बदलते समय में भाई दूज: प्रेम और अपनापन कैसे बना रहे

0

> “त्योहार अब सिर्फ़ रस्म नहीं, रिश्तों की परीक्षा बनते जा रहे हैं — सवाल यह है कि क्या हमारे दिलों में अब भी वही स्नेह बचा है?”

भाई दूज सिर्फ़ तिलक और मिठाई का त्योहार नहीं, बल्कि रिश्तों की वह डोर है जो समय की रफ़्तार में भी स्नेह का रंग बनाए रखती है। पर बदलते दौर में जहाँ मुलाकातें वीडियो कॉल पर सिमट गई हैं और तिलक डिजिटल इमोजी बन गया है, वहाँ यह सवाल उठता है — क्या रिश्तों की गर्माहट अब भी वैसी ही है? भाई दूज हमें याद दिलाता है कि प्रेम केवल परंपरा नहीं, आत्मीयता का अभ्यास है। यह त्योहार हमें अपने व्यस्त जीवन में अपनापन लौटाने का अवसर देता है।

— डॉ. प्रियंका सौरभ

दीवाली के बाद का शांत उजाला जब धीरे-धीरे घरों में उतरता है, तब आती है भाई दूज की सुबह — मिठास और ममता से भरी। बहनें अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाती हैं, आरती करती हैं और मन ही मन यह कामना करती हैं कि उनका भाई सदा सुखी रहे। बदले में भाई बहन को उपहार देता है और यह वादा कि जीवनभर उसका साथ निभाएगा। यह दृश्य जितना सरल लगता है, उतना ही गहरा भी है। क्योंकि यह सिर्फ एक तिलक नहीं, रिश्तों में भरोसे, सुरक्षा और प्रेम की लकीर खींचने का संस्कार है।

लेकिन आज जब समय बदल रहा है, रिश्तों की परिभाषाएँ बदल रही हैं, तब यह सवाल उठता है कि क्या भाई दूज का वही अपनापन और स्नेह अब भी पहले जैसा है? क्या भाई-बहन का रिश्ता अब भी उतना ही सहज, निर्भीक और भावनाओं से भरा है, जैसा कभी गाँव की मिट्टी और आँगन की धूप में होता था?

कभी भाई दूज सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि जीवन का उत्सव हुआ करता था। बहनें सवेरे से तैयार होकर भाई की प्रतीक्षा करती थीं, घरों में पकवानों की खुशबू फैल जाती थी। भाई दूर-दूर से बहन के घर पहुँचते थे, क्योंकि यह दिन मिलन का होता था। न कोई दिखावा, न औपचारिकता—बस भावनाओं का सच्चा प्रवाह। उस समय रिश्तों में दूरी नहीं, दिलों की गर्माहट थी।

आज भी भाई दूज मनाया जाता है, पर उसकी आत्मा कहीं धुंधली पड़ने लगी है। अब भाई दूज का तिलक कई बार व्हाट्सएप पर भेजे गए इमोजी से लग जाता है, राखी और तिलक दोनों ऑनलाइन ग्रीटिंग्स में सिमट गए हैं। “भाई दूज मुबारक” का संदेश सोशल मीडिया पर चमकता है, पर उसके पीछे की नज़रों में अब वो अपनापन नहीं दिखता जो किसी बहन की आँखों में तब झलकता था जब वह अपने भाई का चेहरा देखती थी।

यह बदलाव केवल तकनीक का नहीं, संवेदना का भी है। समय ने हमें जोड़ा जरूर है, पर जोड़े हुए रिश्ते अब दिलों से ज़्यादा डिवाइसों में रहने लगे हैं। भाई दूज जैसे पर्व जो निकटता, स्नेह और संवाद के प्रतीक थे, अब “स्टेटस अपडेट” बनते जा रहे हैं। इस बदलाव की जड़ें आधुनिक जीवन की भागदौड़, व्यावसायिकता और आत्मकेंद्रित सोच में हैं, जिसने हमें अपनों से दूर कर दिया है।

भाई दूज का पर्व केवल बहन की पूजा नहीं, बल्कि उस भावनात्मक संतुलन का प्रतीक भी है, जिसमें भाई सुरक्षा देता है और बहन संवेदना। दोनों एक-दूसरे की जरूरत बनकर रिश्तों के समाज का ढांचा खड़ा करते हैं। लेकिन आज की पीढ़ी में यह रिश्ता धीरे-धीरे औपचारिक होता जा रहा है। शहरों में बढ़ती व्यस्तता, प्रवास, और आत्मनिर्भर जीवनशैली ने भाई-बहन के रिश्तों को एक ‘मौके की मुलाकात’ बना दिया है।

जहाँ पहले भाई अपनी बहन के घर जाकर दिन भर का समय उसके परिवार के साथ बिताता था, अब वह मुलाकात कुछ मिनटों या वीडियो कॉल तक सीमित रह जाती है। बहनें भी अब आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं, भावनात्मक रूप से मज़बूत हैं, और जीवन के हर फैसले खुद लेती हैं। यह बदलाव सकारात्मक भी है, क्योंकि अब बहनें “सुरक्षा की मोहताज” नहीं, बल्कि बराबरी के आत्मसम्मान की प्रतीक हैं। मगर इस बराबरी के दौर में भी रिश्तों की गर्माहट बनी रहना जरूरी है।

त्योहारों का उद्देश्य ही यही होता है—रिश्तों को दोबारा गढ़ना, दूरी मिटाना। भाई दूज हमें हर साल यह याद दिलाती है कि रिश्तों का पोषण केवल खून से नहीं, व्यवहार से होता है। लेकिन आधुनिकता की रफ्तार ने हमें इतना व्यस्त कर दिया है कि हम भावनाओं को भी समय-सारिणी में बाँधने लगे हैं। कभी-कभी लगता है कि रिश्ते अब कैलेंडर पर टिके कुछ त्योहारी दिनों के मेहमान बन गए हैं।

आज की बहनें केवल उपहार नहीं, भावनात्मक साझेदारी चाहती हैं। उन्हें यह नहीं चाहिए कि भाई बस त्यौहार पर पैसे या गिफ्ट दे दे; वे चाहती हैं कि भाई उन्हें समझे, उनका सम्मान करे, उनके निर्णयों में साथ खड़ा रहे। और भाई भी चाहते हैं कि बहन सिर्फ स्नेह की मूर्ति नहीं, बल्कि सहयोग और संवेदना की साझेदार बने। यही रिश्ते का नया रूप है—बराबरी और आत्मीयता का संतुलन।

भाई दूज अब केवल बहन की सुरक्षा का प्रतीक नहीं, बल्कि आपसी सम्मान और संवाद का भी प्रतीक बनना चाहिए। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि भाई-बहन का रिश्ता सिर्फ बचपन का नहीं होता, वह उम्रभर का साथ है। भले जीवन के रास्ते अलग हों, पर दिलों के रास्ते जुड़े रहने चाहिए।

आज का समाज रिश्तों को “प्रोडक्टिविटी” और “प्रोफेशनलिज़्म” की कसौटी पर तौलने लगा है। हम दोस्ती में भी फायदे ढूँढ़ते हैं, तो पारिवारिक रिश्ते भी कभी-कभी बोझ लगने लगते हैं। भाई दूज ऐसे ही समय में हमें झकझोरती है—कि प्रेम का कोई विकल्प नहीं होता। तकनीक रिश्ते बना सकती है, पर आत्मीयता केवल स्पर्श, मुस्कान और अपनापन से आती है।

यह सही है कि समय बदल रहा है और रिश्तों की शैली भी बदलनी चाहिए। लेकिन हर बदलाव में भावनाओं का बीज बचा रहना जरूरी है। भाई दूज के पर्व को नया अर्थ देना होगा—जहाँ भाई और बहन दोनों एक-दूसरे की भावनाओं, संघर्षों और स्वतंत्रता का सम्मान करें। त्योहार तभी जीवित रहते हैं जब वे समय के साथ अपनी आत्मा को बचाए रखते हैं।

आज की बहनें अपने भाइयों से केवल सुरक्षा नहीं, बल्कि समानता चाहती हैं; और भाई भी यह समझने लगे हैं कि बहन की स्वतंत्रता उसकी शक्ति है, विद्रोह नहीं। यह समझदारी इस रिश्ते को और गहरा बना सकती है। भाई दूज अब उस सामाजिक ढांचे का प्रतीक बन सकता है जहाँ पुरुष और स्त्री के बीच सहयोग और संवेदना का रिश्ता हो, न कि संरक्षण और निर्भरता का।

कभी-कभी लगता है कि त्योहारों की भी अपनी भाषा होती है, जो हमें वह सब याद दिलाती है जिसे हम रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भूल जाते हैं। भाई दूज की भाषा है—स्मृति और स्नेह की। यह पर्व हमें उस समय में ले जाता है जब हम बिना कारण किसी की परवाह करते थे, जब रिश्ते लेन-देन नहीं, जीवन का आधार थे। इस पर्व के बहाने हमें अपने भीतर झाँकना चाहिए—क्या हम अब भी उतने ही आत्मीय हैं जितने बचपन में थे?

