उत्तर प्रदेश पुलिस में फेरबदल

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उत्तर प्रदेश पुलिस में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल हुआ है। यहां 28 आईपीएस अधिकारियों का तबादला कर दिया गया है। उत्तर प्रदेश सरकार ने आईपीएस अधिकारियों की नई तैनाती में श्री राजीव सभरवाल को पुलिस महानिदेशक, प्रशिक्षण एवं आधुनिकीकरण, लखनऊ नियुक्त किया है। इसके साथ ही उन्हें डॉ. भीमराव अंबेडकर पुलिस अकादमी, मुरादाबाद का भी अतिरिक्त प्रभार दिया गया है

आईपीएस ए. सतीश गणेश को अपर पुलिस महानिदेशक, यातायात एवं सड़क सुरक्षा, लखनऊ की जिम्मेदारी दी गई है। श्री के. सत्यनारायण को अपर पुलिस महानिदेशक, नियम एवं प्रशासन लखनऊ बनाया गया है। विजय सिंह मीना को पुलिस महानिदेशक, महिला एवं बाल सुरक्षा संगठन, लखनऊ नियुक्त किया है।आलोक कुमार श्रीवास्तव को विशेष जांच प्रकोष्ठ, लखनऊ भेजा गया है। शुभम पटेल को पुलिस अधीक्षक, पीएसी मुख्यालय, लखनऊ की जिम्मेदारी मिली है।

चक्रपाणि त्रिपाठी को पुलिस अधीक्षक, प्रतापगढ़ बनाया गया है। मनोज कुमार अवस्थी को पुलिस अधीक्षक, 12वीं बटालियन पीएसी, फतेहपुर भेजा गया है। इसके अलावा रोहन पी. को अपर पुलिस अधीक्षक, साइबर क्राइम, लखनऊ नियुक्त किया गया है।मेघनाथ सिंह को सेनानायक, 5वीं बटालियन पीएसी, सहारनपुर भेजा गया है। वहीं अन्य अधिकारियों को भी अलग-अलग जिलों और यूनिट्स में तैनाती दी गई है।बिजनोर के भी अपर पुलिस अधीक्षक हटाएं गए हैं।

तबादले वाले अधिकारियों की सूची

नेपाल में आंदोलन में झड़प , 20 मरे, 250 घायल

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नेपाल में सोशल मीडिया पर प्रतिबंध के बाद Gen-Z हिंसक हुए आंदोलन में में अब तक 20 लोगों की मौत हो चुकी है। नेपाली मीडिया के अनुसार मृतकों में 16 काठमांडू और 2 इटाहारी के हैं। प्रदर्शनों में 250 से अधिक लोग घायल भी हुए हैं ।इनमें प्रदर्शनकारी सुरक्षाकर्मी और पत्रकार शामिल हैं। आंदोलनकारियों पहले सुरक्षाबलों ने लाठीचार्ज किया। आंसू गैस के गोले छोड़े और रबर बुलेट से भीड़ को नियंत्रित करने की कोशिश की । स्थिति बिगड़ने के बाद सेना को उतारना पड़ा। नेपाल के कई शहरों में कर्फ्यू (Nepal Curfew) लगा दिया गया है।भारत से सटी नेपाल की सीमा पर चौकसी बढ़ा दी गई है। नेपाल में सभी परीक्षाएं भी स्थगित कर दी गई हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सुरक्षाबल उन पर गोलियां चला रहे हैं। वहीं ट्रॉमा सेंटर और सिविल अस्पतालों में भी झड़प की खबरें मिल रही हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नेपाल में इस वक्त राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। प्रधानमंत्री आवास पर आपातकालीन कैबिनेट मीटिंग बुलाई गई है । इसमें नेपाल के गृहमंत्री रमेश लेखक ने नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देने की घोषणा की है। छात्र सड़कों से हटने को तैयार नहीं हैं।दरअसल नेपाल में सरकार द्वारा सोशल मीडिया कंपनियों के एक हफ्ते के भीतर नियमों के तहत रजिस्टर करने का अल्टीमेटम दिया था। डेडलाइन पूरी होने के बाद भी मेटा, गूगल समेत दर्जनभर प्लेटफॉर्म्स ने रजिस्ट्रेशन नहीं कराया गया था। इसके बाद ओली सरकार ने कार्रवाई करते हुए इन प्लेटफॉर्म्स को बैन करने का फैसला किया था।सरकार के इसी फैसले के विरोध में नेपाल के युवा सड़कों पर उतर आए। पहले सुरक्षाबलों ने लाठीचार्ज किया। आंसू गैस के गोले छोड़े और रबर बुलेट से भीड़ को नियंत्रित करने की कोशिश की । स्थिति बिगड़ने के बाद सेना को उतारना पड़ा। नेपाल के कई शहरों में कर्फ्यू (Nepal Curfew) लगा दिया गया है। वहीं घायल हुए लोगों के लिए मुफ्त इलाज की घोषणा की गई है।

नेपाल में युवाओं का हालिया आंदोलन, जिसे “जेन जी रिवोल्यूशन” (Gen Z Revolution) भी कहा जा रहा है, सोशल मीडिया पर सरकार के प्रतिबंध के विरोध में शुरू हुआ है। हालांकि, यह केवल सोशल मीडिया बैन का विरोध नहीं है, बल्कि यह आंदोलन भ्रष्टाचार, कुशासन और असमानता के खिलाफ भी युवाओं के गुस्से को दर्शाता है। नेपाल सरकार ने हाल ही में फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब और व्हाट्सएप जैसे 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बैन लगा दिया है। सरकार ने इसका कारण यह बताया है कि ये प्लेटफॉर्म नेपाल के कानूनों का पालन नहीं कर रहे हैं। युवाओं का मानना है कि यह कदम उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाने का प्रयास है। युवाओं में सरकार के खिलाफ लंबे समय से गुस्सा है, खासकर भ्रष्टाचार और कुशासन को लेकर। वे महसूस करते हैं कि राजनीतिक अभिजात वर्ग अपने बच्चों को विदेश में भेजकर और विलासितापूर्ण जीवन जीकर अवैध रूप से कमाई गई दौलत का प्रदर्शन कर रहा है, जबकि आम लोग गरीबी और बेरोजगारी से जूझ रहे हैं।

​आदोंलन को देखते हुए सरकार ने कई इलाकों में कर्फ्यू लगा दिया है, जिसमें संसद भवन और प्रधान मंत्री निवास के आसपास के क्षेत्र शामिल हैं।​प्रदर्शनकारियों द्वारा बैरिकेड्स तोड़ने और संसद भवन में प्रवेश करने की कोशिश के बाद यह कदम उठाया गया।नेपाल के गृह मंत्री रमेश लेखक ने आंदोलन में हुई मौतों की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया है।

