979 की ईरानी इस्लामिक क्रांति से पहले का रज़ा शाह पहलवी का ईरानी शासन अमेरिका का पिट्ठू शासन था। उसी समय से ईरान न केवल अमेरिकी बल्कि संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा लगाये गयी अनेक प्रतिबंध भी झेलता आ रहा है जोकि निश्चित रूप से ईरान की अर्थव्यवस्था को बेहद कमज़ोर कर रहा है। इन प्रतिबंधों के बावजूद अपने अत्यंत सीमित संसाधनों के बल पर ईरान ने शिक्षा,विज्ञान यहाँ तक कि अंतरिक्ष विज्ञान तक के क्षेत्र में जो तरक़्क़ी की है उसी की झलक गत वर्ष के बारह दिवसीय ईरान-इज़राइल युद्ध में भी देखने को मिली।
परन्तु अब बात इस्राईल की नहीं बल्कि ईरान को सीधे अमेरिका चुनौती दे रहा है। ईरान में चल रहे सरकार विरोधी व अमेरिका -इस्राईल समर्थित प्रदर्शनों को लेकर अमेरिका ने ईरान को चेतावनी दी है कि यदि प्रदर्शनकारियों को मारा गया तो अमेरिका ईरान पर बड़े हमले करेगा। ऐसे में ईरान,अमेरिकी हमलों से बचने के लिये आख़िर कौन सी रणनीति अपना सकता है ? क्या ईरान द्वारा परमाणु परीक्षण किया जाना भी इन्हीं संभावनाओं में एक सबसे प्रमुख है ? क्या निकट भविष्य में ईरान भी परमाणु परीक्षण कर “परमाणु क्लब” में शामिल हो जाएगा ताकि अमेरिका व इज़राइल जैसे देशों को सैन्य हमले से रोका जा सके ? यदि ईरान में उपजे सत्ता विरोधी प्रदर्शनों के बीच ईरान रूस और चीन जैसे सहयोगी देशों की मदद से परमाणु परीक्षण करता है तो इससे ईरान की जनता में सुरक्षा,स्वाभिमान तथा राष्ट्रवाद बढ़ेगा तो बढ़ेगा ही साथ ही वहां आंतरिक राष्ट्रीय एकता भी बढ़ेगी। इसके अलावा ईरान का क्षेत्रीय प्रभाव भी बढ़ेगा साथ ही अमेरिकी एकध्रुवीयता का विरोध करने वाले देशों को भी मज़बूती मिलेगी। इसके अलावा दशकों से अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण दबाव का सामना करती आ रही ईरान की अर्थव्यवस्था में इस परीक्षण से JCPOA के रूप में कई नई संभावनाएँ भी खुल सकती हैं। वैसे भी उत्तर कोरिया द्वारा किये गये परमाणु परीक्षण के बाद ही ट्रंप – की उत्तर कोरिया राष्ट्रपति किम जोंग के साथ 27 -28 फ़रवरी 2019 को वेतनाम के हनोई में मुलाक़ात हुई थी। गोया आज की दुनिया में ख़ासकर अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया में यदि किसी देश को अपना अस्तित्व बचाकर रखना है तो उसका परमाणु संपन्न देश होना ज़रूरी हो चुका है। अन्यथा कभी भी इराक़-वेनेज़ुएला-ग़ज़ा-सीरिया-लेबनान यानी कहीं भी कुछ भी हो सकता है ?
