अमृता प्रीतम : प्रेम, पीड़ा और मानवीय संवेदनाओं की कवयित्री

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भारतीय साहित्य में अमृता प्रीतम का नाम स्त्री चेतना, संवेदना और प्रेम के सशक्त स्वर के रूप में अमर है। उन्होंने न केवल पंजाबी साहित्य को समृद्ध किया, बल्कि हिंदी साहित्य को भी नई दिशा दी। अमृता प्रीतम की रचनाओं में एक औरत की आत्मा बोलती है—जो समाज की बंदिशों के बावजूद अपनी पहचान और अपने प्रेम के लिए संघर्ष करती है। वह कवयित्री ही नहीं, बल्कि कहानीकार, उपन्यासकार, निबंधकार और विचारक भी थीं।

प्रारंभिक जीवन

अमृता प्रीतम का जन्म 31 अगस्त 1919 को गुजरांवाला (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। उनके पिता करतार सिंह हितकारी एक कवि और विद्वान थे, जबकि माता हरनाम कौर धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं। अमृता का बचपन स्नेह और संस्कारों में बीता, परंतु जब वह 11 वर्ष की थीं, तभी उनकी माँ का निधन हो गया। इस घटना ने अमृता के भीतर गहरी संवेदना और अकेलेपन की अनुभूति भर दी, जो आगे चलकर उनके लेखन का स्थायी भाव बन गई।

साहित्यिक आरंभ और लेखन यात्रा

अमृता ने बहुत छोटी उम्र से ही लेखन आरंभ कर दिया था। 16 वर्ष की आयु में उनका पहला कविता संग्रह “अमृत लेहरां” प्रकाशित हुआ। प्रारंभिक रचनाओं में रोमानी भावनाएँ थीं, परंतु धीरे-धीरे उनमें सामाजिक यथार्थ और स्त्री अस्मिता की गूंज स्पष्ट होने लगी। विभाजन के दौर में उन्होंने जिस दर्द को देखा, उसे उन्होंने अपनी प्रसिद्ध कविता “आज आखां वारिस शाह नूं” में उकेरा—

“अज आख्या वारिस शाह नूं, कितों कबर विच्चों बोल…”
यह कविता भारत-पाकिस्तान के विभाजन के दौरान हुई मानवीय त्रासदी का करुण चित्रण है। इस एक कविता ने अमृता प्रीतम को अमर कर दिया।

प्रमुख रचनाएँ

अमृता प्रीतम ने 100 से अधिक पुस्तकें लिखीं, जिनमें कविता, उपन्यास, आत्मकथा, कहानी संग्रह और निबंध शामिल हैं।
उनकी प्रसिद्ध कृतियों में —

कविता संग्रह: आखां वारिस शाह नूं, नागमणि, कागज़ ते कैनवास, संगम, सत्तावन वर्षों के बाद।

उपन्यास: पिंजर, धरती सागर ते सीमा, रसीदी टिकट, कोरे कागज, दूआरे, जिंदगीनामां।
इनमें “पिंजर” (1948) को विशेष प्रसिद्धि मिली। यह उपन्यास भारत विभाजन की पृष्ठभूमि पर आधारित है, जिसमें एक स्त्री ‘पूरो’ की कहानी के माध्यम से अमृता ने स्त्री की पीड़ा, समाज की कठोरता और मानवीय करुणा का अद्भुत चित्रण किया है। इस उपन्यास पर बाद में एक लोकप्रिय फिल्म भी बनी।

स्त्री चेतना की स्वरधारा

अमृता प्रीतम भारतीय समाज की उन कुछ लेखिकाओं में से थीं, जिन्होंने औरत के भीतर की भावनाओं, उसकी स्वतंत्रता और उसकी पहचान को बड़ी निडरता से व्यक्त किया। उन्होंने प्रेम को केवल रोमांटिक दृष्टि से नहीं, बल्कि आत्मा की स्वतंत्रता के रूप में देखा। उनकी कविताएँ और गद्य रचनाएँ पुरुष-प्रधान समाज में औरत की अपनी जगह की तलाश का दस्तावेज़ हैं।

निजी जीवन और प्रेम

अमृता प्रीतम का निजी जीवन भी उतना ही संवेदनशील और चर्चित रहा जितना उनका साहित्य। 16 वर्ष की आयु में उन्होंने प्रीतम सिंह से विवाह किया, परंतु यह वैवाहिक जीवन बहुत सुखद नहीं रहा। विभाजन के बाद वे दिल्ली आ गईं और रेडियो में काम करने लगीं। धीरे-धीरे उन्होंने पारंपरिक रिश्तों से अलग होकर स्वतंत्र जीवन जीना चुना।

उनके जीवन में प्रसिद्ध कवि साहिर लुधियानवी का नाम गहराई से जुड़ा है। अमृता ने साहिर के प्रति अपने गहरे प्रेम को कभी छिपाया नहीं। उनकी आत्मकथा “रसीदी टिकट” में उन्होंने इस संबंध की अंतरंग झलकियाँ दी हैं। साहिर के प्रति उनके भावों को उन्होंने अपनी अनेक कविताओं में उकेरा। बाद के वर्षों में प्रसिद्ध चित्रकार इमरोज़ उनके जीवन में आए, जिन्होंने अमृता के साथ कई दशकों तक गहरी मित्रता और आत्मिक साझेदारी निभाई। अमृता ने कहा था—

“इमरोज़ मेरा आज है, और साहिर मेरा बीता हुआ कल।”

साहित्यिक सम्मान और योगदान

अमृता प्रीतम को उनके साहित्यिक योगदान के लिए अनेक पुरस्कार और सम्मान मिले। उन्हें 1956 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1969 में पद्मश्री, 1982 में भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार और 2004 में पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया। वह स्वतंत्र भारत की पहली प्रमुख पंजाबी महिला लेखिका थीं, जिन्हें इस स्तर पर मान्यता मिली।

उनकी आत्मकथा “रसीदी टिकट” भारतीय आत्मकथात्मक साहित्य की कालजयी कृति मानी जाती है। इसमें उन्होंने न केवल अपने जीवन का लेखा-जोखा दिया, बल्कि अपने समय, समाज और स्त्री की स्थिति पर गहरा विमर्श प्रस्तुत किया।

अंत समय और विरासत

अमृता प्रीतम का निधन 31 अक्टूबर 2005 को दिल्ली में हुआ। उनके साथ इमरोज़ अंत तक रहे। अमृता आज भी भारतीय साहित्य में एक प्रेरणा हैं—एक ऐसी स्त्री लेखिका, जिसने अपनी कलम से समाज की रूढ़ियों को चुनौती दी और प्रेम, मानवीयता तथा स्वतंत्रता के नए आयाम स्थापित किए।

निष्कर्ष

अमृता प्रीतम केवल एक कवयित्री नहीं, बल्कि एक युग थीं। उन्होंने अपने जीवन और लेखन दोनों में यह साबित किया कि स्त्री भी सोच सकती है, लिख सकती है और अपने दिल की बात कह सकती है। उनका साहित्य स्त्री के मौन को शब्द देता है, और उनकी कविताएँ आज भी हर संवेदनशील आत्मा में गूंजती हैं।

‘अहिराणा’ शब्द से हुई है ‘हरियाणा’ की व्युत्पत्ति

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*’हरयान’ या ‘हरियान’ शब्द से नहीं, ‘अहिराणा’ शब्द से हुई है ‘हरियाणा’ की व्युत्पत्ति : डॉ. रामनिवास ‘मानव’*

*(डॉ. रामनिवास ‘मानव’ हरियाणा के जाने-माने साहित्यकार और शिक्षाविद् होने के साथ-साथ हरियाणा के समकालीन हिंदी-साहित्य के प्रथम शोधार्थी और अधिकारी विद्वान भी हैं। ‘हरियाणा में रचित सृजनात्मक हिंदी-साहित्य’ पर पीएचडी और ‘हरियाणा में रचित हिंदी-महाकाव्य’ विषय पर डीलिट् की उपाधि प्राप्त करने वाले डॉ. ‘मानव’ हरियाणा के प्रथम और ये दोनों उपाधियाँ प्राप्त करने वाले अद्यतन एकमात्र विद्वान हैं। हरियाणवी भाषा और साहित्य के विकास में भी इन्होंने बहुआयामी और महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। साहित्य अकादमी, नई दिल्ली की ‘हिंदी की सहभाषा’ श्रृंखला के अंतर्गत हरियाणवी भाषा पर प्रथम पुस्तक लिखने का गौरव भी डॉ. ‘मानव’ को ही प्राप्त हुआ है। इस दृष्टि से इनकी साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘हरियाणवी’  ऐतिहासिक महत्त्व रखती है। विभिन्न विधाओं की चौंसठ महत्त्वपूर्ण पुस्तकों के लेखक और संपादक तथा वर्तमान में सिंघानिया विश्वविद्यालय, पचेरी बड़ी (राजस्थान) में आचार्य तथा सांस्कृतिक संकाय के अधिष्ठाता के पद पर कार्यरत डॉ. ‘मानव’ ने अब हरियाणा प्रदेश के नामकरण को लेकर भी सर्वथा मौलिक और नवीन अवधारणा प्रस्तुत की है। इनकी यह अवधारणा पुरानी और परंपरागत मान्यताओं से कहीं अधिक तथ्यपरक और तर्कसंगत जान पड़ती है। अतः हरियाणा दिवस के सुअवसर पर, इसी संदर्भ में प्रस्तुत हैं डॉ. ‘मानव’ के विशिष्ट विचार।)*