​आंदोलन काठमांडू के अलावा नेपाल के अन्य शहरों जैसे पोखरा, बुटवल, नेपालगंज, और विराटनगर में भी फैल गया है।इस आंदोलन का नेतृत्व मुख्य रूप से “जनरेशन ज़ेड” (Gen Z) के युवा कर रहे हैं, जो डिजिटल तकनीक से परिचित हैं।​प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे शांतिपूर्ण विरोध कर रहे थे, लेकिन पुलिस की हिंसा ने इसे हिंसक बना दिया।

यह आंदोलन नेपाल सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है, जो पहले से ही भ्रष्टाचार और कुशासन के आरोपों का सामना कर रही है।सरकार को न केवल सोशल मीडिया पर प्रतिबंध के मुद्दे को हल करना होगा, बल्कि युवाओं के गहरे असंतोष को भी संबोधित करना होगा।इस आंदोलन ने नेपाल में एक नई क्रांति ला दी है, जो दर्शाता है कि युवा अब अपनी आवाज़ उठाना चाहते हैं और देश के भविष्य को बदलना चाहते हैं।

राहुल की सियासी संजीवनी का फैसला

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बाल मुकुन्द ओझा
इसमें कोई दो राय नहीं है कि कांग्रेस के सर्वमान्य नेता राहुल गांधी अपनी और पार्टी की साख बचाने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे है। सियासत के जानकारों का मानना है बिहार के चुनाव कांग्रेस को सियासी संजीवनी देने का फैसला करेंगे। हाल ही राहुल गांधी द्वारा निकाली गई वोटर अधिकार यात्रा में उमड़ी भीड़ से राहुल और कांग्रेस काफी उत्साहित है। इसी बीच प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की एक लक्खी रैली के आयोजन के माध्यम से भाजपा ने राहुल की यात्रा को पंक्चर करने का प्रयास किया। राहुल गांधी की यात्रा ने बिहार में 1300 किलोमीटर का सफर तय किया और 23 जिलों के 110 विधानसभा क्षेत्रों को कवर किया। अब देखने की बात यह है कि राहुल गांधी की वोटर अधिकार यात्रा ने क्या हासिल किया और बिहार कांग्रेस के लिए क्या बदल गया है। हालांकि भीड़ किसी जीत का सही पैमाना नहीं है। मगर अपनी पार्टी के लिए यह वातावरण के निर्माण में सहयोगी हो सकती है। पिछले दो सालों में कांग्रेस पार्टी हिंदी पट्टी के तीन राज्यों सहित महाराष्ट्र और हरियाणा तथा लोकसभा चुनाव हारने के बाद घायल शेर की तरह दहाड़ रही है। कांग्रेस ने चुनाव जीतने के लिए हर हथकंडे का उपयोग किया। यहाँ तक की संसद भी चलने नहीं दी जा रही है। ईडी, सीबीआई और चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं पर तरह तरह के आरोपों की झड़ी लगाई। बिहार में अपनी यात्रा के दौरान एक नया आरोप और आरोपों की लिस्ट में जुड़ गया। राहुल गाँधी ने कहा नरेंद्र मोदी ने गुजरात चुनाव वोट चोरी से जीता। लोकसभा चुनाव वोट चोरी से जीतने का आरोप तो वे कई बार दोहरा चुके है। अब बिहार चुनाव उनकी संजीवनी का सहारा है। दूसरी तरफ बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा को मुश्किलों में देखकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने महाराष्ट्र और हरियाणा की तर्ज पर बिहार में सक्रिय भूमिका निभाने के संकेत दिए हैं।
लगातार लोकसभा चुनाव हारने के बात कांग्रेस के नेता समय समय पर इस प्रकार के बयान देते रहे है। राहुल गाँधी का वह चर्चित बयान याद कीजिये जिसमें उन्होंने कहा था, अगर राफेल की जांच शुरू हुई, पीएम मोदी जेल जाएंगे। बाद में राहुल गांधी ने सुप्रीम कोर्ट में खेद जताकर माना है कि वह राफेल डील पर आरोप राजनीति से प्रेरित होकर लगा रहे थे। उन्होंने बिना किसी आधार के केन्द्र सरकार की सुरक्षा डील पर सवाल उठाया। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे भी बिना सिर पैर के आरोप लगाने में पीछे नहीं रहे है। खरगे भी एक बार यह कह चुके है, अगर हमें 20 सीटें और आ जाती तो ये सारे लोग जेल में होते। ये लोग जेल में रहने के लायक हैं।
गांधी अपनी पार्टी कांग्रेस के गिरते जनाधार से बेहद चिंतित है और देशभर के दौरे कर पार्टी को मज़बूत करने के प्रयास में जुटे है। वैसे हर नेता का दायित्व है वह अपनी पार्टी की साख बनाये, और इसी काम में राहुल लगातार लगे है। राहुल गांधी दिल्ली सहित हरियाणा और महाराष्ट्र में पार्टी की हार से हताश है। राहुल लगातार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमलावर है और ऐसा कोई भी मौका नहीं चुकते जब उनके निशाने पर मोदी होते है। यही नहीं राहुल ने देश की सवैंधानिक संस्थाओं यथा चुनाव आयोग, न्यायालय और प्रेस पर भी समय समय पर हमला बोला है। राहुल हमेशा मोहब्बत की बात करते है मगर मोदी और आरएसएस के बारे में अपनी नफरत छुपा नहीं पाते। हालाँकि वे कहते है मैं मोदी से नफरत नहीं करता। लोकसभा में विपक्ष का नेता बनने के बाद राहुल कुछ अधिक ही उत्साहित हो रहे है। उन्हें होना भी चाहिए मगर विदेशी धरती पर जाकर मोदी और संवैधानिक संस्थाओं पर बेसिरपैर के आरोप लगाना देशवासियों के गले नहीं उतरता। राहुल के बयानों पर भाजपा आग बबूला हो रही है वहां इंडि गठबंधन की सहयोगी पार्टियां राहुल के बयानों का समर्थन कर अपनी एकजुटता प्रदर्शित कर रही है। नेता विपक्ष बनने के बाद राहुल गांधी के गुस्से में बढ़ोतरी देखी जा रही है। राहुल गांधी को बहुत गुस्सा आता है जब लोग उन्हें तरह तरह की उपमाओं से नवाजते है। राहुल कई बार यात्राएं निकालकर लोगों के बीच गए। हर तबके के लोगों से मिले। उनका प्यार भी उन्हें मिला। राहुल गांधी की एक दशक की सियासी यात्रा पर दृष्टिपात करें तो पाएंगे कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने मोदी पर तरह तरह के आरोप लगाए। गौरतलब है राहुल ने देश की सवैंधानिक संस्थाओं यथा चुनाव आयोग, न्यायालय और प्रेस पर भी समय समय पर हमला बोला है।


बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

कुलगाम में मुठभेड़ में दो आतंकी मरे, दो जवान भी शहीद

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जम्मू-कश्मीर के कुलगाम जिले के गुड्डार इलाके में आतंकियों के साथ सुरक्षाबलों की मुठभेड़ में दो आतंकी मारे गए।, दो जवान के शहीद होने की सूचना है।मुठभेड़ अभी चल रही है। तलाशी अभियान के दौरान आतंकियों ने सुरक्षाबलों पर फायरिंग की। इसके बाद सुरक्षाबलों ने भी जवाब दिया। दो आतंकी मारे गये । इलाके में तलाशी अभियान जारी है।

कश्मीर जोन पुलिस के अनुसार कुलगाम के गुड्डर जंगल में मुठभेड़ हो रही है। तलाशी अभियान के दौरान जंगल में छिपे आतंकियों ने सुरक्षाबलों पर फायरिंग की है, सुरक्षाबलों ने भी मुंहतोड़ जवाब दिया है। दोनों तरफ से तेज गोलीबारी हुई।

रिश्तों की गरिमा की पुनर्स्थापना का यक्ष प्रश्न

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अशोक मधुप
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आज जगह – जगह रिश्तों का खून हो रहा है। हैं।हालत यह है कि बाप बेटी को मार रहा है ।बेटी बाप को मार रही है ।पति-पत्नी को मार रहा है। पत्नी −पति की हत्याकर रही है।भाई− बहिन को मारते नही झिझक रहा तो भाई की हत्या करते बहन के हाथ नही कांप रहे।मां − बेटे और बेटी का हत्या कर रही है तो बेटा और बेटी मां को ही नही बाप की भी हत्या कर रहे हैं।ऐसा लगता है कि भारत की परिवार व्यवस्था टूट चुकी है। रिश्तों पर स्वार्थ हावी हो गया है।
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आज समाज का सबसे दुखद और चिंताजनक पहलू यह है कि जिन रिश्तों को सबसे पवित्र और मजबूत माना जाता है, वहीं रिश्ते टूट रहे हैं और हिंसा का शिकार हो रहे हैं। समाचार पत्र और टीवी चैनल लगभग रोज़ाना ऐसी ख़बरें दिखाते हैं।हालत यह है कि बाप बेटी को मार रहा है ।बेटी बाप को मार रही है ।पति-पत्नी को मार रहा है। पत्नी −पति की हत्याकर रही है।भाई− बहिन को मारते नही झिझक रहा तो भाई की हत्या करते बहन के हाथ नही कांप रहे।मां बेटे और बेटी का हत्या कर रही है तो बेटा और बेटी मां को ही नही बाप की भी हत्या कर रहे हैं।ऐसा लगता है कि भारत की परिवार व्यवस्था टूट चुकी है। रिश्तों पर स्वार्थ हावी हो गया है। व्यक्तिवाद ने समाज पर अपना अधिकार कर लिया।
इन घटनाओं ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि आखिर इंसान को इतना निर्दयी और क्रूर कौन बना रहा है? जिन संबंधों में विश्वास, अपनापन और प्रेम होना चाहिए, वहां नफरत, तनाव और हिंसा क्यों बढ़ रही है?लगता है कि भारतीय परिवार टूटने का असर यह हुआ है कि एकल परिवार अब अपने तक सीमित होने की जद्दोजहद में है।पहले संयुक्त परिवार होते है।सामूहिक चूल्हा होता था। सामूहिक खान − पान था। हमारे बचपन तक खाना रसोई के पास जमीन पर बैठकर जीमा जाता था।परिवार के बुजुर्ग बच्चे साथ बैठकर भोजन करते थे। सब दुख− सुख के साथी थे।प्रायः जरूरत के सामान सब घर के आसपास मिल जाते थे।धीरे – धीरे परिवार की जरूरते बढ़ने लगीं। युवक रोजगार के लिए बाहर जाने लगे।धीरे− धीरे उनके साथ पत्नी और बच्चे नौकरी वाले स्थान पर रहने लगे। आज आदमी अपने तक सीमित होकर रह गया। व्यक्तिवाद हावी हो गया।
लगता है कि जैसे समाज ने सारे रिश्ते जंगल बनाकर रहेंगे। हम आदि व्यवस्था से भी आदम की ओर बढ़ते जा रहे हैं ।इन सब रिश्तों को दोबारा कैसे जिंदा किया जाए इस पर विचार करना
होगा।पहले के समय में संयुक्त परिवार होते थे। परिवार के बुज़ुर्ग विवादों को संभालते, बच्चों को संस्कार देते और छोटी-छोटी गलतियों को समय रहते सुधार लेते। आज अधिकांश परिवार ‘न्यूक्लियर फैमिली’ यानी छोटे परिवार बन गए हैं। ऐसे में
पति-पत्नी के झगड़े सुलझाने वाला कोई नहीं होता।माता-पिता और बच्चों के बीच पीढ़ीगत संवाद टूट गया है।अकेलापन और अवसाद घर कर जाता है।जब संवाद टूटता है तो ग़लतफ़हमियाँ बढ़ती हैं और छोटी-सी बात हिंसा तक पहुँच जाती है।
पहले मोहल्ले और गाँव के लोग भी परिवार के सदस्य जैसे होते थे। यदि किसी परिवार में कलह होती थी तो पड़ोसी हस्तक्षेप करके सुलह करा देते थे। आज लोग एक-दूसरे से अलग-थलग हो गए हैं।‘निजता’ के नाम पर लोग किसी के मामलों में बोलना नहीं चाहते।इस चुप्पी का नतीजा है कि छोटे विवाद हिंसक रूप ले लेते हैं।परिवारों में हिंसा का एक बड़ा कारण आर्थिक तनाव भी है।महँगाई, बेरोज़गारी और आर्थिक असमानता ने लोगों को चिड़चिड़ा बना दिया है।पिता बेरोज़गार बेटे पर गुस्सा निकालते हैं, बेटा अपमानित होकर पिता की हत्या तक कर देता है।पति-पत्नी के बीच आर्थिक जिम्मेदारियों को लेकर झगड़े होते हैं जो कभी-कभी खून-खराबे में बदल जाते हैं।शराब, ड्रग्स और अन्य नशे परिवारिक हिंसा की जड़ हैं। नशे में व्यक्ति का विवेक खत्म हो जाता है और वह अपने ही परिवार को मारने तक से नहीं हिचकिचाता। भारत में लगभग 30 प्रतिशत घरेलू हिंसा के मामलों में नशे को मुख्य कारण माना गया है।
आज के समय में शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी या पैसा कमाना रह गया है। बच्चों को नैतिक शिक्षा, संस्कार और धैर्य सिखाने की परंपरा कमजोर हो चुकी है।सम्मान और सहनशीलता की जगह ‘आत्मकेंद्रितता’ बढ़ रही है।लोग रिश्तों को बोझ समझने लगे हैं।आपसी विश्वास और त्याग की भावना खत्म हो रही है।यही कारण है कि भाई-बहन, पति-पत्नी, माँ-बेटे जैसे पवित्र रिश्ते भी हत्या जैसे अपराध तक पहुँच जाते हैं।
मोबाइल, टीवी, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने जीवन की धारा को बदला है।युवा वर्ग आभासी (Virtual) दुनिया में ज्यादा जी रहा है।परिवार को समय न देकर ‘फ्रस्ट्रेशन’ (तनाव) में डूब जाता है।अपराध आधारित वेब सीरीज़ और हिंसक वीडियो गेम ने भी संवेदनाओं को कुंद कर दिया है।लोग वास्तविक जीवन में भी गुस्से और हिंसा को सामान्य मानने लगे हैं।
आज मानसिक स्वास्थ्य सबसे बड़ी समस्या है। डिप्रेशन, तनाव और मनोविकृति से पीड़ित लोग अक्सर हिंसा की ओर बढ़ जाते हैं।कई बार माता-पिता अवसाद में आकर अपने ही बच्चों की हत्या कर देते हैं।युवा अवसादग्रस्त होकर माता-पिता पर हमला कर बैठते हैं।मानसिक रोगों की पहचान और इलाज की व्यवस्था की कमी के कारण ऐसी घटनाएँ बढ़ रही हैं।परिवारों में संपत्ति विवाद हिंसा का बड़ा कारण है।भाई-भाई की हत्या कर देते हैं।बेटे-बेटियाँ माँ-बाप की संपत्ति हथियाने के लिए उन्हें मौत के घाट उतार देते हैं।ज़मीन-जायदाद के झगड़े अक्सर खून-खराबे तक पहुँच जाते हैं।
पारिवारिक हिंसा सिर्फ़ अपराध नहीं है, बल्कि समाज की चेतावनी भी है। यह हमें बताता है कि हम रिश्तों के मूल्य, संस्कारों और आपसी संवाद को खोते जा रहे हैं। अगर समय रहते सुधार नहीं किया गया तो परिवार जैसी संस्था ही कमजोर हो जाएगीहमें यह समझना होगा कि पैसा, आधुनिकता और तकनीक से ज़्यादा महत्वपूर्ण मानवता, प्रेम और विश्वास है। यदि रिश्तों में करुणा, धैर्य और संवाद कायम रहेगा तो न बाप बेटी को मारेगा, न बेटी बाप को, न पति पत्नी पर हाथ उठाएगा और न ही भाई-बहन, माँ-बाप, बेटे-बेटी हत्या तक पहुँचेंगे।