वाराणसी, 11 जनवरी(हि. स.)। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय के चेतगंज थाना क्षेत्र स्थित उनके मकान के चारों ओर रविवार की सुबह बैरिकेडिंग लगाकर पुलिस कर्मियों की तैनाती की गई। साथ ही अजय राय को हाउस अरेस्ट भी किया गया।
अपने मकान के चारों ओर बैरिकेडिंग देखकर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने कहा कि मनरेगा का नाम बदले जाने पर वाराणसी में विरोध प्रदर्शन करने जा रहे उनके साथियों और उन्हें रोकने के लिए हाउस अरेस्ट कर दिया गया है। स्थानीय पुलिस ने उनके मकान के बाहर बैरिकेडिंग कर दी है। फिर भी वह रुकने या डरने वाले नहीं हैं।
वही, चेतगंज थाना के प्रभारी निरीक्षक ने बताया कि अजय राय के विरोध प्रदर्शन किए जाने का ऐलान किए जाने पर उन्हें हाउस अरेस्ट करते हुए उनके मकान के चारों ओर बैरिकेडिंग लगाई गई है। मौके पर वाराणसी कमिश्नरेट पुलिस के अधिकारी भी मौजूद हैं
देहरादून, 11 जनवरी (हि.स.)। अंकिता भंडारी हत्याकांड में सीबीआई जांच की मांग को लेकर विभिन्न राजनीतिक एवं गैर-राजनीतिक संगठनों ने रविवार को उत्तराखंड बंद का आह्वान किया गया है। हालांकि, मुख्यमंत्री उत्तराखंड द्वारा मामले में सीबीआई जांच की संस्तुति किए जाने के बाद कुछ व्यापारिक संगठनों ने बंद से दूरी बना ली है। राज्य के विभिन्न व्यापार मंडलों तथा टैक्सी-बस यूनियनों ने यह स्पष्ट किया है कि प्रकरण में विधिसम्मत कार्रवाई प्रचलित होने के कारण वे बंद का समर्थन नहीं करेंगे और अपने व्यापारिक एवं परिवहन कार्यों को सुचारू रूप से जारी रखेंगे।
व्यापारिक संगठनों ने बंद के दौरान किसी भी प्रकार की जबरदस्ती या कार्यों में बाधा की आशंका जताते हुए एसएसपी देहरादून से पुलिस सुरक्षा की मांग की है। प्रशासन ने भी बंद को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है। पलटन बाजार देहरादून में भी बाजार बंद का मिला-जुला असर नजर आया।
इस बीच एसएसपी देहरादून ने आमजन से अपील करते हुए कहा है कि सभी प्रदर्शन शांतिपूर्ण एवं संवैधानिक तरीके से किए जाएं। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि कोई व्यक्ति जबरन बाजार बंद कराने, सार्वजनिक परिवहन रोकने या कानून-व्यवस्था भंग करने का प्रयास करता है, तो उसके खिलाफ सख्त वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।
वहीं पौड़ी व श्रीनगर में उत्तराखंड बंद का मिला जुला असर देखने को मिला। रविवार को यहा साप्तहिक अवकाश रहता है। जिसके चलते अधिकतर दुकान बंद रही। वही, वाहन चलते रहे।
स्वामी विवेकानंद का नाम भारतीय इतिहास में एक महान विद्वान, संन्यासी और समाज सुधारक के रूप में दर्ज है, जिन्होंने मानवता की सेवा को अपना सर्वोच्च धर्म माना। वे न केवल आध्यात्मिक गुरु थे, बल्कि ऐसे विचारक भी थे जिन्होंने भारत को आत्मगौरव और आत्मविश्वास का संदेश दिया। अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्मसभा में दिए गए उनके ऐतिहासिक और धाराप्रवाह भाषण ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई और विश्व को भारतीय संस्कृति, वेदांत और सहिष्णुता से परिचित कराया।