        ‘हरियाणा’ शब्द की व्युत्पत्ति के संदर्भ में चर्चा करने पर डॉ. रामनिवास ‘मानव’ बताते हैं कि ‘हरियाणा’ वैदिक कालीन शब्द है। इसका सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है-“ऋजुभुक्षस्याने रजतं हरियाणे। रथं युक्तं असनाम सुषामणि।” (8:25:22) यहांँ प्रयुक्त ‘हरियाणे’ शब्द के कष्टों को सहने वाला, हरणशील, हरि का यान आदि अनेक अर्थ हो सकते हैं, किंतु इससे प्रदेश-विशेष के नाम का स्पष्ट बोध नहीं होता। मुख्यतः ‘हरियाणा’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘हरयान’ अथवा ‘हरि‌यान’ शब्द से‌ मानी जाती है। इसीलिए इसे अंग्रेजी में ‘हरयाणा’ तथा हिंदी में ‘हरियाणा’ लिखा जाता है। किंतु मेरे मतानुसार यह थ्योरी गलत है। हर (शिव) और हरि (विष्णु) के इस क्षेत्र में यान द्वारा विचरण करने का सटीक उल्लेख नहीं मिलता। फिर यान के विचरण करने से किसी क्षेत्र ‌के नामकरण की बात भी गले नहीं उतरती। ‘हरियानक’, ‘हरितारण्यक’, ‘हरिताणक’, ‘आर्यायन’, ‘दक्षिणायन’, ‘उक्षणायन’, ‘हरिधान्यक’, ‘हरिबांँका’ आदि शब्दों से हरियाणा की व्युत्पत्ति की अन्य थ्योरियाँ भी अविश्वसनीय, बल्कि कुछ तो हास्यास्पद लगती हैं। डॉ. बुद्धप्रकाश और प्राणनाथ चोपड़ा ने हरियाणा की व्युत्पत्ति ‘अभिरायण’ शब्द से मानी है, किंतु इसे भी आंशिक रूप में ही सही माना जा सकता है।

        अपनी अवधारणा को स्पष्ट करते हुए डॉ. ‘मानव’ ने कहा कि मेरी सुनिश्चित मान्यता है कि ‘हरियाणा’ की व्युत्पत्ति ‘अहिराणा’ शब्द से हुई है। पशुपालन और कृषि का व्यवसाय करने वाले यदुवंशियों को अभिर या आभीर कहा जाता था, कालांतर में, जिसका तद्भव  रूप अहीर हो गया। अहीर बहादुर योद्धा माने जाते थे, जिनके अस्तित्व के प्रमाण ईसा से छह हजार वर्ष पूर्व भी मिलते हैं। किसी समय अहीर जाति हरियाणा, दिल्ली, बिहार, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान से लेकर गुजरात और महाराष्ट्र तक फैली हुई थी। किंतु वर्तमान हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उसका पूरा आधिपत्य और संपूर्ण वर्चस्व रहा। अहीरों का बाहुल्य होने के कारण ही इस क्षेत्र को ‘अहिराणा’ कहा जाने लगा। (जैसे राजपूतों के कारण राजपुताना, मराठों के कारण मराठवाड़ा और भीलों के कारण भीलवाड़ा कहा जाता है।) बाद‌ में, हरियाणवी बोली की उदासीन अक्षरों के लोप की प्रकृति और प्रवृत्ति के चलते, अखाड़ा-खाड़ा, अहीर-हीर, उतारणा-तारणा, उठाणा-ठाणा और स्थाण-ठाण की तर्ज पर, ‘अहिराणा’ से ‘हिराणा’ और फिर ‘हरयाणा’ या ‘हरियाणा’ हो गया। ‘अहिराणा’ शब्द का अर्थ है- ‘अहीरों का क्षेत्र’। इसे ‘अहीरवाल’ का पर्यायवाची माना जा सकता है।

        डॉ. ‘मानव’ ने कहा कि एक अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य से भी मेरे मत की पुष्टि होती है। आज भी महाराष्ट्र के खानदेश, जिसे कभी हीरदेश भी कहा जाता था और जिसमें महाराष्ट्र के मालेगांव, नंदुरबार और धुले जिलों के अतिरिक्त नासिक जिले के धरनी, कलवण, सटाणा और बागलान तथा औरंगाबाद जिले के देवला क्षेत्र, गुजरात के सूरत और व्यारा तथा मध्यप्रदेश के अंबा और वरला क्षेत्र शामिल हैं, जहांँ आज भी ‘अहिराणी’ बोली, बोली जाती है। देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली और बीस-बाईस लाख लोगों द्वारा बोली जाने वाली ‘अहिराणी’ का अर्थ है- ‘अहीरों की बोली’। इससे स्पष्ट है कि ‘अहिराणा’ और ‘अहिराणी’ में सीधा संबंध और पूरी समानता है। 

        अंत में निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए डॉ. ‘मानव’ कहते हैं कि ‘हरयाणा’ अथवा ‘हरियाणा’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘हरयान’ या ‘हरियान’ से नहीं, बल्कि ‘अहिराणा’ शब्द से हुई है। निश्चय ही, डॉ. ‘मानव’ का यह मत पूर्णतया तथ्यपरक, तर्कसंगत और प्रामाणिक है।

*प्रस्तुति : डॉ. सत्यवान सौरभ, हिसार (हरियाणा)*

*(डॉ. रामनिवास ‘मानव’ हरियाणा के जाने-माने साहित्यकार और शिक्षाविद् होने के साथ-साथ हरियाणा के समकालीन हिंदी-साहित्य के प्रथम शोधार्थी और अधिकारी विद्वान भी हैं। ‘हरियाणा में रचित सृजनात्मक हिंदी-साहित्य’ पर पीएचडी और ‘हरियाणा में रचित हिंदी-महाकाव्य’ विषय पर डीलिट् की उपाधि प्राप्त करने वाले डॉ. ‘मानव’ हरियाणा के प्रथम और ये दोनों उपाधियाँ प्राप्त करने वाले अद्यतन एकमात्र विद्वान हैं। हरियाणवी भाषा और साहित्य के विकास में भी इन्होंने बहुआयामी और महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। साहित्य अकादमी, नई दिल्ली की ‘हिंदी की सहभाषा’ श्रृंखला के अंतर्गत हरियाणवी भाषा पर प्रथम पुस्तक लिखने का गौरव भी डॉ. ‘मानव’ को ही प्राप्त हुआ है। इस दृष्टि से इनकी साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘हरियाणवी’  ऐतिहासिक महत्त्व रखती है। विभिन्न विधाओं की चौंसठ महत्त्वपूर्ण पुस्तकों के लेखक और संपादक तथा वर्तमान में सिंघानिया विश्वविद्यालय, पचेरी बड़ी (राजस्थान) में आचार्य तथा सांस्कृतिक संकाय के अधिष्ठाता के पद पर कार्यरत डॉ. ‘मानव’ ने अब हरियाणा प्रदेश के नामकरण को लेकर भी सर्वथा मौलिक और नवीन अवधारणा प्रस्तुत की है। इनकी यह अवधारणा पुरानी और परंपरागत मान्यताओं से कहीं अधिक तथ्यपरक और तर्कसंगत जान पड़ती है। अतः हरियाणा दिवस के सुअवसर पर, इसी संदर्भ में प्रस्तुत हैं डॉ. ‘मानव’ के विशिष्ट विचार।)*

        ‘हरियाणा’ शब्द की व्युत्पत्ति के संदर्भ में चर्चा करने पर डॉ. रामनिवास ‘मानव’ बताते हैं कि ‘हरियाणा’ वैदिक कालीन शब्द है। इसका सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है-“ऋजुभुक्षस्याने रजतं हरियाणे। रथं युक्तं असनाम सुषामणि।” (8:25:22) यहांँ प्रयुक्त ‘हरियाणे’ शब्द के कष्टों को सहने वाला, हरणशील, हरि का यान आदि अनेक अर्थ हो सकते हैं, किंतु इससे प्रदेश-विशेष के नाम का स्पष्ट बोध नहीं होता। मुख्यतः ‘हरियाणा’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘हरयान’ अथवा ‘हरि‌यान’ शब्द से‌ मानी जाती है। इसीलिए इसे अंग्रेजी में ‘हरयाणा’ तथा हिंदी में ‘हरियाणा’ लिखा जाता है। किंतु मेरे मतानुसार यह थ्योरी गलत है। हर (शिव) और हरि (विष्णु) के इस क्षेत्र में यान द्वारा विचरण करने का सटीक उल्लेख नहीं मिलता। फिर यान के विचरण करने से किसी क्षेत्र ‌के नामकरण की बात भी गले नहीं उतरती। ‘हरियानक’, ‘हरितारण्यक’, ‘हरिताणक’, ‘आर्यायन’, ‘दक्षिणायन’, ‘उक्षणायन’, ‘हरिधान्यक’, ‘हरिबांँका’ आदि शब्दों से हरियाणा की व्युत्पत्ति की अन्य थ्योरियाँ भी अविश्वसनीय, बल्कि कुछ तो हास्यास्पद लगती हैं। डॉ. बुद्धप्रकाश और प्राणनाथ चोपड़ा ने हरियाणा की व्युत्पत्ति ‘अभिरायण’ शब्द से मानी है, किंतु इसे भी आंशिक रूप में ही सही माना जा सकता है।

        अपनी अवधारणा को स्पष्ट करते हुए डॉ. ‘मानव’ ने कहा कि मेरी सुनिश्चित मान्यता है कि ‘हरियाणा’ की व्युत्पत्ति ‘अहिराणा’ शब्द से हुई है। पशुपालन और कृषि का व्यवसाय करने वाले यदुवंशियों को अभिर या आभीर कहा जाता था, कालांतर में, जिसका तद्भव  रूप अहीर हो गया। अहीर बहादुर योद्धा माने जाते थे, जिनके अस्तित्व के प्रमाण ईसा से छह हजार वर्ष पूर्व भी मिलते हैं। किसी समय अहीर जाति हरियाणा, दिल्ली, बिहार, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान से लेकर गुजरात और महाराष्ट्र तक फैली हुई थी। किंतु वर्तमान हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उसका पूरा आधिपत्य और संपूर्ण वर्चस्व रहा। अहीरों का बाहुल्य होने के कारण ही इस क्षेत्र को ‘अहिराणा’ कहा जाने लगा। (जैसे राजपूतों के कारण राजपुताना, मराठों के कारण मराठवाड़ा और भीलों के कारण भीलवाड़ा कहा जाता है।) बाद‌ में, हरियाणवी बोली की उदासीन अक्षरों के लोप की प्रकृति और प्रवृत्ति के चलते, अखाड़ा-खाड़ा, अहीर-हीर, उतारणा-तारणा, उठाणा-ठाणा और स्थाण-ठाण की तर्ज पर, ‘अहिराणा’ से ‘हिराणा’ और फिर ‘हरयाणा’ या ‘हरियाणा’ हो गया। ‘अहिराणा’ शब्द का अर्थ है- ‘अहीरों का क्षेत्र’। इसे ‘अहीरवाल’ का पर्यायवाची माना जा सकता है।

