पाकिस्तान दोहरा रहा है अपना खूनी इतिहास

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बाल मुकुन्द ओझा

पाकिस्तान से आने वाली ख़बरों पर यकीन करें तो पाकिस्तान एक बार फिर अपने खूनी इतिहास को दोहराने जा रहा है। जियाउलहक ने 1979 में जुल्फिकार अली भुट्टों को फांसी दे दी थी और अब इमरान खान की जेल में मौत की ख़बरों से पूरी दुनियां हतप्रभ है। इसी बीच अदियाला जेल प्रशासन ने इमरान खान को लेकर चल रही अफवाहों को खारिज कर दिया है। अधिकारियों ने बताया कि वह जेल में ही हैं, पूरी तरह स्वस्थ हैं और उन्हें सभी जरूरी मेडिकल सुविधाएं मिल रही हैं। पाकिस्तान में लोकतंत्र के छलावे से हर कोई परिचित है। यह भी सर्वविदित है इस देश में सैनिक हुकुमरानों की इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता। यहाँ एक और सैनिक तानाशाह आसिम मुनीर ने इमरान खान को जेल में डाल रखा है और उनके जीवित रहने या नहीं रहने की ख़बरें मीडिया की सुर्खिया बनी हुई है। पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को लेकर इस समय पाकिस्तान की सियासत गरमाई हुई है। इमरान खान 2023 से रावलपिंडी की अदियाला जेल में बंद हैं, लेकिन इस वक्त पाकिस्तान में उनकी हत्या की अफवाह तेजी से फैल गई है। पाकिस्तान की सेना और सरकार पर जेल में उन्हें टॉर्चर करने का आरोप है। जबकि उनसे किसी को मिलने नहीं दिया जा रहा, जिससे अफवाह को बल मिल रहा है। इमरान खान की बहनें नोरीन खान, अलीमा खान और उजमा खान को जेल के बाहर से घसीटकर भगा दिया गया। उनके साथ मारपीट भी की गई।

पाक के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान सेना की मदद से पाक पर काबिज हुए थे। जितने दिन उन्हें सेना की छत्रछाया मिली वे निर्बाध रूप से राज करते रहे फिर जैसे ही उन्होंने अपनी स्वतंत्र आवाज बुलंद करनी चाही तो उनसे जल्द ही शासन से बेदखल होना पड़ा। बेदखल होने के बाद इमरान पर कई मुक़दमे कायम किये गए और अन्तोगत्वा अपने पूर्ववर्ती शासकों की तरह जेल के सींकचों में बंद होना पड़ा। भारत से अलग होने  के बाद पाकिस्तान ने भी लोकतंत्र का रास्ता चुना था। मगर शीघ्र ही लोकतंत्र की यह नकाब उतर गई। पाक में लोकतंत्र के पीछे सेना खड़ी हो गई और देखते देखते पाक पर छद्म रूप से सेना काबिज हो गई। कहा जाता है पाक पर वही पार्टी शासन करेगी जिसे सेना का समर्थन मिलेगा। अन्यथा सैना खुद शासन की कमान सँभालते देर नहीं करेगी। यह कोई कल्पित कहानी नहीं है अपितु पाक की असलियत है। कहते है पाक के शासक का पद काँटों के ताज से कम नहीं है। उसे कब सत्ताच्युत होकर जेल जाना पड़ेगा यह किसी को मालूम नहीं है। इससे पहले सुहरावर्दी से लेकर इमरान तक 5 निर्वाचित नेता गिरफ्तार हो चुके हैं। एक को फांसी दी गई थी। पाकिस्तान अपने पूर्व शासकों को जेल भेजने के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है।

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान तोशखाना केस में दोषी करार दिए गए। उन्हें तीन साल की सजा हुई। हुसैन सुहरावर्दी, जुल्फिकार अली भुट्टो, बेनजीर,  परवेज मुशर्रफ ,नवाज शरीफ, शाहिद खाकान अब्बासी आदि की कहानी ज्यादा पुरानी नहीं है जिन्होंने पहले निर्बाध रूप से पाक पर शासन किया और फिर जेल जाना पड़ा। 1956 से 1957 तक पाकिस्तान के पांचवें प्रधानमंत्री हुसैन सुहरावर्दी को 1962 में गिरफ्तार किया गया था, जब उन्होंने 1958 में जनरल अयूब खान के तख्तापलट का समर्थन करने से मना कर दिया था। हुसैन को 1962 में पाकिस्तान सुरक्षा अधिनियम 1952 के तहत जेल में डाल दिया गया। इसके साथ ही उन्हें पाकिस्तान में राजनीति में भाग लेने से भी प्रतिबंधित कर दिया गया था। इसी तरह जुल्फिकार अली भुट्टो ने 1971 में पाकिस्तान के राष्ट्रपति के रूप में जनरल याह्या खान की जगह ली थी। उन्होंने 1973-1977 तक प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया था। उनके शासनकाल में पाकिस्तान ने भारत के साथ शिमला समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, उस समय इंदिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री थीं। लेकिन जुलाई 1977 में एक सैन्य तख्तापलट के माध्यम से जनरल जिया-उल-हक ने सत्ता हड़प ली। भुट्टो को एक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की हत्या की साजिश के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था। सितंबर 1977 में रिहा तो किया गया लेकिन फिर से गिरफ्तार कर लिया गया। बाद में उन्हें अप्रैल 1979 में सेंट्रल जेल रावलपिंडी में फांसी दे दी गई। शाहिद खाकान अब्बासी, जिन्होंने 2017 से 2018 तक प्रधानमंत्री के रूप में नवाज शरीफ की जगह ली थी, उनको भी कथित भ्रष्टाचार के लिए जनवरी 2019 में 12-सदस्यीय राष्ट्रीय जवाबदेही ब्यूरो (एनएबी) की टीम ने गिरफ्तार किया था। 2001 से 2007 तक पाक के प्रधानमंत्री परवेज मुशर्रफ को भी सत्ताच्युत कर देश से निर्वासित  गया था। पाकिस्तान के पूर्व तानाशाह परवेज मुशर्रफ का संयुक्त अरब अमीरात में निधन हो गया। मुर्शरफ के खिलाफ पाकिस्तान में कई मुकदमें चल रहे थे और इसी वजह से वह दुबई में निर्वासन में जी रहे थे। इससे पहले पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के साथ भी कुछ ऐसा ही हश्र हुआ था। अप्रैल 2018 में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने नवाज शरीफ को आजीवन सार्वजनिक पद धारण करने से अयोग्य घोषित कर दिया था।

1988 और 1990 के बीच 2 बार और फिर 1993 से 1996 तक पीएम बनने से पहले जुल्फिकार अली भुट्टो की बेटी बेनजीर भुट्टो को कई गिरफ्तारियों और जेल में कई शर्तों का सामना भी करना पड़ा था। 2007 में एक आत्मघाती हमलावर ने बेनजीर की हत्या कर दी थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक यह हत्या पाकिस्तानी तालिबान और अलकायदा के इशारे पर की गई थी।

पाक अपना इतिहास दोहरा रहा है। असल में पाक में लोकतंत्र का दिखावा मात्र है वहां असली शासन की बागडोर सेना के हाथ में है। जो व्यक्ति सेना की हुक्म उदूली करेगा उसे सत्ता से हटना ही होगा।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी-32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

मार्शल आर्ट के महा नायक ब्रूस ली

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ब्रूस ली आधुनिक युग के उन महान व्यक्तित्वों में से एक हैं, जिन्होंने केवल मार्शल आर्ट की दुनिया को ही नहीं बदला, बल्कि शारीरिक क्षमता, आत्मविश्वास, दर्शन और जीवन दृष्टि को भी नई दिशा दी। वे केवल एक अभिनेता नहीं थे, बल्कि एक शिक्षक, दार्शनिक और नवप्रवर्तनकर्ता थे जिनकी सोच ने दुनिया भर के युवाओं को प्रेरित किया। आज भी ब्रूस ली को मार्शल आर्ट का प्रतीक, शक्ति का अवतार और दृढ़ संकल्प का प्रतीक माना जाता है। उनकी बनाई शैली “जीत कुन डो” ने मार्शल आर्ट की सीमाओं को तोड़ते हुए इसे एक वैज्ञानिक, व्यावहारिक और लचीली कला में बदल दिया।

ब्रूस ली का जन्म 27 नवंबर 1940 को अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में हुआ था, लेकिन उनका पालन-पोषण हांगकांग में हुआ। उनके पिता ली होई चुएन एक प्रसिद्ध चीनी थिएटर कलाकार थे, इसलिए बचपन से ही ब्रूस को अभिनय और प्रदर्शन की दुनिया से परिचय मिला। वे शुरू से ही फुर्तीले, जिज्ञासु और ऊर्जा से भरपूर थे। किशोरावस्था में वे सड़क झगड़ों और गैंग से जुड़े माहौल में रहते हुए भी खुद को बचाने और शारीरिक रूप से मजबूत बनने की चाह में मार्शल आर्ट की ओर आकर्षित हुए। उन्होंने विंग-चुन शैली के महान गुरु इप मैन से प्रशिक्षण लिया, जिसने उनके जीवन की दिशा बदल दी।

मार्शल आर्ट में गहराई से उतरते हुए ब्रूस ली ने महसूस किया कि पारंपरिक शैलियों में कई सीमाएं हैं। वे मानते थे कि लड़ाई की कला को व्यावहारिक, वैज्ञानिक और तेज बनाया जाना चाहिए। इस विचार के साथ उन्होंने विभिन्न मार्शल आर्ट शैलियों—कुंग फू, बॉक्सिंग, जूडो और फेंसिंग—के सिद्धांतों को मिलाकर एक नई शैली विकसित की, जिसे उन्होंने नाम दिया “जीत कुन डो”। यह शैली कठोर नियमों से मुक्त थी और परिस्थितियों के अनुसार बदलने की क्षमता पर आधारित थी। ब्रूस ली का प्रसिद्ध सिद्धांत था—”जो उपयोगी है उसे अपनाओ, जो अनुपयोगी है उसे छोड़ दो।” यह सिद्धांत न केवल लड़ाई की कला पर बल्कि जीवन पर भी लागू होता है।

ब्रूस ली ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन फिल्मों के माध्यम से भी किया। उनकी शुरुआती फिल्में हांगकांग में रहीं, लेकिन उन्हें विश्व प्रसिद्धि 1970 के दशक में हॉलीवुड फिल्मों से मिली। द बिग बॉस, फिस्ट ऑफ फ्यूरी, वे ऑफ द ड्रैगन, एंटर द ड्रैगन जैसी फिल्मों ने ब्रूस ली को अंतरराष्ट्रीय सुपरस्टार बना दिया। इन फिल्मों में उनकी गति, ताकत और वास्तविक मार्शल आर्ट तकनीक ने दर्शकों को अभिभूत कर दिया। एंटर द ड्रैगन तो आज भी दुनिया की सर्वोत्तम मार्शल आर्ट फिल्मों में गिनी जाती है। ब्रूस ली की फिल्मों ने न केवल पूर्वी लड़ाई प्रणालियों को पश्चिमी देशों में लोकप्रिय बनाया, बल्कि एशियाई कलाकारों के लिए हॉलीवुड के दरवाजे भी खोले।