अगर इस सवाल का उत्तर ‘हाँ’ है तो यह त्योहार जीवित है। और अगर उत्तर ‘न’ है, तो हमें इसे फिर से जीवित करना होगा—किसी सोशल मीडिया पोस्ट से नहीं, बल्कि सच्चे व्यवहार से। किसी बहन के घर जाकर उसका हाल पूछने से, किसी भाई को गले लगाने से, किसी बचपन की याद को फिर से जीने से।

भाई दूज का असली अर्थ यही है कि रिश्तों की दीवारों पर समय की धूल जम जाने के बावजूद उनका रंग न फीका पड़े। यह पर्व हमें सिखाता है कि प्रेम का रिश्ता कभी पुराना नहीं होता, बस हमें उसे झाड़-पोंछकर चमकाना आना चाहिए।

आज जब दुनिया ‘डिजिटल रिश्तों’ की ओर बढ़ रही है, तो ऐसे पर्व हमें धरती से जोड़ते हैं। हमें बताते हैं कि मानवीय भावनाएँ अब भी सबसे बड़ी पूँजी हैं। इसलिए भाई दूज का तिलक केवल माथे पर नहीं, मन पर लगाना चाहिए—जहाँ अपनापन, स्मृति और कृतज्ञता की लकीरें स्थायी रहें।

भाई दूज का संदेश बहुत सीधा है—रिश्तों को निभाने के लिए कोई बड़ी रस्म नहीं चाहिए, बस छोटी-छोटी संवेदनाएँ चाहिएं। कभी एक फोन कॉल, कभी एक पत्र, कभी बिना कारण किया गया धन्यवाद—यही वो छोटे तिलक हैं जो भाई-बहन के रिश्ते को जीवित रखते हैं।

समय बदलेगा, त्यौहार भी रूप बदलेंगे, पर प्रेम और अपनापन अगर मन में बसा रहा, तो रिश्ते कभी टूटेंगे नहीं। भाई दूज हमें यह याद दिलाने आया है कि जीवन चाहे जितना तेज़ हो जाए, एक दिन रुककर किसी प्रिय को तिलक लगाना, उसकी आँखों में अपनेपन की रोशनी देखना—यही सच्चा त्योहार है।

इसलिए इस बार जब तिलक लगाएँ, तो साथ यह वचन भी लें—कि रिश्तों की डोर कभी ढीली नहीं पड़ने देंगे। भाई दूज की यह रौशनी सिर्फ दीयों में नहीं, दिलों में भी जले। प्रेम और अपनापन केवल तस्वीरों में नहीं, व्यवहार में बहे। तभी इस पर्व का सार बचा रहेगा, और हम कह सकेंगे—

बदलते समय में भी, भाई दूज से प्रेम और अपनापन बना हुआ है।

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

नरकासुर पर विजय का पर्व है नरक चतुर्दशी

0

आज नरक चतुर्दशी है जिसे लोक में छोटी दीवाली भी कहा जाता हैं। मेरी समझ से यह पांच-दिवसीय दीप पर्व का सबसे महत्वपूर्ण दिन है क्योंकि यह दिन एक स्त्री के अदम्य साहस और शौर्य को समर्पित है। इस उत्सव की पृष्ठभूमि में एक बहुत खूबसूरत पौराणिक कथा है। कथा के अनुसार प्राग्ज्योतिषपुर के एक शक्तिशाली असुर सम्राट नरकासुर ने देवराज इन्द्र को पराजित करने के बाद देवताओं तथा ऋषियों की सोलह हजार से ज्यादा कन्याओं का अपहरण कर लिया था। देवताओं की भीड़ उसके आगे असहाय थी क्योंकि नरकासुर को अजेय होने का वरदान प्राप्त था। कोई भी देवता या मनुष्य उसकी हत्या नहीं कर सकता था। कोई स्त्री ही उसे मार सकती थी। उससे त्रस्त और भयभीत देवताओं ने अंततः कृष्ण से सहायता की याचना की। कोई रास्ता न देखकर कृष्ण स्वयं चिंता में डूबे हुए थे। नरकासुर की कैद में हजारों स्त्रियों की पीड़ा सुन और पति की चिंता देखकर कृष्ण की एक पत्नी सत्यभामा सामने आई। कृष्ण के रनिवास की वह एकमात्र योद्धा थीं जिनके पास कई कई युद्धों का अनुभव था। उन्होंने नरकासुर से युद्ध की चुनौती स्वीकार की। कृष्ण उनके सारथि बनें। कृष्ण की प्रेरणा और अपने युद्ध कौशल के बल पर उन्होंने नरकासुर को पराजित कर मार डाला।उसका अंत हो जाने के बाद सभी सोलह हजार बंदी कन्याओं को मुक्त करा लिया गया। वीरांगना सत्यभामा जब कृष्ण के साथ द्वारका लौटीं तो पूरे नगर में दीये जलाकर उनके शौर्य और स्त्रियों की मुक्ति का उत्सव मनाया गया। इस उत्सव की परंपरा आज तक ज़ारी है मगर इसका अर्थ और संदेश हम भूल चुके हैं।विजय का उल्लास मनाने के साथ साथ आज का दिन हमारे लिए खुद से यह सवाल पूछने का अवसर है कि क्या उस घटना के हजारों साल बाद भी हम पुरुष अपने भीतर मौजूद वासना और पुरूष – अहंकार जैसे नरकासुरों की कैद से स्त्रियों को मुक्ति दिला पाए हैं ?

धुरूदत्त

प्रिया तेंदुलकर , आज जिनका जन्मदिन है

0

प्रिया तेंदुलकर का जन्म 19 अक्टुबर, 1954 को हुआ। वे भारत की पहली टीवी स्टार हैं। प्रिया तेंडुलकर ने अनेक फिल्मों व टीवी धारावाहिकों में भूमिका निभाई पर संभवतः वे संपूर्ण जीवन अपने सबसे पहले टीवी अवतार “रजनी” के नाम से ही बेहतर पहचानी जाती रहीं। 1985 में निर्मित व बासू चटर्जी द्वारा निर्देशित इस धारावाहिक में उन्होंने भ्रष्टाचार और सामाजिक बुराइयों के खिलाफ बेखौफ आवाज़ उठाने वाली एक साधारण गृहणी का किरदार निभाया था।

वह लेखिका भी थी। प्रसिद्ध नाटककार विजय तेंडुलकर उनके पिता थे। उनकी दो बहनें और एक भाई था। प्रिया का विवाह अभिनेता व लेखक करण राजदान से 1988 में हुआ। पर यह विवाह सात साल ही चल सका और इसके बाद उनका संबंध विच्छेद हो गया। करण व प्रिया ने “रजनी” और “किस्से मियाँ बीवी के” धारावाहिकों में पति− पत्नी के वास्तविक जीवन के किरदार भी निभाये। 1974 में श्याम बेनेगल की फिल्म अंकुर में निभाई भूमिका के कारण प्रिया के अभिनेता अनंत नाग से भी संबंध जोड़े जाते रहे।

प्रिया का प्रारंभ से ही अभिनय की और झुकाव था। 1939 में जब वे स्कूल में थीं, उन्होंने सत्यदेव दुबे के निर्देशन तले गिरीश कर्नाड के लिखे पौराणिक नाटक “हयवदन” में गुड़िया की भूमिका निभाई। इस नाटक में निर्देशिका कल्पना लाज़मी उनकी सह कलाकार थीं। इसके बाद पिग्मेलियन, अंजी, कमला, कन्यादान, सखाराम बाइंडर, ती फूलराणी, एक हठी मुलगी जैसे अनेक मराठी नाटकों में उन्होंने भूमिकायें कीं।

प्रिया ने टीवी पर जहाँ गुलज़ार निर्देशित स्वयंसिद्ध जैसे नारीवादी धारावाहिक में काम किया वहीं “हम पाँच” जैसे हास्य धारावाहिक में फोटो फ्रेम से बोलती मृत बीवी की भूमिका भी अदा की और “द प्रिया तेंडुलकर शो” और “ज़िम्मेदार कौन” जैसे सफल टॉक शो भी किये जिसमें वे काफी आक्रामक तेवर के लिये जानी जाती थीं। अंकुर, मोहरा और त्रिमूर्ती जैसी कुछ हिन्दी फिल्मों में भी उन्होंने काम किया पर कोई उल्लेखनीय भूमिकायें नहीं निभाईं।