        डॉ. ‘मानव’ ने कहा कि एक अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य से भी मेरे मत की पुष्टि होती है। आज भी महाराष्ट्र के खानदेश, जिसे कभी हीरदेश भी कहा जाता था और जिसमें महाराष्ट्र के मालेगांव, नंदुरबार और धुले जिलों के अतिरिक्त नासिक जिले के धरनी, कलवण, सटाणा और बागलान तथा औरंगाबाद जिले के देवला क्षेत्र, गुजरात के सूरत और व्यारा तथा मध्यप्रदेश के अंबा और वरला क्षेत्र शामिल हैं, जहांँ आज भी ‘अहिराणी’ बोली, बोली जाती है। देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली और बीस-बाईस लाख लोगों द्वारा बोली जाने वाली ‘अहिराणी’ का अर्थ है- ‘अहीरों की बोली’। इससे स्पष्ट है कि ‘अहिराणा’ और ‘अहिराणी’ में सीधा संबंध और पूरी समानता है। 

        अंत में निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए डॉ. ‘मानव’ कहते हैं कि ‘हरयाणा’ अथवा ‘हरियाणा’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘हरयान’ या ‘हरियान’ से नहीं, बल्कि ‘अहिराणा’ शब्द से हुई है। निश्चय ही, डॉ. ‘मानव’ का यह मत पूर्णतया तथ्यपरक, तर्कसंगत और प्रामाणिक है।

*प्रस्तुति : डॉ. सत्यवान सौरभ, हिसार (हरियाणा)*

– डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,

किताबें उधार नहीं, अनुभूति होती हैं

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(जब समाज सेवा की शुरुआत दूसरों की अलमारी से होती है, तो किताबें वस्तु बन जाती हैं, अनुभूति नहीं।) 

किताबों का रिश्ता सिर्फ़ कागज़ और अक्षरों का नहीं होता, यह मन और आत्मा का संवाद है। आज जब लोग समाज सेवा या मित्रता के नाम पर किताबें माँगते हैं, तो यह सवाल उठता है — क्या उन्हें सच में किताबों से प्रेम है या केवल उन्हें मुफ़्त में पाने से? किताबें दान का सामान नहीं, एक अनुभव हैं। जो व्यक्ति अपने श्रम और जिज्ञासा से किताबें जुटाता है, वही उनकी असली कीमत समझता है। किताबें हमें आत्मनिर्भर बनाती हैं, हमें यह सिखाती हैं कि ज्ञान किसी की कृपा से नहीं, अपने प्रयास से अर्जित होता है।

— डॉ. प्रियंका सौरभ

कभी कोई व्हाट्सएप पर लिखता है, कभी मैसेंजर पर, तो कभी ईमेल में — “हमने समाज सेवा के लिए एक लाइब्रेरी बनाई है, आप कुछ किताबें भेज दीजिए।” शुरुआत में यह संदेश मुझे अच्छे लगते थे। लगा कि लोग पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देना चाहते हैं, किताबों को जीवित रखना चाहते हैं। लेकिन धीरे-धीरे यह सिलसिला कुछ ज़्यादा ही बढ़ गया। अब हर कुछ दिनों में कोई न कोई संदेश आता है — वही आग्रह, बस शब्द थोड़े बदल जाते हैं। मैं हर बार विनम्रता से मना करती हूँ, और कुछ दिन बाद फिर वही निवेदन लौट आता है।

कभी-कभी सोचती हूँ — क्या सच में लोग किताबों से प्रेम करते हैं, या सिर्फ़ उन्हें मुफ़्त में पाने से? कुछ तो ऐसे भी हैं जो दोस्ती ही इस उम्मीद से करते हैं कि मैं उन्हें किताबें दूँगी — जैसे मेरी अलमारी किसी सार्वजनिक पुस्तकालय की शाखा हो और मैं उसकी अनिच्छुक लाइब्रेरियन। ऐसे लोगों की सोच यह होती है कि “आपके पास तो बहुत किताबें हैं, कुछ हमें भी दे दीजिए, समाज का भला हो जाएगा।” लेकिन मैं सोचती हूँ — समाज सेवा की शुरुआत हमेशा दूसरों की अलमारी से क्यों होती है?

अगर सच में किताबों से प्रेम है, तो अपने श्रम से उन्हें जुटाइए। किताबें पाने का आनंद तभी होता है जब उन्हें पाने में थोड़ी मेहनत, थोड़ा इंतज़ार और बहुत-सा लगाव शामिल हो। वो किताबें, जिन्हें आपने अपनी पहली तनख्वाह से खरीदा हो, जिनके पन्नों पर कॉफ़ी के निशान हों या जिनमें आपकी उंगलियों के मोड़ से पन्ने मुड़े हों — वही किताबें आपके जीवन का हिस्सा बनती हैं। किताबों से प्रेम का अर्थ यह नहीं कि आप उन्हें जमा कर लें या दूसरों से माँगकर अपने रैक में सजा लें। किताबों से प्रेम का अर्थ है — उन्हें पढ़ना, उनसे प्रश्न करना, उनसे बहस करना और कभी-कभी उनसे असहमति जताना। किताबें जीवित प्राणी की तरह हैं — वे संवाद चाहती हैं, मौन नहीं।

आजकल किताबें माँगने का एक नया चलन शुरू हो गया है — समाज सेवा के नाम पर। कोई संगठन कहता है कि वह “गरीब बच्चों के लिए लाइब्रेरी” बना रहा है, कोई “महिला सशक्तिकरण केंद्र” के लिए किताबें चाहता है। शुरुआत में यह सब बहुत प्रेरक लगता है। लेकिन जब वही लोग साल दर साल, बार-बार वही संदेश भेजते हैं, तो शक होने लगता है — क्या सच में ये लाइब्रेरियाँ बन रही हैं, या किताबें किसी के ड्राइंगरूम की सजावट बन रही हैं? समाज सेवा की भावना प्रशंसनीय है, परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि हम दूसरों की मेहनत, लगाव और निजी संपदा को अपने नाम के झंडे तले बाँट लें।

किताबें सिर्फ़ कागज़ और शब्दों का ढेर नहीं होतीं — वे किसी व्यक्ति की यात्रा का हिस्सा होती हैं। उनमें उसकी सोच, उसकी भावनाएँ, उसके समय की छाप होती है। इसलिए जब कोई किताब माँगता है, तो वह केवल एक वस्तु नहीं माँग रहा होता, बल्कि किसी के जीवन का अंश माँग रहा होता है। यही कारण है कि जब कोई कहता है, “आपके पास तो इतनी किताबें हैं, कुछ हमें दे दीजिए,” तो मुझे यह एक भावनात्मक हस्तक्षेप जैसा लगता है। किताबों से जो रिश्ता बनता है, वह व्यक्तिगत होता है। वह संग्रह नहीं, संगति होती है।

लोग कहते हैं कि देश में लाइब्रेरियाँ नहीं हैं, इसलिए वे व्यक्तिगत संग्रहों से किताबें माँगते हैं। पर क्या सच में ऐसा है? मेरे अपने शहर में डॉ. कामिल बुल्के की लाइब्रेरी है — शब्दों और भाषाओं का अद्भुत संग्रह। राज्य पुस्तकालय और ब्रिटिश लाइब्रेरी — दोनों ही ज्ञान के खज़ाने से भरे पड़े हैं। मैंने अपनी पढ़ाई के दिनों में इन्हीं लाइब्रेरियों से किताबें लीं, घंटों वहीं बैठकर पढ़ा। उन पन्नों की महक, लकड़ी की अलमारियों की ठंडक और पुराने कागज़ की स्याही में घुली हुई ख़ामोशी आज भी मेरे मन में जीवित है।

लाइब्रेरी जाना एक अनुशासन सिखाता है। किताबों के साथ समय बिताने की एक लय बनती है। वहाँ आपको केवल ज्ञान नहीं मिलता, बल्कि धैर्य और विनम्रता भी मिलती है। आज जब सब कुछ ऑनलाइन उपलब्ध है, तब भी असली किताबों की दुनिया की तुलना नहीं की जा सकती। डिजिटल पन्ने रोशनी देते हैं, लेकिन कागज़ के पन्ने आत्मा देते हैं।

अब जब मैं किताबें खरीदती हूँ, तो वह मेरे लिए कोई साधारण ख़रीदारी नहीं होती। यह मेरे भीतर की यात्रा होती है। कुछ किताबें मेरे अकेलेपन की सखी हैं — वे तब साथ होती हैं जब शब्दों की ज़रूरत होती है, लेकिन लोग नहीं। कुछ किताबें मेरे विचारों की हमसफ़र हैं — वे तब जवाब देती हैं जब दुनिया सवाल पूछती है। हर किताब मेरे मन का एक कोना है, एक स्मृति है, एक विचार का विस्तार है। कभी-कभी मैं सोचती हूँ — किसी किताब को उधार देना वैसा ही है जैसे अपने दिल का एक टुकड़ा किसी को दे देना और फिर रोज़ यह सोचना कि क्या वह लौटेगी भी या नहीं।

कई बार किताबें लौटती नहींं। कई बार वे लौटती हैं, लेकिन उनके पन्नों से वह अपनापन गायब होता है जो पहले था। इसीलिए मैंने सीखा है कि किताबों को दान नहीं करती, बस उन्हें जीती हूँ। हमारे समाज में “दान” का एक विशेष स्थान है, लेकिन हर चीज़ दान योग्य नहीं होती। किताबें उनमें से एक हैं। किताबें तब दान बन जाती हैं जब उन्हें देने वाला उन्हें केवल वस्तु समझता है, और पाने वाला उन्हें केवल सजावट समझता है। लेकिन जब दोनों उन्हें “अनुभव” मानते हैं, तब वे आत्मा का आदान-प्रदान बन जाती हैं।

किताबें किसी भी समाज का बौद्धिक आधार हैं। लेकिन जब हम उन्हें सिर्फ़ “मुफ़्त में पाने” की मानसिकता से देखते हैं, तो हम उस ज्ञान की गरिमा को छोटा कर देते हैं। किताबें खरीदना, पढ़ना, संभालना — यह सब एक संस्कृति है, जो धीरे-धीरे गायब हो रही है। हम चाहते हैं कि सब हमें “मुफ़्त” मिले — शिक्षा, किताबें, विचार, प्रेरणा — लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि उनके निर्माण में कितना श्रम और समर्पण लगा है।