अशोक मधुप
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

हरियाणा में डेंगू का प्रकोप ,जनता बीमार, प्रशासन लाचार

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हरियाणा में डेंगू का प्रकोप तेज़ है, लेकिन नगर निकायों के पास फॉगिंग मशीनों की भारी कमी है। प्रदेश के 87 निकायों में केवल 426 मशीनें उपलब्ध हैं, जो आवश्यकतानुसार बेहद कम हैं। मशीनों की कमी के कारण न तो शहरों में और न ही ग्रामीण इलाकों में नियमित फॉगिंग अभियान चल पाए हैं। 1200 से अधिक गाँव जलभराव से जूझ रहे हैं, जिससे खतरा और बढ़ गया है। स्वास्थ्य विभाग और निकायों की लापरवाही से जनता पर बीमारी का संकट गहराता जा रहा है। ठोस कार्ययोजना और पर्याप्त संसाधन ही डेंगू से सुरक्षा का रास्ता हैं।

 – डॉ. सत्यवान सौरभ

डेंगू का नाम सुनते ही लोगों के मन में डर बैठ जाता है। हर साल मानसून के बाद बरसात के दिनों में जब मच्छरों का प्रकोप बढ़ता है, तो डेंगू के मामले तेजी से सामने आने लगते हैं। बुखार, सिरदर्द, शरीर में दर्द और प्लेटलेट्स की कमी से पीड़ित मरीजों की संख्या अस्पतालों में बढ़ने लगती है। सरकारें हर वर्ष दावा करती हैं कि मच्छरों की रोकथाम और फॉगिंग के इंतज़ाम पूरे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत बिल्कुल उलट होती है। हाल ही में सामने आई रिपोर्ट ने हरियाणा के स्वास्थ्य तंत्र और स्थानीय निकायों की तैयारियों पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। प्रदेश के 87 नगर निकायों में डेंगू और मच्छर जनित बीमारियों से निपटने के लिए मात्र 426 फॉगिंग मशीनें ही उपलब्ध हैं। यानी लगभग हर निकाय के हिस्से में औसतन पाँच मशीनें भी नहीं आतीं। जबकि स्थिति यह है कि एक मध्यम आकार के शहर में ही डेंगू पर काबू पाने के लिए 20–25 मशीनें आवश्यक मानी जाती हैं। ऐसे में पूरे प्रदेश के स्तर पर मशीनों की यह कमी सीधा संदेश देती है कि प्रशासनिक लापरवाही किस हद तक हावी है।

डेंगू एक ऐसी बीमारी है जिसका सीधा इलाज एंटीबायोटिक दवाइयों से संभव नहीं है। यह मच्छरों से फैलने वाला वायरल संक्रमण है और रोगी के शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर ही उपचार टिका होता है। अधिकतर मामलों में डेंगू का वायरस शरीर की प्लेटलेट्स तेजी से घटा देता है। समय पर इलाज न मिलने पर यह स्थिति जानलेवा हो सकती है। भारत में हर साल लाखों लोग डेंगू से प्रभावित होते हैं और हजारों मौतें भी होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी डेंगू को दुनिया के सबसे तेजी से फैलने वाले वायरल रोगों में गिनता है। इसलिए रोकथाम ही सबसे बड़ा हथियार है। मच्छरों को पनपने से रोकना, जलभराव हटाना और समय-समय पर फॉगिंग करना — यही डेंगू पर नियंत्रण के सबसे कारगर उपाय हैं। लेकिन जब यही इंतज़ाम कमजोर पड़ जाएं, तो बीमारी का फैलाव तेज़ी से होता है।