शायद “रजनी” के किरदार और अपने पिता का ही प्रभाव था कि प्रिया सामाजिक मुद्दों के प्रति सदा जागरूक रहीं। उनका व्यक्तित्व खुला और साहसी था। “द प्रिया तेंडुलकर शो” की बुलंदी पर शिवसेना समेत कई राजनीतिक दलों ने उन्हें अपने दल में शामिल करने का प्रयास किया पर वे मन नहीं बना पाईं।

वे स्वयं लघु कथायें लिखती रहती थीं। ज्याचा त्याचा प्रश्न, जन्मलेला प्रत्येकला, असंही व पंचतारांकित उनकी कुछ कृतियाँ हैं, जिनमें से कुछ पुरस्कृत भी हुईं।

19 सितंबर, 2002 में 47 वर्ष की अल्पायु में उनका हृदयाघात से देहांत हो गया। वे कुछ समय कैंसर से भी लड़ती रहीं। उनकी असमय मृत्यु पर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा, “रजनी के रूप में उनकी जिहादी भूमिका ने अनेक सामाजिक मुद्दों को मुखरित किया।

रजनीकांत शुक्ला

बिहार में अब कांग्रेस का नारा – टिकट चोर गद्दी छोड़

0

जिस बिहार में कांग्रेस अब तक वोट चोर गद्दी छोड़ का नारा लगा रही थी , तस्वीर अब पलट गई है । कांग्रेसी अब नारा लगा रहे हैं – टिकट चोर गद्दी छोड़ । तो किसने चुरा लिए बिहार कांग्रेस प्रत्याशियों के टिकट ? बिहार में तो कांग्रेस का कोई नेता है नहीं । है भी तो बड़े कमजोर हैं । इतने कमजोर की प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजेश राम जिस सीट से लड़ना चाह रहे थे आरजेडी ने उस सीट पर अपने प्रत्याशी सुरेश पासवान को लड़ा दिया है । तो क्या खड़गे ने या राहुल ने चुरा लिए कांग्रेसियों के टिकेट ? पर राहुल तो करीब 25 दिनों से बिहार गए नहीं । कांग्रेसी पूछ रहे हैं कि हमारे टिकटों का चोर कौन है ?

तो क्या तेजस्वी उड़ा ले गए कांग्रेस प्रत्याशियों के टिकट ? तभी तो कांग्रेसियों के सुर बदले । अब मांग कर रहे हैं कि कांग्रेसियों का टिकट चोर गद्दी छोड़ ? समझ आ रहा है कि बिहार में कोई भी इंडी गठबंधन का नाम क्यों नहीं ले रहा है ? लालू तेजस्वी ने जब लिया महागठबंधन का नाम लिया , एक बार भी इंडिया ब्लॉक नहीं कहा । तेजस्वी जानते थे कि राहुल कभी उन्हें इंडिया ब्लॉक का नेता मतलब मुख्यमंत्री फेस नहीं मानेंगे । अतः उन्होंने इंडिया के बजाय महागठबंधन कहना शुरू किया । फिर तमाम मीडिया भी महागठबंधन कहने लगा । मतलब बिहार चुनाव में इंडी की मौत हो गई ? राजद और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारा नहीं हुआ ।

मुकेश सहनी की जेएमएम ने महागठबंधन से अलग होकर चुनाव प्रत्याशी मैदान में उतार दिए हैं । पशुपति पारस और हेमंत सोरेन ने अपने को महागठबंधन से अलग कर लिया । ऐसा लगता है कि राहुल गांधी का वोट चोर नारा उनकी पार्टी को ले डूबा है । बिहारियों ने बता दिया है कि बिहार की धरती चोर मचाए शोर को कतई पसंद नहीं करती ।

दरअसल बिहार के चुनाव आजकल ऐसा हॉट सब्जेक्ट हैं कि देश में दिवाली फेस्टिवल के अलावा एक ही फेस्टिवल है बिहार चुनाव । एनडीए जितने संगठित तरीके से चुनाव मैदान में उतरा है , महागठबंधन उतना ही खंड खंड हो गया है । बीजेपी ने अपने तमाम मुख्यमंत्रियों को बिहार में उतार दिया । अमित शाह ने स्थाई रूप से बिहार में डेरा जमा लिया है ।

21 अक्टूबर से नीतीश के प्रदेशव्यापी दौरे होंगे । तमाम केंद्रीय मंत्री एक एक कर बिहार पहुंच रहे हैं । मोदी स्वयं चार दिन बिहार में रहेंगे , 12 रेलियां करेंगे । अब खुद ही अनुमान लगाइए गठबंधन चूर −चूर हुआ या नहीं । एनडीए पहले ही फास्ट मोड़ में था , तेजस्वी और राहुल की मूर्खताओं से और फास्ट हो गया है । दीपावली और छठ पूजा की तैयारियां कर रही जनता के सामने भविष्य का नक्शा अब पूरी तरह साफ है ।
….. कौशल सिखौला

गोवर्धन पूजा से श्रद्धा बढ़े, दिखावा नहीं

0

 

 “कृष्ण का पर्व हमें सिखाता है कि असली भक्ति धरती, गाय और करुणा में है, कैमरे की चमक में नहीं।”

गोवर्धन पूजा केवल भगवान कृष्ण का पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, गाय और धरती के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति दिखावे में नहीं, संवेदना में है। आज जब पूजा इंस्टाग्राम की तस्वीर बन चुकी है और गोबर की जगह प्लास्टिक ने ले ली है, तब ज़रूरत है श्रद्धा के वास्तविक अर्थ को समझने की। गोवर्धन पर्व हमें याद दिलाता है कि मिट्टी, जल और जीव-जंतु की सेवा ही असली आराधना है। पूजा तब पूर्ण होती है जब धरती मुस्कुराती है, न कि सिर्फ़ कैमरा।

— डॉ. सत्यवान सौरभ

दीपों की कतारें अभी बुझी भी नहीं होतीं कि अगली सुबह गोवर्धन पर्व आ जाता है। यह त्योहार केवल भगवान कृष्ण की पूजा नहीं, बल्कि प्रकृति, गोवंश और सामूहिक श्रम के प्रति कृतज्ञता का उत्सव है। यह पर्व उस सादगी, मिट्टी की सुगंध और मन की पवित्रता का प्रतीक है, जो भारतीय संस्कृति की जड़ों में रची-बसी है। लेकिन जब श्रद्धा का अर्थ केवल दिखावे, फोटो और स्टेटस तक सीमित रह गया हो, तब “गोवर्धन पूजा से श्रद्धा बढ़े” कहना एक कामना भी है और एक चेतावनी भी।

कृष्ण की कथा में गोवर्धन पूजा का मूल भाव बहुत गहरा है। जब इंद्र के अहंकार से तंग आकर गोकुलवासी भीषण वर्षा में डूबने लगे, तब बालक कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा उंगली पर उठा लिया। इस घटना को केवल एक चमत्कार के रूप में देखना उसके अर्थ को छोटा करना है। असल में यह एक सामाजिक प्रतीक है। यह हमें बताती है कि जब सत्ता अहंकार में अंधी हो जाती है, तब जनसाधारण को अपने सामूहिक साहस से संकट से निकलना पड़ता है। कृष्ण ने गोवर्धन पूजा की परंपरा इसलिए शुरू की ताकि लोग प्रकृति, गोमाता और अपनी श्रमशक्ति को देवत्व के रूप में स्वीकारें—क्योंकि वही असली सहायक हैं, न कि केवल आकाश के देवता।

गोवर्धन पूजा दरअसल प्रकृति पूजा है। गाय, गोबर, गोचर भूमि—ये सब उस पारिस्थितिकी का हिस्सा हैं जिसने भारतीय जीवन को आत्मनिर्भर बनाया। जब हम गोबर, मिट्टी और फूलों से गोवर्धन बनाते हैं, तो वह धरती और पर्यावरण के प्रति हमारी श्रद्धा का प्रतीक होता है। वह एक स्मरण है कि यह मिट्टी ही हमारी असली माता है, जो हर बीज को अंकुरित कर हमें अन्न देती है। लेकिन आज के दौर में यह सब प्रतीक धीरे-धीरे खोते जा रहे हैं। गोबर की जगह प्लास्टिक की सजावट ने ले ली है, मिट्टी की गंध पर परफ्यूम का कब्जा हो गया है। गोवर्धन पूजा अब इंस्टाग्राम पोस्ट बन गई है—जिसमें “हैप्पी गोवर्धन पूजा” के स्टिकर तो हैं, पर गाय के लिए चारा नहीं। श्रद्धा अब धरती पर नहीं, स्क्रीन पर चमकती है।

