बगराम हवाई अड्डा हथियाना स्वीकार्य नहीं

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भारत ने अमेरिका द्वारा अफ़ग़ानिस्तान के बगराम हवाई ठिकाने को हथियाने की मंशा का विरोध किया है. यह विरोध मॉस्को में सात अक्टूबर को आयोजित अफ़ग़ानिस्तान पर ‘मॉस्को फॉर्मेट कंसल्टेशंस’ की सातवीं बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में व्यक्त किया गया.

इस बयान को भारत, चीन, रूस, ईरान, पाकिस्तान, कज़ाख़िस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज़्बेकिस्तान द्वारा संयुक्त रूप से जारी किया गया है.

इस बैठक में अफ़ग़ानिस्तान के तालिबान शासन के विदेश मंत्री आमिर ख़ान मुत्तक़ी को ‘समूह के एक सदस्य’ के रूप में स्वीकार किया गया है. मुत्तक़ी नौ अक्टूबर को भारत की पाँच दिनों की यात्रा पर आ रहे हैं. भारत और अन्य देशों को तालिबान शासन को मान्यता दे देनी चाहिए ताकि वहाँ विकास, शांति एवं स्थिरता को बल मिल सके.

उल्लेखनीय है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प बगराम सैन्य ठिकाने को वापस करने के लिए कई बार कह चुके हैं और उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान को धमकी भी दी है. यह हवाई अड्डा और अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सेनाओं की वापसी के समझौते पर ट्रम्प ही अपने पहले कार्यकाल में सहमत हुए थे. अगस्त 2021 में अमेरिका से भागने से पहले अमेरिकी सेना ने उस ठिकाने को छोड़ दिया था.

ट्रम्प का कहना है कि इस अड्डे को अमेरिका ने बनाया है. यह झूठ है. असल में इसे सोवियत संघ ने बनाया था. इस अड्डे को हथियाने की कोशिश एशिया में अमेरिका के हस्तक्षेप की वापसी की कोशिश का एक हिस्सा है.

−प्रकाश के राय

कहानी शकुंतला,दुष्यंत और भरत की

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महर्षि कण्व ने अप्सरा मेनका के गर्भ से उत्पन्न विश्वामित्र की कन्या शकुंतला को पाला था। देवी शकुन्तला के धर्मपिता के रूप में महर्षि कण्व की अत्यन्त प्रसिद्धि है।

महाकवि कालिदास ने अपने ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ में महर्षि के तपोवन, उनके आश्रम-प्रदेश तथा उनका, जो धर्माचारपरायण उज्ज्वल एवं उदात्त चरित प्रस्तुत किया है, वह अन्यत्र उपलब्ध नहीं होता। उनके मुख से एक भारतीय कथा के लिये विवाह के समय जो शिक्षा निकली है, वह उत्तम गृहिणी का आदर्श बन गयी। महर्षि कण्व शकुन्तला की विदाई के समय कहते हैं-

“शुश्रुषस्व गुरुन् कुरु प्रियसखीवृत्तिं सपत्नीज ने पत्युर्विप्रकृताऽपि रोषणतया मा स्म प्रतीपं गम:।

भूयिष्ठं भव दक्षिणा परिजने भाग्येष्वनुत्सेकिनी

यान्त्येवं गृहिणीपदं युवतयो वामा: कुलस्याधय:॥”

एक बार हस्तिनापुर नरेश दुष्यंत आखेट खेलने वन में गये। जिस वन में वे शिकार के लिये गये थे उसी वन में कण्व ऋषि का आश्रम था। कण्व ऋषि के दर्शन करने के लिये महाराज दुष्यंत उनके आश्रम पहुँच गये। आवाज लगाने पर एक अति लावण्यमयी कन्या ने आश्रम से निकल कर कहा,

“हे राजन्! महर्षि तो तीर्थ यात्रा पर गये हैं,

किन्तु आपका इस आश्रम में स्वागत है।

उस कन्या को देख कर महाराज दुष्यंत ने पूछा, “बालिके! आप कौन हैं?”

बालिका ने कहा,

“मेरा नाम शकुन्तला है और मैं कण्व ऋषि की पुत्री हूँ।”

उस कन्या की बात सुन कर महाराज दुष्यंत आश्चर्यचकित होकर बोले,

“महर्षि तो आजन्म ब्रह्मचारी हैं फिर आप उनकी पुत्री कैसे हईं?”

उनके इस प्रश्न के उत्तर में शकुन्तला ने कहा,

“वास्तव में मेरे माता-पिता मेनका और विश्वामित्र हैं।

मेरी माता ने मेरे जन्म होते ही मुझे वन में छोड़ दिया था जहाँ पर शकुन्त नामक पक्षी ने मेरी रक्षा की।

इसी लिये मेरा नाम शकुन्तला पड़ा।

उसके बाद कण्व ऋषि की दृष्टि मुझ पर पड़ी और वे मुझे अपने आश्रम में ले आये। उन्होंने ही मेरा भरन-पोषण किया। जन्म देने वाला, पोषण करने वाला तथा अन्न देने वाला – ये तीनों ही पिता कहे जाते हैं। इस प्रकार कण्व ऋषि मेरे पिता हुये।”

शकुन्तला के वचनों को सुनकर महाराज दुष्यंत ने कहा, “शकुन्तले! तुम क्षत्रिय कन्या हो। तुम्हारे सौन्दर्य को देख कर मैं अपना हृदय तुम्हें अर्पित कर चुका हूँ। यदि तुम्हें किसी प्रकार की आपत्ति न हो तो मैं तुमसे विवाह करना चाहता हूँ।”

शकुन्तला भी महाराज दुष्यंत पर मोहित हो चुकी थी, अतः उसने अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी। दोनों नें गन्धर्व विवाह कर लिया।

कुछ काल महाराज दुष्यंत ने शकुन्तला के साथ विहार करते हुये वन में ही व्यतीत किया।

फिर एक दिन वे शकुन्तला से बोले,

“प्रियतमे! मुझे अब अपना राजकार्य देखने के लिये हस्तिनापुर प्रस्थान करना होगा। महर्षि कण्व के तीर्थ यात्रा से लौट आने पर मैं तुम्हें यहाँ से विदा करा कर अपने राजभवन में ले जाउँगा।”

इतना कहकर महाराज ने शकुन्तला को अपने प्रेम के प्रतीक के रूप में अपनी स्वर्ण मुद्रिका दी और हस्तिनापुर चले गये।

एक दिन उसके आश्रम में दुर्वासा ऋषि पधारे।

महाराज दुष्यंत के विरह में लीन होने के कारण शकुन्तला को उनके आगमन का ज्ञान भी नहीं हुआ और उसने दुर्वासा ऋषि का यथोचित स्वागत सत्कार नहीं किया।

दुर्वासा ऋषि ने इसे अपना अपमान समझा और क्रोधित हो कर बोले,

“बालिके! मैं तुझे शाप देता हूँ कि जिस किसी के ध्यान में लीन होकर तूने मेरा निरादर किया है, वह तुझे भूल जायेगा।”

दुर्वासा ऋषि के शाप को सुन कर शकुन्तला का ध्यान टूटा और वह उनके चरणों में गिर कर क्षमा प्रार्थना करने लगी।

शकुन्तला के क्षमा प्रार्थना से द्रवित हो कर दुर्वासा ऋषि ने कहा,

“अच्छा यदि तेरे पास उसका कोई प्रेम चिन्ह होगा तो उस चिन्ह को देख उसे तेरी स्मृति हो आयेगी।”

महाराज दुष्यंत के सहवास से शकुन्तला गर्भवती हो गई थी। कुछ काल पश्चात् कण्व ऋषि तीर्थ यात्रा से लौटे तब शकुन्तला ने उन्हें महाराज दुष्यंत के साथ अपने गन्धर्व विवाह के विषय में बताया।

इस पर महर्षि कण्व ने कहा,

“पुत्री! विवाहित कन्या का पिता के घर में रहना उचित नहीं है। अब तेरे पति का घर ही तेरा घर है।”

इतना कह कर महर्षि ने शकुन्तला को अपने शिष्यों के साथ हस्तिनापुर भिजवा दिया।

मार्ग में एक सरोवर में आचमन करते समय महाराज दुष्यंत की दी हुई शकुन्तला की अँगूठी, जो कि प्रेम चिन्ह थी, सरोवर में ही गिर गई। उस अँगूठी को एक मछली निगल गई।

महाराज दुष्यंत के पास पहुँच कर कण्व ऋषि के शिष्यों ने शकुन्तला को उनके सामने खड़ी कर के कहा, “महाराज! शकुन्तला आपकी पत्नी है, आप इसे स्वीकार करें।”

महाराज तो दुर्वासा ऋषि के शाप के कारण शकुन्तला को विस्मृत कर चुके थे। अतः उन्होंने शकुन्तला को स्वीकार नहीं किया और उस पर कुलटा होने का लाँछन लगाने लगे।

शकुन्तला का अपमान होते ही आकाश में जोरों की बिजली कड़क उठी और सब के सामने उसकी माता मेनका उसे उठा ले गई।