अगर सच में किसी को किताबों से प्रेम है, तो वह उन्हें पाने की कोशिश करेगा। वह अपनी तनख्वाह का थोड़ा हिस्सा किताबों के लिए रखेगा। वह बुकफेयर में जाएगा, सेकंड हैंड स्टॉल पर पुराने शीर्षक खोजेगा, या किसी लेखक से संवाद करेगा। सच्चा पाठक किताबों को उधार नहीं माँगता — वह उन्हें खोजता है, अर्जित करता है, और पढ़ने के बाद अपने भीतर उन्हें जीवित रखता है। किताबों की असली कीमत वही समझ सकता है, जिसने उन्हें अपने श्रम, अपनी जिज्ञासा और अपने प्रेम से पाया हो।

वो जानता है कि किताबें सिर्फ़ ज्ञान नहीं देतीं, वे जीवन का नज़रिया देती हैं। किताबें किसी के विचारों का संग्रह नहीं, बल्कि आत्मा का विस्तार हैं। वे हमें यह सिखाती हैं कि पढ़ना केवल जानकारी पाना नहीं, बल्कि अपने भीतर के संसार को गहराई देना है।

कभी-कभी मैं सोचती हूँ — किताबों की असली ताक़त यही है कि वे हमें आत्मनिर्भर बनाती हैं। वे सिखाती हैं कि ज्ञान किसी की दया पर निर्भर नहीं होता। और शायद यही कारण है कि मैं अपनी किताबें आसानी से किसी को नहीं देती — क्योंकि उन्होंने मुझे वही सिखाया है जो शायद कोई इंसान नहीं सिखा सका। किताबें दान की वस्तु नहीं, आत्मा की भाषा हैं। वे अपने भीतर हमारे विचारों, संवेदनाओं और संघर्षों का संग्रह रखती हैं।

इसलिए जब कोई मुझे कहता है — “आपके पास इतनी किताबें हैं, कुछ दे दीजिए,” तो मैं मुस्कुरा कर कहती हूँ — “अगर सच में किताबों से प्रेम है, तो उन्हें खोजिए, खरीदिए, और पढ़िए।”

क्योंकि किताबों से प्रेम का असली प्रमाण उन्हें माँगना नहीं, बल्कि उन्हें जीना है। और जब आप किसी किताब को जी लेते हैं — तब वह कभी छूटती नहीं, वह आपके भीतर बस जाती है — हमेशा के लिए।

(लेखिका — प्रियंका सौरभ, स्वतंत्र लेखिका एवं सामाजिक चिंतक)

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

बिहार चुनाव में सियासत और अपराध का नापाक गठजोड़

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बाल मुकुन्द ओझा

भारतीय लोकतंत्र में अपराधी इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं कि कोई भी राजनीतिक दल उन्हें नजरअंदाज नहीं कर पा रहा। पार्टियाँ उन्हें नहीं चुनती बल्कि वे चुनते हैं कि उन्हें किस पार्टी से लड़ना है। उनके इसी बल को देखकर उन्हें बाहुबली का नाम मिला है। कभी राजनीति के धुरंधर, अपराधियों का अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करते थे अब दूसरे को लाभ पहुँचाने के बदले उन्होंने खुद ही कमान संभाल ली है। चुनाव आते हैं तो राजनीति और अपराध जगत का संबंध भी सुर्खियों में आ जाता है। हम बात कर रहे है बिहार की जहां चुनाव सुधारों को बेहतर बनाने के लिए काम करने वाले संगठन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और बिहार इलेक्शन वॉच की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में पहले चरण का चुनाव लड़ रहे  हर तीसरे उम्मीदवार पर आपराधिक मुकदमा दर्ज है। पहले चरण में चुनावी रण में कुल 1,314 उम्मीदवार ताल ठोंक रहे हैं। ADR और बिहार इलेक्शन वॉच ने इन सभी के शपथ पत्रों का गहन विश्लेषण किया तो पता चला कि इसमें से 423 कैंडिडेट ने अपने ऊपर दर्ज हुए आपराधिक मुकदमों का ब्यौरा दिया है। हलफनामे के अनुसार 1,314 में से 354 उम्मीदवारों पर गंभीर आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। इनमें से 33 ने हत्या,  86 उम्मीदवारों ने हत्या की कोशिश, 42 ने महिला अपराध और 2 ने खुद पर दुष्कर्म के आरोपों की जानकारी दी है। इनमें CPI ML के 14 में 13, CPI के 3 में 3, जबकि राजद के 70 में से 53 उम्मीदवारों पर आपराधिक मुकदमें दर्ज़ है। जबकि बीजेपी के 48 में से 31, कांग्रेस के 23 में से 15,  लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के 13 में 7, जनसुराज पार्टी के 114 में 50 तथा जदयू के 57 में 22 उम्मीदवारों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज है। कहने का तात्पर्य है कोई भी पार्टी अपराधी तत्वों को टिकट थमाने में पीछे नहीं है। अन्य पार्टियों की भी कमोवेश यही स्थिति है। ये आंकड़ा बताता हैं कि राजनीति को अपराध मुक्त बनाने की लाखों कोशिशों के बावजूद ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती ही जा रही है जिनके खिलाफ आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं। लोकतंत्र की दुहाई देने वाले नेताओं और सियासी पार्टियों के नापाक गठजोड़ से जनता जनार्दन को जागरूक होने की जरुरत है। अपराधियों को नेताओं का समर्थन हो या नेताओं की अपराधियों को कानून के शिकंजे से बचाने की कोशिश, आखिर राजनैतिक दलों पर अपराधियों का ये कैसा असर है। 

राजनीति में शुचिता को लेकर ऊपरी तौर पर सभी सियासी दल सहमत है मगर व्यवहार में उनकी कथनी और करनी में भारी अंतर है। लगभग सभी दल चुनाव जीतने के लिए ऐसे उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारते है जो बाहुबली होने के साथ आपराधिक आचरण वाले है। नेताओं के खिलाफ अदालती मुकदमें कोई नयी बात नहीं है। आजादी के बाद से ही नेताओं को विभिन्न धाराओं में दर्ज मुकदमों का सामना करना पड़ रहा है। पिछले दो दशकों में ऐसे मामलों में यकायक ही तेजी आयी। दर्ज मुकदमों में हत्या, हत्या के प्रयास, सरकारी धन का दुरूपयोग, भ्रष्टाचार, बलात्कार जैसे गंभीर प्रकृति के मुकदमें भी शामिल है। कई नामचीन नेता आज भी जेलों में बंद होकर सजा भुगत रहे है और अनेक नेता जमानत पर बाहर आकर मुकदमों का सामना कर रहे है। वर्षों से इन मुकदमों का फैसला नहीं होने से हमारी लोकतान्त्रिक प्रणाली पर सवाल उठते रहे है। लम्बे मुकदमें चलने से सबूत मिलने में काफी परेशानी होती है और अंततोगत्वा आरोपी बरी हो जाते है। सुप्रीम अदालत यदि ऐसे मुकदमों के शीघ्र निस्तारण के लिए कोई सख्त कदम उठाये तो पीड़ितों को न्याय मिल पायेगा।

पिछले सालों में देश में जिस तरह हमारी राजनीति का अपराधीकरण हुआ है और आपराधिक तत्वों की ताकत बढ़ी है, वह जनतंत्र में हमारी आस्था को कमजोर बनाने वाली बात है। राजनीतिक दलों द्वारा अपराधियों को शह देना, जनता द्वारा वोट देकर उन्हें स्वीकृति और सम्मान देना और फिर कानूनी प्रक्रिया की कछुआ चाल, यह सब मिलकर हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था और जनतंत्र के प्रति हमारी निष्ठा, दोनों, को सवालों के घेरे में खड़ा कर देते हैं। प्रधानमंत्रीजी आपने वादा किया था देश को दागी राजनीति से मुक्त कराने का। केवल एक परिवार पर कार्यवाही से देश इस दंश से मुक्त नहीं होगा। आज हर दल में दागी शीर्ष पर बैठे है। वे देश के भाग्यविधाता बन बैठे है। थोड़ी हिम्मत दिखाइए और इन काले नागों का फन कुचल दीजिये। पूरा देश आपको सदियों याद रखेगा। दागी राजनीति को समाप्त करने में आपके अप्रतिम योगदान को इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जायेगा।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32 मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

दुनिया भर में मशहूर हैं मेरठ की गजक − रेबड़ी

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सर्दियों में रेवड़ियां बड़ी अच्छी लगती हैं । मेरठ में गुड और देसी घी से बने रेवड़ी और गजक दुनिया भर में मशहूर है । गुदड़ी बाजार को हम कभी नहीं भुला सकते चूंकि वह तो पूरा बाजार ही रेवड़ी बाजार है । बुढ़ाना गेट पर गोकुल और रामचंद्र कृष्णचंद्र सहाय की दुकानें तो उस समय देश में रेवड़ियों का सबसे बड़ा ब्रांड बन गई थीं , आज भी हैं ।

खांड और चीनी वाली रेवड़ी गजक शायद ही लखनऊ से बढ़िया कहीं बनती हों । गुलाब की खुशबू वाली ये रावड़ियाँ खाना शुरू करें तो जब तक डिब्बा आधा न हो जाए , काम नहीं चलता था । लखनऊ की गजक तो और भी लाजवाब है । मुरैना , आगरा और इंदौर में भी रेवड़ियाँ खूब बनती हैं । लेकिन मेरठ और लखनऊ के रेवड़ी गजक का आज भी कोई जवाब नहीं । यह और बात है कि रेवड़ी हजारों जगह बनती होंगी । बिकती तो देश भर में हैं ।

जी हां , हम असली रेवड़ियों की बात कर रहे हैं दोस्तों । आजकल राजनैतिक रेवड़ियाँ भी खूब बंट रही हैं । मुफ़्त की रेवड़ियों के जनक तो चचा केजरीवाल थे । आज तो पता नहीं कहां लुप्त हो गए । क्या करें हांकते ही इतनी बड़ी बड़ी थे कि बिग बॉस की बड़बोली तान्या मित्तल भी गश खाकर गिर पड़े । यद्यपि आजकल तो सभी हांक रहे हैं ।

केजरी बाबू को पीछे छोड़ने में लगे हैं अपने तेजस्वी बबुआ । लालू के फरजंद तेजस्वी ने तो लम्बे चौड़े बिहार के प्रत्येक घर को ही सरकारी नौकरी बांट डाली है । अब कौन नहीं जानता कि बिहारियों के लिए सरकारी नौकरी पाना जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य होता है । तो बबुआ ने फेंक दी रेवड़ियाँ । साथ में थमा दिया तेजस्वी प्रण । अपने नाम से इसलिए चूंकि लालू की चारा मंडी का एड्रेस तो सारे बिहारियों के पता है ?