कृष्ण ने कहा था—“कर्मण्येवाधिकारस्ते।” लेकिन हमने कर्म छोड़कर कर्मकांड को पकड़ लिया। पूजा अब उस भावना से दूर जा रही है जिसमें सामूहिकता, सहयोग और संवेदना थी। पहले गाँवों में सब मिलकर गोवर्धन बनाते थे, बच्चे गोबर लाते, महिलाएँ फूल सजातीं, पुरुष दीप रखते। वह सामूहिक श्रम और सादगी का पर्व था, जिसमें न कोई प्रतियोगिता थी, न तुलना। आज हर घर में अलग-अलग पूजा होती है—मानो यह अहंकार का गोवर्धन हो गया हो। श्रद्धा भी अब प्रदर्शन बन गई है, जिसमें पूजा का असल अर्थ खो गया है।

भारत का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि हम गाय को “माता” कहकर आँसू बहाते हैं, लेकिन सड़कों पर वही गाय भूख और दर्द से मरती है। गोवर्धन पूजा का केंद्र ही गाय है, और हम उसी केंद्र को भुला चुके हैं। यह कैसी श्रद्धा है जो दीप जलाती है पर एक मुठ्ठी चारा देने में कंजूसी करती है? पूजा का अर्थ केवल आरती नहीं, जिम्मेदारी भी है। जब तक हम गोवंश, जल, मिट्टी और वृक्षों के प्रति करुणा नहीं दिखाएँगे, तब तक हमारी पूजा अधूरी रहेगी।

त्योहार अब भक्ति नहीं, भोग का उत्सव बनते जा रहे हैं। गोवर्धन पूजा भी अब “सेल्फी सीज़न” का हिस्सा बन गई है। प्रसाद, थाल और पूजा की तस्वीरें सोशल मीडिया पर अपलोड करने की होड़ लग जाती है। लेकिन असली भोग—जो सेवा, संतोष और सादगी में था—वह कहीं खो गया है। हमारी दादी-नानी के समय यह पर्व मिट्टी और मेहनत की खुशबू से भरा होता था। अब यह कृत्रिम रोशनी और दिखावे का तमाशा बन गया है। श्रद्धा अब कैमरे की फ्लैश पर निर्भर है, आत्मा की रोशनी पर नहीं।

अगर कृष्ण आज होते, तो शायद पूछते—क्या तुम सच में गोवर्धन बना रहे हो, या गोवर्धन के मूल अर्थ को मिटा रहे हो? क्या तुम्हारी पूजा में धरती की गंध है या केवल मॉल की सुगंध? क्या तुम्हारी आरती में गाय की घंटी की आवाज़ है या मोबाइल के नोटिफिकेशन की? ये सवाल हमारे भीतर की श्रद्धा की जाँच करते हैं। क्योंकि भक्ति तभी सार्थक होती है जब वह दूसरों के सुख-दुख में सहभागी बनती है।

ग्रामीण भारत में आज भी यह पर्व आत्मीयता से मनाया जाता है। गाँव की गलियों में बच्चे नंगे पैर गोबर इकट्ठा करते हैं, महिलाएँ पारंपरिक गीत गाती हैं—“गोवर्धन धर्यो गिरधारी।” वहाँ पूजा में सादगी है, पर दिल है। वहीं शहरी भारत में गोवर्धन पूजा “रील” बन चुकी है—पाँच मिनट की पूजा, फिर पिज़्ज़ा पार्टी। यह फर्क बताता है कि विकास ने हमें सुविधा तो दी, पर संवेदना छीन ली। हमारी आधुनिकता ने हमें अपने ही मूल से काट दिया है।

जब जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकट मानवता के सामने सबसे बड़ा खतरा बन चुके हैं, तब गोवर्धन पूजा का महत्व और भी बढ़ जाता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि ईश्वर से प्रार्थना करने से पहले हमें धरती के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। यह वह समय है जब हमें गोवर्धन पूजा की व्याख्या को नये अर्थों में देखना चाहिए—केवल धर्म नहीं, बल्कि जीवनशैली के रूप में। अगर हम इस दिन पेड़ लगाएँ, गोशाला में सेवा करें, तालाब साफ़ करें, पशुओं को भोजन दें—तो वही सच्ची श्रद्धा होगी।

श्रद्धा का अर्थ केवल झुकना नहीं, जुड़ना है—धरती से, जल से, पशु से, मनुष्य से। जब श्रद्धा जिम्मेदारी के साथ जुड़ती है, तभी वह भक्ति बनती है। वरना वह सिर्फ रस्म रह जाती है। कृष्ण का गोवर्धन पर्व हमें यही सिखाता है—कि असली धर्म दूसरों के लिए खड़ा होना है।

कृष्ण ने इंद्र का अहंकार तोड़ा था, लेकिन आज हमारे भीतर भी ऐसे सैकड़ों इंद्र पल रहे हैं—लालच, ईर्ष्या, उपभोग, दिखावा और अधिकार की अंधी चाह। हमें इन इंद्रों को शांत करने के लिए अपने भीतर एक गोवर्धन उठाना होगा। वह गोवर्धन कोई पत्थर का पहाड़ नहीं, बल्कि विवेक, संयम और करुणा का पहाड़ है, जिसे हम सबको मिलकर थामना है।

गोवर्धन पूजा का एक और गहरा पक्ष है—यह पर्व सामूहिकता का उत्सव है। जब गोवर्धन के नीचे सारा गोकुल एकत्र हुआ था, तब किसी ने किसी की जात, पद या संपत्ति नहीं पूछी थी। सब एक ही छत के नीचे थे—बराबर, सुरक्षित, जुड़ाव में। यह दृश्य बताता है कि संकट के समय समाज को एकता में रहना चाहिए। पर आज हम अपने-अपने घरों के भीतर बंद हैं, पूजा भी निजी हो गई है, और समाज से संबंध केवल औपचारिक रह गए हैं। हमें फिर वही सामूहिकता लौटानी होगी, जिसमें साथ रहना भी पूजा है।

यह पर्व हमें यह भी सिखाता है कि शक्ति का अर्थ केवल भौतिक बल नहीं होता। जब बालक कृष्ण ने पर्वत उठाया था, तब वह शारीरिक नहीं, नैतिक शक्ति थी। आज के युग में वह नैतिक शक्ति सबसे बड़ी कमी बन गई है। हमें हर घर में, हर हृदय में एक छोटा-सा गोवर्धन बनाना होगा—जहाँ श्रद्धा, सादगी और करुणा एक साथ बसें।

अगर गोवर्धन पूजा का सच्चा पालन करना है, तो तीन संकल्प लेने होंगे। पहला, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता—हर पूजा के बाद एक पेड़ लगाना या किसी पशु को भोजन देना। दूसरा, सादगी का पुनर्जागरण—दिखावे की जगह सच्चे भाव अपनाना। और तीसरा, सामूहिकता का पुनर्स्थापन—पूजा को फिर से मिल-जुलकर मनाने की परंपरा लौटाना, ताकि समाज में संवाद और संवेदना जिंदा रहे।

आज का समय ऐसा है जब श्रद्धा की परिभाषा बदल रही है। श्रद्धा अब विज्ञापनों और प्रचार में दिखने लगी है, पर जीवन से गायब हो रही है। हम मंदिरों में झुकते हैं, पर किसी घायल गाय या भूखे इंसान के आगे नहीं रुकते। हम दीये जलाते हैं, पर अपने मन के अंधकार से डरते हैं। यही वह विच्छेदन है जो हमें भीतर से खोखला बना रहा है। गोवर्धन पूजा उस खोखलेपन को भरने का अवसर है—अगर हम चाहें तो।

यह पर्व केवल धार्मिक कृत्य नहीं, बल्कि नैतिक अनुबंध है—मनुष्य और प्रकृति के बीच। यह याद दिलाता है कि देवता की पूजा से पहले धरती की सेवा जरूरी है। गोवर्धन पर्वत अब कोई भौतिक शिला नहीं, बल्कि हमारे भीतर का आत्मबल है, जो संकट के समय खड़ा रहता है। इंद्र अब कोई स्वर्गीय देव नहीं, बल्कि हमारी इच्छाओं का प्रतीक है, जो हर सुख पर वर्षा की तरह गिरना चाहता है। और कृष्ण वह विवेक है जो उसे संयम सिखाता है।

जब हम कहते हैं “गोवर्धन पूजा से श्रद्धा बढ़े”, तो इसका अर्थ केवल पूजा-पाठ की बढ़ोतरी नहीं, बल्कि आस्था की गहराई से है। श्रद्धा वह शक्ति है जो हमें कर्तव्य के प्रति सचेत करती है। अगर श्रद्धा बढ़ी, तो समाज में संवेदना बढ़ेगी; अगर श्रद्धा गहरी हुई, तो राजनीति में नैतिकता लौटेगी; अगर श्रद्धा सच्ची हुई, तो पर्यावरण बचेगा।