स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को बंगाल में हुआ था। उनका मूल नाम नरेंद्रनाथ दत्त था। वे अपने ओजपूर्ण, निर्भीक और प्रेरणादायी भाषणों के कारण विशेष रूप से युवाओं के बीच अत्यंत लोकप्रिय हुए। वे युवाओं को राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति मानते थे और उन्हें आत्मविश्वास, चरित्र निर्माण और कर्मशीलता का संदेश देते थे। इसी कारण उनके जन्मदिन को पूरे देश में ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।
मानव सेवा और परोपकार को संगठित रूप देने के उद्देश्य से स्वामी विवेकानंद ने वर्ष 1897 में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। इस मिशन का नाम उन्होंने अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस के सम्मान में रखा। रामकृष्ण मिशन आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य और समाजसेवा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।
महत्वपूर्ण घटनाचक्र
1708 – शाहू जी को मराठा शासक का ताज पहनाया गया।
1757 – ब्रिटेन ने पश्चिम बंगाल के बंदेल प्रांत को पुर्तग़ाल से अपने कब्जे में लिया।
1866 – लंदन में रॉयल एयरोनॉटिकल सोसायटी का गठन हुआ।
1924- गोपीनाथ साहा ने कोलकाता के पुलिस आयुक्त चार्ल्स ऑगस्टस टेगार्ट समझकर ग़लती से एक आदमी की हत्या कर दी। इसके बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया।
1934 – भारत के स्वतंत्रता संग्राम के महान् क्रान्तिकारी सूर्य सेन को चटगांव में फाँसी दी गयी। उन्होने इंडियन रिपब्लिकन आर्मी की स्थापना की और चटगांव विद्रोह का सफल नेतृत्व किया।
1950- स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 12 जनवरी 1950 में ‘संयुक्त प्रांत’ का नाम बदल कर ‘उत्तर प्रदेश’ रखा।
1984 – स्वामी विवेकानंद के जन्मदिन के मौके पर हर वर्ष देश में ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ मनाने की घाेषणा की गयी।
1991 – अमरीकी संसद ने कुवैत में इराक के खिलाफ सैनिक कार्रवाई काे मंजूरी दी।
2001 – भारत का इंडोनेशिया-रूस-चीन संधि से इंकार, नैफ नदी पर बांध निर्माण योजना के कारण बांग्लादेश-म्यांमार सीमा पर तनाव के बाद सेनाएँ तैनात।
2002 – पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ़ ने राष्ट्र के नाम ऐतिहासिक संदेश प्रसारित किया।
2002 – पाकिस्तान ने आतंकवादी संगठन लश्कर व जैश पर प्रतिबंध लागू करने की घोषणा की जबकि वांछित पाक अपराधियों को भारत को सौंपने से इन्कार किया।
2003 – भारतीय मूल की महिला लिंडा बाबूलाल त्रिनिदाद की संसद अध्यक्ष बनीं।
2004 – दुनिया के सबसे बड़े समुद्री जहाज, आरएमएस क्वीन मैरी 2 ने अपनी पहली यात्रा की शुरूआत की।
2006 – भारत और चीन ने हाइड्रोकार्बन पर एक महत्त्वपूर्ण सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए।
2007 – हिन्दी फिल्म ‘रंग दे बसन्ती’ बाफ्टा के लिए नामांकित।
2008 – कोलकाता में आग से 2500 दुकानें जल कर खाक हुई।
2008 – दुनिया के सबसे बड़े फिल्म शो टोरंटो अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव की बुनियाद रखने वाले ‘मुर्रे दस्ती कोहल’ का निधन।
2009- प्रसिद्ध संगीतकार ए. आर. रहमान प्रतिष्ठित गोल्डन ग्लोब अवार्ड जीतने वाले पहले भारतीय बने।
2009 – इलाहाबाद विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ जयन्त कुमार ने दुनिया का सबसे पुराना उल्का पिंड क्रेटर खोजा।
2010- भारत सरकार द्वारा नागर विमानन क्षेत्र पर आतंकी हमलो की आशंका के बीच विमान अपहरण रोधी क़ानून 1982 में मौत की सजा की धारा जोड़ी गई।