तो रेवड़ियों की बात चली तो बता दें कि गुड तिल से बनीं रेवड़ियां होती लाजवाब हैं । जवानी में बड़ा मजा देती हैं । बुढ़ापे में जाड़ दांत साथ देना छोड़ दें तो गजक खाइए । गजक खाने में दांत की कम मुंह हिलाने और चबाने की ज्यादा जरूरत होती है , बाकी काम मसूड़े कर देते हैं । फिर आजकल बे दांत है ही कौन । ये गली गली बैठे डेंटिस्ट किसी को बे दांत छोड़ते कहां हैं । दांत नए उगा देते हैं ।

मोदी के आयुष्मान कार्ड तो 5 लाख के इलाज की बात थी । तेजस्वी व्रत में तो 25 लाख सालाना का इलाज होगा । तो रेवड़ियां खाने के लिए दांत भी उसी कार्ड में कवर करा देंगे । तब शौंक से खाना जमकर खाना रेवड़ियां । मेरठ और लखनऊ की खस्ता गजक रेवड़ियां ? कुछ कमी पड़ जाए तो संकोच न करना । अभी तक गायब थे । अब आ गए हैं दिल्ली वाले विदेश यात्री । वे भी तो दे जाएंगे थोड़ी बहुत फटाफट रेवड़ियां ? लेते जाइए , वोट जिसे देना हो देते जाइए ?

,,,,,,,,,कौशल सिखौला

ऑस्ट्रेलिया को हराकर वर्ल्ड कप फ़ाइनल में पहुँची भारतीय महिला टीम

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  जय हो भारतीय नारी शक्ति!

मेहनत, संघर्ष और नारी शक्ति का स्वर्णिम संगम। 

भारत की बेटियों ने इतिहास रच दिया! महिला क्रिकेट विश्वकप 2025 के सेमीफाइनल में भारत ने ऑस्ट्रेलिया को हराकर फाइनल में प्रवेश किया। यह जीत केवल खेल की नहीं, बल्कि नारी शक्ति, संघर्ष और आत्मविश्वास की प्रतीक है। स्मृति मंधाना, हरमनप्रीत कौर और दीप्ति शर्मा जैसी खिलाड़ियों के उत्कृष्ट प्रदर्शन ने दिखा दिया कि भारतीय महिलाएँ अब विश्व क्रिकेट की नई पहचान हैं। यह जीत हर उस बेटी के सपने का प्रमाण है जो सीमित साधनों में भी ऊँचा उड़ने का हौसला रखती है। अब कप दूर नहीं — जय हो भारतीय नारी शक्ति! 

– डॉ. प्रियंका सौरभ

आज का दिन भारतीय खेल इतिहास में स्वर्णाक्षरों से लिखा जाएगा। महिला क्रिकेट विश्वकप 2025 के सेमीफाइनल में भारत ने विश्वविजेता ऑस्ट्रेलिया को हराकर फाइनल में शानदार प्रवेश किया है। यह केवल एक जीत नहीं, बल्कि उस साहस, समर्पण और संघर्ष की कहानी है जिसने भारत की बेटियों को क्रिकेट की दुनिया में सबसे ऊँचे मुकाम पर पहुँचा दिया है।

कभी वह दौर था जब महिला क्रिकेट को केवल औपचारिकता समझा जाता था। मैदान पर मैच तो होते थे, पर दर्शक नहीं आते थे। खिलाड़ियों को सामान्य सुविधाएँ मिलती थीं और पहचान लगभग न के बराबर थी। लेकिन इन बेटियों ने हार नहीं मानी। उन्होंने खेलना जारी रखा — धूप, धूल और कठिन परिस्थितियों से जूझते हुए। मिथाली राज, झूलन गोस्वामी, हरमनप्रीत कौर और स्मृति मंधाना जैसी खिलाड़ियों ने उस दौर में भारतीय महिला क्रिकेट की नींव को मजबूत किया, जब समर्थन और साधन बहुत सीमित थे। आज उन्हीं के संघर्ष का परिणाम है कि भारत की युवा टीम आत्मविश्वास और जोश के साथ विश्व की सबसे शक्तिशाली टीम ऑस्ट्रेलिया को परास्त कर रही है।

यह जीत केवल एक मैच की सफलता नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और संयम की प्रतीक है। ऑस्ट्रेलिया, जिसने कई बार विश्वकप अपने नाम किया, के सामने भारतीय टीम ने बेहतरीन बल्लेबाज़ी, सटीक गेंदबाज़ी और चुस्त फील्डिंग का अद्भुत प्रदर्शन किया। हर चौके, हर विकेट पर पूरा मैदान “भारत माता की जय” से गूंज उठा। दर्शकों की आँखों में खुशी के आँसू थे, क्योंकि यह सिर्फ़ खेल की जीत नहीं, बल्कि भारतीय नारी शक्ति की प्रतिध्वनि थी। कप्तान ने निर्णायक क्षणों में जो साहसिक निर्णय लिए, उन्होंने साबित कर दिया कि यह टीम मानसिक रूप से भी उतनी ही सशक्त है जितनी शारीरिक रूप से।

यह सफलता अचानक नहीं आई। यह वर्षों की मेहनत, असफलताओं से सीखे गए सबक और अटूट लगन का परिणाम है। भारतीय महिला क्रिकेट अब केवल भावनात्मक प्रेरणा नहीं, बल्कि पेशेवर उत्कृष्टता का उदाहरण बन चुका है। खेल के मैदान में अब महिलाएँ सिर्फ़ भाग नहीं ले रही हैं — वे इतिहास रच रही हैं। क्रिकेट, जिसे कभी केवल पुरुषों का खेल माना जाता था, अब भारतीय बेटियों के नाम से गूंज रहा है। स्मृति मंधाना की शानदार बल्लेबाज़ी, हरमनप्रीत कौर की कप्तानी, शेफाली वर्मा की तेज़ शुरुआत और दीप्ति शर्मा की ऑलराउंड क्षमता ने साबित कर दिया कि भारतीय महिला टीम किसी भी परिस्थिति में जीत दर्ज करने का दम रखती है।

यह जीत केवल मैदान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक परिवर्तन का संकेत भी है। गाँव-कस्बों से निकलकर, सीमित संसाधनों में पली-बढ़ी बेटियों ने यह दिखा दिया कि अगर संकल्प दृढ़ हो और अवसर मिले, तो कोई सपना असंभव नहीं। यह सफलता उन माता-पिताओं के लिए भी प्रेरणा है जो बेटियों को खेल में आगे बढ़ाने से हिचकते हैं। अब वे निश्चिंत होकर कह सकते हैं — “हमारी बेटी भी खेल सकती है, जीत सकती है और देश का नाम रोशन कर सकती है।”

भारतीय महिला क्रिकेट को आज जो लोकप्रियता और समर्थन मिल रहा है, वह ऐतिहासिक है। स्टेडियम की भीड़, टीवी चैनलों की टीआरपी और सोशल मीडिया के ट्रेंड यह दर्शाते हैं कि अब महिला क्रिकेट केवल खेल नहीं, बल्कि भावना बन चुका है। दर्शकों और मीडिया के इस समर्थन ने खिलाड़ियों का आत्मविश्वास कई गुना बढ़ा दिया है। अब बेटियाँ न केवल खेल रही हैं, बल्कि देश की नई पहचान गढ़ रही हैं।

अब सबकी निगाहें फाइनल पर हैं। भारतीय टीम ने जिस लय, अनुशासन और जोश के साथ खेला है, वह विश्वकप को भारत की झोली में डालने के लिए पर्याप्त है। हर खिलाड़ी जानती है कि यह केवल मैच नहीं, बल्कि इतिहास रचने का अवसर है। अब यह केवल ट्रॉफी का सवाल नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के सपनों का सम्मान है। फाइनल भारतीय नारी शक्ति का उत्सव होगा — यह दुनिया को दिखाएगा कि भारत की महिलाएँ केवल परिवार और समाज में ही नहीं, बल्कि खेल के मैदान में भी नेतृत्व कर सकती हैं।

आज की यह जीत एक संदेश है — कि मेहनत, अनुशासन और आत्मविश्वास से कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती। भारत की बेटियाँ आज मैदान में नहीं, बल्कि इतिहास के पन्नों पर खेल रही हैं। उनके हाथों में बल्ला है, आँखों में लक्ष्य है, और दिल में असीम देशप्रेम है। यही वो शक्ति है जो भारत को नए युग की ओर ले जा रही है। अब चाहे ऑस्ट्रेलिया हो, इंग्लैंड या कोई और टीम — भारतीय महिला क्रिकेट अब किसी से डरना नहीं जानती। यह वह पीढ़ी है जो सपनों को साकार करने के लिए पैदा हुई है।

अब कप दूर नहीं। यह जीत एक नई सुबह की शुरुआत है। यह उन अनगिनत छोटी-छोटी बेटियों की प्रेरणा है जो किसी कोने में बल्ला थामे अपने सपनों को आकार दे रही हैं। यह जीत हर उस माँ की मुस्कान है जिसने अपनी बेटी को उड़ान भरने की आज़ादी दी। यह जीत हर उस पिता का गर्व है जिसने समाज की सोच से ऊपर उठकर अपनी बेटी को मैदान तक पहुँचाया।

भारतीय महिला टीम की इस ऐतिहासिक विजय को शत-शत नमन। यह केवल खेल की जीत नहीं, बल्कि राष्ट्र के आत्मविश्वास की पुनर्स्थापना है। अब जब भारतीय तिरंगा फाइनल में लहराएगा, तो वह हर बेटी की मेहनत और हर माँ की प्रार्थना का परिणाम होगा।

जय हो भारतीय नारी शक्ति!