ब्रूस ली केवल एक योद्धा नहीं थे; वे गहरे दार्शनिक भी थे। वे मानते थे कि शरीर और मन का संतुलन मनुष्य को पूर्ण बनाता है। उन्होंने अपनी डायरी में कई विचार लिखे जो आज भी लाखों लोगों को प्रेरित करते हैं—”Be water, my friend” जैसे वाक्य दुनिया की सबसे प्रभावशाली पंक्तियों में गिने जाते हैं। उनका मानना था कि जीवन को पानी की तरह सरल, लचीला और प्रवाहमयी होना चाहिए। वे फिटनेस में भी बहुत आगे थे और अपने समय के सबसे अधिक प्रशिक्षित एथलीटों में थे। उनकी तेज़ी, सहनशक्ति और गति आज भी वैज्ञानिक अध्ययन का विषय हैं।

ब्रूस ली का जीवन जितना उज्ज्वल था उतना ही छोटा भी। 20 जुलाई 1973 को महज 32 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु को लेकर कई अटकलें लगाई गईं, लेकिन आधिकारिक रूप से यह कहा गया कि दवा की प्रतिक्रिया से उनका मस्तिष्क सूज गया था। अचानक चले जाने के बावजूद ब्रूस ली की विरासत आज भी उतनी ही मजबूत है। उनका नाम ताकत, समर्पण और आत्म-विकास का पर्याय बना हुआ है। दुनिया भर में लाखों मार्शल आर्ट स्कूलों में उनके सिद्धांत पढ़ाए जाते हैं और अनगिनत लोग उनके प्रेरणादायक विचारों का अनुसरण करते हैं।

ब्रूस ली ने साबित किया कि मनुष्य की असली शक्ति उसके भीतर होती है। यदि लक्ष्य स्पष्ट हो, संकल्प मजबूत हो और अभ्यास निरंतर हो, तो कोई भी सीमा मार्ग में बाधा नहीं बन सकती। उनका जीवन दिखाता है कि महानता केवल प्रतिभा से नहीं, बल्कि निरंतर मेहनत, आत्मविश्वास और नवीनता की सोच से प्राप्त होती है। वे सदैव याद किए जाएंगे—एक महान मार्शल आर्टिस्ट के रूप में, एक अद्भुत अभिनेता के रूप में, और एक ऐसे इंसान के रूप में जिसने दुनिया को सिखाया कि अपने भीतर की ऊर्जा को कैसे पहचानकर जीवन को असाधारण बनाया जा सकता है।

भारतीय संगीत में डिस्को शैली को स्थापित करने गायक − संगीतकार बप्पी लहरी

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भारतीय फिल्म संगीत की दुनिया में बप्पी लहरी का नाम एक विशिष्ट पहचान रखता है। अस्सी और नब्बे के दशक में बॉलीवुड में जिस तरह का संगीत लोकप्रिय हुआ, उसमें बप्पी लहरी ने एक नई दिशा और नई ऊर्जा का संचार किया। वे न सिर्फ एक संगीतकार थे, बल्कि एक गायक, नवप्रवर्तनकर्ता और लाखों युवाओं के फैशन आइकॉन भी थे। भारतीय संगीत में डिस्को शैली को स्थापित करने का श्रेय बड़ी हद तक बप्पी लहरी को दिया जाता है, जिन्होंने फिल्म संगीत को अंतरराष्ट्रीय पॉप और इलेक्ट्रॉनिक ध्वनियों से जोड़ा। अपने चकाचौंध भरे अंदाज़ और अनोखे संगीत प्रयोगों के कारण वे “डिस्को किंग” के नाम से पूरे देश में प्रसिद्ध हुए।

बप्पी लहरी का जन्म 27 नवंबर 1952 को कोलकाता के एक संगीत-समृद्ध बंगाली परिवार में हुआ था। उनका वास्तविक नाम आलोकेश लाहिड़ी था। उनके माता-पिता अपरेश लाहिड़ी और बंसरी लाहिड़ी स्वयं प्रतिष्ठित शास्त्रीय संगीतकार तथा गायिका थे। इस सांगीतिक वातावरण ने बप्पी को बचपन से ही संगीत की ओर प्रेरित किया। तीन वर्ष की उम्र में ही उन्होंने तबला बजाना और छह वर्ष की उम्र में पहला संगीत कार्यक्रम किया। किशोरावस्था तक वे वाद्ययंत्रों, ताल और सुर में पूरी तरह पारंगत हो चुके थे। किशोर कुमार के साथ उनका पारिवारिक संबंध भी उनके शुरुआती संगीत मार्गदर्शन में महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ।

संगीतकार के रूप में बप्पी लहरी का बॉलीवुड में पदार्पण 1973 की फिल्म नन्हा शीकारी से हुआ, लेकिन उन्हें व्यापक पहचान 1975 की फिल्म ज़ख्मी से मिलने लगी, जिसके गीतों ने उनकी प्रतिभा को सबके सामने ला दिया। 1980 का दशक उनके करियर का स्वर्णिम काल रहा। इस दौर में उन्होंने एक के बाद एक ऐसी फिल्में दीं जिनके गीतों ने भारतीय संगीत संस्कृति को पूरी तरह बदल दिया। वार्डन, डिस्को डांसर, डांस डांस, कसम पैदा करने वाले की, नमक हलाल, शराबी, हिम्मतवाला, सहस और तोहफा जैसी बड़ी फिल्मों में उनका संगीत सुपरहिट हुआ। हर गाने में उन्होंने आधुनिक बीट, सिंथेसाइज़र, इलेक्ट्रॉनिक संगीत और भारतीय सुरों का अनूठा मेल तैयार किया।

फिल्म डिस्को डांसर ने तो मानो संगीत के इतिहास में क्रांति ला दी। मिथुन चक्रवर्ती पर फिल्माए गए उनके गीत—आई एम ए डिस्को डांसर, जिमी जिमी जिमी आजा—दुनिया के विभिन्न देशों में लोकप्रिय हुए। यह उन दिनों की बात है जब भारतीय गीतों का वैश्विक प्रसार इतना आसान नहीं था, लेकिन बप्पी लहरी के संगीत ने सीमाएँ तोड़ दीं। रूस, चीन और मध्य-एशियाई देशों तक उनकी धुनों ने भारतीय फिल्मों की पहुंच बढ़ाई। उनकी इसी वैश्विक लोकप्रियता के कारण वे भारत में वेस्टर्न पॉप और नृत्य संगीत के लगभग पर्याय बन गए।

गायक के रूप में भी बप्पी लहरी बेहद सफल रहे। उनकी आवाज़ में एक अनूठी मिठास और आधुनिकता थी, जो युवा दर्शकों को जल्दी आकर्षित करती थी। कोई यहां नाचे नाचे, बंबई से आया मेरा दोस्त, यार बिना चेन कहां रे, ऊ लाला ऊ लाला, आज रपट जाएं, तम्मा तम्मा लोगे और दे दे प्यार दे जैसे गीत आज भी पार्टी और नृत्य का माहौल बना देते हैं। उनका अंदाज़, उनकी आवाज़ और उनकी मस्ती ने उन्हें गायकों की भीड़ में अलग खड़ा किया।

बप्पी लहरी की सबसे खास बात यह थी कि उन्होंने भारतीय फिल्म संगीत में प्रयोगों को हमेशा अपनाया। उस समय जब अधिकतर संगीतकार पारंपरिक वाद्ययंत्रों और रागों पर निर्भर थे, बप्पी दा इलेक्ट्रॉनिक गिटार, सिंथेसाइज़र, ड्रम मशीन और विदेशी ताल-ध्वनियों का उपयोग कर रहे थे। यही नवाचार आगे चलकर बॉलीवुड के संगीत का मुख्य स्वरूप बन गया। उनकी वजह से ही अस्सी और नब्बे के दशक में बॉलीवुड का संगीत युवा पीढ़ी को पश्चिमी पॉप संगीत की ओर आकर्षित किए बिना उसके स्वाद को भारतीय शैली में परिवर्तित कर बताया गया।

उनके व्यक्तित्व का एक और महत्वपूर्ण पहलू उनका फैशन था। बप्पी लहरी और सोने की चेनें एक-दूसरे के पर्याय बन गए थे। उनके कई लेयर्ड गोल्ड चेन, गोल्ड ब्रेसलेट्स, चश्मे और चमकदार कपड़े उनकी पहचान का हिस्सा बन गए थे। वे कहते थे कि सोना उनके लिए शुभ है और उनकी ऊर्जा बढ़ाता है। भले ही कुछ लोग इसे दिखावा समझते थे, लेकिन उनकी यह शैली उन्हें पॉप कल्चर का हिस्सा बना चुकी थी।

नब्बे के दशक और उसके बाद भी बप्पी दा का योगदान जारी रहा। बदलते संगीत दौर में भी उन्होंने अपनी धुनों और स्टाइल को आधुनिक रूप में प्रस्तुत किया। 2000 के दशक में जब रिमिक्स और रीक्रिएटेड सॉन्ग्स की लहर चली, तब उनके कई गीतों के नए संस्करण सुपरहिट हुए। उन्होंने खुद भी फिल्मों और एल्बमों के लिए नए गाने बनाए। फिल्म डर्टी पिक्चर का उनका गीत ऊ लाला ऊ लाला उन की वापसी का शानदार उदाहरण बना। 2014 में उन्होंने हॉलीवुड फिल्म स्लमडॉग मिलियनेयर के लिए भी अपनी आवाज़ दी।

बप्पी लहरी को उनके संगीत योगदान के लिए कई सम्मान मिले। फिल्मफेयर पुरस्कार, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार, दादा साहेब फाल्के अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार सहित अनेक मंचों पर उन्हें सम्मानित किया गया। वे लंबे समय तक इंडियन परफॉर्मिंग राइट्स सोसाइटी (IPRS) और अन्य संगीत अधिकार संस्थाओं से जुड़े रहे, जहाँ उन्होंने कलाकारों के अधिकारों की मजबूती के लिए आवाज उठाई।

18 फरवरी 2022 को बप्पी लहरी का निधन मुंबई में हुआ। उनकी उम्र 69 वर्ष थी। उनके अचानक चले जाने से भारतीय संगीत जगत में गहरा शोक फैल गया। करोड़ों प्रशंसकों ने उन्हें सोशल मीडिया पर याद किया, और उनके गीत कई दिनों तक ट्रेंड में बने रहे। उनकी अतुलनीय ऊर्जा, प्रयोगशीलता और संगीत प्रेम हमेशा प्रेरणा का स्रोत रहेंगे।

बप्पी लहरी केवल एक संगीतकार नहीं थे, वे एक सांस्कृतिक धरोहर थे। उन्होंने भारतीय फिल्म संगीत में वह परिवर्तन लाया जिसने न सिर्फ बॉलीवुड को नया रूप दिया, बल्कि दुनियाभर के दर्शकों को भारतीय गीतों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज भी जब कोई युवा “डिस्को” शब्द सुनता है, तो सबसे पहले बप्पी दा की ही याद आती है। उनकी संगीत यात्रा और योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए भारतीय पॉप और फिल्म संगीत का आदर्श उदाहरण है।

बप्पी दा ने हिन्दी, बांग्ला और दक्षिण भारतीय भाषाओं में 5000 से ज्यादा गाने कंपोज किए. यह भी अपने आप में एक उपलब्धि है. इसके साथ ही उन्होंने कई सिंगिग रिएलिटी शोज में बतौर जज अपनी भूमिका निभाई. राजनीति में भी बप्पी दा ने कदम रखा. 2014 में वह भाजपा में शामिल हुए थे, लेकिन सक्रिय राजनीति नहीं की.