हरियाणा के नगर निकायों के पास फॉगिंग मशीनों की संख्या न सिर्फ कम है बल्कि जिन मशीनों का इस्तेमाल किया जा रहा है, उनमें से कई पुराने और खराब हालत में हैं। यह स्थिति स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति राज्य सरकार और निकायों की उदासीनता को उजागर करती है। फॉगिंग का महत्व इस बात से समझा जा सकता है कि यह मच्छरों के जीवन चक्र को तोड़ती है। मच्छर के अंडे से निकलने और उनके वयस्क होने की प्रक्रिया पर फॉगिंग सीधा असर डालती है। यदि यह नियमित अंतराल पर हो तो मच्छरों की संख्या तेजी से कम हो सकती है। लेकिन जब मशीनें ही उपलब्ध न हों, तो फॉगिंग का अभियान केवल कागजों में रह जाता है।

यह समस्या सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं है। प्रदेश के 1200 से अधिक गाँव जलभराव की समस्या से जूझ रहे हैं। गाँवों में नालियों की सफाई और कचरे के निस्तारण की व्यवस्था कमजोर है। पंचायतों के पास न तो पर्याप्त बजट है और न ही तकनीकी संसाधन। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में डेंगू और मलेरिया का प्रकोप और भी खतरनाक हो सकता है। सरकारी नीतियों में बार-बार शहरी क्षेत्रों पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाएँ और रोकथाम अभियान बिल्कुल नाममात्र के रह जाते हैं।

इस स्थिति की सबसे बड़ी जिम्मेदारी स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय निकायों पर आती है। हर साल डेंगू का मौसम आता है और हर बार प्रशासन अचानक हाथ-पैर मारता है। जबकि यह समस्या नई नहीं है। फॉगिंग मशीनें सालभर सक्रिय रहनी चाहिए और नियमित अंतराल पर उनका रखरखाव होना चाहिए। लेकिन निकायों के पास अक्सर यह तर्क होता है कि बजट की कमी है। सवाल यह उठता है कि जब स्वास्थ्य सेवाओं पर ही खर्च नहीं होगा तो विकास का दावा किस आधार पर किया जाएगा?

मशीनों की कमी और लापरवाही का सीधा असर आम जनता पर पड़ता है। हर साल हजारों परिवार डेंगू से प्रभावित होते हैं। एक बार किसी घर का सदस्य डेंगू से बीमार हो जाए तो उस परिवार पर मानसिक, शारीरिक और आर्थिक बोझ बढ़ जाता है। अस्पतालों में भर्ती का खर्च, दवाइयों और प्लेटलेट्स की कमी का संकट, लंबे समय तक काम और पढ़ाई से दूरी, बीमारी का डर और असुरक्षा—ये सभी पहलू जनता को झकझोरते हैं। खासकर गरीब और मध्यम वर्ग के परिवार सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं क्योंकि उनके पास महंगे इलाज का साधन नहीं होता।

सरकार और प्रशासन को चाहिए कि इस स्थिति से सबक लें। सबसे पहले फॉगिंग मशीनों की संख्या बढ़ाई जाए और हर निकाय को पर्याप्त मशीनें दी जाएं। केवल आपातकालीन हालात में नहीं बल्कि पूरे वर्ष तय अंतराल पर फॉगिंग होनी चाहिए। पंचायतों को बजट और मशीनें उपलब्ध कराकर ग्रामीण क्षेत्रों में मच्छरनाशी अभियान चलाना आवश्यक है। जनता को भी जागरूक किया जाए कि घरों में पानी जमा न होने दें, कूलर व टंकियों को ढककर रखें। अस्पतालों में डेंगू टेस्ट, दवाइयों और प्लेटलेट्स की पर्याप्त व्यवस्था समय रहते की जाए।

डेंगू हर साल एक बार नहीं बल्कि अब स्थायी खतरे के रूप में सामने आ चुका है। बदलते मौसम, बढ़ते शहरीकरण और जलभराव की समस्याओं ने इसकी जड़ें और गहरी कर दी हैं। ऐसे में केवल घोषणाओं से काम नहीं चलेगा। फॉगिंग मशीनों की कमी और प्रशासनिक उदासीनता न केवल लापरवाही है बल्कि लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ भी है। सरकार को चाहिए कि इस समस्या को आपदा प्रबंधन की तरह प्राथमिकता दे और हर निकाय को संसाधन उपलब्ध कराए। जनता भी अपनी जिम्मेदारी समझे और घर-आसपास पानी जमा न होने दे। प्रशासन और समाज के संयुक्त प्रयासों से ही डेंगू पर काबू पाया जा सकता है। आज जरूरत है एक ठोस कार्ययोजना की, वरना डेंगू हर साल नए रूप में दस्तक देता रहेगा और स्वास्थ्य तंत्र की कमजोरियों को उजागर करता रहेगा।

 – डॉ. सत्यवान सौरभ

(ये लेखक के अपने विचार है)

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पंजाब जल प्रलय : दुनिया के मददगारों को आज मदद की दरकार