जिस मछली ने शकुन्तला की अँगूठी को निगल लिया था, एक दिन वह एक मछुआरे के जाल में आ फँसी।

जब मछुआरे ने उसे काटा तो उसके पेट अँगूठी निकली। मछुआरे ने उस अँगूठी को महाराज दुष्यंत के पास भेंट के रूप में भेज दिया। अँगूठी को देखते ही महाराज को शकुन्तला का स्मरण हो आया और वे अपने कृत्य पर पश्चाताप करने लगे। महाराज ने शकुन्तला को बहुत ढुँढवाया किन्तु उसका पता नहीं चला।

कुछ दिनों के बाद देवराज इन्द्र के निमन्त्रण पर देवासुर संग्राम में उनकी सहायता करने के लिये महाराज दुष्यंत इन्द्र की नगरी अमरावती गये। संग्राम में विजय प्राप्त करने के पश्चात् जब वे आकाश मार्ग से हस्तिनापुर लौट रहे थे तो मार्ग में उन्हें कश्यप ऋषि का आश्रम दृष्टिगत हुआ। उनके दर्शनों के लिये वे वहाँ रुक गये। आश्रम में एक सुन्दर बालक सिंह के साथ खेल रहा था।

मेनका ने उस समय शकुन्तला को कश्यप ऋषि के पास लाकर छोड़ा था तथा वह बालक शकुन्तला का ही पुत्र था। उस बालक को देख कर महाराज के हृदय में प्रेम की भावना उमड़ पड़ी। वे उसे गोद में उठाने के लिये आगे बढ़े तो शकुन्तला की सखी चिल्ला उठी,

“हे भद्र पुरुष! आप इस बालक को न छुयें अन्यथा उसकी भुजा में बँधा काला डोरा साँप बन कर आपको डस लेगा।”

यह सुन कर भी दुष्यंत स्वयं को न रोक सके और बालक को अपने गोद में उठा लिया। अब सखी ने आश्चर्य से देखा कि बालक के भुजा में बँधा काला गंडा पृथ्वी पर गिर गया है।

सखी को यह ज्ञात था कि बालक को जब कभी भी उसका पिता अपने गोद में लेगा वह काला डोरा पृथ्वी पर गिर जायेगा।

सखी ने प्रसन्न हो कर समस्त वृतान्त शकुन्तला को सुनाया। शकुन्तला महाराज दुष्यंत के पास आई। महाराज ने शकुन्तला को पहचान लिया।

उन्होंने अपने कृत्य के लिये शकुन्तला से क्षमा प्रार्थना किया और कश्यप ऋषि की आज्ञा लेकर उसे अपने पुत्र सहित अपने साथ हस्तिनापुर ले आये।

महाराज दुष्यंत और शकुन्तला के उस पुत्र का नाम भरत था। बाद में वे भरत महान प्रतापी सम्राट बने और उन्हीं के नाम पर हमारे देश का नाम भारतवर्ष हुआ।

साभार… शास्त्री प्रवीण त्रिवेदी की पोस्ट से संपादित अंश

दुर्गा भाभी,कल जिनका जन्मदिन है

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दुर्गा भाभी का जन्म 7 अक्टूबर को हुआ । वे सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी थीं।। दुर्गा भाभी भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू की तरह फांसी पर नहीं चढ़ीं लेकिन कंधें से कंधा मिलाकर आजादी की लड़ाई लड़ती रहीं। स्वतंत्रता सेनानियों के हर आक्रमक योजना का हिस्सा बनी। दुर्गा भाभी बम बनाती थीं तो अंग्रेजों से लोहा लेने जा रहे देश के सपूतों को टीका लगाकर विजय पथ पर भी भेजती थीं।

देश की आजादी की लड़ाई के लिए महिलाओं ने खुद को बलिदान कर दिया था। झांसी की रानी, अहिल्या बाई और कई दमदार व्यक्तित्व की महिलाओं की जाबांजी का भारतीय इतिहास गवाह है। इन महिलाओं में एक नाम और भी शामिल हैं, वह हैं दुर्गावती देवी जी का। दुर्गावती देवी को आप दुर्गा भाभी के नाम से जानते होंगे।

दुर्गा भाभी को भारत की ‘आयरन लेडी’ भी कहा जाता है। बहुत ही कम लोगों को ये बात पता होगी कि जिस पिस्तौल से चंद्रशेखर आजाद ने खुद को गोली मारकर बलिदान दिया था, वह पिस्तौल दुर्गा भाभी ने ही आजाद को दी थी। इतना ही नहीं दुर्गा भाभी एक बार भगत सिंह के साथ उनकी पत्नी बन कर अंग्रेजों से बचाने के लिए उनके प्लान का हिस्सा बनी थीं। लाला लाजपत राय की मौत के बाद दुर्गा भाभी इतना गुस्से में थीं कि उन्होंने खुद स्काॅर्ट को जान से मारने की इच्छा जताई थी।

दुर्गा भाभी और उनके पति भगवतीचरण वोहरा दोनों ही ऐसे महान क्राँन्तिकारी हैं, जिनका पूरा जीवन राष्ट्र को समर्पित रहा । पति बलिदान हुये, और दुर्गा भाभी का पूरा जीवन संघर्ष और समर्पण में बीता । उनका संघर्ष स्वतंत्रता के पूर्व भी रहा और स्वतंत्रता के बाद भी। यह भी संयोग है कि उनका जन्म भी अक्टूबर माह में ही हुआ और निधन भी अक्टूबर में…

दुर्गा भाभी के दादाजी पं. शिवशंकर कौशांबी जिले के अंतर्गत शहजादपुर के जमींदार थे तो पिता पं बाँके बिहारी इलाहाबाद कलेक्टोरेट में नाजिर । दुर्गा भाभी अपने मायके में तीसरी कक्षा तक पढ़ी थीं । उन दिनों अल्पायु में विवाह की प्रथा थी । इस के अनुसार केवल दस वर्ष की आयु में दुर्गा का विवाह लाहौर के वोहरा परिवार में हो गया । उनके ससुर को अंग्रेजों से राय बहादुर की उपाधि मिली थी । इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि उनके मायके और ससुराल की पृष्ठभूमि कितनी प्रभाव शाली थी लेकिन ये दोनों पति पत्नि को अंग्रेजों द्वारा प्रदत्त सुविधा और दिखावटी प्रतिष्ठा में जीना पसंद न था । इसलिए दोनों ने अपनी अलग राह पकड़ी।

दुर्गा भाभी ने विवाह के बाद भी अपनी पढ़ाई जारी रखी और प्रभाकर की डिग्री हासिल की । उनके पति भी बचपन से ही अंग्रेजों की ज्यादती के विरुद्ध थे । किशोर वय से ही वे अंग्रेज विरोधी गतिविधियों से जुड़ गये । और धीरे धीरे क्रान्तिकारी आंदोलन से । उन्होंने 1926 नौजवान भारत सभा का गठन किया । इसके साथ ही दोनों पति पत्नि क्रान्ति कारी आँदोलन में सक्रिय रहे । दुर्गा भाभी के जिम्मे हथियारों तथा बम बनाने की सामग्री को यहाँ से वहां ले जाने का और संदेश यहाँ से वहां पहुँचाने का दायित्व था। वे एक बार बंबई में पिस्तौल के साथ गिरफ्तार भी हुई । मुकदमा चला सजा हुई छूटकर आईं फिर अपने काम में लग गयीं।

18 दिसम्बर 1928 को वेश बदल कर वे सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी भगतसिंह को लेकर कलकत्ता गयीं थी। इस यात्रा में उन्होंने भगतसिंह की पत्नी की भूमिका निभाई थी। यह उनके अभिनय का ही कमाल था कि सख्त चेकिंग के बीच भी वे भगतसिंह को सुरक्षित निकाल ले गईं थीं। 1930 में उनके पति बम बनाकर उसका परीक्षण करते समय शहीद हो गये थे । लेकिन कुछ समय के शोक के बाद दुर्गा भाभी फिर अपने काम में लग गईं ।

उन्होंने 9 अक्टूबर 1930 को गवर्नर हैली पर गोली चलाई । हैली तो बच गया लेकिन उनका अंग रक्षक घायल हुआ । इस घटना के बाद क्राँतिकारियों का दमन बढ़ गया । क्राँन्तिकारियों के दमन के बाद वे दिल्ली गयीं जहाँ पुलिस ने भारी परेशान किया । कभी भी उठा ले जाती और छोड़ जाती फिर उन्हे दिल्ली छोड़ने को कहा गया। वे लाहौर चली गईं । वहां उन्हे निगरानी में रखा गया । वे गिरफ्तार हुईं । तीन साल जेल में रहीं । अंत में अनेक शर्तों के साथ छोड़ा । जेल से बाहर आकर वे लखनऊ पहुँची । जहां उन्होंने एक मोन्टेसरी स्कूल खोला ।

आजादी के बाद भी वे लगभग गुमनामी में ही रहीं। इसका कारण जो भी रहे हों। उन्हे वह सम्मान मिला ही नहीं जिसकी वे हकदार थीं । अंत में 1999 में उन्होंने 92 वर्ष की अवस्था में संसार छोड़ा।