हमारे समाज को आज एक ऐसे गोवर्धन की ज़रूरत है जो दिखावे के नहीं, दायित्व के पत्थरों से बना हो। एक ऐसे पर्व की, जो हमें सजावट नहीं, सच्चाई सिखाए। एक ऐसी श्रद्धा की, जो सोशल मीडिया पर नहीं, समाज के भीतर बसे। गोवर्धन पूजा का सार यही है—जहाँ प्रकृति, पशु और मनुष्य एक सूत्र में बंधे हों।

कृष्ण का संदेश बहुत सीधा है—“जब संकट आये, तो पर्वत उठाओ, पर मिलकर।” यही वह पंक्ति है जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी तब थी। अगर हम गोवर्धन पूजा के दिन अपने भीतर यह संकल्प लें कि हम दिखावे से अधिक जिम्मेदारी निभाएँगे, तो यही पूजा सबसे पवित्र होगी।

गोवर्धन पूजा हमें याद दिलाती है कि मिट्टी में ही जीवन की सबसे सच्ची सुगंध है, और उसी मिट्टी से हमारी श्रद्धा भी अंकुरित होती है। वह मिट्टी जो गाय के खुरों से पवित्र होती है, किसान के श्रम से सींची जाती है, और आकाश की धूप से सुनहरी बनती है। जब तक हम इस मिट्टी का आदर नहीं करेंगे, तब तक कोई भी पूजा पूर्ण नहीं होगी।

इसलिए इस बार जब दीप जलाएँ, तो साथ एक वचन भी लें—कि गोवर्धन पूजा से केवल घर नहीं, मन भी उजले होंगे। श्रद्धा केवल आरती की लौ में नहीं, व्यवहार की रोशनी में भी दिखेगी। तभी हम सच्चे अर्थों में कह सकेंगे—

“गोवर्धन पूजा से श्रद्धा बढ़े, दिखावा नहीं।”

क्योंकि श्रद्धा बढ़ी तो ईश्वर अपने आप हमारे भीतर उतर आएगा, और शायद तब हमें किसी गोवर्धन की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी—क्योंकि हर मन स्वयं पर्वत बन जाएगा।

– डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट

नारायण दत्त तिवारी, जन्म के दिन ही मरे

0

1 8 अक्टूबर — तारीख वही थी, जिस दिन उनका जन्म हुआ था, और संयोग देखिए, उसी दिन उन्होंने दुनिया को अलविदा भी कह दिया। 1925 में नैनीताल में जन्मे नारायण दत्त तिवारी भारतीय राजनीति के ऐसे अध्याय हैं, जिन्हें जितना पढ़िए, उतना नया मोड़ सामने आता है। उनके जीवन में सत्ता, संघर्ष, दोस्ती, विवाद — सब कुछ था, जो एक फिल्मी कहानी को भी मात दे सके।

मिट्टी से उठे, मुख्यमंत्री तक पहुंचे

एन.डी. तिवारी का राजनीतिक सफर किसी रोलरकोस्टर से कम नहीं रहा। 1952 में महज़ 26 साल की उम्र में वो उत्तर प्रदेश विधानसभा के सबसे युवा विधायक बने। उनके पहले भाषण ने सत्ता और विपक्ष — दोनों को चौंका दिया। वो नेता नहीं, वक्ता थे, और वक्ता नहीं, सोचने वाला मस्तिष्क। यहीं से शुरू हुआ वो सफर, जो उन्हें दो राज्यों का मुख्यमंत्री बनाने वाला था — पहले उत्तर प्रदेश, फिर उत्तराखंड। भारतीय राजनीति में यह कारनामा आज तक किसी और के नाम नहीं हुआ।

‘नथिंग डूइंग तिवारी’ और ‘ना नर, ना नारी’ — फिर भी सबके प्रिय

उनके विरोधी मज़ाक उड़ाते थे — “ये न नर हैं, ना नारी, ये हैं नारायण दत्त तिवारी।”
अपनी ही पार्टी के लोग उन्हें कहते थे — “नथिंग डूइंग तिवारी।”
लेकिन तिवारी मुस्कुरा देते थे। शायद यही उनकी ताकत थी — मुस्कराहट। वो जानते थे, राजनीति में सबसे बड़ा हथियार क्रोध नहीं, संयम है।

हर नाम याद रखने वाला मुख्यमंत्री

तिवारी की एक अद्भुत खासियत थी — उन्हें हर व्यक्ति का नाम याद रहता था। चाहे वो सचिवालय का क्लर्क हो या चपरासी, वो उसे नाम से पुकारते थे। यही वजह थी कि अफसर से लेकर आम जनता तक, हर कोई उनसे जुड़ा महसूस करता था। वरिष्ठ पत्रकार दिलीप अवस्थी ने कहा था — “उनके दिमाग में मानो एक कंप्यूटर फिट था, जो हर व्यक्ति की कहानी याद रखता था।”

ओलोफ पाम की ‘टूटी चिड़िया’ और एक यादगार मुलाकात

बहुत कम लोग जानते हैं कि तिवारी स्वीडिश भाषा में निपुण थे। 1959 में वो स्वीडन गए थे और वहां के प्रधानमंत्री ओलोफ पाम से उनकी गहरी दोस्ती हो गई थी। 25 साल बाद जब वो फिर मिले, तो पाम ने एक टूटी हुई सीप की बनी चिड़िया दिखाते हुए कहा — “तुम्हें याद है, ये वही है जो तुमने मुझे 1959 में दी थी।”
इतनी बारीकी से दोस्ती निभाना, शायद आज के नेताओं में दुर्लभ है।

प्रधानमंत्री बनने का मौका, जो हाथ से निकल गया

1987 में राजीव गांधी बोफोर्स मामले में घिर गए। कांग्रेस में चर्चा हुई कि कुछ समय के लिए प्रधानमंत्री पद किसी और को सौंप दिया जाए। दो नाम सामने आए — नरसिम्हा राव और नारायण दत्त तिवारी। उत्तर भारत के समीकरण देखते हुए तिवारी आगे थे। लेकिन जब प्रस्ताव उनके सामने आया, तो उन्होंने मना कर दिया।
उन्होंने कहा — “अगर मैं ये पद ले लूं, तो जनता सोचेगी कि राजीव गांधी भाग रहे हैं।”
राजनीति में ऐसा उदाहरण शायद ही मिले — जब कोई सत्ता से ऊपर उठकर सोचता हो।

18 घंटे काम, मुस्कान से फैसले

तिवारी अपने अनुशासन और ऊर्जा के लिए जाने जाते थे। रोज़ 18 घंटे काम करते, रात में दो बजे सोते और सुबह छह बजे फिर सक्रिय हो जाते।
उनके प्रधान सचिव योगेंद्र नारायण कहते हैं — “वो किसी भी वक्त दिल्ली के लिए उड़ान भर लेते थे, चाहे हम फिल्म देख रहे हों या खाना खा रहे हों।”
उनकी गंभीरता का आलम ये था कि वो हर फाइल का एक-एक शब्द खुद पढ़ते थे और लाल निशान खुद लगाते थे।

राजभवन का सबसे बड़ा विवाद

जब वो आंध्र प्रदेश के राज्यपाल बने, तब एक टेलीविज़न चैनल ने ऐसा वीडियो दिखाया जिसने उनकी छवि हिला दी — उन पर महिलाओं के साथ संबंधों के आरोप लगे। उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।
फिर 2008 में रोहित शेखर नामक युवक ने अदालत में दावा किया कि तिवारी उसके पिता हैं। DNA टेस्ट ने यह सच साबित किया।
लोगों ने कहा — “89 की उम्र में भी तिवारी ने अपनी ज़िंदगी को अधूरा नहीं छोड़ा।”
2014 में उन्होंने रोहित की मां उज्ज्वला तिवारी से शादी कर ली — एक ऐसा अंत, जो किसी उपन्यास से कम नहीं।

अगर 1991 में जीत जाते…

राजीव गांधी की हत्या के बाद अगर तिवारी चुनाव जीत जाते, तो शायद भारत के प्रधानमंत्री वही होते। लेकिन वो 5,000 वोटों से हार गए — और इतिहास ने करवट बदल ली।
नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने, और तिवारी हमेशा के लिए “सबसे योग्य, पर कभी प्रधानमंत्री न बने” नेता बन गए।

राजनीति का वो दौर, जो अब नहीं लौटेगा

एन.डी. तिवारी का जीवन भारतीय राजनीति की वो किताब है, जिसमें हर पन्ने पर एक सबक है —
कैसे संयम से संकट को संभाला जा सकता है,
कैसे विरोध को मुस्कान से हराया जा सकता है,
और कैसे सत्ता पाने के बजाय, गरिमा से जिया जा सकता है।