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तनवीर जाफ़री
भारत का “अन्न भंडार” कहा जाने वाला देश की खाद्य आपूर्ति के लिए सबसे महत्वपूर्ण राज्य पंजाब इन दिनों जल प्रलय जैसे अति गंभीर संकट से जूझ रहा है। कुछ स्रोतों के अनुसार राष्ट्रीय खाद्य भंडार में पंजाब लगभग 45 प्रतिशत अनाज का योगदान करता है। इसमें देश के गेहूं उत्पादन में लगभग 22 प्रतिशत और चावल उत्पादन में लगभग 12प्रतिशत का योगदान शामिल है। इसीलिए पंजाब देश की खाद्य आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण राज्य है। इसके अलावा इसी पंजाब का किसान भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में ज़रूरतमंदों की हर तरह की मदद करने के लिये पहली पंक्ति में खड़ा नज़र आता है। चाहे वह युद्ध की विभीषिका से जूझने वाले लोग हों या भूकंप,सुनामी अथवा बाढ़ से प्रभावित लोग,शरणर्थियों की मदद करनी हो या कोरोना जैसे विश्वस्तरीय संकटकाल में लोगों को मुफ़्त भोजन व अन्य सुविधायें उपलब्ध कराना हो, पंजाब की यह क़ौम हमेशा सबसे आगे खड़ी नज़र आई है। न यह धर्म देखते हैं न देश, न सीमा न जाति या भाषा। इन्हें प्रत्येक मानव की पीड़ा अपनी पीड़ा महसूस होती है और यह क़ौम तन मन धन से एकजुट होकर मदद करने को खड़ी हो जाती है। आज पूरे देश में न जाने कितने गुरुद्वारे दिन रत ज़रूरतमंदों को लंगर उपलब्ध कराते हैं। देश बार में स्वास्थ्य सम्बन्धी दर्जनों प्रयोगशालाएं व अस्पताल इनके सौजन्य से संचालित हो रहे हैं।
दुर्भाग्यवश आज हमारे देश का यही पंजाब प्राकृतिक प्रकोप से जूझ रहा है। इन दिनों जम्मू कश्मीर,हिमाचल प्रदेश व उत्तरांचल सहित केवल पंजाब में आई भीषण बाढ़ से राज्य के सभी 23 ज़िले प्रभावित हैं। राज्य में अब तक दर्जनों लोगों की मौत या उनके लापता होने के समाचार हैं। इस जल प्रलय से पंजाब के लाखों लोग प्रभावित हुए हैं। क़रीब 2000 गांव जलमग्न हो गए हैं। अनुमान के अनुसार बाढ़ ने लगभग 18 लाख हेक्टेयर खेतों की फ़सलें बर्बाद कर दी हैं। बासमती फ़सल को तो भारी नुक़्सान हुआ है। अभी तक 600 करोड़ से अधिक के नुक़सान का अनुमान लगाया जा रहा है। सरकारी व अनेक ग़ैर सरकारी स्वयंसेवी संगठनों द्वारा राहत और बचाव कार्य तेज़ी से चलाया जा रह है। हज़ारों बाढ़ पीड़ितों को सुरक्षित जगहों पर या राहत शिविरों में पहुँचाया जा चुका है।
इसी दौरान शौर्य समर्पण व बलिदान की इस धरती से बड़े ही ह्रदय विदारक दृश्य सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। हज़ारों गायें भैंसें तेज़ बहाव में बहकर लापता हो गई हैं। पूरी पूरी डेयरियां जल प्रलय का शिकार हो गयी हैं। लोगों के खेतों में वर्तमान फ़सल तो बर्बाद हुई ही है परन्तु ऐसी संभावना भी है कि खेतों में रेत की मोटी परत बैठ जाने के चलते अनिश्चितकाल के लिये इन खेतों की अपनी उर्वरक क्षमता भी समाप्त हो जाएगी। गोया इस जल प्रलय के चलते आने वाले वर्षों में देश की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होने की संभावना है।
बहरहाल आज पीड़ा की इस घड़ी में पंजाब के किसानों के साथ पूरा देश खड़ा दिखाई दे रहा है। अक्षय कुमार,दिलजीत दोसांझ,रणदीप हुड्डा,सोनू सूद,प्रीटी जिंटा,करीना कपूर,विक्की कौशल,एमी विर्क,राज कुंद्रा,गुरु रंधावा,गिप्पी ग्रेवाल,करण औजला,सुनंदा शर्मा,शाहरुख़ ख़ान , आलिया भट्ट, करण जौहर,हरभजन सिंह,मनकीरत औलख,बब्बू मान, रणजीत बावा,सोनम बाजवा ,संजय दत्त,अजय देवगन, कपिल शर्मा, बादशाह, सिद्धार्थ मल्होत्रा व अनन्या पांडे जैसे अनेक फ़िल्म व कला जगत से जुड़े लोगों ने बढ़चढ़कर या तो भारी भरकम रक़म दान की है या पीड़ितों के लिये राहत शिविर स्थापित किये हैं,एम्बुलेंस दान की हैं अथवा उनके साथ अपना समर्थन व्यक्त किया है। इसी तरह मदरसा ज़ीनत उलूम,नारायणगढ़ मदरसा जमीयतुल उलूम, मेवात के मुस्लिम समुदाय के लोग व दर्जनों मस्जिदों से राहत भरे ट्रक पंजाब की ओर भेजे जा रहे हैं। ईरान ने भी भारत के पंजाब में आई भीषण बाढ़ पर गहरा दुख व्यक्त किया है। ईरान के भारत स्थित दूतावास ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म X पर जारी एक संदेश में कहा कि पंजाब में आई बाढ़ से हुए व्यापक नुक़्सान और दर्द को देखकर मन दुखी है। दूतावास ने प्रभावित लोगों और राहत कार्यों में लगे सभी के लिए प्रार्थनाएं कीं तथा भगवान से सभी की रक्षा और आशीर्वाद की कामना की। ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामनेई की ओर से भी पंजाब के बाढ़ पीड़ितों की हिफ़ाज़त और सलामती के लिए दुआएं भेजी गई हैं। ईरान के इस बयान की सोशल मीडिया पर काफ़ी सराहना की गयी है।
आज पूरे देश के हर वर्ग व हर धर्म का व्यक्ति पंजाब के इन किसानों के साथ इसीलिये खड़ा है क्योंकि गुरुनानक देव जी महाराज द्वारा किये गये ‘सच्चा सौदा ‘ के संस्कारों में परवरिश पाने वाला पंजाब का यह किसान भी बुरे वक़्त में पूरी दुनिया के साथ दुर्गम से दुर्गम परिस्थितियों में भी हमेशा खड़ा दिखाई दिया है। जहां कहीं धर्म देश या जाति देखकर लोगों की सहायता करने वाले संकीर्ण सोच के लोग मुसीबत में खड़े नहीं होते वहीँ पंजाब का यह समुदाय केवल मानवता को मद्देनज़र रखकर हमेशा हर जगह हर एक पीड़ित के साथ खड़ा दिखाई दिया है। संकट की इस घड़ी में देश के कारपोरेट घरानों व उद्योगपतियों को भी खुलकर सामने आना चाहिये। देश के उन बड़े बड़े मठों व धर्मस्थलों को भी मदद के हाथ पंजाब के जल प्रलय प्रभावित लोगों की ओर बढ़ाना चाहिये जिनके भण्डार अकूत सोने चांदी व धन सम्पदा से भरे पड़े हैं। देश के धनाढ्य कथावाचकों व धर्माधिकारियों को भी खुलकर सामने आना चाहिये। देश की बड़ी दरगाहों व जमाअतों को भी संकट में पंजाब के साथ खड़े होना चाहिये। बेशक प्रकृतिक प्रकोप के चलते दुनिया के इन मददगारों को भी आज वक़्ती तौर पर मदद की दरकार ज़रूर है परन्तु विश्वास है कि मानवता व भाईचारे की मिसाल पेश करने व संकट में सबके साथ खड़ी नज़र आने वाली यह क़ौम जल्द ही इस संकट से भी उबार जाएगी।