एक बार बड़े जोर शोर से गाजियाबाद जिले का नाम बदलकर दुर्गा भाभी नगर किए जाने की मुहिम स्थानीय स्तर पर चलाई गई थी।

उनकी स्मृति को नमन

करवा चौथ: परंपरा, प्रेम और पितृसत्ता के बीच

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(प्रेम, आस्था और समानता के बीच झूलता एक पर्व — जहाँ परंपरा भी है, और बदलाव की दस्तक भी।) 

करवा चौथ भारतीय संस्कृति का एक लोकप्रिय पर्व है, जिसमें विवाहित महिलाएँ अपने पति की दीर्घायु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। हालांकि इसकी परंपरा प्रेम और समर्पण से जुड़ी है, लेकिन आधुनिक समाज में यह त्यौहार समानता और साझेदारी के भाव से मनाया जाने लगा है। अब कई पुरुष भी यह व्रत रखते हैं। यह बदलाव बताता है कि करवा चौथ केवल पति की लंबी उम्र का प्रतीक नहीं, बल्कि रिश्तों में आपसी सम्मान, प्रेम और विश्वास का उत्सव भी है। परंपरा तभी सार्थक है, जब उसमें आत्मा के साथ-साथ समय की समझ भी हो।

– डॉ. प्रियंका सौरभ

हर साल कार्तिक मास की चतुर्थी को जब शाम का सूरज डूबता है, तो भारत के कोने-कोने में सजी-संवरी महिलाएं थाली में दीप, छलनी और करवा सजाकर चाँद के दर्शन करती हैं। उनके माथे पर लाल बिंदी, हाथों में मेंहदी, आँखों में इंतज़ार और होठों पर एक ही सवाल—“चाँद निकला क्या?” यह दृश्य भारतीय संस्कृति की सुंदरता का प्रतीक भी है और उसकी गहराई में छिपे सामाजिक अर्थों का आईना भी।

करवा चौथ का व्रत उत्तर भारत में विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार में बड़े उत्साह से मनाया जाता है। इस दिन विवाहित महिलाएँ अपने पति की दीर्घायु के लिए सूर्योदय से चंद्रोदय तक निर्जला व्रत रखती हैं। परंपरा के अनुसार यह व्रत सुहाग की स्थिरता और पति की लंबी उम्र के लिए रखा जाता है, और दिनभर की तपस्या के बाद जब चाँद निकलता है तो पत्नी छलनी से पति का चेहरा देख कर व्रत तोड़ती है।

लेकिन सवाल उठता है कि क्या यह व्रत सिर्फ प्रेम और आस्था की अभिव्यक्ति है या समाज की पितृसत्तात्मक जड़ों में गहरे धंसा एक प्रतीक?

भारतीय समाज में स्त्री के जीवन को “सुहाग” से जोड़ा गया है—उसकी खुशी, उसकी प्रतिष्ठा और उसकी पहचान तक। विवाह के बाद उसके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि उसका पति माना गया, और उसकी मृत्यु को अभिशाप समझा गया। ऐसे में करवा चौथ जैसे व्रत स्त्री के समर्पण, त्याग और सहनशीलता का उत्सव बन गए। लेकिन क्या यह प्रेम का उत्सव है या स्त्री के अस्तित्व को पति की उम्र के साथ बाँध देने का सांस्कृतिक औचित्य?

आज की पढ़ी-लिखी स्त्री जब करवा चौथ का व्रत रखती है, तो उसके कारण परंपरागत नहीं भी हो सकते। कई महिलाओं के लिए यह पति के प्रति प्रेम का, साथ निभाने का, रिश्ते में सामंजस्य का प्रतीक बन चुका है। वहीं कई पुरुष भी अब पत्नी के साथ समान भाव से व्रत रखने लगे हैं—यह बदलाव सकारात्मक है। परंतु यह भी उतना ही सच है कि करवा चौथ आज एक “कल्चरल इवेंट” बन गया है—टीवी धारावाहिकों, फिल्मों और सोशल मीडिया पर यह व्रत जितना “ग्लैमरस” दिखाया जाता है, उतनी ही गहराई में उसका मूल अर्थ खोता जा रहा है।

कभी यह व्रत गाँव की औरतों के बीच अपनापन और सहयोग का प्रतीक था। महिलाएँ एक-दूसरे के घर जातीं, मिट्टी के करवे (घड़े) में जल भरतीं, गीत गातीं—“करवा चौथ का व्रत है भाई, करवा लाना भूली न जाई।” यह त्यौहार उनके लिए आपसी मिलन का अवसर था, जहाँ वे जीवन की तकलीफ़ों को साझा करतीं। पर अब यह व्रत सोने के करवे, महंगे साज-श्रृंगार और डिजाइनर साड़ियों का प्रदर्शन बन गया है। उपवास के बजाय अब “इंस्टा रील्स” का युग है—जहाँ सजना-संवरना ही मुख्य उद्देश्य बन गया है।

फिर भी, परंपराओं को केवल अंधविश्वास कहकर नकार देना भी उचित नहीं। हर संस्कृति की अपनी आत्मा होती है। करवा चौथ के पीछे जो भाव है—प्रेम, समर्पण और आस्था का—उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन यह भी जरूरी है कि हम परंपरा को आधुनिक दृष्टि से देखें। आज जब हम समानता, स्वतंत्रता और पारस्परिक सम्मान की बात करते हैं, तो यह व्रत भी एकतरफा नहीं रहना चाहिए। यदि पत्नी पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती है, तो पति भी पत्नी की सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य के लिए समान भाव से प्रार्थना करे—यही सच्चा प्रेम और समानता है।

दिलचस्प बात यह है कि करवा चौथ का धार्मिक या पौराणिक आधार उतना स्पष्ट नहीं है जितना कि इसके लोकप्रचलन का प्रभाव। “करवा” यानी मिट्टी का घड़ा, जो प्राचीन भारत में जल का प्रतीक था, और “चौथ” यानी चतुर्थी का दिन। कुछ विद्वानों के अनुसार यह व्रत सैनिक परिवारों की परंपरा से जुड़ा था—जब पति युद्ध पर जाते थे, तो पत्नी उनकी सुरक्षित वापसी के लिए यह व्रत रखती थी। वहीं कुछ मान्यताएँ कहती हैं कि यह महिलाओं के बीच सामाजिक एकता बढ़ाने का माध्यम था। यानी इस त्यौहार का मूल भाव केवल पति की आयु से नहीं, बल्कि स्त्री के सामाजिक सहयोग से भी जुड़ा था।

आधुनिक समाज में करवा चौथ की व्याख्या के कई अर्थ हैं। एक ओर यह प्रेम का उत्सव है, तो दूसरी ओर यह स्त्री पर “आदर्श पत्नी” बनने का सामाजिक दबाव भी। यह द्वंद्व हमें सोचने पर मजबूर करता है—क्या हर प्रेम का प्रमाण त्याग से ही मापा जाएगा? क्या भूखे रहकर ही सच्ची निष्ठा सिद्ध होती है? और क्या यह परंपरा पति-पत्नी के बीच समान संबंधों का उत्सव बन पाई है या अब भी “पति-प्रधानता” का ही प्रतीक है?

फिर भी, यह सच है कि समय के साथ इसके स्वरूप में बदलाव आया है। अब कई जगह पति भी व्रत रखते हैं, कई जोड़े इसे “रिलेशनशिप रिचुअल” की तरह मनाते हैं। यह बदलाव बताता है कि समाज धीरे-धीरे समानता की ओर बढ़ रहा है। त्योहार का अर्थ वही रहता है, पर दृष्टिकोण बदल जाता है। करवा चौथ का भी यही हाल है—जहाँ पहले यह स्त्री के कर्तव्य का प्रतीक था, वहीं अब यह रिश्तों की साझेदारी का रूप ले रहा है।

आज जरूरत है कि हम परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाएं। करवा चौथ को न तो केवल रूढ़िवादिता समझें, न ही सिर्फ दिखावे का त्यौहार बनाएं। इसके भीतर के प्रेम, भाव और समर्पण को सच्चे अर्थों में आत्मसात करें—बिना किसी सामाजिक दबाव के। हर स्त्री को यह अधिकार होना चाहिए कि वह चाहे तो व्रत रखे या न रखे; क्योंकि प्रेम की परिभाषा उपवास से नहीं, आपसी समझ और सम्मान से तय होती है।

यदि इस व्रत के बहाने पति-पत्नी एक-दूसरे को समझने, एक-दूसरे के त्याग की कद्र करने और रिश्ते में नयापन लाने का अवसर पा सकें—तो यह त्यौहार अपने असली अर्थ में सफल होगा।

क्योंकि आखिरकार, करवा चौथ सिर्फ “पति की लंबी उम्र” का पर्व नहीं, बल्कि उस रिश्ते की स्थिरता और संवेदनशीलता का प्रतीक है, जो दो आत्माओं को जोड़ता है।

-प्रियंका सौरभ 

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

हरियाणा के एडीजीपी वाई. पूरन की आत्महत्या , हमारी सामूहिक असफलता

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“एक वर्दी का मौन:

(पद और प्रतिष्ठा के पीछे छिपी पीड़ा का मौन विस्फोट — हरियाणा के एडीजीपी वाई.एस. पूरण की आत्महत्या समाज के संवेदनहीन होते ढांचे पर गहरा सवाल उठाती है।) 

पूरन कुमार की आत्महत्या केवल एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक और सामाजिक ढांचे की विफलता का प्रतीक है। मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान न देना, लगातार दबाव और अकेलापन, संवेदनशील अधिकारियों को भीतर से तोड़ देता है। हमें अपने प्रशासनिक तंत्र में नियमित काउंसलिंग, गोपनीय सहायता और संवाद की व्यवस्था करनी होगी। समाज और मीडिया को भी संवेदनशील होना चाहिए, सनसनीखेज़ी की बजाय सहानुभूति और सुधार पर ध्यान देना चाहिए। केवल इसी तरह हम भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोक सकते हैं और अपने अधिकारियों को उनका सम्मान और सुरक्षा दिला सकते हैं।

✍️ डॉ. प्रियंका सौरभ

कभी-कभी किसी घटना की ख़बर केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं होती, बल्कि वह पूरे समाज के भीतर छिपे हुए असंतुलन, दबाव और संवेदनहीनता का दर्पण बन जाती है। हरियाणा के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक वाई पूरन कुमार की आत्महत्या ऐसी ही एक घटना है — जो केवल पुलिस विभाग की त्रासदी नहीं, बल्कि उस मानसिक, प्रशासनिक और सामाजिक ढाँचे की विफलता का प्रतीक है, जिसमें पद और प्रतिष्ठा के बावजूद इंसान अकेला और असहाय महसूस करने लगता है।

पूरन कुमार का शव चंडीगढ़ स्थित उनके घर के तहखाने में मिला, जहाँ बताया गया कि वह कमरा पूरी तरह ध्वनि-रोधक था। उनके पास से सरकारी पिस्तौल बरामद हुई। उनकी पत्नी अमनीत कौर एक भारतीय प्रशासनिक सेवा की अधिकारी हैं, जो उस समय जापान में थीं। कोई आत्महत्या-पत्र नहीं मिला। यह सब कुछ इतना अचानक हुआ कि पूरा प्रदेश और प्रशासनिक तंत्र स्तब्ध रह गया।

जब कोई पुलिस अधिकारी आत्महत्या करता है, समाज का पहला सवाल होता है – “इतने ऊँचे पद पर था, उसे क्या कमी थी?” यही सवाल हमारी सबसे बड़ी भूल है। हम यह भूल जाते हैं कि पद, पैसा या अधिकार कभी भी मन की शांति की गारंटी नहीं देते।

प्रत्येक अधिकारी, चाहे वह किसी भी सेवा में हो, सबसे पहले एक मनुष्य होता है। दिन-रात का तनाव, फाइलों के ढेर, राजनीतिक दबाव, निरंतर आलोचना, और एक ऐसे तंत्र की घुटन जिसमें ईमानदारी को अक्सर कमजोरी समझा जाता है — ये सब किसी भी व्यक्ति को भीतर से तोड़ सकते हैं। पूरन कुमार के मामले में कहा जा रहा है कि वे हाल के दिनों में पदोन्नति नीति और वरिष्ठ अधिकारियों के व्यवहार से असंतुष्ट थे। लेकिन क्या इन कारणों से जीवन समाप्त करना उचित था? नहीं। पर यह भी सच है कि जब कोई व्यवस्था भीतर से सड़ जाती है, तो उसमें संवेदनशील और आत्मसम्मानी व्यक्ति सबसे पहले टूटते हैं।

भारत में मानसिक स्वास्थ्य को आज भी कमजोरी के रूप में देखा जाता है। “मैं थक गया हूँ” या “मुझे किसी से बात करनी है” जैसे वाक्य कहने में भी लोग डरते हैं कि कहीं उनकी योग्यता या क्षमता पर प्रश्न न उठ जाए। पुलिस बलों में यह स्थिति और भी गंभीर है। लंबे कार्य घंटे, पारिवारिक जीवन में कमी, जनता और राजनीतिक दबाव, भ्रष्टाचार से जूझना, और ऊँचे अधिकारियों की मनमानी — ये सब मिलकर मानसिक थकान को बढ़ाते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़े बताते हैं कि हर वर्ष सैकड़ों पुलिसकर्मी आत्महत्या करते हैं, लेकिन शायद ही किसी ने यह गंभीरता से पूछा कि क्यों। उनके लिए न तो परामर्श प्रणाली है, न मनोवैज्ञानिक सहायता, न ही सहानुभूति। पूरन कुमार की घटना भी इसी मौन अवसाद का परिणाम प्रतीत होती है।

जब यह ख़बर सामने आई कि “एडीजीपी ने खुद को गोली मारी”, तो सोशल मीडिया पर तरह-तरह की टिप्पणियाँ आने लगीं — “भ्रष्टाचार होगा”, “पारिवारिक विवाद रहा होगा”, “कोई साजिश होगी।” यही हमारी सामाजिक बीमारी है — हम संवेदना से पहले संदेह खोजते हैं। कोई यह नहीं पूछता कि वह व्यक्ति अपने भीतर क्या झेल रहा था। कोई नहीं सोचता कि उसकी पत्नी, उसके बच्चे और उसके सहकर्मी किस पीड़ा से गुजर रहे होंगे। हम केवल सुर्खियाँ बनाते हैं, क्योंकि हमारे लिए अब मनुष्य नहीं, केवल समाचार बचा है।

एक अधिकारी, जिसने अपना पूरा जीवन कानून और जनता की सेवा में लगाया, अगर उसी व्यवस्था से हारकर जीवन त्याग देता है, तो यह केवल उसकी नहीं बल्कि पूरे तंत्र की आत्महत्या है। यह असफलता उस व्यवस्था की है जो अपने लोगों को भावनात्मक सहारा नहीं दे पाती। यह विफलता उस समाज की है जो केवल सफलता की दौड़ में भागता है, पर सहानुभूति और संतुलन को भूल गया है। और यह शर्म उस मीडिया की है जो किसी की मृत्यु में भी आकर्षण और टीआरपी खोज लेती है। पूरन कुमार की मौत हमसे यह सवाल पूछती है — “क्या इस देश में किसी अधिकारी को ईमानदार, असहमति रखने वाला और संवेदनशील रहकर भी जीने दिया जाएगा?”

देश में प्रशासनिक अधिकारियों पर राजनीतिक दबाव कोई नई बात नहीं है। फाइलों, तबादलों, पदोन्नतियों और जांचों का जाल इस कदर फैल गया है कि सच्चा और स्पष्ट बोलने वाला व्यक्ति हमेशा अकेला पड़ जाता है। पूरन कुमार जैसे अधिकारी, जिनकी पहचान स्पष्टवादिता से थी, अक्सर इसी जाल में फँस जाते हैं। वे न तो झुक पाते हैं, न ही समर्थन पा पाते हैं। परिणामस्वरूप भीतर का अकेलापन उन्हें धीरे-धीरे तोड़ देता है। वर्दी बाहर से चमकती है, पर अंदर का मन बुझ जाता है।

अगर हम सचमुच इस घटना से कुछ सीखना चाहते हैं, तो तीन मोर्चों पर काम करना होगा। पहला, मानसिक स्वास्थ्य को संस्थागत व्यवस्था का हिस्सा बनाना होगा। हर राज्य में पुलिस और प्रशासनिक सेवाओं के अधिकारियों के लिए नियमित परामर्श, तनाव प्रबंधन कार्यशालाएँ और गोपनीय सहायता केंद्र होने चाहिए। दूसरा, संवाद और मानवता का वातावरण बनाना होगा। वरिष्ठ अधिकारी अपने अधीनस्थों से केवल आदेश नहीं, बल्कि सहानुभूति भी साझा करें। “आप कैसे हैं?” जैसे कुछ शब्द कई बार जीवन बचा सकते हैं। और तीसरा, मीडिया को अपनी भूमिका जिम्मेदारी से निभानी होगी। किसी आत्महत्या की खबर को सनसनीखेज़ बनाना न केवल असंवेदनशील है बल्कि यह समाज पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। समाचारों का उद्देश्य सुधार और समझ होना चाहिए, न कि मनोरंजन।

पूरन कुमार का शव जिस ध्वनि-रोधक कक्ष में मिला, वह केवल एक भौतिक स्थान नहीं बल्कि पूरे तंत्र की स्थिति का प्रतीक है। एक ऐसा कक्ष, जहाँ बाहर की कोई आवाज़ नहीं पहुँचती और भीतर की कोई पुकार बाहर नहीं आती। यह तहखाना हमारे प्रशासनिक ढाँचे का प्रतीक बन गया है — ऊपर से चमकदार, भीतर से मौन और घुटनभरा।