2010 – कैरेबियाई देश हैती में आए भयंकर भूकंप में लाखों लोगों की मौत और राजधानी पोर्ट ओ प्रिंस का अधिकतर हिस्सा तबाह हो गया।
2015 – कैमरून में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड में आतंकवादी संगठन बोको हराम के 143 आतंकवादी मारे गये।
2018 – इसरो ने लॉन्च किया 100वाँ उपग्रह, एक साथ भेजे 31 सैटेलाइट्स।
2020 – भारतीय टीम के तेज गेंदबाज जसप्रीत बुमराह को प्रतिष्ठित ‘पॉली उमरीगर अवॉर्ड’ से सम्मानित किया गया।
जन्म
1863 – स्वामी विवेकानंद- भारतीय दार्शनिक।
1869 – भगवान दास – ‘भारत रत्न’ सम्मानित स्वतंत्रता सेनानी, समाज सेवी और शिक्षा शास्त्री।
1886 – नेली सेनगुप्ता – प्रसिद्ध महिला क्रांतिकारी।
1899 – बद्रीनाथ प्रसाद – भारत के प्रसिद्ध गणितज्ञ।
1901 – उमाशंकर दीक्षित – ‘भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन’ के पुरोधा एवं मानवता के पुजारी और राष्ट्रवाद के अग्रदूत।
1917 – महर्षि महेश योगी- भारतीय अध्यात्मवादी
1918 – महर्षि महेश योगी – प्रसिद्ध भारतीय योगाचार्य थे, जिन्होंने योग को भारत के बाहर भी प्रसिद्धि दिलाई।
1918 – सी. रामचन्द्र – हिन्दी फ़िल्म संगीतकार, गायक और निर्माता-निर्देशक।
1927 – डार्विन दीनघदो पग – भारतीय राज्य मेघालय के भूतपूर्व दूसरे मुख्यमंत्री थे।
1931 – अहमद फराज – प्रसिद्ध उर्दू कवि।
1936 – मुफ़्ती मोहम्मद सईद – भारतीय राज्य जम्मू और कश्मीर के भूतपूर्व नौवें मुख्यमंत्री थे।
1940 – एम. वीरप्पा मोइली – भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राजनीतिज्ञ हैं।
1943 – सुमित्रा भावे – सुप्रसिद्ध मराठी फिल्म निर्माता थीं।
1958 – अरुण गोविल – भारतीय सिनेमा में हिंदी फ़िल्म और टीवी अभिनेता हैं।
1964 – अजय माकन – भारतीय राजनीतिज्ञ
1964 – दिनेश शर्मा – राजनीतिज्ञ तथा उत्तर प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री।
1972 – प्रियंका गांधी – भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की वर्तमान अध्यक्ष
1990 – मनोज सरकार – भारत के पैरा बैडमिंटन खिलाड़ी हैं।
1991 – हरिका द्रोणावल्ली – भारत की तेजतर्रार महिला शतरंज खिलाड़ी हैं।
1999 – आर्या राजेंद्रन – तिरुवनंतपुरम की सबसे कम उम्र की नवनियुक्त महापौर हैं।
निधन
1924- गोपीनाथ साहा- पश्चिम बंगाल के स्वतंत्रता सेनानी।
1934 – सूर्य सेन – भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले प्रसिद्ध क्रांतिकारी।
1941 – प्यारे लाल शर्मा – भारतीय क्रांतिकारियों में से एक थे।
1966 – नरहर विष्णु गाडगिल – राजनेता, अर्थशास्त्री, लेखक व भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और संविधान सभा के सदस्य थे।
1976 – अगाथा क्रिस्टी – दुनिया के जाने माने जासूसी उपन्यासकारों में से एक।
1992 – कुमार गंधर्व – भारत के प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक।
2000 – वी. आर. नेदुनचेजियन – तीन बार तमिल नाडु राज्य के कार्यवाहक मुख्यमंत्री रहे।
2004 – रामकृष्ण हेगड़े – जनता पार्टी के राजनीतिज्ञ थे, जो कर्नाटक के भूतपूर्व मुख्यमंत्री थे।
2005 – अमरीश पुरी – भारतीय सिनेमा के प्रसिद्ध अभिनेता और खलनायक।
महत्वपूर्ण दिवस
-राष्ट्रीय युवा दिवस।
-अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह दिवस (10 दिवसीय)।
-राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा सप्ताह 11 जनवरी- 17 जनवरी तक।