जय हो भारत की बेटियाँ! 🇮🇳✨

#भारतीयमहिलाक्रिकेट #वर्ल्डकप2025 #नारीशक्ति #भारतकीबेटियाँ #इंडियाविन्स #महिलाविश्वकप #WomenInBlue

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का 12वीं का परीक्षा कार्यक्रम

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केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने 2026 की 12वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा की अंतिम समय-सारिणी जारी कर दी है। इस बार बोर्ड ने जेईई मेन (JEE Main 2026) के अभ्यर्थियों से कहा है कि वे अपने आवेदन पत्र में 11वीं कक्षा की जानकारी भी दें, ताकि परीक्षा तिथियों में कोई टकराव न हो।

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड  परीक्षा 2026 में कक्षा 12वीं की परीक्षाएं 17 फरवरी से 9 अप्रैल तक आयोजित होंगी। बोर्ड ने बताया कि इस शेड्यूल को बनाते समय विभिन्न प्रवेश परीक्षाओं की तारीखों का ध्यान रखा गया है। परीक्षाएं सुबह 10:30 बजे से दोपहर 1:30 बजे तक चलेंगी। सीबीएसई ने यह भी स्पष्ट किया है कि परीक्षा में शामिल होने के लिए छात्र की कम से कम 75प्रतिशत उपस्थिति और आंतरिक मूल्यांकन स्कोर होना जरूरी है।

वी. शांताराम : भारतीय सिनेमा के युगपुरुष

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भारतीय सिनेमा का इतिहास जब-जब रचनात्मकता, सामाजिक संदेश और तकनीकी नवाचार की बात करता है, तो एक नाम सदा उज्ज्वल रूप से सामने आता है — वी. शांताराम। वे केवल अभिनेता या निर्देशक नहीं थे, बल्कि भारतीय फिल्म उद्योग के ऐसे शिल्पी थे जिन्होंने सिनेमा को मनोरंजन से आगे बढ़ाकर सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया। उनकी फिल्में कला, तकनीक और मानवीय संवेदना का अद्भुत संगम थीं।


प्रारंभिक जीवन

वी. शांताराम का पूरा नाम वैष्णव देवई शांताराम भाऊराव राजाराम भोसले था। उनका जन्म 18 नवंबर 1901 को महाराष्ट्र के कोल्हापुर में हुआ। बचपन से ही वे कला और अभिनय में रुचि रखते थे। उनका जीवन बेहद संघर्षपूर्ण रहा। वे एक साधारण परिवार से थे, लेकिन अपनी प्रतिभा, मेहनत और दूरदर्शिता से उन्होंने भारतीय सिनेमा को नई दिशा दी।


अभिनय और निर्देशन की शुरुआत

शांताराम ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत 1920 के दशक में की। वे “महाराष्ट्र फिल्म कंपनी” से जुड़े, जो तत्कालीन मराठी फिल्मों के लिए प्रसिद्ध थी। उन्होंने 1921 में “सुरेखा हरन” फिल्म में एक छोटे से किरदार से अभिनय शुरू किया।

लेकिन उनका असली परिचय निर्देशक के रूप में हुआ, जब उन्होंने 1929 में मूक फिल्म “नेटाजी पालकर” का निर्देशन किया। इसके बाद उन्होंने “आयुध”, “माया मच्छिंद्र” जैसी फिल्मों से अपनी पहचान मजबूत की।


प्रभात फिल्म कंपनी की स्थापना

1930 में वी. शांताराम ने अपने साथियों के साथ मिलकर प्रभात फिल्म कंपनी की स्थापना की, जो भारत की सबसे महत्वपूर्ण फिल्म स्टूडियो में से एक बनी। प्रभात फिल्म कंपनी ने भारतीय सिनेमा को सामाजिक और नैतिक विषयों पर केंद्रित फिल्में दीं।

शांताराम की शुरुआती फिल्मों में “अमर ज्योति” (1936), “दुनिया ना माने” (1937), और “आदमी” (1939) जैसी फिल्में शामिल थीं, जो महिलाओं की सामाजिक स्थिति, समानता और आत्मसम्मान जैसे विषयों पर आधारित थीं। उनकी फिल्में समाज को सोचने पर मजबूर करती थीं।


सामाजिक विषयों की फिल्मों के अग्रदूत

वी. शांताराम ने फिल्मों को मनोरंजन का साधन भर नहीं माना। उन्होंने फिल्मों को सामाजिक सुधार और जन-जागरण का माध्यम बनाया।

“दुनिया ना माने” में उन्होंने बाल विवाह और महिला उत्पीड़न जैसे मुद्दों को उठाया।

“डॉ. कोटनीस की अमर कहानी” (1946) में भारत-चीन मित्रता और मानवीय सेवा की भावना दिखाई।

“दो आंखें बारह हाथ” (1957) में उन्होंने अपराधियों के पुनर्वास की कहानी बताई — यह फिल्म अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराही गई और बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में पुरस्कार प्राप्त किया।

“जल बिन मछली नृत्य बिन बिजली” (1971) उनकी बाद की रंगीन फिल्मों में से एक थी, जिसने तकनीकी दृष्टि से भारतीय सिनेमा को नई ऊंचाई दी।

उनकी फिल्में केवल कहानी नहीं थीं, बल्कि सामाजिक दस्तावेज़ थीं, जिनमें यथार्थ, संवेदना और संदेश का सुंदर मेल था।


अभिनय में विशिष्टता

वी. शांताराम ने जहाँ निर्देशन में अपनी पहचान बनाई, वहीं अभिनय में भी वे उतने ही कुशल थे। फिल्म “दो आंखें बारह हाथ” में उन्होंने स्वयं जेलर का किरदार निभाया, जिसमें उनका अभिनय सादगी और दृढ़ता से भरपूर था। उनकी आँखों और आवाज़ में वह असर था जो सीधे दर्शक के दिल तक पहुँचता था।


फिल्म निर्माण में प्रयोगशीलता

शांताराम भारतीय सिनेमा के प्रयोगशील फिल्मकार थे। उन्होंने ध्वनि, कैमरा और रंगों के साथ निरंतर प्रयोग किए। वे पहले भारतीय निर्देशकों में से एक थे जिन्होंने रंगीन फिल्मों का निर्माण किया। उनकी फिल्म “झनक झनक पायल बाजे” (1955) भारतीय रंगीन फिल्मों में मील का पत्थर मानी जाती है। इस फिल्म में नृत्य, संगीत, परंपरा और आधुनिक तकनीक का अद्भुत संगम था।


संगीत और सौंदर्य का संगम

वी. शांताराम की फिल्मों में संगीत का विशेष स्थान था। वे मानते थे कि संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि भावों की अभिव्यक्ति का माध्यम है। उनके निर्देशन में वसंत देसाई, सी. रामचंद्र और लता मंगेशकर जैसे कलाकारों ने यादगार काम किया।

“झनक झनक पायल बाजे”, “नवरंग” और “गीत गाया पत्थरों ने” जैसी फिल्मों के गीत आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में बसे हुए हैं।


पुरस्कार और सम्मान

वी. शांताराम के योगदान को देखते हुए उन्हें अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले।

पद्म भूषण (1992) से सम्मानित किया गया।

दादा साहेब फाल्के पुरस्कार (1985) — जो भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान है।

उनकी फिल्में “दो आंखें बारह हाथ” और “झनक झनक पायल बाजे” को राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए।

उनकी स्मृति में भारतीय फिल्म उद्योग ने “वी. शांताराम पुरस्कार” की स्थापना की है, जो उत्कृष्ट फिल्म निर्माण के लिए प्रतिवर्ष दिया जाता है।


व्यक्तिगत जीवन

वी. शांताराम का निजी जीवन भी उनके फिल्मों की तरह रोचक रहा। उन्होंने तीन विवाह किए। उनकी पत्नियों में प्रसिद्ध अभिनेत्री जयश्री गडकर और संध्या शामिल थीं, जो उनकी कई फिल्मों में नायिका रहीं। संध्या के साथ उनकी जोड़ी को “नवरंग” और “झनक झनक पायल बाजे” जैसी फिल्मों में दर्शकों ने बेहद पसंद किया।


निधन और विरासत

30 अक्टूबर 1990 को वी. शांताराम का निधन हुआ। उनके निधन के साथ भारतीय सिनेमा ने एक ऐसे युगपुरुष को खो दिया जिसने फिल्मों को कला, समाज और नैतिकता से जोड़ा।

आज भी उनके द्वारा स्थापित “राजकमल कलामंदिर” स्टूडियो भारतीय सिनेमा की ऐतिहासिक धरोहर माना जाता है।


निष्कर्ष

वी. शांताराम केवल एक फिल्मकार नहीं थे — वे एक दर्शनशास्त्री, समाज सुधारक और कलाकार थे, जिन्होंने कैमरे को समाज का दर्पण बना दिया। उन्होंने यह सिद्ध किया कि सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मानवता का संदेश देने का सबसे प्रभावशाली माध्यम है।

उनकी हर फिल्म अपने आप में एक विचार, एक प्रेरणा और एक सामाजिक क्रांति थी।
भारतीय सिनेमा की आत्मा में आज भी वी. शांताराम के सुर, दृश्य और विचार गूंजते हैं — वे सिनेमा के उस स्वर्ण युग के प्रतीक हैं जहाँ कला, समाज और सत्य एक साथ चलते थे।

वी. शांताराम — एक नाम, एक युग, और भारतीय सिनेमा का अमर अध्याय।प्रसिद्ध अभिनेता, निर्माता और निर्देशक वी. शांताराम : भारतीय सिनेमा के युगपुरुष

भारतीय सिनेमा का इतिहास जब-जब रचनात्मकता, सामाजिक संदेश और तकनीकी नवाचार की बात करता है, तो एक नाम सदा उज्ज्वल रूप से सामने आता है — वी. शांताराम। वे केवल अभिनेता या निर्देशक नहीं थे, बल्कि भारतीय फिल्म उद्योग के ऐसे शिल्पी थे जिन्होंने सिनेमा को मनोरंजन से आगे बढ़ाकर सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया। उनकी फिल्में कला, तकनीक और मानवीय संवेदना का अद्भुत संगम थीं।


प्रारंभिक जीवन

वी. शांताराम का पूरा नाम वैष्णव देवई शांताराम भाऊराव राजाराम भोसले था। उनका जन्म 18 नवंबर 1901 को महाराष्ट्र के कोल्हापुर में हुआ। बचपन से ही वे कला और अभिनय में रुचि रखते थे। उनका जीवन बेहद संघर्षपूर्ण रहा। वे एक साधारण परिवार से थे, लेकिन अपनी प्रतिभा, मेहनत और दूरदर्शिता से उन्होंने भारतीय सिनेमा को नई दिशा दी।