तनवीर जाफ़री

वरिष्ठ पत्रकार

एशिया कप में भारतीय हाकी टीम विजयी

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एशिया कप 2025 के फाइनल मैच में भारतीय हॉकी टीम ने जीत कर इतिहास रच दिया।बिहार के राजगीर में खेले गए फाइनल में भारतीय टीम ने कोरिया को 4-1 से हराया। इस विजय के साथ भाररतीय टीम चौथी बार एशिया कप की चैंपियन बनी है। साथ ही भारतीय हॉकी टीम ने वर्ल्ड कप के लिए क्वालीफाई भी कर लिया । भारत की तरफ से दिलप्रीत ने सबसे ज्यादा दो गोल किए। सुखजीत सिंह और अमित रोहिदास ने 1-1 गोल करने में सफलता हासिल की।

मुकाबले की बात करें तो, भारत की शुरुआत बेहतरीन रही। भारतीय टीम ने आक्रामक शुरुआत करते हुए पहले ही मिनट में गोल किया। कप्तान हरमनप्रीत सिंह के बेहतरीन पास पर डी के अंदर मौजूद सुखजीत सिंह ने टॉमहॉक लगाते हुए गोल दागा। इस मैच के आठवें मिनट पर भारत को पेनल्टी स्ट्रोक मिला, पर जुगराज गोल नहीं कर सके। इसके बाद दूसे क्वार्टर की समाप्ति से लगभग दो मिनट पहले ही दिलप्रीत ने मैदानी गोल करके बढ़त को दोगुना किया। 

वहीं तीसरे क्वार्टर में दोनों टीमों को पेनाल्टी कॉर्नर मिले, जिस पर कोई भी गोल नहीं हो सका। भारत की ओर से हो रहे लगातार आक्रामक प्रयासों के बीच दिलप्रीत ने अपना दूसरा और भारत के लिए तीसरा गोल किया। चौथे क्वार्टर में कोरिया से सोन डेन ने पेनाल्टी कॉर्नर पर मिले मौके पर गोल किया। मैच के आखिरी मिनटों के दौरान कोरियाई खिलाड़ियों ने तेजी से कुछ प्रयास किए, लेकिन वे इसमें नाकामयाब रहे।  

तरक़्क़ी के शहर, अकेलेपन के घर 

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(सुविधाओं की उपलब्धता ने जीवन आसान बनाया, पर सामुदायिक विश्वास, आत्मीयता और सामाजिक बंधन टूटने लगे हैं।) 

सबसे बड़ी चुनौती है सामुदायिक बंधनों का क्षरण। गाँवों में जहाँ पड़ोसियों और रिश्तेदारों के बीच गहरे संबंध होते हैं, वहीं शहरों में रहने वाले लोग अक्सर अनजानेपन और दूरी का अनुभव करते हैं। गेटेड सोसाइटी और उच्च-आय वर्गीय कॉलोनियों ने  सामाजिक जीवन को खंडित कर दिया है। लोग अपने छोटे-से घेरे में सिमट जाते हैं और “अन्य” के प्रति अविश्वास पनपने लगता है। यह प्रवृत्ति समाज में सामूहिक विश्वास और सहयोग की भावना को कमजोर करती है। शहरी जीवन का दूसरा बड़ा संकट है अकेलापन। भीड़भाड़ और व्यस्तता के बावजूद लोग व्यक्तिगत रूप से अलग-थलग पड़ जाते हैं।


-प्रियंका सौरभ 

 महानगरों में लाखों लोग रहते हैं, परंतु अधिकांश अपने पड़ोसियों को भी नहीं पहचानते। एक सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 40 प्रतिशत शहरी भारतीयों ने स्वीकार किया कि वे खुद को अकेला महसूस करते हैं। यह आँकड़ा दिखाता है कि आधुनिक शहरी जीवन ने भले ही हमें भौतिक सुविधाएँ दी हों, परंतु भावनात्मक और सामाजिक रूप से हमें कमजोर किया है। तकनीक ने भी इस अकेलेपन को बढ़ाया है। स्मार्टफोन और सोशल मीडिया पर निर्भरता ने वास्तविक मानवीय बातचीत को सीमित कर दिया है। मेट्रो या बस में सफर करते हुए अक्सर लोग एक-दूसरे से संवाद नहीं करते, बल्कि मोबाइल स्क्रीन में डूबे रहते हैं। 

शहरीकरण ने भारत के सामाजिक जीवन और मानवीय संबंधों को गहराई से प्रभावित किया है। यह केवल आर्थिक प्रगति का साधन नहीं बल्कि एक ऐसा सामाजिक परिवर्तन भी है जिसने हमारे पारंपरिक रिश्तों, विश्वास और आपसी सहयोग की प्रकृति को बदल दिया है। शहरी जीवन की रफ्तार, अवसरों की विविधता और सेवाओं तक आसान पहुँच ने निश्चित ही नागरिकों को नए विकल्प दिए हैं, परंतु इसके साथ ही यह प्रक्रिया मानवीय संवेदनाओं और सामुदायिक रिश्तों को भी चुनौती देती रही है।

शहरों के विस्तार ने लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार जैसे अवसरों के करीब लाया। पहले जहाँ ग्रामीण भारत में इन सुविधाओं तक पहुँच कठिन थी, वहीं शहरी क्षेत्रों ने इन्हें आसान बनाया। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और कोलकाता जैसे महानगरों में विश्वस्तरीय अस्पताल, विश्वविद्यालय और सांस्कृतिक केंद्र मौजूद हैं। यह स्थान केवल सेवाएँ ही उपलब्ध नहीं कराते, बल्कि ज्ञान और विचारों के आदान-प्रदान के मंच भी बनते हैं। इसी वजह से शहरी जीवन को आधुनिक भारत का इंजन कहा जाता है। यहाँ के निवासी विभिन्न भाषाई, धार्मिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आते हैं, जिससे विविधता का अनुभव होता है और सहिष्णुता की भावना विकसित होती है।

साथ ही, शहरी जीवन में सांस्कृतिक समृद्धि और नागरिक चेतना भी प्रबल होती है। कला दीर्घाएँ, पुस्तकालय, रंगमंच, साहित्यिक सभाएँ और जनआंदोलन जैसी गतिविधियाँ शहरों की पहचान रही हैं। चाहे वह कोलकाता की अकादमी ऑफ फाइन आर्ट्स हो या दिल्ली का इंडिया हैबिटेट सेंटर—ये स्थान सामूहिक संवाद और रचनात्मकता को बढ़ावा देते हैं। इसके अतिरिक्त, बेंगलुरु जैसे शहरों में आईटी उद्योग और स्टार्टअप संस्कृति ने पेशेवर सहयोग और नेटवर्किंग की नई संभावनाएँ खोली हैं। नागरिक स्वयं भी संगठित होकर अपने अधिकारों और सुविधाओं के लिए आवाज़ उठाते हैं। गुरुग्राम की आवासीय कल्याण समितियों द्वारा कचरा प्रबंधन और जलभराव के खिलाफ अभियान इसका उदाहरण हैं।