एक अवॉर्ड शो के दौरान बप्पी लाहिरी और राजकुमार की अचानक मुलाकात हो गई। राजकुमार ने बप्पी दा के गहनों को देखकर तारीफ की और कहा कि एक से बढ़कर एक जेवर पहने हो। पहले तो सब हंसी-खुशी थी, लेकिन फिर राजकुमार ने मजाक में तंज कसते हुए कहा, ‘बस अब तो एक मंगलसूत्र की कमी रह गई है।’ ये बात बप्पी लाहिरी को बुरी तरह चुभ गई और उन्हें बिल्कुल अच्छी नहीं लगी।

 अमीर अलीः सात सौ  हत्याएं करने वाला ठग

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क्या कोई  ठग अपने ठगी के लगभग बीस साल के समय में 700 हत्याएं कर सकता है। इस पर यकीन नही होता किंतु यह सत्य है। 700 हत्याएं करने वाला ठग अमीर अली  जेल में ठांठ से रहता है।  उसे इन हत्याओं पर कोई अफसोस  नही।

अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार

फिलिप मिडोज टेलर की पुस्तक एक ठग की दास्तान का हिंदी में अनुवाद राज नारायण  पांडेय ने किया है। 700 से अधिक हत्याएँ करके अपराध के महासिन्धु में डूबा हुआ अमीर अली जेल में सामान्य बन्दियों से पृथक बड़े ठाट-बाट से रहता था। वह साफ कपड़े पहनता, अपनी दाढ़ी सँवारता और पाँचों वक्त की नमाज अदा करता था। उसकी दैनिक क्रियाएँ नियमपूर्वक चलती । अपराधबोध अथवा पश्चात्ताप का कोई चिह्न उसके मुख पर कभी नहीं देखा गया। उसे भवानी की अनुकम्पा और शकुनों पर अटूट विश्वास था। एक प्रश्न के उत्तर में उसने कहा था कि भवानी स्वयं उसका शिकार उसके हाथों में दे देती है, इसमें उसका क्या कसूर? और अल्लाह की मर्जी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता। उसका यह भी कहना था कि यदि वह जेल में न होता तो उसके द्वारा शिकार हुए यात्रियों की संख्या हजार से अधिक हो सकती थी।

पुस्तक ‘एक ठग की दास्तान’ 19वीं शताब्दी के आरम्भकाल में मध्य भारत, महाराष्ट्र तथा निजाम के समस्त इलाकों में सड़क मार्ग से यात्रा करनेवाले यात्रियों के लिए आतंक का पर्याय बने ठगों में सर्वाधिक प्रसिद्ध अमीर अली के विभिन्न रोमांचकारी अभियानों की तथ्यपरक आत्मकथा है। इसे लेखक ने स्वयं जेल में अमीर अली के मुख से सुनकर लिपिबद्ध किया है। “एक ठग की आत्मकथा” — एक अत्यंत चर्चित कृति है। यह उपन्यास 1839 में प्रकाशित हुआ था और इसे भारतीय समाज, अपराध, धार्मिक अंधविश्वास तथा ब्रिटिश औपनिवेशिक दृष्टिकोण को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ माना जाता है।टेलर स्वयं ब्रिटिश अधिकारी थे और उन्होंने लंबे समय तक भारत में कार्य किया। भारतीय संस्कृति, भाषा और समाज की गहरी समझ होने के कारण उन्होंने इस उपन्यास को न केवल अपराध की कथा के रूप में, बल्कि भारतीय जीवन के एक यथार्थ चित्र के रूप में प्रस्तुत किया। फिलिप मीडोज़ टेलर (1808–1876) ब्रिटिश अधिकारी, प्रशासक, और लेखक थे। उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय भारत में बिताया, विशेषकर दक्षिण भारत के क्षेत्रों में। टेलर का झुकाव भारतीय जीवन, लोककथाओं और रहस्यमयी घटनाओं की ओर था। उन्होंने भारतीय समाज को केवल शासन की दृष्टि से नहीं, बल्कि मानवता और संस्कृति की दृष्टि से भी गहराई से समझा।

 -“एक ठग की आत्मकथा” मूल रूप से एक अपराधी ठग, अमीर अली, की आत्मकथा है जिसे ब्रिटिश पुलिस पकड़ लेती है। कहानी का अधिकांश भाग अमीर अली के अपने अपराधी जीवन के वर्णन पर आधारित है, जिसे वह एक अंग्रेज अधिकारी को सुनाता है। अमीर अली मुस्लिम पृष्ठभूमि का व्यक्ति है, जो ठगों के एक संगठन से जुड़ जाता है। ये ठग धार्मिक और रहस्यमयी विश्वासों से प्रेरित होकर यात्रियों की हत्या करते थे और उनका धन लूट लेते थे। वे देवी काली की पूजा करते थे और मानते थे कि उनकी हत्या “धर्मिक बलिदान” का एक रूप है। अमीर अली अपने ठग जीवन के आरंभ, प्रशिक्षण, धार्मिक विश्वासों, यात्राओं, और अंततः गिरफ्तारी तक की कथा बड़े आत्मविश्वास और विस्तार से सुनाता है। कथा में भारत के विभिन्न भूभागों — मध्य भारत, बुंदेलखंड, मालवा, दक्क्षिण, आदि — के दृश्य आते हैं, जो 19वीं शताब्दी के भारत की सामाजिक और भौगोलिक झलक प्रस्तुत करते हैं।

अमीर अली का बाप भी ठग है। वह अपने बेटे काठगी की विधिवत ट्रेनिंग देता है। ये  ठग अपने शिकार की एक रूमाल से हत्या करते हैं। रूमाल के एक किनारे में एक सिक्का बंधा होता है। ये  अपने शिकार को बातों में लगाकर उसके गले में रूमाल डालकर उसे ऐंठ देते हैं।इससे शिकार का गला घुट जाता  है और कुछ ही पल में मौत हो जाती है।ये मरे शिकार का पेट फाड़कर उसे  जगह में दाब देतें हैं, जहां पता न लग सके।

पुस्तक के तीन पात्र हैं−1. अमीर अली – कहानी का नायक और कथावाचक। वह एक बुद्धिमान, साहसी, परंतु नैतिक दृष्टि से भ्रष्ट ठग है। उसके भीतर अपराध और आस्था का विचित्र मिश्रण है। 2.कैप्टन विलियम्स – ब्रिटिश अधिकारी जो अमीर अली से पूछताछ करता है और उसकी आत्मकथा को सुनता है। यह पात्र लेखक का प्रतिनिधि है । 3. ठगों का गिरोह – यह समूह संगठित अपराध का प्रतीक है, जो धार्मिक प्रतीकों और परंपराओं का सहारा लेकर हत्याओं को न्यायोचित ठहराता है।

 पुस्तक में लेखक टेलर ने दिखाया कि कैसे धर्म और अंधविश्वास को अपराध का औचित्य सिद्ध करने के लिए प्रयोग किया जा सकता है। ठग देवी काली की सेवा के नाम पर यात्रियों की हत्या करते थे। कथा में विभिन्न भाषाएँ, रीति-रिवाज, परिधान, और लोकधारणाएँ शामिल हैं, जो भारत की बहुरंगी सामाजिक संरचना को दर्शाती हैं। अमीर अली का चरित्र गहराई से मनोवैज्ञानिक है। वह अपराधी है, परंतु पूरी तरह निर्दयी नहीं। वह अपने कर्मों को धार्मिक औचित्य से जोड़ता है, जिससे उसके भीतर द्वंद्व उत्पन्न होता है।

टेलर की भाषा सरल, प्रभावशाली और चित्रात्मक है। उन्होंने अंग्रेज़ी में लिखा, लेकिन भारतीय शब्दों — जैसे ठग, फकीर, देवी, नमाज़, काली — का प्रयोग प्रचुर मात्रा में किया, जिससे पाठक को भारतीय वातावरण का यथार्थ अनुभव होता है। संवाद-शैली ने उपन्यास को जीवंत बनाया है। अमीर अली के कथन आत्मस्वीकारोक्ति के रूप में हैं, जो उसे विश्वसनीय बनाते हैं।

“एक ठग की आत्मकथा अंग्रेजी साहित्य में पहला ऐसा उपन्यास था जिसने भारत के अपराध-जगत और औपनिवेशिक यथार्थ को इतने जीवंत रूप में प्रस्तुत किया। यह उपन्यास थ्रिलर शैली का प्रारंभिक उदाहरण भी माना जाता है, क्योंकि इसमें रहस्य, हत्या और मनोवैज्ञानिक तनाव का उत्कृष्ट संयोजन है। साथ ही, इस उपन्यास ने पश्चिमी पाठकों के बीच भारत के रहस्यमयी और अंधविश्वासी रूप की एक स्थायी छवि बनाई, जो बाद में औपनिवेशिक साहित्य की विशेषता बन गई।

उपन्यास उस समय लिखा गया जब ब्रिटिश सरकार भारत में ठगों के उन्मूलन के अभियान में जुटी थी।वास्तव में, 1830 के दशक में कैप्टन विलियम स्लीमैन ने ठगों के गिरोहों के विरुद्ध बड़े पैमाने पर कार्रवाई की थी।टेलर ने इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को आधार बनाकर अपने उपन्यास की रचना की। इस प्रकार यह रचना केवल साहित्यिक कल्पना नहीं, बल्कि एक सामाजिक-ऐतिहासिक दस्तावेज़ भी है।

उपन्यास यह संदेश देता है कि जब अंधविश्वास और धार्मिक कट्टरता मानव बुद्धि पर हावी हो जाते हैं, तो अपराध को भी “धर्म का रूप मिल जाता है। अमीर अली जैसे पात्र यह दिखाते हैं कि नैतिकता केवल कानून से नहीं, बल्कि विवेक और सहानुभूति से आती है। यह रचना यह भी इंगित करती है कि समाज में शिक्षा और विवेक का प्रसार ही ऐसे अपराधों का अंत कर सकता है।

फिलिप मीडोज़ टेलर की “एक ठग की आत्मकथा” केवल अपराध की कहानी नहीं, बल्कि भारतीय समाज के एक ऐसे अंधेरे पक्ष की गाथा है जहाँ धर्म, अंधविश्वास और लालच आपस में उलझे हैं। यह उपन्यास औपनिवेशिक युग के भारत को समझने का एक सशक्त माध्यम है।अमीर अली का चरित्र अपराधी होते हुए भी मानवीय जटिलताओं से भरा है, जो पाठक को यह सोचने पर विवश करता है कि अपराध केवल व्यक्ति का नहीं, समाज का भी दर्पण होता है ।

अशोक मधुप

( लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं)

फास्ट फूड का नकारात्मक प्रभाव!