पूरन कुमार का जाना केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि पूरे समाज का नुकसान है। यह चेतावनी है कि अगर हमने मानसिक स्वास्थ्य, संवेदनशील नेतृत्व और संवाद को प्राथमिकता नहीं दी, तो आने वाले समय में ऐसी घटनाएँ और बढ़ेंगी। अब यह स्वीकार करना ही होगा कि मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक सहयोग किसी भी आधुनिक शासन की उतनी ही आवश्यकता हैं, जितना अनुशासन और उत्तरदायित्व। एक संवेदनशील व्यवस्था ही एक सुरक्षित समाज की नींव रख सकती है।

पूरन कुमार की आत्मा को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके मौन से सबक लें और भविष्य में किसी भी वर्दीधारी को इतना अकेला न होने दें कि वह अपनी ही आवाज़ को बन्दूक से सदा के लिए मौन कर दे।

🕊️ “जब वर्दी का बोझ इंसानियत को कुचल दे,

तो सत्ता नहीं, संवेदना की ज़रूरत होती है।”

-प्रियंका सौरभ 

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

मुंशी प्रेमचंद की कलम ने अन्याय और नाइंसाफी के खिलाफ बुलंद की आवाज

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बाल मुकुन्द ओझा

आज उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की पुण्य तिथि है। लम्बी बीमारी के बाद उनका निधन 8 अक्टूबर 1936 को जलोधर रोग से हो गया था। ग्रामीण जन जीवन के चितेरे लेखक मुंशी प्रेमचंद की रचनाएं आज भी न केवल प्रासंगिक है अपितु हिंदी साहित्य की अमर अजय रचनाएं है। प्रेमचंद ने कहानी और उपन्यास विधा में एक नई और जीवंत परंपरा की शुरुआत की। उनकी प्रत्येक रचना सच्चाई के इर्द गिर्द घूमती है। वे कहीं भटकती नहीं है। प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं के माध्यम से आम आदमी की समस्याओं और पीड़ाओं को यथार्थ रूप से चित्रित किया । यही कारण है की वे साहित्य के अमर अजर रचनाकार के रूप में ख्यात है।

उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को काशी से चार मील दूर बनारस के पास लमही नामक गाँव में हुआ था। 31 जुलाई को उनकी 140 वीं जयंती है। उनका असली नाम धनपतराय था । आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह प्रेमचंद ने 1901 मे उपन्यास लिखना शुरू किया। कहानी 1907 से लिखने लगे। उर्दू में नवाबराय नाम से लिखते थे। स्वतंत्रता संग्राम के दिनों लिखी गई उनकी कहानी सोजेवतन 1910 में जब्त की गई। उसके बाद अंग्रेजों के उत्पीड़न के कारण वे प्रेमचंद नाम से लिखने लगे। 1923 में उन्होंने सरस्वती प्रेस की स्थापना की। 1930 में हंस का प्रकाशन शुरु किया। इन्होने मर्यादा, हंस, जागरण तथा माधुरी जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का संपादन किया। उन्होंने हिन्दी कहानी को एक नयी पहचान व नया जीवन दिया। आधुनिक कथा साहित्य के जन्मदाता कहलाए। उन्हें कथा सम्राट की उपाधि प्रदान की गई।

उन्होंने 300 से अधिक कहानियां लिखी हैं। इन कहानियों में आम आदमी की घुटन, चुभन व कसक को अपनी कहानियों में उन्होंने प्रतिबिम्बित किया। उनकी कहानियों में रूढियों, अंधविश्वासों, अंधपरंपराओं पर कड़ा प्रहार किया गया है वहीं दूसरी ओर मानवीय संवेदनाओं को भी उभारा गया है। ईदगाह, पूस की रात, शतरंज के खिलाड़ी, नमक का दारोगा, दो बैलों की आत्म कथा जैसी कहानियां कालजयी हैं। तभी तो उन्हें कलम का सिपाही, कथा सम्राट, उपन्यास सम्राट आदि अनेकों नामों से पुकारा जाता है।

 प्रेमचंद के साहित्य में समस्याओं को न केवल उठाया गया है बल्कि उनका समाधान भी प्रस्तुत किया गया है। सेवा सदन में वेश्यावृत्ति की समस्या, गबन में नारी के आभूषण प्रेम की समस्या, कर्म भूमि में जमीदारों के अत्याचारों का पूंजीपतियों की हठधर्मिता की समस्या, निर्मला में अनमेल विवाह की समस्या आदि का चित्रण किया गया है। इस प्रकार प्रेमचंद अपने साहित्य में इन समस्याओं को उनके दुष्प्रभावों से परिचित कराते हैं तथा उन्हें दूर करने के लिए प्रेरित भी करते हैं। प्रेमचंद का साहित्य ग्रामीण जीवन की संपूर्ण झांकी को प्रस्तुत करता है। गोदान उपन्यास तो ग्रामीण जीवन का महाकाव्य कहलाता है। बड़े घर की बेटी, पंच परमेश्वर, दो बैलों की कथा आदि कहानियों भी ग्रामीण पृष्ठभूमि में लिखी गई हैं। इन रचनाओं में उन्होंने ग्रामीणों के प्रति एक नवीन व स्वस्थ दृष्टिकोण अपनाकर उनकी समस्याओं को प्रभावशाली ढंग से उठाया है। मुंशी प्रेमचंद एक महान कथाकार के साथ-साथ एक अच्छे समाज सुधारक भी रहें है, उन्होंने अपनी रचनओं के माध्यम सामाज में फैली कुरीतियों का विरोध किया है।

 मुंशी प्रेमचंद देश के ऐसे पहले रचनाकार थे जिन्होंने उपन्यास साहित्य को तिलस्मी और ऐयारी से बाहर निकाल कर जमीनी हकीकत से परिचय कराया । उन्होंने अपनी रचनाओं में आम लोगों विशेषकर मेहनतकश वर्ग की भावनाओं और सच्चाइयों को वर्णित किया। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से देश की वास्तविक और जमीनी समस्याओं से देशवासियों को अवगत कराया। प्रेमचंद ने साहित्य को सच्चाई के धरातल पर उतारा। उनकी रचनाएं गरीबी और दैन्यता की कहानी कहती है। वह आम भारतीय के रचनाकार थे। उनकी रचनाओं में ऐसे नायक हुए,जिसे भारतीय समाज अछूत और घृणित समझता था। उन्होंने सरल,सहज और जनसाधारण की  बोल-चाल की भाषा का उपयोग किया और अपने प्रगतिशील विचारों को दृढ़ता से  समाज के सामने प्रस्तुत किया। 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के पहले सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने कहा कि लेखक स्वभाव से प्रगतिशील होता है और जो ऐसा नहीं है वह लेखक नहीं है। प्रेमचंद हिन्दी साहित्य के युग प्रवर्तक माने गए। उनकी  रचनाओं में समाज का पूरा ‘परिवेश’ उसकी ‘कुरूपता’ और ‘असमानता’, ‘छुआछूत’, ‘शोषण’ की विभीषिका कमजोर वर्ग और स्त्रियों का दमन आदि वास्तविकता प्रकट हुई है। उन्होंने सामान्य आदमी का जीवन अत्यंत निकट से देखा था तथा खुद उस जिंदगी को भोगा भी था। उपन्यास के क्षेत्र में उनके योगदान को देखकर बंगाल के विख्यात उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने उन्हें उपन्यास सम्राट कहकर संबोधित किया था।

 प्रेमचंद ने हिन्दी कहानी और उपन्यास की एक ऐसी परंपरा का विकास किया जिसने पूरी सदी के साहित्य का मार्गदर्शन किया। उन्होंने कुल 15 उपन्यास, 300 से कुछ अधिक कहानियाँ, 3 नाटक, 10 अनुवाद, 7 बाल पुस्तकें तथा हजारों पृष्ठों के लेख, सम्पादकीय, भाषण, भूमिका, पत्र आदि की रचना की लेकिन जो यश और प्रतिष्ठा उन्हें उपन्यास और कहानियों से प्राप्त हुई, वह अन्य विधाओं से प्राप्त न हो सकी। प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं में सामाजिक कुरीतियों  जमकर विरोध किया और आम आदमी की कहानी को उनकी बोलचाल की भाषा में चित्रित की।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी .32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर                                                                 

बढ़ती छात्र आत्महत्याएँ: कानून हैं, लेकिन संवेदना कहाँ है?

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भारत में बढ़ती छात्र आत्महत्याएँ एक गहरी सामाजिक और मानसिक स्वास्थ्य संकट का संकेत हैं। मानसिक स्वास्थ्य कानून (2017) और आत्महत्या रोकथाम नीति (2021) ने क़ानूनी ढाँचा तो दिया, पर उसका असर सीमित रहा। जागरूकता की कमी, काउंसलिंग ढाँचे का अभाव और अभिभावकों की अपेक्षाएँ छात्रों को अवसाद की ओर धकेल रही हैं। अब ज़रूरत है भावनात्मक शिक्षा, प्रशिक्षित काउंसलर, डिजिटल सहायता और पारिवारिक संवेदना की। जब तक समाज यह नहीं समझेगा कि हर बच्चे की सफलता अलग है, तब तक कानून भी किसी की जान नहीं बचा पाएँगे।

✍️ डॉ. सत्यवान सौरभ

भारत जैसे युवा देश के लिए यह एक शर्मनाक सच्चाई है कि यहाँ हर साल हज़ारों विद्यार्थी पढ़ाई, प्रतिस्पर्धा और सामाजिक दबाव के बोझ तले अपनी जान दे देते हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के अनुसार 2023 में 13,000 से अधिक छात्र आत्महत्याएँ दर्ज की गईं — यानी हर 40 मिनट में एक विद्यार्थी अपनी ज़िंदगी खत्म कर रहा है। यह सिर्फ़ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की नाकामी का सबूत है जो बच्चों को बचाने के बजाय उन्हें अंधे मोड़ पर छोड़ देती है।

सरकार ने मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में कई कानून और नीतियाँ बनाईं हैं — जैसे मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 और राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम नीति 2021। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये कागज़ों पर लिखे कानून ज़मीन पर किसी बच्चे को सच में बचा पा रहे हैं?