18 अक्टूबर 2018 को उन्होंने उसी दिन विदा ली, जिस दिन 93 साल पहले उन्होंने जन्म लिया था।
शायद इसलिए कहा जाता है — कुछ लोग जन्म और मृत्यु दोनों में अपने समय को चुनते हैं।
नारायण दत्त तिवारी — ऐसे ही विरले इंसान थे।

किस्सा18 अक्टूबर — तारीख वही थी, जिस दिन उनका जन्म हुआ था, और संयोग देखिए, उसी दिन उन्होंने दुनिया को अलविदा भी कह दिया। 1925 में नैनीताल में जन्मे नारायण दत्त तिवारी भारतीय राजनीति के ऐसे अध्याय हैं, जिन्हें जितना पढ़िए, उतना नया मोड़ सामने आता है। उनके जीवन में सत्ता, संघर्ष, दोस्ती, विवाद — सब कुछ था, जो एक फिल्मी कहानी को भी मात दे सके।

मिट्टी से उठे, मुख्यमंत्री तक पहुंचे

एन.डी. तिवारी का राजनीतिक सफर किसी रोलरकोस्टर से कम नहीं रहा। 1952 में महज़ 26 साल की उम्र में वो उत्तर प्रदेश विधानसभा के सबसे युवा विधायक बने। उनके पहले भाषण ने सत्ता और विपक्ष — दोनों को चौंका दिया। वो नेता नहीं, वक्ता थे, और वक्ता नहीं, सोचने वाला मस्तिष्क। यहीं से शुरू हुआ वो सफर, जो उन्हें दो राज्यों का मुख्यमंत्री बनाने वाला था — पहले उत्तर प्रदेश, फिर उत्तराखंड। भारतीय राजनीति में यह कारनामा आज तक किसी और के नाम नहीं हुआ।

‘नथिंग डूइंग तिवारी’ और ‘ना नर, ना नारी’ — फिर भी सबके प्रिय

उनके विरोधी मज़ाक उड़ाते थे — “ये न नर हैं, ना नारी, ये हैं नारायण दत्त तिवारी।”
अपनी ही पार्टी के लोग उन्हें कहते थे — “नथिंग डूइंग तिवारी।”
लेकिन तिवारी मुस्कुरा देते थे। शायद यही उनकी ताकत थी — मुस्कराहट। वो जानते थे, राजनीति में सबसे बड़ा हथियार क्रोध नहीं, संयम है।

हर नाम याद रखने वाला मुख्यमंत्री

तिवारी की एक अद्भुत खासियत थी — उन्हें हर व्यक्ति का नाम याद रहता था। चाहे वो सचिवालय का क्लर्क हो या चपरासी, वो उसे नाम से पुकारते थे। यही वजह थी कि अफसर से लेकर आम जनता तक, हर कोई उनसे जुड़ा महसूस करता था। वरिष्ठ पत्रकार दिलीप अवस्थी ने कहा था — “उनके दिमाग में मानो एक कंप्यूटर फिट था, जो हर व्यक्ति की कहानी याद रखता था।”

ओलोफ पाम की ‘टूटी चिड़िया’ और एक यादगार मुलाकात

बहुत कम लोग जानते हैं कि तिवारी स्वीडिश भाषा में निपुण थे। 1959 में वो स्वीडन गए थे और वहां के प्रधानमंत्री ओलोफ पाम से उनकी गहरी दोस्ती हो गई थी। 25 साल बाद जब वो फिर मिले, तो पाम ने एक टूटी हुई सीप की बनी चिड़िया दिखाते हुए कहा — “तुम्हें याद है, ये वही है जो तुमने मुझे 1959 में दी थी।”
इतनी बारीकी से दोस्ती निभाना, शायद आज के नेताओं में दुर्लभ है।

प्रधानमंत्री बनने का मौका, जो हाथ से निकल गया

1987 में राजीव गांधी बोफोर्स मामले में घिर गए। कांग्रेस में चर्चा हुई कि कुछ समय के लिए प्रधानमंत्री पद किसी और को सौंप दिया जाए। दो नाम सामने आए — नरसिम्हा राव और नारायण दत्त तिवारी। उत्तर भारत के समीकरण देखते हुए तिवारी आगे थे। लेकिन जब प्रस्ताव उनके सामने आया, तो उन्होंने मना कर दिया।
उन्होंने कहा — “अगर मैं ये पद ले लूं, तो जनता सोचेगी कि राजीव गांधी भाग रहे हैं।”
राजनीति में ऐसा उदाहरण शायद ही मिले — जब कोई सत्ता से ऊपर उठकर सोचता हो।

18 घंटे काम, मुस्कान से फैसले

तिवारी अपने अनुशासन और ऊर्जा के लिए जाने जाते थे। रोज़ 18 घंटे काम करते, रात में दो बजे सोते और सुबह छह बजे फिर सक्रिय हो जाते।
उनके प्रधान सचिव योगेंद्र नारायण कहते हैं — “वो किसी भी वक्त दिल्ली के लिए उड़ान भर लेते थे, चाहे हम फिल्म देख रहे हों या खाना खा रहे हों।”
उनकी गंभीरता का आलम ये था कि वो हर फाइल का एक-एक शब्द खुद पढ़ते थे और लाल निशान खुद लगाते थे।

राजभवन का सबसे बड़ा विवाद

जब वो आंध्र प्रदेश के राज्यपाल बने, तब एक टेलीविज़न चैनल ने ऐसा वीडियो दिखाया जिसने उनकी छवि हिला दी — उन पर महिलाओं के साथ संबंधों के आरोप लगे। उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।
फिर 2008 में रोहित शेखर नामक युवक ने अदालत में दावा किया कि तिवारी उसके पिता हैं। DNA टेस्ट ने यह सच साबित किया।
लोगों ने कहा — “89 की उम्र में भी तिवारी ने अपनी ज़िंदगी को अधूरा नहीं छोड़ा।”
2014 में उन्होंने रोहित की मां उज्ज्वला तिवारी से शादी कर ली — एक ऐसा अंत, जो किसी उपन्यास से कम नहीं।

अगर 1991 में जीत जाते…

राजीव गांधी की हत्या के बाद अगर तिवारी चुनाव जीत जाते, तो शायद भारत के प्रधानमंत्री वही होते। लेकिन वो 5,000 वोटों से हार गए — और इतिहास ने करवट बदल ली।
नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने, और तिवारी हमेशा के लिए “सबसे योग्य, पर कभी प्रधानमंत्री न बने” नेता बन गए।

राजनीति का वो दौर, जो अब नहीं लौटेगा

एन.डी. तिवारी का जीवन भारतीय राजनीति की वो किताब है, जिसमें हर पन्ने पर एक सबक है —
कैसे संयम से संकट को संभाला जा सकता है,
कैसे विरोध को मुस्कान से हराया जा सकता है,
और कैसे सत्ता पाने के बजाय, गरिमा से जिया जा सकता है।

18 अक्टूबर 2018 को उन्होंने उसी दिन विदा ली, जिस दिन 93 साल पहले उन्होंने जन्म लिया था।
शायद इसलिए कहा जाता है — कुछ लोग जन्म और मृत्यु दोनों में अपने समय को चुनते हैं।
नारायण दत्त तिवारी — ऐसे ही विरले इंसान थे

ओल्ड इज गोल्ड से साभार

पापों से मुक्ति और आत्मिक शुद्धि का पर्व है नरक चतुर्दशी

0

बाल मुकुन्द ओझा

सनातन धर्म में नरक चतुर्दशी का त्योहार बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। दीपावली से एक दिन पहले  नरक चतुर्दशी का त्योहार मनाया जाता है। इस साल यह त्योहार 19 अक्टूबर को मनाया जाएगा। नरक चतुर्दशी कई नामों से जानी जाती है। प्रत्येक नाम एक विशेष अनुष्ठान तथा महत्व को दर्शाता है। यथा छोटी दीपावली, रूप चौदस, रूप चतुर्दशी, यम चतुर्दशी, और काली चौदस। यह दिन हमें नरक के भय से मुक्ति, पापों के निवारण और आत्मिक शुद्धता का मार्ग दिखाता है। चतुर्दशी तिथि 19 अक्टूबर को दोपहर 1:51 बजे से शुरू होकर 20 अक्टूबर को दोपहर 3:44 बजे तक रहेगी। इस शुभ अवसर पर ऐन्द्र योग, सर्वार्थसिद्धि योग और सर्वाअमृत योग का विशेष संयोग भी बन रहा है, जो इसे और भी फलदायी बनाता है। इस दिन रूप निखारा जाता है। इसलिए इसे रूप चतुर्दशी भी कहा जाता है। इसके लिए सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करने की परंपरा है।