अभिनय और निर्देशन की शुरुआत

शांताराम ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत 1920 के दशक में की। वे “महाराष्ट्र फिल्म कंपनी” से जुड़े, जो तत्कालीन मराठी फिल्मों के लिए प्रसिद्ध थी। उन्होंने 1921 में “सुरेखा हरन” फिल्म में एक छोटे से किरदार से अभिनय शुरू किया।

लेकिन उनका असली परिचय निर्देशक के रूप में हुआ, जब उन्होंने 1929 में मूक फिल्म “नेटाजी पालकर” का निर्देशन किया। इसके बाद उन्होंने “आयुध”, “माया मच्छिंद्र” जैसी फिल्मों से अपनी पहचान मजबूत की।


प्रभात फिल्म कंपनी की स्थापना

1930 में वी. शांताराम ने अपने साथियों के साथ मिलकर प्रभात फिल्म कंपनी की स्थापना की, जो भारत की सबसे महत्वपूर्ण फिल्म स्टूडियो में से एक बनी। प्रभात फिल्म कंपनी ने भारतीय सिनेमा को सामाजिक और नैतिक विषयों पर केंद्रित फिल्में दीं।

शांताराम की शुरुआती फिल्मों में “अमर ज्योति” (1936), “दुनिया ना माने” (1937), और “आदमी” (1939) जैसी फिल्में शामिल थीं, जो महिलाओं की सामाजिक स्थिति, समानता और आत्मसम्मान जैसे विषयों पर आधारित थीं। उनकी फिल्में समाज को सोचने पर मजबूर करती थीं।


सामाजिक विषयों की फिल्मों के अग्रदूत

वी. शांताराम ने फिल्मों को मनोरंजन का साधन भर नहीं माना। उन्होंने फिल्मों को सामाजिक सुधार और जन-जागरण का माध्यम बनाया।

“दुनिया ना माने” में उन्होंने बाल विवाह और महिला उत्पीड़न जैसे मुद्दों को उठाया।

“डॉ. कोटनीस की अमर कहानी” (1946) में भारत-चीन मित्रता और मानवीय सेवा की भावना दिखाई।

“दो आंखें बारह हाथ” (1957) में उन्होंने अपराधियों के पुनर्वास की कहानी बताई — यह फिल्म अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराही गई और बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में पुरस्कार प्राप्त किया।

“जल बिन मछली नृत्य बिन बिजली” (1971) उनकी बाद की रंगीन फिल्मों में से एक थी, जिसने तकनीकी दृष्टि से भारतीय सिनेमा को नई ऊंचाई दी।

उनकी फिल्में केवल कहानी नहीं थीं, बल्कि सामाजिक दस्तावेज़ थीं, जिनमें यथार्थ, संवेदना और संदेश का सुंदर मेल था।


अभिनय में विशिष्टता

वी. शांताराम ने जहाँ निर्देशन में अपनी पहचान बनाई, वहीं अभिनय में भी वे उतने ही कुशल थे। फिल्म “दो आंखें बारह हाथ” में उन्होंने स्वयं जेलर का किरदार निभाया, जिसमें उनका अभिनय सादगी और दृढ़ता से भरपूर था। उनकी आँखों और आवाज़ में वह असर था जो सीधे दर्शक के दिल तक पहुँचता था।


फिल्म निर्माण में प्रयोगशीलता

शांताराम भारतीय सिनेमा के प्रयोगशील फिल्मकार थे। उन्होंने ध्वनि, कैमरा और रंगों के साथ निरंतर प्रयोग किए। वे पहले भारतीय निर्देशकों में से एक थे जिन्होंने रंगीन फिल्मों का निर्माण किया। उनकी फिल्म “झनक झनक पायल बाजे” (1955) भारतीय रंगीन फिल्मों में मील का पत्थर मानी जाती है। इस फिल्म में नृत्य, संगीत, परंपरा और आधुनिक तकनीक का अद्भुत संगम था।


संगीत और सौंदर्य का संगम

वी. शांताराम की फिल्मों में संगीत का विशेष स्थान था। वे मानते थे कि संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि भावों की अभिव्यक्ति का माध्यम है। उनके निर्देशन में वसंत देसाई, सी. रामचंद्र और लता मंगेशकर जैसे कलाकारों ने यादगार काम किया।

“झनक झनक पायल बाजे”, “नवरंग” और “गीत गाया पत्थरों ने” जैसी फिल्मों के गीत आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में बसे हुए हैं।


पुरस्कार और सम्मान

वी. शांताराम के योगदान को देखते हुए उन्हें अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले।

पद्म भूषण (1992) से सम्मानित किया गया।

दादा साहेब फाल्के पुरस्कार (1985) — जो भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान है।

उनकी फिल्में “दो आंखें बारह हाथ” और “झनक झनक पायल बाजे” को राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए।

उनकी स्मृति में भारतीय फिल्म उद्योग ने “वी. शांताराम पुरस्कार” की स्थापना की है, जो उत्कृष्ट फिल्म निर्माण के लिए प्रतिवर्ष दिया जाता है।


व्यक्तिगत जीवन

वी. शांताराम का निजी जीवन भी उनके फिल्मों की तरह रोचक रहा। उन्होंने तीन विवाह किए। उनकी पत्नियों में प्रसिद्ध अभिनेत्री जयश्री गडकर और संध्या शामिल थीं, जो उनकी कई फिल्मों में नायिका रहीं। संध्या के साथ उनकी जोड़ी को “नवरंग” और “झनक झनक पायल बाजे” जैसी फिल्मों में दर्शकों ने बेहद पसंद किया।


निधन और विरासत

30 अक्टूबर 1990 को वी. शांताराम का निधन हुआ। उनके निधन के साथ भारतीय सिनेमा ने एक ऐसे युगपुरुष को खो दिया जिसने फिल्मों को कला, समाज और नैतिकता से जोड़ा।

आज भी उनके द्वारा स्थापित “राजकमल कलामंदिर” स्टूडियो भारतीय सिनेमा की ऐतिहासिक धरोहर माना जाता है।


निष्कर्ष

वी. शांताराम केवल एक फिल्मकार नहीं थे — वे एक दर्शनशास्त्री, समाज सुधारक और कलाकार थे, जिन्होंने कैमरे को समाज का दर्पण बना दिया। उन्होंने यह सिद्ध किया कि सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मानवता का संदेश देने का सबसे प्रभावशाली माध्यम है।

उनकी हर फिल्म अपने आप में एक विचार, एक प्रेरणा और एक सामाजिक क्रांति थी।
भारतीय सिनेमा की आत्मा में आज भी वी. शांताराम के सुर, दृश्य और विचार गूंजते हैं — वे सिनेमा के उस स्वर्ण युग के प्रतीक हैं जहाँ कला, समाज और सत्य एक साथ चलते थे।

वी. शांताराम — एक नाम, एक युग, और भारतीय सिनेमा का अमर अध्याय।

फिल्म अभिनेता विनोद मेहरा : सरल व्यक्तित्व और सशक्त अभिनय के प्रतीक

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हिंदी सिनेमा के स्वर्ण युग में कई ऐसे कलाकार हुए जिन्होंने अपनी सादगी, गहराई और सहज अभिनय से दर्शकों के दिलों में अमिट छाप छोड़ी। इनमें से एक नाम था विनोद मेहरा — एक ऐसे अभिनेता जिनके अभिनय में भावनाओं की सच्चाई, चेहरे पर गजब की मासूमियत और संवादों में अद्भुत संवेदना झलकती थी। वे न तो किसी विशेष नायक की तरह ऊँची आवाज़ में संवाद बोलते थे, न ही उनका अंदाज़ आक्रामक था, पर उनकी सादगी ही उनकी सबसे बड़ी पहचान बन गई।

प्रारंभिक जीवन

विनोद मेहरा का जन्म 13 फरवरी 1945 को अमृतसर, पंजाब में हुआ था। उनका परिवार बाद में मुंबई आ गया, जहाँ से उन्होंने अपनी शिक्षा प्राप्त की। बचपन से ही उन्हें फिल्मों का शौक था और उनकी अभिनय यात्रा की शुरुआत बाल कलाकार के रूप में फिल्म बेहरूपिया (1952) से हुई थी। आगे चलकर उन्होंने फिल्मों में सहायक भूमिकाओं से शुरुआत की और धीरे-धीरे मुख्य अभिनेता के रूप में अपनी पहचान बनाई।

फिल्मी करियर की शुरुआत

विनोद मेहरा का पहला प्रमुख ब्रेक फिल्म “एक थी रीता” (1971) से मिला, जिसने उन्हें हिंदी सिनेमा में स्थापित कर दिया। इसके बाद उन्होंने अनेक फिल्मों में अपनी अभिनय प्रतिभा का परिचय दिया। 1970 और 1980 के दशक में वे रोमांटिक, भावनात्मक और पारिवारिक किरदारों के लिए जाने जाने लगे। उनकी अभिनय शैली बहुत स्वाभाविक थी—वे किरदारों को जीते थे, निभाते नहीं।

उनकी प्रमुख फिल्मों में “अनुराग” (1972), “लाल पत्थर” (1971), “गृहप्रवेश” (1979), “स्वयंवर” (1980), “अमर प्रेम” (1972), “नमक हराम” (1973), “घर” (1978), “जानी दुश्मन” (1979), “बेइमान”, “खूबसूरत” (1980) और “अखराई” जैसी अनेक फ़िल्में शामिल हैं।

अभिनय शैली

विनोद मेहरा की अभिनय कला का सबसे बड़ा गुण था—संवेदनशीलता और सरलता। वे अपने चेहरे के भावों से गहरी भावनाएँ व्यक्त कर देते थे। उन्हें अक्सर ऐसे किरदारों में देखा गया जो ईमानदार, दयालु, जिम्मेदार और प्रेम में सच्चे होते थे।
फिल्म “घर” में रेखा के साथ उनका अभिनय आज भी याद किया जाता है, जिसमें उन्होंने एक ऐसे पति का किरदार निभाया जो अपनी पत्नी के साथ हुए अपराध के बाद मानसिक और सामाजिक संघर्ष से गुजरता है। इस फिल्म ने उन्हें समीक्षकों की सराहना दिलाई।

फिल्म “गृहप्रवेश” में उनका अभिनय एक सामान्य पति की दुविधाओं और भावनाओं को बेहद यथार्थ ढंग से पेश करता है। वहीं “अमर प्रेम” और “नमक हराम” जैसी फिल्मों में उन्होंने सहायक भूमिकाओं में भी ऐसा असर छोड़ा कि दर्शक उन्हें भूल नहीं सके।

सह-कलाकारों के साथ संबंध

विनोद मेहरा को उनके सह-अभिनेताओं द्वारा बहुत पसंद किया जाता था। वे अपने विनम्र स्वभाव और सौम्य व्यक्तित्व के कारण फिल्म जगत में सबके प्रिय थे। उन्होंने राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, धर्मेन्द्र, रेखा, मौसमी चटर्जी, शर्मिला टैगोर, और बिंदिया गोस्वामी जैसे सितारों के साथ काम किया। खास बात यह थी कि हर बड़ी जोड़ी के बीच भी उनका अभिनय अपना अलग प्रभाव छोड़ता था।

व्यक्तिगत जीवन

विनोद मेहरा का व्यक्तिगत जीवन काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा। उन्होंने कई बार विवाह किया। उनका नाम अभिनेत्री रेखा के साथ भी जुड़ा, हालांकि यह रिश्ता कभी सार्वजनिक रूप से स्थायी नहीं हुआ। बाद में उन्होंने किरण से विवाह किया, जिनसे उन्हें दो संतानें—सोनिया मेहरा और रोहन मेहरा—हुए। रोहन मेहरा ने भी फिल्मों में कदम रखा।

अचानक मृत्यु

विनोद मेहरा का जीवन जितना सादगीपूर्ण था, उतना ही उनका अंत अचानक और दुखद था। 30 अक्टूबर 1990 को मात्र 45 वर्ष की आयु में हृदयाघात से उनका निधन हो गया। उनकी असमय मृत्यु ने फिल्म उद्योग को गहरे शोक में डाल दिया। उस समय वे कई फिल्मों की शूटिंग कर रहे थे, जिनमें कुछ फिल्में बाद में रिलीज़ हुईं, जैसे “गुरुदेव” (1993)।

विरासत और योगदान

विनोद मेहरा ने लगभग 100 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया। उन्होंने फिल्मों में वह स्थान पाया जो अभिनय की सादगी और भावनात्मक गहराई का प्रतीक माना जाता है। वे उन कुछ अभिनेताओं में थे जिन्होंने अपने अभिनय से यह साबित किया कि बड़े स्टारडम के बिना भी कोई कलाकार दर्शकों के दिलों में अमर हो सकता है।

उनकी बेटी सोनिया मेहरा ने फिल्म रागिनी एमएमएस 2 से अभिनय में कदम रखा, जबकि बेटे रोहन मेहरा ने बाजार (2018) जैसी फिल्मों में अपनी प्रतिभा दिखाई।

निष्कर्ष

विनोद मेहरा हिंदी सिनेमा के उन कलाकारों में गिने जाते हैं जिन्होंने बिना किसी दिखावे, बिना किसी विवाद के, अपने सच्चे अभिनय और सौम्य व्यक्तित्व से सिनेमा को समृद्ध किया। वे एक ऐसे अभिनेता थे जिन्होंने प्रेम, त्याग, संघर्ष और मानवीय भावनाओं को परदे पर इतनी ईमानदारी से उतारा कि दर्शक आज भी उन्हें याद करते हैं।

उनकी मुस्कान, उनका शांत चेहरा और उनकी भावनाओं की गहराई आज भी हिंदी सिनेमा प्रेमियों के दिलों में जीवित है। विनोद मेहरा भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका योगदान हमेशा हिंदी फिल्म इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा।

बेगम अख्तर : ठुमरी की मल्लिका और शास्त्रीय संगीत की अमर साधिका

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भारतीय संगीत की दुनिया में जब भी ठुमरी, ग़ज़ल और दादरा की चर्चा होती है, तो सबसे पहले जिस नाम की याद आती है, वह है बेगम अख्तर। उनकी गायकी में दर्द की गहराई, सुरों की मिठास और भावों की सच्चाई थी। वे न केवल एक महान गायिका थीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप में ग़ज़ल और ठुमरी को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने वाली अग्रदूत भी थीं। उन्हें संगीत प्रेमी ससम्मान “मल्लिका-ए-ग़ज़ल” यानी ग़ज़लों की रानी के नाम से जानते हैं।

प्रारंभिक जीवन

बेगम अख्तर का जन्म 7 अक्टूबर 1914 को उत्तर प्रदेश के फैजाबाद (अब अयोध्या) में हुआ था। उनका असली नाम अख्तरी बाई फ़ैज़ाबादी था। बचपन से ही उनके भीतर संगीत के प्रति गहरी रुचि थी। परिवार में विरोध के बावजूद उन्होंने संगीत को ही अपना जीवन बना लिया। उनके संगीत गुरु उस्ताद इमरात खान, उस्ताद अताउल्ला खान, और बाद में उस्ताद झंडे खाँ साहब रहे, जिन्होंने उन्हें ठुमरी, दादरा और ग़ज़ल गायन की बारीकियाँ सिखाईं।

संगीत यात्रा की शुरुआत

अख्तरी बाई ने किशोरावस्था में ही मंच पर गाना शुरू कर दिया था। उनकी पहली सार्वजनिक प्रस्तुति पटना में हुई, जहाँ सरोजिनी नायडू जैसी हस्तियों ने उनकी सराहना की। इसके बाद उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। उस दौर में महिलाओं के लिए मंच पर आना आसान नहीं था, परंतु अख्तरी बाई ने समाज की परंपराओं को तोड़कर यह सिद्ध कर दिया कि प्रतिभा किसी बंधन की मोहताज नहीं होती।

फिल्मों से संगीत तक

1930 के दशक में अख्तरी बाई ने कुछ फिल्मों में अभिनय भी किया। उन्होंने “एक दिन का बादशाह” (1933), “नल-दमयंती” (1933) और “रoti” (1942) जैसी फिल्मों में काम किया। “रोटी” फिल्म में उन्होंने अभिनय के साथ-साथ गीत भी गाए, जो अत्यंत लोकप्रिय हुए।
लेकिन फिल्मों की दुनिया उन्हें रास नहीं आई। उन्होंने निश्चय किया कि वे अपने जीवन को केवल संगीत के लिए समर्पित करेंगी। इसी समय वे “बेगम अख्तर” के नाम से प्रसिद्ध हुईं।

विवाह और व्यक्तिगत जीवन

1945 में उन्होंने लखनऊ के जाने-माने वकील इसरार अहमद अब्बासी से विवाह किया। विवाह के बाद उन्होंने कुछ समय के लिए गायन से दूरी बना ली, लेकिन संगीत से उनका गहरा संबंध कभी नहीं टूटा। गायन छोड़ने के कारण वे मानसिक रूप से बहुत विचलित हो गईं, और डॉक्टरों की सलाह पर उन्हें फिर से संगीत की ओर लौटने की अनुमति मिली।
इसके बाद उनका गायन और भी परिपक्व, संवेदनशील और भावनाओं से भरपूर हो गया।

गायकी की विशेषता

बेगम अख्तर की गायकी का सबसे बड़ा गुण था भावनात्मक गहराई। उनके स्वर में एक अद्भुत दर्द और आत्मीयता थी। जब वे “दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे” या “ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया” जैसी ग़ज़लें गातीं, तो श्रोता उनके साथ-साथ उस दर्द को महसूस करते थे।

उनकी ठुमरी में बनारस, लखनऊ और पटियाला घराने की झलक मिलती थी। उन्होंने ठुमरी को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक साहित्यिक और भावनात्मक कला बना दिया। वे हर शब्द को जीती थीं — उनके सुर, शब्दों के अर्थ और भावों के साथ चलते थे।

उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ थीं –

“हमरी अटरिया पे आओ संवरिया”

“चराग़ दिल का जला के गया कौन”

“ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया”

“दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे”

“कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता”

“वो जो हममें तुममें क़रार था”

इन गीतों ने उन्हें अमर बना दिया।

पुरस्कार और सम्मान

बेगम अख्तर को संगीत के क्षेत्र में अनेक सम्मान प्राप्त हुए। उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री (1968) और पद्मभूषण (1975) से सम्मानित किया। इसके अतिरिक्त उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भी मिला। इन सम्मानों ने उनके योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दी।

अंतिम समय और निधन

1974 में जब वे अहमदाबाद में एक कार्यक्रम के दौरान गा रही थीं, तब उन्हें अस्वस्थता महसूस हुई। इसके बावजूद उन्होंने कार्यक्रम अधूरा नहीं छोड़ा। उसी वर्ष 30 अक्टूबर 1974 को उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु के बाद पूरा संगीत जगत शोक में डूब गया।

बेगम अख्तर की विरासत

बेगम अख्तर ने भारतीय संगीत को जो दिशा दी, वह आज भी अडिग है। उन्होंने ग़ज़ल और ठुमरी को केवल दरबारी या पारंपरिक कला नहीं रहने दिया, बल्कि उसे आम जनता के दिलों तक पहुँचाया। उन्होंने महिला गायिकाओं के लिए एक राह खोली, जिसमें संगीत को सामाजिक बंधनों से मुक्त किया गया।

उनकी शिष्या शुभा मुद्गल, चित्रा सिंह, रीता गांगुली, गुलाम अली जैसे कलाकारों ने उनकी शैली से प्रेरणा पाई। आज भी जब उनकी आवाज़ गूंजती है, तो लगता है जैसे कोई दिल के सबसे गहरे कोने से पुकार रहा हो।

निष्कर्ष

बेगम अख्तर केवल एक गायिका नहीं थीं, बल्कि एक युग थीं — एक ऐसी शख्सियत जिन्होंने संगीत को अपने जीवन का धर्म बना लिया। उनके गीतों में प्रेम है, पीड़ा है, समर्पण है और आत्मा की सच्चाई है।
उनकी आवाज़ में जो तड़प थी, वह शायद उनके जीवन की वास्तविकता का प्रतिबिंब थी। बेगम अख्तर ने अपने सुरों से भारतीय संगीत को अमर कर दिया। वे भले ही अब इस संसार में नहीं हैं, लेकिन उनकी ग़ज़लें, उनकी ठुमरियाँ आज भी हर संगीतप्रेमी के दिल में गूंजती हैं।

बेगम अख्तर सचमुच भारतीय संगीत की वह “मल्लिका” थीं, जिनकी गूँज समय की सीमाओं को पार कर अमर हो चुकी है।