मेंटल हेल्थकेयर एक्ट 2017 का मकसद था कि आत्महत्या का प्रयास अब अपराध नहीं माना जाएगा, बल्कि इसे मानसिक संकट के रूप में देखा जाएगा। यानी अगर कोई बच्चा आत्महत्या की कोशिश करता है, तो उसे सज़ा नहीं, बल्कि सहारा दिया जाएगा। यह बहुत बड़ी पहल थी, क्योंकि इससे पहले ऐसे मामलों में पुलिस कार्रवाई होती थी, जिससे पीड़ित और परिवार दोनों और टूट जाते थे। कानून ने यह भी कहा कि हर नागरिक को मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का अधिकार होगा। यानी स्कूलों, कॉलेजों और कार्यस्थलों पर काउंसलिंग और सहायता उपलब्ध कराई जाएगी।

पर आज भी सच्चाई यह है कि देश के अधिकांश स्कूलों और कॉलेजों में कोई प्रशिक्षित काउंसलर तक नहीं हैं। 2023 में एम्स द्वारा किए गए सर्वे में पाया गया कि 70 प्रतिशत कॉलेजों में कोई मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ मौजूद नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो स्थिति और भी खराब है। यानी कानून बना, लेकिन उसके लिए जो आधारभूत ढांचा चाहिए था, वो कभी तैयार नहीं हुआ।

2021 में सरकार ने राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम नीति जारी की। इस नीति में कहा गया कि आत्महत्या एक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है और इसके लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण विभागों को मिलकर काम करना चाहिए। इसमें “हाई-रिस्क ग्रुप” जैसे छात्रों, किसानों और प्रवासी मजदूरों की पहचान कर, उनके लिए रोकथाम तंत्र बनाने की बात कही गई थी।

कुछ राज्यों ने इसे गंभीरता से लिया भी। जैसे केरल और महाराष्ट्र में स्कूल शिक्षकों को यह सिखाया गया कि वे छात्रों में अवसाद या निराशा के संकेत पहचान सकें। कुछ जगहों पर “स्कूल काउंसलिंग सेल” भी बने। लेकिन पूरे देश की तस्वीर देखें तो 40 प्रतिशत ज़िलों में अब भी कोई “सुसाइड प्रिवेंशन सेल” नहीं बना है। इस नीति के लिए अलग से कोई बजट तय नहीं किया गया। परिणाम यह हुआ कि यह नीति भी सरकारी फाइलों में एक और दस्तावेज बनकर रह गई।

कानूनों और नीतियों की सीमाओं से आगे जाकर हमें यह समझना होगा कि आत्महत्या का कारण सिर्फ मानसिक बीमारी नहीं, बल्कि समाज का बढ़ता असंवेदनशील माहौल भी है। कोचिंग सेंटर्स की दीवारों पर “IIT or Nothing” जैसे नारे लिखे होते हैं। हर बच्चा रैंक और रिज़ल्ट की दौड़ में फँस गया है। उसे बचपन की जगह एक ‘प्रोजेक्ट’ बना दिया गया है।

बहुत से माता-पिता अपने सपने बच्चों पर थोप देते हैं। असफलता को अपमान समझा जाता है। घर में बातचीत के बजाय सवाल-जवाब होता है — “कितने नंबर आए?” “अगले साल क्या करोगे?” यह भावनात्मक दूरी बच्चों को भीतर से तोड़ देती है।

अब असफलता छिपाना भी मुश्किल हो गया है। इंस्टाग्राम और रीलों की दुनिया में हर कोई “सफल” दिखना चाहता है। जो नहीं दिखा पाता, वह खुद को असफल मान लेता है। किसी स्कूल में खेल का मैदान नहीं तो लोग शिकायत करते हैं, लेकिन काउंसलर नहीं है तो कोई नहीं पूछता। बच्चे को “तनावग्रस्त” कहने पर आज भी परिवार उसे “कमज़ोर” समझता है। मानसिक स्वास्थ्य आज भी कलंक बना हुआ है।

कानूनों और नीतियों से आगे बढ़कर अब हमें कुछ व्यावहारिक, संवेदनशील और स्थायी उपाय अपनाने की ज़रूरत है। हर स्कूल और कॉलेज में प्रशिक्षित काउंसलर अनिवार्य होने चाहिए। सरकार चाहे तो राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत मनोवैज्ञानिकों की नियुक्ति कर सकती है। टेली-काउंसलिंग की सुविधा भी दूर-दराज़ क्षेत्रों तक पहुँचाई जा सकती है। मानसिक स्वास्थ्य को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए। बच्चों को यह सिखाना ज़रूरी है कि असफलता अंत नहीं है। दिल्ली सरकार के “हैप्पीनेस करिकुलम” की तरह सभी राज्यों में “लाइफ स्किल्स” और “इमोशनल एजुकेशन” को अनिवार्य किया जा सकता है।

हर माता-पिता और शिक्षक को यह समझना होगा कि उनकी बातों का बच्चों पर कितना असर पड़ता है। यदि कोई बच्चा अलग-थलग रह रहा है, बात नहीं कर रहा, या अचानक व्यवहार बदल रहा है — तो यह संकेत है कि उसे मदद की ज़रूरत है। आज हर छात्र के पास मोबाइल है। अगर उसी से वह मनोवैज्ञानिक सहायता पा सके तो कई जानें बच सकती हैं। “किरण हेल्पलाइन” जैसी पहल को और मज़बूत करने की ज़रूरत है।

मीडिया को भी अपनी भूमिका समझनी होगी। आत्महत्या की खबरों को सनसनी बनाकर दिखाने के बजाय, मीडिया को यह दिखाना चाहिए कि कैसे मदद ली जा सकती है। फिल्मों और सोशल मीडिया को भी “सफलता या मृत्यु” वाली सोच से बाहर लाना होगा। सरकार के हर जिले में यह रिपोर्ट होनी चाहिए कि कितने स्कूलों में काउंसलर हैं, कितनी आत्महत्या की घटनाएँ हुईं और कौन-से कदम उठाए गए। जवाबदेही के बिना कोई नीति सफल नहीं होती।

कानून और नीतियाँ दिशा दिखा सकती हैं, लेकिन वे संवेदना नहीं जगा सकतीं। वह समाज को खुद करनी होगी। हमें यह स्वीकार करना होगा कि बच्चा “रैंक” नहीं, “इंसान” है। उसकी आँखों में सिर्फ़ डिग्री नहीं, सपने भी हैं — और उन सपनों को असफलता से नहीं, प्यार और सहारे से संभाला जा सकता है।

कोटा, दिल्ली, पटना या हैदराबाद — हर शहर से आती आत्महत्याओं की खबरें हमें झकझोरती हैं, लेकिन कुछ दिन बाद हम भूल जाते हैं। जबकि हर बच्चा जो चला गया, वह हमारे समाज का आईना था — वह यह कह गया कि “तुमने मुझे सुना नहीं।”

भारत में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 और राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम नीति 2021 जैसी पहलें सही दिशा में कदम हैं, लेकिन ये तब तक अधूरी रहेंगी जब तक समाज, परिवार और शिक्षा संस्थान मिलकर मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता नहीं देंगे। हर आत्महत्या एक असफल नीति नहीं, बल्कि असफल संवेदना की कहानी है। समाधान किसी नए कानून में नहीं, बल्कि इस सोच में है कि असफलता कोई अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है।

महर्षि वाल्मीकि: शिक्षा, साधना और समाज का सच

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(गुरु का कार्य शिक्षा देना है, किंतु उस शिक्षा का प्रयोग शिष्य के हाथ में है — यही महर्षि वाल्मीकि की जीवनगाथा का अमर संदेश है।) 

महर्षि वाल्मीकि जयंती केवल एक संत कवि की स्मृति नहीं, बल्कि उस परिवर्तन की प्रेरणा है जो अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती है। उन्होंने दिखाया कि शिक्षा और साधना से जीवन का हर रूप बदला जा सकता है। “गुरु का कार्य शिक्षा देना है, पर उसका प्रयोग शिष्य के हाथ में है”—यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है। वाल्मीकि जी ने ज्ञान को मानवता से जोड़ा और समाज को बताया कि कर्म, विचार और संवेदना ही सच्ची पूजा हैं। उनकी जयंती हमें याद दिलाती है कि हर व्यक्ति अपने भीतर का वाल्मीकि जगा सकता है।