लेकिन इन सब सकारात्मक पहलुओं के बीच शहरीकरण का एक दूसरा चेहरा भी है, जो कहीं अधिक गहन सामाजिक संकट की ओर इशारा करता है। सबसे बड़ी चुनौती है सामुदायिक बंधनों का क्षरण। गाँवों में जहाँ पड़ोसियों और रिश्तेदारों के बीच गहरे संबंध होते हैं, वहीं शहरों में रहने वाले लोग अक्सर अनजानेपन और दूरी का अनुभव करते हैं। गेटेड सोसाइटी और उच्च-आय वर्गीय कॉलोनियों ने सामाजिक जीवन को खंडित कर दिया है। लोग अपने छोटे-से घेरे में सिमट जाते हैं और “अन्य” के प्रति अविश्वास पनपने लगता है। यह प्रवृत्ति समाज में सामूहिक विश्वास और सहयोग की भावना को कमजोर करती है।

शहरी जीवन का दूसरा बड़ा संकट है अकेलापन। भीड़भाड़ और व्यस्तता के बावजूद लोग व्यक्तिगत रूप से अलग-थलग पड़ जाते हैं। महानगरों में लाखों लोग रहते हैं, परंतु अधिकांश अपने पड़ोसियों को भी नहीं पहचानते। एक सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 40 प्रतिशत शहरी भारतीयों ने स्वीकार किया कि वे खुद को अकेला महसूस करते हैं। यह आँकड़ा दिखाता है कि आधुनिक शहरी जीवन ने भले ही हमें भौतिक सुविधाएँ दी हों, परंतु भावनात्मक और सामाजिक रूप से हमें कमजोर किया है।

तकनीक ने भी इस अकेलेपन को बढ़ाया है। स्मार्टफोन और सोशल मीडिया पर निर्भरता ने वास्तविक मानवीय बातचीत को सीमित कर दिया है। मेट्रो या बस में सफर करते हुए अक्सर लोग एक-दूसरे से संवाद नहीं करते, बल्कि मोबाइल स्क्रीन में डूबे रहते हैं। यह प्रवृत्ति समाजशास्त्री जॉर्ज सिमेल की उस धारणा को सही साबित करती है जिसमें उन्होंने आधुनिक शहरों को “भीड़ में अकेलेपन” का प्रतीक कहा था।

साथ ही, शहरी जीवन की भीड़-भाड़ और संसाधनों की कमी ने तनाव और संघर्ष को भी जन्म दिया है। पानी, बिजली, यातायात और पार्किंग जैसे मुद्दों पर झगड़े आम हो गए हैं। दिल्ली जैसे शहरों में पार्किंग विवाद कई बार हिंसा तक पहुँच जाते हैं। वाहन प्रदूषण और सड़क दुर्घटनाएँ भी नागरिक जीवन की असुरक्षा को बढ़ाती हैं। पैदल चलने वालों के लिए सुरक्षित स्थान कम होते जा रहे हैं, जिससे साझा सार्वजनिक जीवन घटता जा रहा है। यह कमी सामाजिक पूँजी पर सीधा आघात करती है, क्योंकि खुले और सुरक्षित सार्वजनिक स्थल ही लोगों के बीच संवाद और सहयोग को जन्म देते हैं।

इस प्रकार, शहरीकरण ने भारत के सामाजिक पूँजी पर दोतरफा असर डाला है। एक ओर इसने शिक्षा, स्वास्थ्य, विविधता और सांस्कृतिक उन्नति के अवसर दिए, तो दूसरी ओर इसने रिश्तों को सतही, अस्थिर और अविश्वासी बना दिया। आर्थिक विकास की गति में हमने भावनात्मक और सामुदायिक जीवन को पीछे छोड़ दिया।

आवश्यक है कि शहरी नियोजन केवल भौतिक ढाँचे तक सीमित न रहे, बल्कि उसमें मानवीय संबंधों की गरिमा और सामुदायिक जीवन की बहाली को भी स्थान मिले। हमें ऐसे सार्वजनिक स्थल चाहिए जहाँ लोग सहजता से मिल सकें और संवाद कर सकें। आवासीय कल्याण समितियों को केवल प्रशासनिक इकाई न मानकर सामाजिक मेलजोल और सामुदायिक उत्सवों का मंच बनाया जाए। शहरों में त्योहारों, मेलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जाए, ताकि लोग एक-दूसरे के करीब आ सकें। साथ ही, सस्ते और समावेशी आवास की नीतियाँ तैयार हों, जिससे वर्ग आधारित विभाजन कम हो सके।

भारत का भविष्य निस्संदेह शहरी होगा, परंतु यह भविष्य तभी स्थायी और समृद्ध हो सकता है जब शहरीकरण केवल आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक पूँजी का भी संवाहक बने। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि विकास की दौड़ में रिश्तों का ताना-बाना न टूटे। शहर तभी सच्चे अर्थों में प्रगतिशील बनेंगे जब वे न केवल समृद्धि और अवसर देंगे, बल्कि विश्वास, सहयोग और सामूहिक कल्याण की भावना को भी जीवित रखेंगे।


-प्रियंका सौरभ 

दस लाख की इनामी नक्सली कमांडर मारा गया

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झारखंड के गोइलकेरा थाना क्षेत्र आराहासा पंचायत के रेला गांव स्थित बुरजूवा पहाड़ी के पास रविवार के अहले सुबह पुलिस से मुठभेड़ में में दस लाख का इनामी नक्सली जोनल कमांडर अमित हांसदा उर्फ अपटन मारा गया। एसपी ने मुठभेड़ की पुष्टि की है। मुठभेड़ आज सुबह हुई। सूत्रों के अनुसार सुरक्षा बल और क्सलियों के बीच मुठभेड़ जारी है।

चाईबासा पुलिस को गुप्त सूचना मिली थी कि गोइलकेरा थाना क्षेत्र में रेला पराल क्षेत्र में नक्सली संगठन के सक्रिय सदस्य मौजूद हैं। जइसके बाद पुलिस व सीआरपीएफ टीम ने इलाके में सर्च ऑपरेशन चलाया।पुलिस की सर्च के दौरान नक्सलियों ने उन पर फायरिंग शुरू कर दी। इसके बाद दोनों ओर से गोलीबारी शुरू हो गई।सुरक्षाबलों ने पूरे पहाड़ी क्षेत्र को घेर कर नक्सलियों के भागने के रास्ते बंद करने की कोशिश की जा रही है। चाईबासा एसपी लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं । क्षेत्र में अतिरिक्त पुलिस बल को भी इलाके में भेजा गया है।