देश में पंच दिवसीय दीपावली पर्व की श्रृंखला में नरक चतुर्दशी का त्योहार लोग बड़े धूमधाम और श्रद्धा के साथ मनाते है। नरक चतुर्दशी बुराई पर अच्छाई की जीत के उपलक्ष्य में मनाई जाती है। पौराणिक मान्यता है नरक चतुर्दशी के दिन घरों में माता लक्ष्मी का आगमन होता है और दरिद्रता दूर होती है। नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव कम होता है और सकारात्मकता ऊर्जा  का संचार होता है। विद्वानों के अनुसार इस दिन पर भगवान कृष्ण की पूजा- अर्चना करनी चाहिए। इस दिन को हमारे देश में  छोटी दिवाली के रूप में भी मनाते हैं। मान्यता है नरक चतुर्दर्शी पर घर को रोशनी, फूलों और अन्य सजावटी सामग्री से सजाना चाहिए।  इस अवसर पर भगवान कृष्ण का आशीर्वाद और शाम के समय अपने घर में 11 मिट्टी के दीपक जलाएं। नरक चतुर्दशी के दिन घरों में दीपक जलाने की परंपरा है। नरक चतुर्दशी पर मिट्टी का चौमुखी दीपक जलाने का विशेष महत्व बताया गया है। इस दीपक में सरसों का तेल डालकर चारों दिशाओं की ओर मुख करके चार बत्तियां लगाई जाती हैं। इसे ‘यम दीपक’ कहा जाता है, जो मृत्यु के देवता यमराज को प्रसन्न करता है। दीपक को घर के बाहर मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर रखकर जलाएं, क्योंकि दक्षिण दिशा यमराज की मानी जाती है। पंचांग के अनुसार इस दिन यमराज के नाम का दीया जलाया जाता है। बताया जाता है।  इस दिन यम देव की पूजा करने से अकाल मृत्यु का डर खत्म होता है। इस दिन सूर्योदय से पूर्व स्नान करके यम तर्पण एवं शाम के समय दीप दान का बड़ा महत्व है।

 नरक चतुर्दशी के पर्व को मनाए जाने के पीछे एक बड़ी ही रोचक कथा जुड़ी हुई है। पौराणिक मान्यता के अनुसार प्राचीन काल में नरकासुर नाम के राक्षस ने अपनी शक्तियों से देवताओं और ऋषि-मुनियों के साथ 16 हजार एक सौ सुंदर राजकुमारियों को भी बंधक बना लिया था। इसके बाद नरकासुर के अत्याचारों से त्रस्त देवता और साधु-संत भगवान श्री कृष्ण की शरण में गए। नरकासुर को स्त्री के हाथों मरने का श्राप था, इसलिए भगवान श्री कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा की मदद से कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरकासुर का वध किया और उसकी कैद से 16 हजार एक सौ कन्याओं को आजाद कराया। कैद से आजाद करने के बाद समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने इन सभी कन्याओं से विवाह कर लिया। एक अन्य कथा के अनुसार, इस दिन यमराज की पूजा इसलिए की जाती है, क्योंकि वे मृत्यु के देवता हैं और सभी प्राणियों के कर्मों का हिसाब रखते हैं। शास्त्रों में उल्लेख है कि यमराज की पूजा करने से व्यक्ति को अकाल मृत्यु का भय नहीं सताता और वह अपने पापों से मुक्त होकर मोक्ष की ओर अग्रसर होता है। नरकासुर से मुक्ति पाने की खुशी में देवगण व पृथ्वीवासी बहुत आनंदित हुए। कहा जाता है कि तभी से इस पर्व को मनाए जाने की परंपरा शुरू हुई।

(

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

आज के दिन शुरू हुई हिमालयन कार रैली

0

——————-*

हिमालयन कार रैली की शुरुआत साल 1980 के 18 अक्टूबर को नज़ीर हुसैन ने की थी। मुम्बई के स्टेडियम से झंडी दिखाकर इसकी शुरुआत हुई। हुसैन को भारतीय मोटरस्पोर्ट को विश्व मंच पर लाने का श्रेय दिया जाता है। वह भारतीय रेसिंग ड्राइवर होने के साथ-साथ मोटर स्पोर्ट्स के प्रशासक भी थे। वह विश्व रैली चैम्पियनशिप के मुख्य प्रबंधक और विश्व मोटर स्पोर्ट्स काउंसिल के सदस्य रहे। उनका निधन 78 वर्ष की आयु में साल 2019 में हुआ था।

1980 से 1990 तक इस रैली का आयोजन हर साल किया गया। इन वर्षों में हिमालयन रैली संभवतः दुनिया की सबसे दिलचस्प और आकर्षक रैली थी। पहली हिमालयन कार रैली बॉम्बे (अब मुंबई) से शुरू होकर हिमालय के रास्तों से गुजरते हुए दिल्ली में समाप्त हुई थी। दूसरी हिमालयन रैली की शुरुआत भी मुंबई से हुई थी। लेकिन तीसरी और उसके बाद की सभी रैलियों का आगाज दिल्ली से हुआ।

पहले हिमालयन रैली का उद्घाटन भारतीय मूल के प्रसिद्ध युगांडावासी रैली ड्राइवर चंद्रशेखर मेहता ने की थी। मेहता ने अपने करियर में कई खिताब जीते थे। उनके अलावा उद्घाटन समारोह में अचिम वार्मबोल्ड जैसे विश्व प्रसिद्ध ड्राइवर भी आए थे। ओपल, टोयोटा आदि सहित कई टीमों ने रैली में भाग लिया था।

हिमालयन कार रैली में विदेशी ड्राइवर और टीमें आती रहीं। खासकर केन्या से एक बड़ा दल इस आयोजन में हमेशा देखा गया। भारतीय मूल के केन्याई जयंत शाह ने कई बार जीत भी हासिल की थी। हिमालयन रैली में भाग लेने वाले अन्य बड़े नामों में रॉस डंकर्टन, फ्लोरी रूटहार्ट, रॉड मिलन, गाइ कोलसोल, फिलिप यंग, रमेश खोड़ा, रुडोल्फ स्टोहल, स्टिग एंडरवांग आदि शामिल हैं। यहां तक कि शीर्ष WRC ड्राइवर पेर एकलुंड ने भी हिमालयन रैली में भाग लिया था।

ये सभी ड्राइवर और कंपनियों की टीमें हिमालय की घुमावदार और संकरी सड़कों पर गाड़ी चलाने की चुनौती से आकर्षित थीं। हिमालयन कार रैली के रूट की अधिकांश सड़कें मिट्टी या बजरी वाली थीं। ऐसे में इंसान और मशीन दोनों की परीक्षा और भी अधिक कठिन हो जाती थी।

हिमालयन रैली में भाग लेने वाली कारों की विविधता देखने लायक होती थीं। रैली के प्रतिभागियों को अक्सर मसूरी के सेवॉय में ठहराया जाता था। इस आयोजन में हर साल 100 से अधिक प्रतिभागी शामिल होते थे। इस रैली ने इंडियन सिक्योरिटी फोर्स की टीमों को भी आकर्षित किया।

रैली के दौरान हजारों लोग कारों को देखने आते थे। कुछ क्षेत्रों में तो बच्चों को रैली दिखाने और प्रतिभागियों का उत्साह बढ़ाने के लिए स्कूल बंद कर दिए जाते थे। आलम यह था कि हिमालयन कार रैली का हिस्सा बनने की दावेदार हो गई थी।

आगे के वर्षों में हिमालयन कार रैली राजनीतिक लड़ाई का शिकार हो गई। सबसे पहले जॉर्ज फर्नांडीस ने इसका विरोध किया। बाद में उत्तर प्रदेश के पहाड़ी लोग, जो तब अलग पहाड़ी राज्य उत्तराखंड के लिए आंदोलन कर रहे थे, उन्होंने रैली की कारों पर हमला किया। कुछ मौकों पर रैली को बाधित करने की भी कोशिश की।

जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हुई और दंगे भड़क उठे तो हिमालयन रैली को रोकना पड़ा। प्रतिभागियों की सुरक्षा के लिए सेना बुलानी पड़ी। अफसोस की बात है कि हिमालयन रैली कभी भी WRC का हिस्सा नहीं बनी और 1990 में आखिरी रैली के आयोजन के बाद यह लुप्त हो गई।

रजनी कांत शुक्ला

अमीश त्रिपाठी, आज जिनका जन्मदिन है

0

अमीश त्रिपाठी का जन्म 18 अक्टूबर, 1974 को मुंबई (महाराष्ट्र, भारत) में हुआ था। वे एक भारतीय लेखक हैं जो अपने उपन्यासों, विशेषकर अंग्रेजी भाषा में पौराणिक कथा शैली के उपन्यासों के लिए जाने जाते हैं। अमीश त्रिपाठी वैश्विक साहित्यिक मंच पर एक विपुल और प्रभावशाली लेखक के रूप में उभरे हैं।

उन्होंने पौराणिक कथा शैली को फिर से परिभाषित करने का प्रयास किया है, ऐसी कहानियाँ बुनी हैं जो दुनियाभर के पाठकों को प्रभावित करती हैं। अपनी मनमोहक कहानियों के माध्यम से, अमीश ने भारतीय पौराणिक कथाओं को समकालीन दुनिया में सफलतापूर्वक पहुँचाया है, प्राचीन किंवदंतियों में नई जान फूंकी है। इस लेख में, हम इस साहित्यिक वास्तुकार के जीवन, कार्यों और प्रभाव के बारे में जानेंगे, जिन्होंने भारत के साहित्यिक पटल पर एक अमिट छाप छोड़ी है।

उन्होंने मुंबई के सेंट जेवियर्स कॉलेज से विज्ञान में स्नातक होने के बाद, त्रिपाठी ने बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन की पढ़ाई की। उन्होंने भारतीय प्रबंधन संस्थान, कलकत्ता (IIM-C) से एमबीए की डिग्री प्राप्त की।

साहित्यिक प्रसिद्धि हासिल करने से पहले, अमीश ने बैंकिंग और बीमा क्षेत्रों में काम करते हुए वित्तीय सेवा उद्योग में एक सफल करियर बनाया। उन्होंने स्टैंडर्ड चार्टर्ड, डीबीएस बैंक और आईडीबीआई फेडरल लाइफ इंश्योरेंस सहित कई कंपनियों में विपणन और उत्पाद प्रबंधक के रूप में वित्त के क्षेत्र में काम किया।

हालाँकि, कहानी कहने के प्रति उनकी रुचि और भारतीय पौराणिक कथाओं के प्रति गहरे आकर्षण ने उन्हें एक लेखक के रूप में एक नया रास्ता अख़्तियार करने के लिए प्रेरित किया।

अमीश को सफलता उनके पहले उपन्यास, “द इम्मोर्टल्स ऑफ मेलुहा” से मिली, जो शिव त्रयी की पहली पुस्तक थी। दरअसल, शिव त्रयी तीन पुस्तकों की एक श्रृंखला है जो भगवान शिव के जीवन को पुनर्कल्पित करते हुए उनकों मानवीकृत करने का प्रयास करती है। त्रयी में शामिल हैं –

“द इम्मोर्टल्स ऑफ़ मेलुहा” (2010)

“द सीक्रेट ऑफ़ द नागाज़” (2011)

“द ओथ ऑफ़ द वायुपुत्राज़” (2013)

शिव त्रयी की शानदार सफलता के बाद, अमीश ने अपने साहित्यिक प्रयासों में भारतीय पौराणिक कथाओं को आधार बनाकर अपना लेखन जारी रखा। उन्होंने राम चंद्र श्रृंखला की शुरुआत की, जो “इक्ष्वाकु के वंशज” (2015) से शुरू हुई।

इसके बाद, उन्होंने अपनी इम्मोर्टल इंडिया सीरीज़ के साथ नॉन-फिक्शन में भी कदम रखा है, जो देश के इतिहास और संस्कृति पर केंद्रित है।

अमीश त्रिपाठी का साहित्यिक कार्य भौगोलिक सीमाओं से परे है। भारतीय पौराणिक कथाओं को समसामयिक परिदृश्य में समाहित करने की उनकी असाधारण क्षमता ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक हलकों में पहचान दिलाई है। उनके उपन्यासों का कई भाषाओं में अनुवाद किया गया है, जिससे वे दुनिया भर के पाठकों के लिए सुलभ हो गए हैं।

अमीश त्रिपाठी का प्रभाव उनकी किताबों के पृष्ठों से कहीं आगे तक फैला हुआ है। इक्ष्वाकु के वंशज ने क्रॉसवर्ड बुक का “सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय पुरस्कार” जीता। 2019 में, त्रिपाठी को भारत सरकार द्वारा एक राजनयिक भूमिका में नेहरू सेंटर, लंदन के निदेशक के रूप में नियुक्त किया गया था।

अमीश ने परंपरा और आधुनिकता का सफलतापूर्वक विलय कर एक ऐसी साहित्यिक विरासत का निर्माण किया है जो समय की कसौटी पर खरी उतरती प्रतीत होती है। साहित्य की दुनिया में उनका योगदान आज भी निरंतर जारी है।

वर्ष 2022 में 13 अक्टूबर के दिन ‘लेखक से भेंट’ कार्यक्रम में साहित्य अकादेमी के सभागार में अमीश त्रिपाठी से मेरी भेंट हुई थी। कम समय में युवा पाठकों के बीच अपनी जगह बनाने वाले अमीश ने ज्यादातर समय श्रोताओं के प्रश्नों के उत्तर दिए थे।

अपनी पुस्तकों की बिक्री का साठ लाख का जादुई आंकड़ा वे छू चुके थे। उनके प्रशंसकों में जाने माने फिल्मी सितारों से लेकर राजनेता और बुद्धिजीवी सहित युवा वर्ग हैं। शिव व राम पर लिखी गई उनकी श्रृंखलाएं बहुत लोकप्रिय हुई हैं।कांत शुक्ला

−रजनीकांत शुक्ला

चुनाव का मैदान सजा है , मुंछवा ” बढ़ाए ” डालो

0

बिहार में तीन व्यंजन बड़े लोकप्रिय हैं । पहला है चौड़ा पोहा या चिवड़ा और दही , दूसरा लिट्टी चोखा और तीसरा सर्वाधिक लोकप्रिय सत्तू । हमारे नगर में अनेक बिहारी रहते हैं , भेल बनने पर आए उनमें से कईं मित्र भी हैं । 150 साल पहले जब कर्नल प्रॉबी काटले ने हरिद्वार से कानपुर तक नहर बनाने का काम कानपुर से हरिद्वार की ओर उल्टा शुरू किया था ।

नतीजा यह निकला कि पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार से हजारों मजदूर हरिद्वार रुड़की आ बसे । नहर बन जाने के बाद ठेले चलाने लगे और अनाज मंडी , घास मंडी आदि में पल्लेदारी करने लगे । सावन भादों में दोपहर बाद ढोलक की थाप पर गीत गाते थे । एक लोकगीत बड़ा प्रचलित और पसंदीदा था । वह था —
आई सतुवन की बहार मुंछवा मुंडाए डालो … बरसात के मौसम में कटोरे भर भर सत्तू पियेंगे , मूंछें कटोरे में न डूब जाएं सो मुंडा डालो ।

आजकल बिहार में बड़ी रौनक है । लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व चुनाव जो आ गया त्यौहारों के मौसम में , तो रौनक तो होगी ही । आइए अब बिहार की उस खिचड़ी की बात करें जो इन दिनों चूल्हों पर चढ़ी है , राजनीति के गलियारों में खुदबुदा रही है । बेशक अभी तक पकी नहीं है । आपको पता है न , इंटरनेशनल लेबल पर भारत के सबसे लोकप्रिय दो डिशेज क्या हैं ? तो बता दें कि वे हैं कढ़ी और खिचड़ी । जी हां , ठीक सुना आपने खिचड़ी ! समझ जाइए कथित बिरयानी नहीं सीधी सादी खिचड़ी ।

भारत के फाइव स्टार होटलों में भी मिलती है । लेकिन हम बात उस राजनैतिक खिचड़ी की कर रहे हैं जिसे चंद्रगुप्त , अशोक और चाणक्य के बिहार में सत्तर पार्टियां मिलकर पकाना चाहती हैं । परन्तु अभी तक सलीके से पका नहीं पा रही । पक तो जाएगी एक दिन , अब किसकी पकेगी , बताना मुश्किल । लगाते रहिए गणित और फैलाते रहिए आंकड़े ? खिचड़ी पकेगी , किसी की तो पकेगी , जो पकेगी , वह सरकार बनने के बाद भी पकती रहेगी । कईं दालों ही नहीं , पतले , मोटे , लम्बे , छोटे ; कईं किस्म के दाल चावलों से बनीं मशहूर बिहारी खिचड़ी । कईं तरह के छौंके और तड़के वाली खिचड़ी ।

तो साहब ! लिट्टी चोखा खाइए , सत्तू पीजिए या पोहा दही खाइए , आपकी मर्जी । चुनाव का मैदान सजा है , मुंछवा ” बढ़ाए ” डालो ?
…..कौशल सिखौला