– डॉ प्रियंका सौरभ

कहते हैं, शिक्षा केवल अक्षर ज्ञान नहीं देती, बल्कि वह जीवन का मार्ग प्रशस्त करती है। किंतु उस शिक्षा का प्रयोग कौन-से दिशा में होगा — यह निर्णय हर व्यक्ति को स्वयं करना पड़ता है। यह विचार महर्षि वाल्मीकि के जीवन से बढ़कर और किसकी गाथा कह सकती है? महर्षि वाल्मीकि की उनकी यात्रा इस बात का प्रमाण है कि यदि मनुष्य सच्चे ज्ञान से परिचित हो जाए, तो उसका हृदय परिवर्तित हो सकता है, चाहे वह कितना भी अंधकारमय क्यों न हो।

महर्षि वाल्मीकि की जयंती केवल एक महापुरुष का स्मरण नहीं है, बल्कि यह उस मानवीय संभावना का उत्सव है, जो हमें पशुता से मानवता की ओर ले जाती है। यह जयंती हमें याद दिलाती है कि गुरु के दिए ज्ञान की शक्ति तभी सार्थक होती है, जब शिष्य स्वयं उसे सही दिशा में प्रयोग करे।

वाल्मीकि जी का जीवन अत्यंत प्रेरणादायक है। नारद ने उसे “राम-राम” का नाम जपने को कहा। किंतु वह ‘राम’ शब्द उच्चारित नहीं कर सका और “मरा-मरा” कहने लगा। यही “मरा-मरा” जप करते-करते उसका जीवन तपस्या में परिवर्तित हो गया, और वह महर्षि बन गया। यही वह क्षण था जब शिक्षा और आत्मबोध का संगम हुआ। यही परिवर्तन आज के समाज को भी सिखाता है कि कोई भी व्यक्ति जन्म से महान नहीं होता, बल्कि कर्म और ज्ञान से महान बनता है।

महर्षि वाल्मीकि को आदिकवि कहा जाता है — यानी कवियों में प्रथम। उन्होंने रामायण जैसी अमर कृति की रचना की, जो न केवल धार्मिक ग्रंथ है बल्कि भारतीय संस्कृति का जीवन दर्शन भी। उन्होंने साहित्य को धर्म, नीति, प्रेम और करुणा के साथ जोड़ा। उन्होंने मानवता के उस आदर्श को शब्द दिए, जहाँ धर्म केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि न्याय, सहानुभूति और कर्तव्य की भावना है।

उनकी रचना का सबसे बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने एक ऐसा राम प्रस्तुत किया जो केवल राजा नहीं, बल्कि आदर्श मानव हैं। उन्होंने एक ऐसी सीता को चित्रित किया जो नारी की अस्मिता और धैर्य की प्रतीक है। वाल्मीकि जी ने यह भी बताया कि हर व्यक्ति के भीतर एक ‘राम’ और एक ‘रावण’ बसता है, और निर्णय हमारे हाथ में है कि हम किसे पोषित करते हैं।

आज जब हम वाल्मीकि जयंती मनाते हैं, तो यह केवल श्रद्धा नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का अवसर भी है। समाज में आज भी जाति, भेदभाव और अज्ञान का अंधकार व्याप्त है। वाल्मीकि जी का जीवन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि किसी का जन्म नहीं, बल्कि कर्म उसकी पहचान तय करता है। वे स्वयं समाज के उस वर्ग से आए जिसे बाद के समय में “अछूत” कह दिया गया, लेकिन उन्होंने ऐसी रचना की जिसने पूरे आर्यावर्त के नैतिक और सांस्कृतिक जीवन को दिशा दी।

यदि उस युग में भी एक लुटेरा ज्ञान से महर्षि बन सकता है, तो आज हम क्यों नहीं बदल सकते? क्यों आज भी हम जाति के नाम पर लोगों को नीचा दिखाते हैं? क्यों आज भी शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी रह गया है, न कि मानवता की सेवा?

महर्षि वाल्मीकि का संदेश स्पष्ट है — गुरु केवल ज्ञान का दीपक जलाता है, परंतु उस दीपक से प्रकाश फैलाना शिष्य की जिम्मेदारी है। नारद मुनि ने रत्नाकर को मार्ग दिखाया, लेकिन चलना स्वयं रत्नाकर को पड़ा। यही शिक्षा प्रणाली का वास्तविक अर्थ है — शिक्षक केवल दिशा देता है, गंतव्य तय करना शिष्य का काम होता है।

आज के युग में जब शिक्षा केवल प्रतिस्पर्धा और अंक-तालिकाओं तक सीमित रह गई है, तब वाल्मीकि की शिक्षा की परिभाषा हमें झकझोरती है। वे कहते हैं कि शिक्षा का उद्देश्य ‘मनुष्य बनना’ है, न कि केवल ‘विद्वान बनना’। उन्होंने अपने जीवन से साबित किया कि सबसे बड़ा ज्ञान वही है जो मनुष्य को संवेदनशील बनाए, उसे अहंकार से मुक्त करे, और दूसरों के प्रति करुणा सिखाए।

रामायण के माध्यम से वाल्मीकि जी ने समाज को यह भी बताया कि हर व्यक्ति में सुधार की संभावना है। यही कारण है कि उन्होंने लव-कुश जैसे बच्चों को संस्कार, नीति और धर्म का ज्ञान दिया। उन्होंने सीता की पीड़ा को भी शब्दों में अमर किया, जो नारी की गरिमा की सबसे सशक्त व्याख्या है। वाल्मीकि का आश्रम केवल साधना का स्थल नहीं था, बल्कि शिक्षा का एक आदर्श विश्वविद्यालय था — जहाँ विद्या का अर्थ था आत्म-सुधार और समाज-सुधार।

आज जब हम सोशल मीडिया के युग में ज्ञान को ‘सूचना’ समझने लगे हैं, तब वाल्मीकि की स्मृति हमें बताती है कि ज्ञान का अर्थ केवल जानना नहीं, बल्कि उसे जीना है। उनके जीवन से प्रेरणा लेकर यदि हम अपने भीतर का अंधकार मिटा सकें, तो वही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

महर्षि वाल्मीकि ने हमें यह सिखाया कि किसी भी समाज की शक्ति उसकी विचारधारा में होती है, न कि उसके बाहरी आडंबर में। उन्होंने साबित किया कि एक डाकू भी कवि बन सकता है, यदि उसके भीतर परिवर्तन की ज्योति जल उठे। यही कारण है कि उनका जीवन आज भी हर पीढ़ी को प्रेरित करता है — कि शिक्षा केवल गुरु की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि शिष्य का संकल्प भी है।

आज जब हम “महर्षि वाल्मीकि जयंती” मनाते हैं, तो हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम शिक्षा को केवल परीक्षा का माध्यम न बनाएं, बल्कि उसे जीवन सुधार का साधन बनाएं। हर शिक्षक में नारद मुनि की झलक है और हर विद्यार्थी में रत्नाकर का बीज। जरूरत है तो बस जागरण की — और यही वाल्मीकि जी की शिक्षा का सार है।