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पश्चिमी देशों की तरह हमारे मुल्क में भी जंक और फास्ट फूड का चलन तेजी से बढ़ रहा है। इसे हासिल करने में जितने लाभ और सुविधाएँ तलाश की जा रही हैं, उससे ज्यादा इसके नुकसान सामने आ रहे हैं। इंसान रोजाना जो कुछ खाता पीता है, उसका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है। स्वस्थ रहने के लिए अच्छा पोषण और नियमित व्यायाम जरूरी है। इसके विपरीत फास्ट फूड और जंक फूड का ज्यादा सेवन स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। खास ही नही, अब आम घरों में भी खाना बनाने का रिवाज कम होता जा रहा है। फास्ट फूड ऐसा भोजन है जो जल्दी तैयार हो जाता है और होटलों व रेस्टोरेंटों में कम समय में आसानी से सुलभ हो जाता है। मॉल, कंफेक्शनरी व किराना स्टोरों में मिलने वाले फास्ट फूड और डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों की बिक्री में दिन प्रतिदिन हो रही वृद्धि इस बात का प्रमाण है कि मौजूदा नस्ल की घरों में भोजन बनाने में दिलचस्पी नहीं है। हालाँकि घर पर तैयार भोजन की अपेक्षा इन खानों में पौष्टिकता कम होती है और ये महंगे भी होते हैं, फिर भी लोगों का रुझान इसी ओर बढ़ रहा है। युवा पीढ़ी तो फास्ट फूड की दीवानी है ही, बुजुर्गों व बच्चों में भी घर बैठे ऑनलाइन खाना मंगवाना आधुनिकता की शान और सामाजिक प्रगति की पहचान समझा जा रहा है। अधिकतर लोग फास्ट फूड के नुकसान और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले इसके नकारात्मक प्रभावों से अनजान हैं। दफ्तर से वापसी या देर से घर लौटने, थकान होने या खाना बनाने को मन नहीं करने का बहाना बनाकर फास्ट फूड मंगाने को आसान विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। जंक फूड का ज्यादा इस्तेमाल जहां स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, वहीं बीमारियों का सबब भी बन रहा है।
दरअसल, फास्ट फूड कम पोषक तत्व वाला वह भोजन है, जो जल्दी तैयार हो जाता है, जबकि जंक फूड खासतौर पर अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ होते हैं। इनमें चीनी, वसा, सोडियम और कृत्रिम तत्व अधिक होते हैं। इस बिना पर हर जंक फूड फास्ट फूड हो सकता है, लेकिन हर फास्ट फूड जंक फूड नहीं होता। बर्गर जैसे फास्ट फूड की शुरुआत 18वीं शताब्दी में अमेरिका से हुई थी। आरंभ में लोग खराब स्वाद के कारण इसे पसंद नहीं करते थे, लेकिन समय बीतने के साथ लोगों का ध्यान बर्गर और इसके विभिन्न रूपों की ओर जाने लगा। आज दुनिया भर में मैक्डॉनल्ड्स, स्टारबक्स, मिक्स आइसक्रीम एंड टी, सबवे, केएफसी और डोमिनोज पिज्जा, बर्गर किंग, लकन कॉफी, पिज्जा हट, क्रिप्सी क्रीमे, जॉली बी और डंकिन डोनट्स डंकिन आदि ब्रांड के फास्ट फूड उपलब्ध हैं। फास्ट फूड में अमेरिका का वार्षिक राजस्व करीब 7,01,598 करोड़ रुपये, ब्रिटेन का 1,44,257 करोड़, फ्रांस का 1,78,888 करोड़, मेक्सिको का 1,76,647 करोड़, दक्षिण कोरिया का 1,10,373 करोड़, चीन का 1,47,440 करोड़ और इटली का 1,62,685 करोड़ रुपये है। स्वीडन, ऑस्ट्रिया, ग्रीस और नॉर्वे भी फास्ट फूड के बड़े बाजार हैं। भारत में यह कारोबार 7,14,584 करोड़ रुपये से अधिक का है। द लांसेट की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक 2006 में हमारे देश में ऐसे खाद्य पदार्थों की बिक्री 0.9 बिलियन अमेरिकी डॉलर (80,66,17,35,000 रुपये) थी, जो 2019 में बढ़कर 38 बिलियन अमेरिकी डॉलर (34,05,71,77,00,000 रुपये) हो गई है। फास्ट फूड के सेवन से पुरुषों और महिलाओं में मोटापा दोगुना हो गया है। पुरुषों में मोटापे की दर जहां 12 से 23 प्रतिशत हो गई, वहीं महिलाओं में यह दर 15 से 24 प्रतिशत तक बढ़ गई। ऐसे खाद्य एवं पेय पदार्थों में विटामिन, खनिज और फाइबर जैसे पोषक तत्वों की कमी होती है। फास्ट फूड को पुरुषों और महिलाओं में टाइप-2 डॉयबिटीज, रक्तचाप में वृद्धि, अवसाद, पाचन की खराबी, गुर्दों में तकलीफ, स्मृति हानि, हृदय रोग, यकृत की क्षति, कैंसर, चर्म रोग, प्रतिरोधक क्षमता में कमी और समय पूर्व मौत का कारण माना जा रहा है। वास्तविक पौष्टिकता से दूर इन खाद्य पदार्थों में चीनी, नमक, खराब तेल और बनावटी रंग आदि शामिल होते हैं। ऐसा करने से फास्ट फूड का स्वाद इतना बढ़ जाता है कि लोग इन्हें बार बार खाना पसंद करते हैं। हालांकि, ऐसा भोजन हमारी सेहत के लिए हानिकारक है, लेकिन बाजार में उपलब्ध बर्गर, पिज्जा, फ्रेंच फ्राइज, चाउमीन, मोमोज, सैंडविच, फ्राइड चिकन, हॉट डॉग, टिकोज, स्प्रिंग रोल, डोनट, चिप्स, कुरकुरे, नूडल्स, नगेट्स, टॉफी, चॉकलेट, आइस्क्रीम, कुकीज, पेस्ट्रीज, नमकीन, स्नैक्स, पास्ता समोसा, कबाब, पकौड़ा, ढोकला, बड़ा पाव, मंचूरियन, मैगी, बिरयानी, नाचूस, मिठाई, कोल्डड्रिंक्स, ब्रेकफास्ट और खाद्य उत्पादों का सेवन पुरुषों और महिलाओं के साथ बच्चे भी कर रहे हैं। विशेषज्ञों ने पैकेटबंद फूड का सेवन कम करने के लिए सख्त कदम उठाने की आवश्यकता बताई है। हालांकि जंक फूड का कभी कभार सेवन नुकसान नहीं देता, लेकिन नियमित सेवन के कारण मोटापे और स्थाई बीमारियों से बचना मुश्किल है। सोडियम की उच्च मात्रा सिरदर्द और माइग्रेन का कारण बनती है। अधिक कार्बोहाइड्रेट से मुंहासे और चीनी से दांतों में कैविटीज बनती हैं। तले खाद्य पदार्थों से रक्त में कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ता है।
स्वस्थ आहार के तहत विटामिन, खनिज, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट के अलावा, फल, सब्जियाँ, साबुत अनाज, प्रोटीन और मेवे फायदेमंद हैं। टमाटर, आलू और ब्रोकली सहित विभिन्न प्रकार की लाल, हरी और पत्तेदार सब्जियाँ भी लाभदायक हैं। वसा रहित या एक प्रतिशत वसायुक्त दूध में कैल्शियम और अन्य पोषक तत्वों की मात्रा ज्यादा वसा वाले दूध से कम नहीं होती, इसलिए, बिना चिकनाई के दूध का उपयोग बेहतर है। प्रोटीन, खनिज, ओमेगा-3 और फैटी एसिड अधिक होने के कारण मछली को सप्ताह में लेना अच्छा है। पोषक तत्व प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक होते हैं। चूंकि जंक और फास्ट फूड में प्राय आवश्यक पोषक तत्वों की कमी और कैलोरी अधिक होती हैं, इसलिए वजन और मोटापा बढ़ता है और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा होती हैं। अतिरिक्त चीनी और ज्यादा कैलोरीज को नियंत्रित करने के लिए पेय पदार्थों के बजाय पानी पीना बेहतर है। पानी या बिना चीनी वाले पेय लेने से कैलोरीज काफी हद तक कम हो सकती है। स्वाद के लिए नींबू, तरबूज और मौसमी फलों का उपयोग बेहतर होता है। सेहतमंद आहार से ऊर्जा व पोषक तत्वों मिलते हैं, जो शारीरिक विकास में सहायक होने के अलावा हृदय रोग, मधुमेह और कैंसर जैसे रोगों के जोखिम को कम करने में सकारात्मक भूमिका निभाते हैं। इसलिए फास्ट फूड से परहेज सेहत के लिए अच्छा और दीर्घायु का आसान विकल्प है।

एमए कंवल जाफरी

नींद की कमी से जूझ रहा है युवा भारत

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बाल मुकुन्द ओझा

नींद की कमी धीरे-धीरे एक साइलेंट हेल्थ क्राइसिस बन चुकी है। पहले नींद को आराम या आदत माना जाता था, लेकिन अब शोध यह दिखाते हैं कि कम नींद का सीधा असर दिमाग, दिल, इम्यून सिस्टम और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है।  अमेरिका के सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल (सीडीसी) ने इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य की उभरती हुई समस्या बताया है। उनकी रिपोर्ट के अनुसार लगभग हर तीन में से एक वयस्क रोजाना पर्याप्त नींद नहीं ले पा रहा। भारत में किए गए एक बड़े सर्वे में पाया गया कि युवा वर्ग में यह समस्या सबसे अधिक बढ़ी है, जहां रात देर तक फोन का इस्तेमाल, ओवरवर्क, तनाव और अनियमित दिनचर्या नींद का सबसे बड़ा दुश्मन बन चुके हैं। आजकल की खराब लाइफ स्टाइल, वर्क फ्रॉम होम, स्क्रीन से चिपटे रहने और काम के बढ़ते दबाव के कारण लोगों की दिनचर्या पूरी तरह बदल चुकी है। बदलते वर्किंग स्टाइल के कारण लोगों के पास पर्याप्त नींद लेने का समय भी नहीं बचता है। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल की रिसर्च बताती है कि जो लोग 5 घंटे से कम सोते हैं, उनमें हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा 30–40 फीसदी बढ़ जाता है। नींद की कमी शरीर में सूजन बढ़ा देती है, जिससे ब्लड प्रेशर और शुगर लेवल गड़बड़ा सकते हैं। कई डॉक्टर बताते हैं कि नींद की कमी मोटापे को भी बढ़ाती है, क्योंकि देर से सोने पर भूख बढ़ाने वाला हार्मोन “घ्रेलिन” बढ़ जाता है और शरीर को गलती से कैलोरी की जरूरत महसूस होने लगती है। यही कारण है कि कम सोने वाले लोग रात में जंक फूड ज्यादा खाते हैं।

भारत में नींद की कमी एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। एक ऑनलाइन वैश्विक सर्वे की माने तो देश पर्याप्त नींद नहीं लेने के कारण स्वास्थ्य सम्बन्धी विकारों से जूझ रहा है। देश के लगभग 60 प्रतिशत लोग छह घंटे की नींद नहीं लेने के कारण विभिन्न बीमारियों की चपेट में आ रहे है। इनमें बड़ी संख्या में युवा भी शामिल है। सर्वे में भारत के 348 जिलों के 43 हज़ार लोगों को शामिल किया गया जिनमें 61 प्रतिशत पुरुष और 39 प्रतिशत महिलाएं थी। नींद की कमी का सामना कर रहे लोगों में 72 प्रतिशत वाशरूम का बार बार उपयोग करने सहित ख़राब लाइफ स्टाइल, स्क्रीन देखने, शराब सेवन और रात्रि में देर तक काम करने आदि बड़े कारण बताये गए है। सर्वे में बताया गया है पर्याप्त नींद नहीं लेने के कारण आँखों और ह्रदय से जुडी बीमारियां आम बात है। डायबिटीज और मोटापा की चपेट में भी लोग आ रहे है। सड़क दुर्घटनाओं को भी नींद  का एक कारण बताया गया है। 

नींद का असर न केवल शारीरिक स्वास्थ्य पर बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। जहाँ तक युवा भारत की बात है, आजकल युवाओं में तनाव की समस्या को लेकर देशवासी बेहद चिंतित है। तनाव की वजह से कम उम्र में ही युवा डिप्रेशन के शिकार होने लगे हैं। खासतौर से काम करने वाले युवा यानि को नौकरी कर रहे हैं उनके अंदर ठहराव, लगन और काम के लिए पैशन बहुत कम है। जरा-जरा सी बातों पर स्ट्रेस लेने लगते हैं। हाल की में हुई एक स्टडी में भी ऐसे ही आंकड़े सामने आए हैं। जिसमें 25 साल के युवा कर्मचारियों में से 90 प्रतिशत का मन और दिमाग बेचैन पाया गया है। जिसकी वजह से कई बार अपने आप को हानि पहुंचाने तक के ख्याल इनके मन में आने लगते हैं। तनाव और डिप्रेशन से बचना है तो सबसे पहले हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाएं। नींद की कमी के चलते कर्मचारियों की कार्य क्षमता भी प्रभावित हो रही है। रिसर्च से पता चला है कि नींद की कमी वाले कर्मचारी गलतियां करने की ज्यादा संभावना रखते हैं, उनकी एकाग्रता घट जाती है और उनकी समस्या सुलझाने की क्षमता भी कम हो जाती है। मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से बचने के लिए अच्छी नींद लेना बहुत जरूरी है। रात में 6-8 घंटे की नींद से कई विकारों को दूर किया जा सकता है।

आज की भागदौड़ भरी लाइफ स्टाइल में काम का दबाव और समय का प्रबंधन हम पर इस कदर हावी हो चुके हैं कि हमारा मानसिक स्वास्थ्य गड़बड़ा रहा है। सोशल मीडिया के बारे में यह कहा जाता है विशेषज्ञों ने अच्छी नींद के लिए कैफीन का कम सेवन करने, सोने का निश्चित समय तय करने, सोने से पहले मोबाइल, लैपटॉप और टीवी जैसी स्क्रीन का इस्तेमाल न करने की सलाह दी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है एक्सपर्ट्स का कहना है कि अपनी दिनचर्या में  छोटे-छोटे बदलावों को अपनाकर लोग अपनी नींद की क्वालिटी सुधार सकते हैं और इससे उनकी तबीयत और उत्पादकता बेहतर हो सकती है।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी-32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

आईएएस अधिकारी के बच्चे आईएएस नहीं बनना चाहते? 

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जब प्रशासन बदलता है दिशा—क्यों भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारियों के बच्चे उसी राह पर कम चलते हैं? 

प्रतिष्ठा की चमक के पीछे छिपी कठोर सच्चाइयों और नई पीढ़ी की बदलती आकांक्षाओं का विस्तृत विश्लेषण

भारतीय प्रशासनिक सेवा को समाज में सम्मान और शक्ति का प्रतीक माना जाता है, परंतु इसके भीतर छिपी कठोर वास्तविकताएँ अक्सर परिवारों के जीवन को गहराई से प्रभावित करती हैं। तेज़ स्थानांतरण, राजनीतिक दबाव, सीमित निजी समय और निरंतर सार्वजनिक अपेक्षाएँ नई पीढ़ी को इस सेवा से दूर करती हैं। साथ ही, बच्चों को उपलब्ध व्यापक शिक्षा और वैश्विक अवसर उन्हें विविध करियर चुनने की स्वतंत्रता देते हैं। यही कारण है कि आज भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारियों के बच्चे उसी राह पर कम चलते हैं और जीवन–संतुलन तथा रचनात्मक स्वतंत्रता आधारित नए करियर को प्राथमिकता देते हैं।

— डॉ प्रियंका सौरभ

भारत में प्रशासनिक सेवा को लंबे समय से शक्ति, प्रतिष्ठा और राष्ट्र-निर्माण के सर्वोच्च प्रतीकों में गिना जाता रहा है। समाज में आज भी “भारतीय प्रशासनिक सेवा” एक ऐसा नाम है जो सम्मान, अधिकार और सफलता की सम्मिलित छवि बनाता है। किंतु विडंबना यह है कि जिन परिवारों ने इस प्रतिष्ठा को बहुत निकट से देखा है, वही परिवार—विशेषकर भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारियों के बच्चे—बहुत कम संख्या में उसी पेशे की राह अपनाते हैं। यह प्रश्न केवल सामाजिक जिज्ञासा भर नहीं है; यह प्रशासनिक जीवन की कठोर सच्चाइयों, बदलते समय और नई पीढ़ी की मनोवृत्ति का गहरा संकेत है।

सबसे पहले, भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारियों के बच्चे उस सेवा की वास्तविक कठिनता को प्रतिदिन देखते हैं जिसे बाहरी दुनिया केवल प्रतिष्ठा के आवरण में देखती है। अनिश्चित और तेज़ स्थानांतरण, राजनीतिक दबाव, जनता की अपेक्षाओं का अंतहीन बोझ, अवकाश का अभाव और निरंतर संघर्ष—इन सभी का प्रभाव परिवार के जीवन पर प्रत्यक्ष रूप से पड़ता है। नई पीढ़ी जिसके लिए मानसिक स्वतंत्रता और कार्य–जीवन संतुलन अत्यंत महत्वपूर्ण है, वह ऐसी सेवा की ओर आकृष्ट नहीं होती जहाँ व्यक्तिगत समय और निजी जीवन लगभग समाप्त हो जाता है।

दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष है—आर्थिक सुरक्षा। भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी अपने बच्चों को उच्च स्तरीय शिक्षा, उत्कृष्ट वातावरण और व्यापक अवसर प्रदान करने में सक्षम होते हैं। ऐसे में बच्चों के लिए सरकारी सेवा प्राप्त करने का संघर्ष किसी अनिवार्यता के स्थान पर एक अतिरिक्त बोझ जैसा प्रतीत होने लगता है। संघ लोक सेवा आयोग की कठिन, अनिश्चित और समयसाध्य परीक्षा उनके लिए आवश्यक विकल्प नहीं, बल्कि एक चुनौतीपूर्ण यात्रा जैसी लगती है। इसलिए उनकी राहें निजी क्षेत्र, तकनीकी क्षेत्र, अनुसंधान, विधि-विज्ञान या उद्यमिता की ओर अधिक मुड़ जाती हैं—जहाँ आय अधिक है, स्वतंत्रता अधिक है और स्थानांतरण या राजनीतिक दबाव जैसी चुनौतियाँ कम हैं।

तीसरी सच्चाई यह है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के भीतर की जो प्रशासनिक सीमाएँ हैं—फाइलों का व्यवहार, विवश निर्णय, भ्रष्ट तंत्र का दबाव—वे सब इन परिवारों के बच्चे प्रत्यक्ष रूप से अनुभव करते हैं। जब वे देखते हैं कि उनके माता-पिता कई बार अपनी इच्छा के अनुसार निर्णय नहीं ले पाते, तो यह उनके भीतर प्रशासनिक सेवा की “शक्ति” को कम प्रभावी रूप में प्रस्तुत करता है। समाज इसे चाहे जितना सम्मानजनक माने, परिवार के भीतर इसका वास्तविक चित्र कई बार निराशाजनक होता है।

चौथा पहलू है—नई पीढ़ी की मूल्य-दृष्टि। आज की युवा पीढ़ी सरकारी पदों की स्थिरता से अधिक वैश्विक अवसरों, रचनात्मक स्वतंत्रता, डिजिटल माध्यमों पर आधारित करियर और नव–उद्यम संस्कृति की ओर आकर्षित है। वे जोखिम उठाने को तैयार हैं, परंतु बंधी-बंधाई व्यवस्था में रहना नहीं चाहते। भारतीय प्रशासनिक सेवा जैसी सेवा जहाँ नियम कठोर हैं, प्रक्रिया विस्तृत है और ऊर्जा का बड़ा भाग व्यवस्था को संचालित रखने में व्यतीत होता है—वहाँ उन्हें अपनी क्षमता का पूर्ण विस्तार नहीं दिखाई देता।

यह भी उल्लेखनीय है कि स्वयं अनेक भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी अपने बच्चों को इस सेवा में आने के लिए प्रोत्साहित नहीं करते। वर्षों की थकान, संघर्ष और भारी दबाव के बाद वे अपने बच्चों के लिए अधिक संतुलित, स्वतंत्र और अपेक्षाकृत शांत जीवन की कल्पना करते हैं। यह माता-पिता की सहज मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति है, और बच्चों के करियर चयन को गहराई से प्रभावित करती है।

यह पूरा परिदृश्य एक व्यापक सामाजिक परिवर्तन की ओर संकेत करता है। वह समय अब समाप्त हो रहा है जब भारतीय प्रशासनिक सेवा को करियर का सबसे उत्कृष्ट विकल्प माना जाता था। आज अनेक प्रतिष्ठित और प्रभावी करियर उपलब्ध हैं जिनमें स्वतंत्रता, रचनात्मकता, सम्मान और आय—सब कुछ प्रचुर मात्रा में है। इस परिवर्तित परिदृश्य ने भारतीय प्रशासनिक सेवा के आकर्षण को कुछ हद तक कम किया है, विशेष रूप से उन परिवारों में जिन्होंने इसकी चमक के पीछे की कठोर थकान को निकट से महसूस किया है।

फिर भी यह सत्य है कि यह रुझान प्रशासनिक सेवा की महत्ता को कभी समाप्त नहीं करता। भारतीय प्रशासनिक सेवा देश की प्रशासनिक रीढ़ है और इसमें आने वाले युवा राष्ट्र को दिशा देने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अंतर केवल इतना है कि अब इस सेवा की राह वही चुनता है जो इसे मन से अपनाना चाहता है—न कि वह जो सामाजिक दबाव या मजबूरी में प्रवेश करता है।

अंततः, भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारियों के बच्चों का उसी सेवा में न जाना किसी प्रकार की असफलता का संकेत नहीं है, बल्कि बदलते भारत की सूक्ष्म मानसिकता का परिचायक है—एक ऐसा भारत जहाँ विकल्प अधिक हैं, अपेक्षाएँ नवीन हैं, और करियर का अर्थ केवल प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता भी है। यह परिवर्तन सकारात्मक है, क्योंकि यह दिखाता है कि नई पीढ़ी उस संसार का स्वप्न देखती है जहाँ पेशा शक्ति से नहीं, बल्कि संतुलन, स्वतंत्रता और व्यक्तिगत संतोष से निर्धारित होता है।

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

संविधान : भारतीय लोकतंत्र की अटूट नींव और भविष्य की रोशनी

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तेजी से बदलते समय में संविधान हमें स्थिरता, दिशा और लोकतांत्रिक चेतना प्रदान करता है। 

संविधान दिवस केवल एक औपचारिक तिथि नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है। यह हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि क्या हम वास्तव में संविधान की भावना के अनुरूप समाज का निर्माण कर रहे हैं। संविधान हमें अधिकार भी देता है और जिम्मेदारी भी। यही दस्तावेज़ हमें स्वतंत्रता, समानता और न्याय की राह दिखाता है। बदलते समय में संविधान भारत की स्थिरता, प्रगतिशीलता और लोकतांत्रिक परंपरा का आधार बना हुआ है।

– डॉ सत्यवान सौरभ

भारत का संविधान केवल कानून का दस्तावेज़ नहीं है; यह वह जीवंत आत्मा है जो इस विविधताओं से भरे राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधती है। जब 26 नवम्बर 1949 को संविधान को स्वीकार किया गया और 26 जनवरी 1950 से यह प्रभावी हुआ, तभी भारत ने विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का गौरव प्राप्त किया। आज संविधान दिवस न सिर्फ एक तिथि का उत्सव है, बल्कि यह याद दिलाता है कि लोकतंत्र की शक्ति नागरिकों की स्वतंत्रता, समानता और कर्तव्यों में निहित है।

भारतीय संविधान विश्व का सबसे विस्तृत, समावेशी और प्रगतिशील संविधान माना जाता है। इसकी विशेषता यह है कि यह भारत की परंपराओं, विविधताओं और सांस्कृतिक बहुलता को आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों से जोड़ता है। संविधान यह सुनिश्चित करता है कि सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और नागरिक अधिकार किसी वर्ग, जाति या समुदाय पर निर्भर न रहें। यही वजह है कि संविधान केवल शासन का ढाँचा नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का साधन भी है।

डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान की आत्मा को समझाते हुए कहा था कि राजनीतिक लोकतंत्र तभी स्थिर रहेगा, जब सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र भी स्थापित होगा। यह विचार आज के भारत में और भी महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि हमारा देश बड़े सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी बदलावों के दौर से गुजर रहा है।

इक्कीसवीं सदी का भारत डिजिटल क्रांति, वैश्विक प्रतिस्पर्धा, रोजगार के बदलते स्वरूप, पर्यावरणीय संकट और सामाजिक तनाव जैसी नई चुनौतियों का सामना कर रहा है। इन नई परिस्थितियों को देखते हुए संविधान का महत्व और भी बढ़ गया है, क्योंकि यही वह आधार है जो नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है और राज्य को जवाबदेह बनाता है।

संविधान की शक्ति उसकी लचीलापन क्षमता में छिपी है। परिस्थितियों के अनुसार संविधान कैसा व्यवहार करेगा, यह उसकी धारा, भावना और न्यायपालिका के निर्णय तय करते हैं। संविधान में अब तक अनेक संशोधन किए जा चुके हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह जड़ दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि समय के साथ स्वयं को बदल लेने वाला जीवंत ग्रंथ है।

लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव नहीं, बल्कि नागरिकों की निरंतर सहभागिता, पारदर्शिता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संस्थाओं की मजबूती और विविध मतों का सम्मान है। लेकिन आज सोशल मीडिया और त्वरित प्रतिक्रियाओं के युग में संवाद की जगह शोर ने ले ली है। विचारधारात्मक विभाजन बढ़ रहा है और जनमत का स्वरूप तेज़, अस्थिर और कई बार भावनात्मक होता जा रहा है। ऐसे समय में संविधान हमें संयम की शिक्षा देता है और विवेकपूर्ण निर्णय लेने की राह दिखाता है।

भारतीय न्यायपालिका संविधान की संरक्षिका है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट्स ने अनेक ऐतिहासिक निर्णयों से नागरिक अधिकारों की रक्षा की है—चाहे वह व्यक्तिगत स्वतंत्रता हो, निजता का अधिकार हो, समानता का अधिकार हो या पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी व्याख्याएँ। न्यायपालिका ही वह स्तंभ है जो लोकतंत्र में संतुलन बनाए रखने का कार्य करती है और नागरिकों के विश्वास का आधार बनती है।

परंतु आज के समय में संविधान कई नए मोर्चों पर परीक्षा दे रहा है।

तेजी से बढ़ती तकनीक ने निजता और डेटा संरक्षण को बड़ा मुद्दा बना दिया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल निगरानी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग से यह सवाल उठता है कि नागरिकों की स्वतंत्रता किस सीमा तक सुरक्षित है। दूसरी ओर, जलवायु परिवर्तन का खतरा इस बात की ओर संकेत करता है कि पर्यावरण अब केवल विकास का विषय नहीं, बल्कि जीवन के अधिकार से जुड़ा मूलभूत प्रश्न बन चुका है।

सामाजिक ध्रुवीकरण भी एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है। विचारों की बहुलता भारतीय लोकतंत्र की शक्ति रही है, लेकिन हाल के वर्षों में विचारधारा के आधार पर खेमेबाज़ी बढ़ी है। संवाद कम हुआ है, तर्क कम हुए हैं और आरोप-प्रत्यारोप अधिक हो गए हैं। संविधान ऐसे समय में हमें बंधुत्व की शिक्षा देता है—एक ऐसा भाव जिसमें विचारों का मतभेद तो हो सकता है, लेकिन मन का वैमनस्य नहीं।

राजनीतिक जीवन में मर्यादाओं का क्षरण भी चिंता का विषय है। लोकतांत्रिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और शुचिता अनिवार्य है। संविधान इसकी आधारशिला रखता है और सभी संवैधानिक पदधारकों से अपेक्षा करता है कि वे जनहित को निजी स्वार्थ से ऊपर रखें।

नागरिकों के मौलिक कर्तव्य भी लोकतांत्रिक ढाँचे की मजबूती के लिए उतने ही आवश्यक हैं। संविधान नागरिकों को केवल अधिकार नहीं देता; वह उनसे अपेक्षा करता है कि वे संविधान का सम्मान करें, पर्यावरण की रक्षा करें, वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएँ, राष्ट्र की एकता और अखंडता को बनाए रखें तथा समाज में सद्भाव का वातावरण निर्मित करें।

भारत की युवा पीढ़ी के लिए संविधान अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत आज दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक है। यह युवा ऊर्जा अगर संविधानिक मूल्यों से प्रेरित होगी, तो अवसरों का नया युग शुरू हो सकता है। युवाओं को यह समझना होगा कि संविधान केवल कानून की किताब नहीं, बल्कि उनके सपनों को सुरक्षित रखने वाला दस्तावेज़ है।

संविधान दिवस हमें एक महत्वपूर्ण प्रश्न पूछने का अवसर देता है—क्या हम संविधान की भावना के अनुरूप समाज बना रहे हैं? क्या नागरिक अधिकारों की रक्षा हो रही है? क्या हम विविधता को कमजोरियों के रूप में नहीं, बल्कि शक्ति के रूप में देख पा रहे हैं? क्या हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए हम लोकतंत्र की वही मजबूती छोड़ रहे हैं जो हमें विरासत में मिली थी?

भारत का संविधान हमारी लोकतांत्रिक चेतना का केंद्र है। यह अतीत की विरासत भी है और भविष्य की दिशा भी। समय बदलता रहेगा, परिस्थितियाँ बदलती रहेंगी, तकनीक बदलती रहेगी, लेकिन संविधान की प्रासंगिकता कभी कम नहीं होगी। यह हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता, समानता, न्याय और बंधुत्व किसी एक व्यक्ति या सरकार की देन नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की सामूहिक यात्रा है।

जब तक संविधान की आत्मा जीवित है—भारत विश्व की लोकतांत्रिक धड़कनों का प्रमुख केंद्र बना रहेगा।

– डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट

तुम्हारा है तो ‘परिवारवाद ‘ हमारा है तो ‘गुणवाद’?                                                                    

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 निर्मल रानी

बात जब परिवारवाद की आती है तो सबसे पहला निशाना गांधी-नेहरू परिवार पर साधा जाता है। उसके बाद मुलायम सिंह यादव व लालू यादव जैसे नेताओं पर परिवारवादी राजनीति करने का आरोप लगाया जाता है। इन लोगों के ‘परिवारवाद ‘ का विरोध करने वाले विशेषकर भारतीय जनता पार्टी के नेता जनता को यह समझाने की कोशिश करते हैं कि इस परिवार के लोग लोकतंत्र विरोधी हैं और अपने परिवार के लोगों को राजनैतिक विरासत के रूप में जनता पर थोपने की कोशिश करते हैं। जबकि वास्तव में नेहरू घराने से लेकर मुलायम सिंह व यादव,लालू यादव जैसे नेताओं की भारतीय राजनीति में अहम भूमिका रही है। निःसंदेह नेहरू -इंदिरा -राजीव ने देश को विकास व आधुनिकता की राह पर लाने,देश को आत्मनिर्भर बनाने व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश को सम्मान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। इसी तरह  लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव को भी भारतीय राजनीति में मुख्य रूप से “मंडल राजनीति के दो सबसे बड़े चेहरे” और “उत्तर भारत में जातिगत गोलबंदी की राजनीति के जनक” के रूप में याद किया जाता है। इन दोनों ही नेताओं ने 90 के दशक में ओ बी सी विशेषकर यादव- दलित-मुस्लिम गठजोड़ को इतनी शक्ति दी कि उत्तर प्रदेश और बिहार में लंबे समय तक कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा दोनों को सत्ता से बाहर रखा। आज भी इन्हें मंडल क्रांति के नायक, सामाजिक न्याय के प्रतीक तथा भाजपा व कांग्रेस दोनों ही राष्ट्रीय दलों का विकल्प देने की क्षमता रखने वाले नेताओं के रूप में याद किया जाता है। 

                  पूरे देश में नेहरू -इंदिरा परिवार ने और देश के दो सबसे बड़े राज्यों उत्तर प्रदेश व बिहार में इन यादव घरानों ने धर्मनिरपेक्ष व समाजवादी राजनीति की जो अमिट छाप छोड़ी है उसी ने भाजपा को लंबे समय तक सत्ता से दूर रखा। अपनी इसी कसक को भाजपा नेता ‘परिवारवाद ‘ के रूप में प्रचारित कर अपनी भड़ास निकालते रहते हैं। जबकि इन परिवारों की वर्तमान पीढ़ियों में राहुल गांघी ने पहले हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, अमेरिका में पढ़ाई की बाद में रोलिंस कॉलेज, फ्लोरिडा, अमेरिका से स्नातक की डिग्री ली और ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी, ब्रिटेन से 95 में डेवलोपमेन्ट स्टडीज़ में एम फ़िल पूरी की। चार बार सांसद भी चुने जा चुके हैं। इसी तरह अखिलेश यादव ने भी सिविल/एनवायर्नमेंटल इंजीनियर की डिग्री व मास्टर्स डिग्री सिडनी विश्वविद्यालय ऑस्ट्रेलिया से हासिल की है। वे भी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री व पांच बार सांसद होने का अनुभव रखते हैं। गोया यह लोग न अशिक्षित हैं न ही अनुभवविहीन न ही नक़ली डिग्री धारी। तेजस्वी यादव अशिक्षित ज़रूर हैं परन्तु उनके पास राजनीति का एक दशक से भी लंबे समय का अनुभव होने के साथ साथ पांच बार विधायक दो बार उपमुख्यमंत्री व नेता विपक्ष के पद पर रहने का अनुभव व लालू के कारण ही सही परन्तु भारी लोकप्रियता भी है।  

                सवाल यह है कि परिवारवाद का विरोध करने वाली भाजपा क्या ख़ुद भी परिवारवाद से दूर रहती है ? क्या उन क्षेत्रीय पार्टियों या नेताओं से पार्टी फ़ासला बनाकर रखती है जो परिवारवाद की राजनीति करते हैं ? इस समय वर्तमान नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल में ही कम से कम 15 मंत्री ऐसे हैं जो परिवारवाद से जुड़े हैं या अपनी राजनीतिक विरासत आगे बढ़ा रहे हैं। भाजपा के कुल सांसदों में से लगभग 12% राजनैतिक विरासत से आते हैं। अनुराग ठाकुर,ज्योतिरादित्य सिंधिया,पीयूष गोयल,धर्मेंद्र प्रधान,किरेन रिजिजू,राव इंद्रजीत सिंह,रक्षा खड़से आदि ऐसे कई उदाहरण हैं जो परिवारवाद के चलते ही केंद्र में मंत्री पद तक पहुँच सके हैं। परन्तु जब विपक्ष भाजपाई परिवारवाद का यही दर्पण भाजपा को दिखाता है तो भाजपा दावा करती है कि इनका चयन योग्यता अर्थात ‘गुणवाद’ पर आधारित है, न कि परिवारवाद पर। इससे बड़ा पाखंड और क्या हो सकता है ?

                    अभी पिछले दिनों बिहार में जब नितीश कुमार मंत्रिमंडल ने शपथ ली तो उसमें भी भाजपा व उसके सहयोगी दलों का परिवारवाद टिकट वितरण से लेकर मंत्री मंडल में स्थान पाने तक सिर चढ़कर बोलता दिखाई दिया। यहाँ विधान सभा चुनाव में एन डी ए की ओर से 29 ऐसे विधायक जीतकर आये हैं जो परिवारवाद का प्रतीक हैं। जबकि 26 मंत्रियों में से 9 मंत्री भी परिवारवाद से जुड़े हैं। इनमें सबसे प्रमुख परिवार केंद्रीय मंत्री व बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी का है। जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा को 2025 चुनाव में हिस्से में कुल 6 सीटें मिली थीं जिनमें से 5 पर उन्होंने अपने रिश्तेदारों को टिकट दे दिया। इस समय उनके परिवार के 7 सदस्य राजनीति में सक्रिय हैं तथा 5 व्यक्ति सांसद,विधायक व मंत्री बने हैं। इनमें संतोष कुमार सुमन, जीतन राम मांझी के पुत्र हैं ये विधान पार्षद (एम एल सी )हैं तथा इन्हें इस बार तीसरी बार नितीश मंत्रिमंडल में जगह मिली है। इसके अतिरिक्त दीपा मांझी, जीतन राम की पुत्रवधू  अर्थात संतोष (मंत्री जी )की पत्नी हैं।यह  विधायक हैं। जीतन मांझी की भाभी ज्योति देवी विधायक हैं। प्रफुल्ल कुमार दामाद ,संतोष (मंत्री जी ) का साला विधायक है । एक अन्य रिश्तेदार देवेंद्र मांझी दामाद उपाध्यक्ष व बिहार SC आयोग का अध्यक्ष है।  यह पूर्व में मुख्यमंत्री काल में मांझी के पी ए भी रह चुके हैं।   

              इसी तरह बिहार की एक और क्षेत्रीय पार्टी है राष्ट्रीय लोक मोर्चा।तुम्हारा है तो ‘परिवारवाद ‘ हमारा है तो ‘गुणवाद’?

            भाजपा शासित अन्य कई राज्यों में भी इसी तरह के ‘परिवारवाद की पताका’ लहराती दिखाई देगी। परन्तु गत चार दशकों से इन्हें केवल विपक्षी दलों का ही परिवारवाद नज़र आता है। गोया तुम्हारा है तो ‘परिवारवाद ‘ हमारा है तो ‘गुणवाद’?

निर्मल रानी

प्रधानमंत्री ने राम मंदिर के मुख्य शिखर पर धर्मध्वज किया

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अयोध्या राम मंदिर में ध्वजारोहण पूरा हुआ। पीएम मोदी के बटन दबाते ही झंडा धीरे-धीरे ऊपर चढ़ता हुआ मंदिर के शीर्ष पर विराजमान हो गया। जैसे-जैसे झंडा ऊपर चढ़ता गया पीएम मोदी टकटकी लगाए उसे देखते रहे। पीएम मोदी इन पलों में भावुक नजर आए। निर्धारित शुभ मुहूर्त में प्रधानमंत्री ने राम मंदिर के मुख्य शिखर पर धर्मध्वज फहराया। जैसे ही केसरिया ध्वज पवन के संग लहराया, पूरा परिसर ‘जय श्री राम’ के उद्घोष से गूँज उठा। क्षण भर में वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर गया और श्रद्धालुओं की भावनाएँ उमंग में बदल गईं।

धर्मध्वज फहराने से पहले वैदिक मंत्रोच्चार के बीच व्यापक पूजन-अर्चन सम्पन्न हुआ। यज्ञकुंडों से उठती आहुतियों की सुगंध और नगाड़ों की गूँज ने समारोह को भव्यता प्रदान की। पीएम ने ध्वजारोहण कर राष्ट्र को सनातन परंपरा की अखंडता, आस्था और सांस्कृतिक स्वाभिमान का संदेश दिया।

ध्वजारोहण के समय सामने की कतार में साधु-संत बैठे हुए थे। वह भी भावुकता में अपने आंसू पोछते हुए नजर आए। इस कार्यक्रम में देश-दुनिया के करीब आठ हजार लोग आमंत्रित किए गए थे। 

 शुभ मुहूर्त पर हुआ ध्वजारोहण
निर्धारित शुभ मुहूर्त में प्रधानमंत्री ने राम मंदिर के मुख्य शिखर पर धर्मध्वज फहराया। जैसे ही केसरिया ध्वज पवन के संग लहराया, पूरा परिसर ‘जय श्री राम’ के उद्घोष से गूँज उठा। क्षण भर में वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर गया और श्रद्धालुओं की भावनाएँ उमंग में बदल गईं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने मंगलवार 25 नवंबर को विवाह पंचमी के अवसर पर राम मंदिर के ‘शिखर’ पर भगवा ध्वज फहराया। पीएम मोदी ध्वजारोहण समारोह में शामिल होने वाले उच्च-स्तरीय गणमान्य व्यक्तियों में शामिल थे, साथ ही यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भागवत भी अन्य उपस्थित थे। दस फीट ऊंचे और बीस फीट लंबे धर्म ध्वज पर भगवान श्री राम के तेज और पराक्रम के प्रतीक सूर्य की छवि अंकित है, जिस पर कोविदारा वृक्ष की छवि के साथ ‘ओम’ अंकित है।

पारंपरिक उत्तर भारतीय नागर स्थापत्य शैली में निर्मित श्री राम जन्मभूमि मंदिर शिखर पर भगवा ध्वज लहराते ही भक्त खुशी से झूम उठे। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि श्री अयोध्या धाम में भगवान राम के भव्य मंदिर में ध्वजारोहण किसी यज्ञ की पूर्णाहुति नहीं, बल्कि एक नए युग का सूत्रपात है। मैं इस अवसर पर राम भक्तों की ओर से प्रधानमंत्री मोदी का आभार व्यक्त करता हूँ। 

यह समारोह मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को भगवान राम और देवी सीता के विवाह पंचमी के अभिजीत मुहूर्त के साथ संयोग से मनाया गया, जो दिव्य मिलन का प्रतीक है। यह दिन और भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यह नौवें सिख गुरु, गुरु तेग बहादुर जी के शहादत दिवस का भी प्रतीक है, जिन्होंने 17वीं शताब्दी में अयोध्या में 48 घंटे तक ध्यान किया था, जिससे इस दिन का आध्यात्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है।

राम मंदिर के दर्शन से पहले, प्रधानमंत्री मोदी ने सप्तमंदिर का भी दौरा किया, जहाँ महर्षि वशिष्ठ, महर्षि विश्वामित्र, महर्षि अगस्त्य, महर्षि वाल्मीकि, देवी अहिल्या, निषादराज गुहा और माता शबरी को समर्पित मंदिर हैं। मंदिर का शिखर पारंपरिक उत्तर भारतीय नागर शैली में बनाया गया है, जबकि आसपास का 800 मीटर का परिक्रमा परकोटा दक्षिण भारतीय स्थापत्य कला के तत्वों को प्रदर्शित करता है, जो भारत की विविध मंदिर परंपराओं के सम्मिश्रण को दर्शाता है।

धर्मध्वज फहराने से पहले वैदिक मंत्रोच्चार के बीच व्यापक पूजन-अर्चन सम्पन्न हुआ। यज्ञकुंडों से उठती आहुतियों की सुगंध और नगाड़ों की गूँज ने समारोह को भव्यता प्रदान की। पीएम ने ध्वजारोहण कर राष्ट्र को सनातन परंपरा की अखंडता, आस्था और सांस्कृतिक स्वाभिमान का संदेश दिया।

स अवसर पर देश-दुनिया से आए संत-महंत, विशिष्ट अतिथि और हज़ारों श्रद्धालु मौजूद रहे। सुरक्षा के कड़े इंतज़ामों के बीच राम नगरी उत्सव के रंग में डूबी रही। मंदिर परिसर से लेकर सरयू तट तक हर ओर दीप, पुष्प और रंगोलियों से सजा माहौल इस ऐतिहासिक उत्सव का साक्षात अनुभव करा रहा था।

चार से पांच मिनट के संक्षिप्त ध्वजारोहण अनुष्ठान में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच प्रधानमंत्री ने बटन दबाकर ध्वज फहराया। सात हजार अतिथि समारोह के साक्षी बने।, जिनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत, राज्यपाल आनंदीबेन पटेल, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, , धर्मगुरु, व्यापार जगत के प्रमुख नाम, दलित, वंचित, किन्नर और अघोरी समुदाय के प्रतिनिधि शामिल रहे। 

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के शिखर पर ध्वजारोहण के जरिए ‘संकल्प सिद्धि’ के लिए रामनगरी पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जोरदार स्वागत हुआ। जयश्रीराम, जय जय हनुमान के गगनभेदी नारों संग अयोध्यावासियों ने प्रधानमंत्री के काफिले पर पुष्पवर्षा भी की। श्रीराम की अयोध्या ने प्रधानमंत्री का पूरे रास्ते में अभूतपूर्व स्वागत किया। अयोध्यावासियों के एक हाथ में भगवा ध्वज तो दूसरे हाथ में तिरंगा फहरा रहा था। वहीं स्वागत से अभिभूत प्रधानमंत्री ने भी हाथ हिलाकर अयोध्यावासियों का अभिवादन किया। अयोध्या पहुंचने पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ व राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ने प्रधानमंत्री का स्वागत किया। 

अयोध्यावासियों के एक हाथ में भगवा ध्वज तो दूसरे में तिरंगा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंगलवार सुबह अयोध्या पहुंचे। साकेत महाविद्यालय पर उनका हेलीकॉप्टर उतरा। वहां से काफिले संग टेढ़ी बाजार होते हुए उन्होंने श्रीराम मंदिर परिसर में प्रवेश किया। इस दौरान अयोध्यावासियों ने जयश्रीराम, जय जय हनुमान के गगनभेदी नारों संग उनका स्वागत किया। अयोध्यावासी एक हाथ में भगवा ध्वज तो दूसरे हाथ में तिरंगा फहराते हुए प्रधानमंत्री का स्वागत करते रहे। प्रधानमंत्री ने भी पूरे रास्ते में हाथ हिलाकर अयोध्यावासियों का अभिवादन किया। 

सप्त मंदिरों में झुकाया शीश, की पूजा-अर्चना
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सप्त मंदिर में भी पूजा-अर्चना की। मंदिर परिसर में महर्षि वशिष्ठ, महर्षि विश्वामित्र, महर्षि अगस्त्य, महर्षि वाल्मीकि, देवी अहिल्या, निषादराज गुह्य और माता शबरी मंदिर में पहुंचकर प्रधानमंत्री ने शीश झुकाया। प्रधानमंत्री ने शेषावतार मंदिर व माता अन्नपूर्णा मंदिर में भी दर्शन-पूजन किया। 

वर्षों में मानसिक गुलामी से मुक्ति दिलाकर रहेंगे-पीएम

पीएम ने अपने संबोधन में कहा कि धर्म ध्वजा पर कोविदार वृक्ष बना है। जब भरत अपनी सेना के साथ चित्रकूट पहुंचे, तब लक्ष्मण ने दूर से ही अयोध्या की सेना को पहचान लिया। इसका वर्णन वाल्मीकि जी ने किया है। लक्ष्मण कहते हैं कि सामने जो ध्वज दिख रहा है, वह अयोध्या का धर्म ध्वज है, जिस पर कोविदार वृक्ष बना है। यह वृक्ष अपने को याद दिलाता है कि जब हम इसे भूलते हैं, तब अपनी पहचान खो देते हैं। आज से 190 साल पहले 1835 में मैकाले नाम के एक अंग्रेज ने भारत में मानसिक गुलामी की नींव रखी। आने वाले 10 वर्षों में उसके 200 साल होने वाले हैं। हमने संकल्प लिया है कि आने वाले 10 वर्षों में हम मानसिक गुलामी की मानसिकता से मुक्ति दिलाकर रहेगें। 

मानसिक गुलामी ने राम को भी काल्पनिक बता दिया

पीएम ने आगे कहा कि अभी गुलामी की इस मानसिकता ने डेरा डाला हुआ है। हमने नौसेना के ध्वज से गुलामी की मानसिकता को हटाया। ये गुलामी की मानसिकता ही है, जिसने राम को नकारा है। भारतवर्ष के कण-कण में भगवान राम हैं। लेकिन, मानसिक गुलामी ने राम को भी काल्पनिक बता दिया। आने वाले एक हजार वर्ष के लिए भारत की नींव तभी मजबूत होगी, जब आने वाले 10 साल में हम मैकाले की मानसिक गुलामी से छुटकारा पा लेंगे। 21वीं सदी की अयोध्या विकसित भारत का मेरुदंड बनकर उभर रही है। 

उन्होंने कहा कि अयोध्या में आज शानदार रेलवे स्टेशन है। वंदे भारत और अमृत भारत जैसी ट्रेनें हैं। जब से रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हुई है, तब से 45 करोड़ श्रद्धालु यहां दर्शन को आ चुके हैं। इससे अयोध्या व आसपास के लोगों का आर्थिक विकास हुआ है। 21वीं सदीं का आने वाला समय काफी महत्वपूर्ण है। पिछले 11 साल में भारत विश्व की पांचवी अर्थव्यवस्था बन गया है। वह दिन दूर नहीं जब भारत जल्द ही तीसरी सबसे बड़ी अर्थ व्यवस्था बन जाएगा।

मुख्यमंत्री व गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ ने ध्वजारोहण समारोह में अपनी बातों का आगाज सियावर रामचंद्र भगवान, माता जानकी, सरयू मैया की जय, भारत माता की जय और हर हर महादेव के उद्घोष के साथ किया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ ही समूचा मंदिर परिसर जय-जयकार से गूंज उठा।

आजु सफल तपु तीरथ त्यागू। आजु सुफल जप जोग बिरागू।
सफल सकल सुभ साधन साजू। राम तुम्हहि अवलोकत आजू।

सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा कि ध्वजारोहण यज्ञ की पूर्णाहूति नहीं, बल्कि नए युग का शुभारंभ है। प्रभु श्रीराम का भव्य मंदिर 140 करोड़ भारतीयों की आस्था, सम्मान व आत्मगौरव का प्रतीक है। सीएम योगी ने भव्य मंदिर के निर्माण में योगदान देने वाले कर्मयोगियों का भी अभिनंदन किया। उन्होंने कहा कि आज का पावन दिन उन पूज्य संतों, योद्धाओं, श्रीरामभक्तों की अखंड साधना-संघर्ष को समर्पित है, जिन्होंने आंदोलन व संघर्ष के लिए जीवन को समर्पित किया। विवाह पंचमी का दिव्य संयोग इस उत्सव को और भी पावन बना रहा है।

मुख्यमंत्री-गोरक्षपीठाधीश्वर महंत योगी आदित्यनाथ ने श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के शिखर पर भगवा ध्वज के आरोहण समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघ चालक मोहन भागवत की उपस्थिति में अपने विचार रखे। सीएम योगी समेत सभी विशिष्टजनों ने झुककर भगवा ध्वज को प्रणाम निवेदित किया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघ चालक मोहन भागवत को स्मृति चिह्न भी प्रदान किया।

धर्म का प्रकाश अमर और रामराज्य के मूल्य कालजयी हैं
सीएम योगी ने कहा कि ध्वजारोहण उस सत्य का उद्घोष है कि धर्म का प्रकाश अमर है और रामराज्य के मूल्य कालजयी हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में जब नेतृत्व संभाला था, उसी दिन कोटि-कोटि भारतवासियों के मन और हृदय में जिस संभावना, संकल्प व विश्वास का सूर्योदय हुआ, आज वही तपस्या, अनगिनत पीढ़ियों की प्रतीक्षा आपके कर कमलों के माध्यम से साकार होकर भव्य राम मंदिर के रूप में भारतवासियों व सनातन धर्मावलंबियों के समक्ष है। श्रीराम मंदिर पर फहराता केसरिया ध्वज धर्म, मर्यादा, सत्य-न्याय व राष्ट्रधर्म का भी प्रतीक है। यह विकसित भारत की संकल्पना का प्रतीक है।

संकल्प का कोई विकल्प नहीं होता
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि संकल्प का कोई विकल्प नहीं होता। सभी ने 11 वर्ष में बदलते भारत को देखा है। हम नए भारत का दर्शन कर रहे हैं, जहां विकास और विरासत का बेहतरीन समन्वय है। यह इसे नई ऊंचाई प्रदान कर रहा है। सीएम योगी ने कहा कि 80 करोड़ लोगों को राशन, 50 करोड़ लोगों को निःशुल्क स्वास्थ्य सुविधा, हर जरूरतमंद को आवास, हर व्यक्ति बिना भेदभाव शासन की योजनाओं का लाभ पा रहा है तो यह रामराज्य की वह उद्घोषणा है, जिसका आधार विकसित भारत है।

उत्सवों की वैश्विक राजधानी बन रही अयोध्या
सीएम योगी ने कहा कि 500 वर्षों में साम्राज्य बदले, पीढ़ियां बदलीं, लेकिन आस्था अडिग रही। आस्था न झुकी, न रुकी। जन-जन का विश्वास अटल था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठन के हाथों में कमान आई तो हर मुंह से एक ही उद्घोष निकलता था कि ‘रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे। लाठी गोली खाएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे।‘ एक समय था, जब वैभवशाली अयोध्या संघर्ष, बदहाली का शिकार बन चुकी थी, लेकिन पीएम मोदी के मार्गदर्शन व नेतृत्व में अयोध्या उत्सवों की वैश्विक राजधानी बन रही है। यहां हर दिन पर्व है, हर दान प्रताप है और हर दिशा में रामराज्य की पुनर्स्थापना की दिव्य अनुभूति हो रही है।

रामलला की पावन नगरी आस्था व अर्थव्यवस्था के नए युग में कर चुकी है प्रवेश
सीएम योगी ने कहा कि रामलला की पावन नगरी आस्था व आधुनिकता, आस्था व अर्थव्यवस्था के नए युग में प्रवेश कर चुकी है। यहां बेहतर कनेक्टिविटी है। धर्मपथ, रामपथ, भक्ति पथ, पंचकोसी और 14 कोसी के साथ 84 कोसी की परिक्रमा श्रद्धालुओं व भक्तों को नया मार्ग व आस्था को नया सम्मान प्रदान कर रही है। महर्षि वाल्मीकि अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट कनेक्टिविटी की बेहतर सुविधा उपलब्ध करा रही है। पीएम मोदी के मार्गदर्शन में अयोध्या धाम में आस्था, आधुनिकता, आस्था और अर्थव्यवस्था का नया केंद्र दिख रहा है। देश की पहली सोलर सिटी-सस्टेनबल स्मार्ट रूप में नई अयोध्या का दर्शन हो रहा है। आज का दिन हर भारतवासी, सनातन धर्मावलंबी के लिए आत्मगौरव-राष्ट्रगौरव का दिन है।

इस अवसर पर श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास जी महाराज, राज्यपाल आनंदी बेन पटेल, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरी जी महाराज आदि मौजूद रहे। सं