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

हार्ट अटैक

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भारत में 3000 साल पहले एक बहुत बड़े ऋषि हुये थे। नाम था महाऋषि वागवट । उन्होंने एक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक का नाम है, अष्टांग हृदयम Astang hrudayam। इस पुस्तक में उन्होंने बीमारियों को ठीक करने के लिए 7000 सूत्र लिखें थे। यह उनमें से ही एक सूत्र है। वागवट जी लिखते हैं कि कभी भी हृदय को घात हो रहा है मतलब दिल की नलियों मे blockage होना शुरू हो रहा है तो इसका मतलब है कि रक्त blood में acidity अम्लता बढ़ी हुई है। अम्लता आप समझते हैं। इसको अँग्रेजी में कहते हैं acidity ।अम्लता दो तरह की होती है। एक होती है पेट की अम्लता और एक होती है रक्त blood की अम्लता।द्य आपके पेट में अम्लता जब बढ़ती है तो आप कहेंगे पेट में जलन सी हो रही है, खट्टी खट्टी डकार आ रही हैं , मुंह से पानी निकल रहा है और अगर ये अम्लता acidity और बढ़ जाये तो hyperacidity होगी और यही पेट की अम्लता बढ़ते-बढ़ते जब रक्त में आती है तो रक्त अम्लता blood acidity होती है और जब blood में acidity बढ़ती है तो ये अम्लीय रक्त blood दिल की नलियों में से निकल नहीं पाती और नलियों में blockage कर देता है तभी heart attack होता है ।इसके बिना heart attack नहीं होता और ये आयुर्वेद का सबसे बढ़ा सच है जिसको कोई डाक्टर आपको बताता नहीं ,क्योंकि इसका इलाज सबसे सरल है ! इलाज क्या है ? वागवट जी लिखते हैं कि जब रक्त (blood) में अम्लता (acidity) बढ़ गई है तो आप ऐसी चीजों का उपयोग करो जो क्षारीय हैं ।आप जानते हैं दो तरह की चीजें होती हैं अम्लीय और क्षारीय ! acidic and alkaline अब अम्ल और क्षार को मिला दो तो क्या होता है ? acid and alkaline को मिला दो तो क्या होता है ? neutral होता है सब जानते हैं तो वागवट जी लिखते हैं कि रक्त की अम्लता बढ़ी हुई है तो क्षारीय (alkaline) चीजें खाओ ! तो रक्त की अम्लता (acidity) neutral हो जाएगी ! और रक्त में अम्लता neutral हो गई ! तो heart attack की जिंदगी मे कभी संभावना ही नहीं ! ये है सारी कहानी ! अब आप पूछेंगे कि ऐसी कौन सी चीजें हैं जो क्षारीय हैं और हम खायें ? आपके रसोई घर में ऐसी बहुत सी चीजें है जो क्षारीय हैं जिन्हें आप खायें तो कभी heart attack न आए और अगर आ गया है तो दुबारा न आए ।यह हम सब जानते हैं कि सबसे ज्यादा क्षारीय चीज क्या हैं और सब घर मे आसानी से उपलब्ध रहती हैं, तो वह है लौकी ।इसे दुधी भी कहते लौकी जिसे दुधी भी कहते हैं English में इसे कहते हैं bottle gourd जिसे आप सब्जी के रूप में खाते हैं ! इससे ज्यादा कोई क्षारीय चीज ही नहीं है ! तो आप रोज लौकी का रस निकाल-निकाल कर पियो या कच्ची लौकी खायो वागवट जी कहते हैं रक्त की अम्लता कम करने की सबसे ज्यादा ताकत लौकी में ही है तो आप लौकी के रस का सेवन करें, कितना सेवन करें ? रोज 200 से 300 मिलीग्राम पियो कब पिये ? सुबह खाली पेट (toilet जाने के बाद ) पी सकते हैं या नाश्ते के आधे घंटे के बाद पी सकते हैं। इस लौकी के रस को आप और ज्यादा क्षारीय बना सकते हैं इसमें 7 से 10 पत्ते तुलसी के डाल लो तुलसी बहुत क्षारीय है इसके साथ आप पुदीने के 7 से 10 पत्ते मिला सकते हैं ।पुदीना भी बहुत क्षारीय है इसके साथ आप काला नमक या सेंधा नमक जरूर डाले ये भी बहुत क्षारीय है लेकिन याद रखें नमक काला या सेंधा ही डाले वो दूसरा आयोडीन युक्त नमक कभी न डाले। ये आओडीन युक्त नमक अम्लीय है तो आप इस लौकी के जूस का सेवन जरूर करें दो से तीन महीने की अवधि में आपकी सारी heart की blockage को ठीक कर देगा 21 वें दिन ही आपको बहुत ज्यादा असर दिखना शुरू हो जाएगा कोई आपरेशन की आपको जरूरत नहीं पड़ेगी ।घर में ही हमारे भारत के आयुर्वेद से इसका इलाज हो जाएगा और आपका अनमोल शरीर और लाखों रुपए आपरेशन के बच जाएँगे आपने पूरी पोस्ट पढ़ी , आपका बहुत बहुत धन्यवाद। सनातन धर्म सर्वश्रेष्ठ है।

शोसल मीडिया से

जूता उठाने से न्याय नहीं, लोकतंत्र घायल हुआ

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सुप्रीम कोर्ट देश की न्याय व्यवस्था की वह सर्वोच्च संस्था है। जहाँ से अंतिम न्याय की उम्मीद की जाती है। यहाँ से निकला हर शब्द, हर फैसला संविधान की आत्मा को आकार देता है। ऐसे में अगर उसी अदालत के भीतर कोई वकील जो खुद न्याय का साथी कहलाता है। जूता निकालने लगे, हंगामा करें तो यह केवल अनुशासन का उल्लंघन नहीं, बल्कि लोकतंत्र की नींव को हिलाने वाली घटना बन जाती है।हालिया मामला वकील राकेश किशोर का है। जिन्होंने मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की अदालत में हंगामा करते हुए जूता मारने की कोशिश की। उनका कहना था कि सनातन का अपमान बर्दाश्त नहीं। उनकी भावनाएँ चाहे सच्ची रही हो पर उनका तरीका गलत था बेहद गलत। अदालतें भावनाओं से नहीं, तथ्यों और कानून से चलती हैं। यदि अदालत में बैठे व्यक्ति ही भावनाओं के वशीभूत होकर कानून तोड़ने लगें तो न्याय का अर्थ ही समाप्त हो जाएगा।

बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने इस घटना पर त्वरित कार्रवाई करते हुए राकेश किशोर की वकालत पर अस्थायी रोक लगा दी। यह कदम केवल अनुशासन के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश को संदेश देने के लिए था कि कानून के सामने सब बराबर हैं, चाहे वह आम आदमी हो या अधिवक्ता, लेकिन सच यह भी है कि अगर यही हरकत कोई आम नागरिक करता तो उसका हश्र कुछ और होता। उसे अदालत की अवमानना में तुरन्त हिरासत में लिया जाता शायद जेल भी भेज दिया जाता। यह फर्क सोचने पर मजबूर करता है कि क्या कानून का सम्मान केवल कमजोरों से अपेक्षित है। इस घटना ने अदालत की गरिमा के साथ-साथ न्यायिक समुदाय की छवि पर भी सवाल खड़े किए हैं। वकील केवल अपने मुवक्किल के प्रतिनिधि नहीं, बल्कि न्यायिक प्रणाली का एक आवश्यक स्तंभ हैं। यदि वही स्तंभ चरमपंथी प्रतिक्रिया का प्रतीक बनने लगे तो समाज में न्याय पर भरोसा कैसे बचेगा। फिर भी घटना का दूसरा पहलू भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। आज समाज में धार्मिक संवेदनशीलता और असहिष्णुता दोनों तेजी से बढ़ रही हैं। सोशल मीडिया पर भावनाओं को भड़काने वाले संदेश, राजनीति से प्रेरित नैरेटिव और आंशिक सच्चाईयां जनता को भ्रमित कर देती हैं। जब लोगों को लगता है कि उनकी आस्था का अपमान हुआ है तो वे प्रतिक्रिया में अराजकता तक पहुँच जाते हैं, लेकिन अदालत वह जगह नहीं है जहाँ धार्मिक भावनाओं का विस्फोट हो। वहाँ केवल कानून की भाषा बोली जाती है। मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने इस मामले में अत्यंत संतुलित रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि उनके बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है। यही न्यायिक गरिमा की परिपक्वता है। प्रतिक्रिया नहीं, स्पष्टीकरण। यह सबक उन सबके लिए भी है जो ऊँचे पदों पर हैं‌। न्यायिक, प्रशासनिक या राजनीतिक कि उनके शब्दों का असर लाखों पर पड़ता है।इसलिए देश के सर्वोच्च पदों पर बैठे लोगों को अपने वक्तव्यों में मर्यादा और संतुलन बनाए रखना चाहिए। एक असावधान टिप्पणी कभी-कभी उस आग को हवा दे देती है जिसे शांत करने में वर्षों लग जाते हैं। अब सवाल केवल राकेश किशोर या बी.आर. गवई का नहीं है। सवाल इस पूरे दौर का है जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संवेदनशीलता के बीच की रेखा धुंधली हो गई है। लोकतंत्र में असहमति जरूरी है, लेकिन मर्यादा उससे भी ज्यादा जरूरी है। जब अभिव्यक्ति मर्यादा खो देती है तो वह लोकतंत्र की ताकत नहीं, बल्कि उसकी कमजोरी बन जाती है।इस घटना से हमें दो स्पष्ट संदेश लेने चाहिए। पहला, कोई भी व्यक्ति चाहे वह वकील हो या आम नागरिक, न्यायपालिका की गरिमा से ऊपर नहीं है। अदालत न्याय का मंदिर है और वहाँ प्रवेश श्रद्धा और संयम से ही होना चाहिए। दूसरा, सत्ता या न्याय के ऊँचे पदों पर बैठे लोगों को अपने शब्दों और आचरण में संयम रखना चाहिए, क्योंकि उनका हर शब्द जनता की भावनाओं को दिशा देता है। यदि अदालतों में इस तरह की घटनाएं दोहराई जाने लगीं तो आम नागरिक के मन में न्यायपालिका के प्रति जो सम्मान है वह धीरे-धीरे क्षीण हो जाएगा और जब अदालतों पर भरोसा टूटता है तो समाज अराजकता की ओर बढ़ता है। इसलिए बार काउंसिल का यह कदम केवल दंड नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि न्याय की चौखट पर कोई निजी या धार्मिक आक्रोश नहीं लाया जा सकता।
आख़िर में यह याद रखना होगा कि अदालतें भावनाओं का मंच नहीं, बल्कि संविधान की मर्यादा का केंद्र हैं। असहमति व्यक्त करना लोकतंत्र की खूबसूरती है, लेकिन उसे संयमित रखना उसकी गरिमा है। राकेश किशोर की घटना से सबक यही है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी जब मर्यादा खो देती है तो वह न्याय नहीं, अराजकता को जन्म देती है।

भूपेन्द्र शर्मा सोनू
(स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक)