अंतरराष्ट्रीय दास प्रथा उन्‍मूलन दिवस

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प्रतिवर्ष 2 दिसम्बर को अंतरराष्ट्रीय दास प्रथा उन्‍मूलन दिवस मनाया जाता है। इस दिवस को मनाये जाने का मुख्य उद्देश्य यही है कि “सम्पूर्ण विश्व से दास प्रथा को समाप्त करना है।” दास प्रथा विश्व के अधिकांश देशों में प्राचीन समय से ही व्याप्त रही है। इस प्रथा का उन्मूलन करने के लिए दुनिया भर में भले ही कितने भी प्रयास किए जा रहे हों, लेकिन यह प्रथा किसी-न-किसी रूप में आज भी जीवित है।

संयुक्त राष्ट्र की ओर से 2 दिसंबर को ‘अंतरराष्ट्रीय दास प्रथा उन्मूलन दिवस’ के तौर पर मनाने की घोषणा की गई है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने मानव तस्करी और वेश्यावृत्ति को रोकने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसके बाद से हर साल 2 दिसंबर को यह दिवस मनाया जाता है।

आज बेरोज़गारी का सामना कर रहे देशों के नागरिकों के दूसरे देशों में घरेलू नौकरों और कामगारों के तौर पर काम करने के रूप में दास प्रथा अब भी कायम है। भारत में भी कई एजेंसियां फ़र्जी दस्तावेजों के आधार पर लोगों को काम के बहाने दूसरे देशों में भेजने के पेशे में धड़ल्ले से लिप्त हैं, जहां इन लोगों को बहुत-सी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसके पीछे क़ानून की कमी जिम्मेदार है। भारत से लोगों को फ़र्जी दस्तावेजों से विदेश भेजने के मामले बढ़ते जा रहे हैं।

ऐसे मामलों का शिकार होने में महिलाओं और बच्चों की संख्या भी काफ़ी है। हमारे देश में ऐसा कोई क़ानून नहीं है, जिसके तहत देश से बाहर जाने वाले हर नागरिक की सुरक्षा का प्रावधान हो। क़ानून के अभाव में हमारे देश से जो भी नागरिक बाहर जाता है, उसे उसके हाल पर छोड़ दिया जाता है। उसका वहां क्या हाल है, कोई देखने वाला नहीं है। ऐसे मामलों में अंतरराष्ट्रीय स्तर के मानकों के अनुरूप क़ानून होने चाहिए, क्योंकि आतंकवाद के दौर में यह मामला देश की सुरक्षा के लिए भी खतरा हो सकता है। फर्जी पासपोर्ट से लोगों को बाहर भेजने वालों को भी सिर्फ दो साल की सज़ा का प्रावधान है, इसलिए पासपोर्ट अधिनियम के तहत निर्धारित नियमों का भी धड़ल्ले से उल्लंघन होता है। कड़े क़ानून के अभाव में विदेशों में दासों के तौर पर काम कर रहे भारतीयों की संख्या बहुत ज्यादा है।

भारत में समय-समय पर बेरोज़गारी लोगों को फ़र्जी दस्तावेजों के माध्यम से नौकरी के बहाने विदेशों में भेजने और वहां उनके शोषण के मामले सामने आते हैं। कुछ साल पहले केरल की एक महिला को काम के बहाने सऊदी अरब भेजने और वहां उसे एक शेख के यहां घरेलू नौकरानी बनाने का मामला सामने आया था। महिला के मालिक ने उस पर अत्याचार करते हुए उसके शरीर को कीलों से छेद दिया था, जिसके बाद किसी तरह महिला ने अपनी जान बचाई। इस मामले ने एक बार फिर नौकरी के बहाने विदेशों में जाने और वहां दासों की तरह रहने वाले भारतीयों का मामला सुर्खियों में ला दिया।

मेंगलूर में जुलाई, 2010 में हुए विमान हादसे में मारे गए कई लोग भी फ़र्जी पासपोर्ट से खाड़ी देशों में गए थे। हादसे के बाद इस बात का खुलासा हुआ था कि दक्षिण भारत की कई एजेंसियां लोगों को नौकरी के बहाने विदेश भेजकर उन्हें दूसरे धंधों में लिप्त करवा रही है। फ़र्जी पासपोर्ट से लोगों को बाहर भेजने वालों के ख़िलाफ़ कई बार शिकायत की, लेकिन इस धंधे पर लगाम नहीं लग पा रही।

बेरोज़गारी के कारण महिलाओं को भी खाड़ी देशों में भेज दिया जाता है, लेकिन वहां उनकी जो हालत होती है, वह कल्पना से भी परे है। कई बार भारतीय नागरिक विदेशों में मर जाते हैं, लेकिन सही पहचान न होने से उनके बारे में कुछ पता नहीं चलता। सरकार से अपील की गई है कि इस बारे में लोगों को जागरुक करने के अलावा नियम तोड़ने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की भी ज़रूरत है।

रजनीकांत शुक्ला

भारतीय खेल इतिहास के महानायक मेजर ध्यान चंद

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हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद भारतीय खेल इतिहास के उन महानतम खिलाड़ियों में गिने जाते हैं जिनकी प्रतिभा, अनुशासन और खेलने की शैली ने विश्व भर के दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनका पूरा जीवन समर्पण, कठोर अभ्यास और देशभक्ति का प्रेरक उदाहरण रहा है। ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त 1905 को इलाहाबाद में हुआ। उनके पिता सेना में सिपाही थे और हॉकी भी खेलते थे, इसलिए बचपन से ही ध्यानचंद के भीतर खेल के प्रति स्वाभाविक रुचि उत्पन्न हुई। आर्थिक साधन अधिक नहीं थे, पर खेल के प्रति उनकी लगन इतनी प्रबल थी कि वे घर की जिम्मेदारियों के साथ अभ्यास के लिए समय निकालते रहते थे।

ध्यानचंद का असली खेल जीवन सेना में भर्ती होने के बाद शुरू हुआ। सेना में रहते हुए उन्होंने हॉकी में विशेष रुचि दिखाई और लगातार अभ्यास से अपने खेल को निखारा। रात में अभ्यास करने की आदत के कारण साथी खिलाड़ी उन्हें “चंद” कहकर बुलाने लगे और बाद में यही नाम ध्यानचंद के साथ स्थायी रूप से जुड़ गया। इस दौरान उनकी गेंद पर नियंत्रण, तेजी, संतुलन और गोल करने की अद्भुत क्षमता देखकर अधिकारी भी प्रभावित हुए और उन्हें सेना की टीम में खेलने का अवसर मिला।

1928 के एम्स्टर्डम ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम का चयन हुआ और ध्यानचंद उसमें शामिल किए गए। इस ओलंपिक में उनके प्रदर्शन ने पूरे विश्व को चकित कर दिया। उन्होंने शानदार गोल किए और भारत को स्वर्ण पदक दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी खेल शैली इतनी सटीक और कलात्मक थी कि विदेशी दर्शक भी उन्हें ‘हॉकी का जादूगर’ कहने लगे। गेंद पर उनका नियंत्रण इतना सहज था कि ऐसा प्रतीत होता जैसे गेंद उनकी स्टिक से चिपकी हुई हो। विरोधी खिलाड़ी उन्हें रोकने के लिए हर उपाय करते, पर ध्यानचंद अपनी गति और कौशल से सभी को पीछे छोड़ देते थे।

1932 के लॉस एंजिल्स ओलंपिक में भी ध्यानचंद ने बेहतरीन खेल दिखाया। भारत ने इस ओलंपिक में रिकॉर्ड गोल किए जिनमें बड़ी संख्या ध्यानचंद और उनके भाई रूप सिंह के थे। इस प्रतियोगिता में उनका संयोजन विश्व हॉकी के इतिहास में स्वर्णिम अध्याय माना जाता है। 1936 के बर्लिन ओलंपिक में तो उन्होंने अपने खेल की ऐसी मिसाल पेश की कि स्वयं जर्मनी के तानाशाह हिटलर भी उनके कौशल से प्रभावित हो गए। भारत ने इस ओलंपिक में भी स्वर्ण पदक जीता और ध्यानचंद की पहचान विश्व स्तर पर और अधिक चमक उठी।

ध्यानचंद का संपूर्ण खेल जीवन अनुशासन और सादगी का प्रतीक था। वे अपनी टीम के लिए प्रेरणा बने रहते थे। खेल के प्रति उनका समर्पण इतना था कि वे अभ्यास में कभी कोताही नहीं करते। वे घुटनों के सहारे मैदान में गेंद को नियंत्रित करने के कठिन अभ्यास करते थे। उनके खेल में टीम भावना और राष्ट्रीय सम्मान सर्वोपरि होता था। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगभग 400 से अधिक गोल किए, जो अपने आप में एक अद्वितीय उपलब्धि है।

अपने खेल जीवन के बाद ध्यानचंद सेना में मेजर के पद तक पहुंचे और सेवानिवृत्ति के बाद भी खेल से जुड़े रहे। वे युवा खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देते और उन्हें अनुशासन तथा मेहनत का महत्व समझाते थे। मैदान पर उनकी विनम्रता और सरल स्वभाव ने उन्हें न केवल महान खिलाड़ी बनाया, बल्कि एक आदर्श इंसान भी बनाया। वे हमेशा कहते थे कि खेल केवल शारीरिक शक्ति नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन और नैतिक चरित्र का भी खेल है।

1979 में 3 दिसंबर को मेजर ध्यानचंद का निधन हुआ। उनके जाने के बाद भी देश ने उनकी स्मृति को सम्मानित किया। भारत सरकार ने उनके जन्मदिन 29 अगस्त को हर वर्ष राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाने का निर्णय किया। खेल के क्षेत्र में सर्वोच्च सम्मान ‘ध्यानचंद पुरस्कार’ भी उनके नाम पर रखा गया है। यह पुरस्कार खिलाड़ियों को उत्कृष्ट प्रदर्शन और खेल भावना के लिए दिया जाता है, जो उनके आदर्शों को अगली पीढ़ियों तक पहुंचाता है।

ध्यानचंद का जीवन केवल एक खिलाड़ी की कहानी नहीं, बल्कि एक ऐसे सपूत की कथा है जिसने अपनी प्रतिभा से भारत का नाम दुनिया भर में रोशन किया। उनका खेल आज भी दुनिया भर के खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा है। उन्होंने दिखाया कि यदि मन में समर्पण और देश के प्रति प्रेम हो तो कोई भी बाधा खिलाड़ी की राह नहीं रोक सकती। हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद भारतीय खेल इतिहास में सदैव अमर रहेंगे।

दिव्यांगों के जीवन में भरे प्यार का उजियारा

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                                                  बाल मुकुन्द ओझा

अन्तर्राष्ट्रीय दिव्यांग दिवस अथवा अन्तर्राष्ट्रीय विकलांग दिवस प्रतिवर्ष 3 दिसंबर को मनाया जाता है। वर्ष 2025 की थीम सतत परिवर्तन के लिए अभिनव मानसिक स्वास्थ्य पहल और समावेशी पुनर्वास के माध्यम से विकलांग लोगों को सशक्त बनाना है। यह दिवस शारीरिक रूप से अक्षम लोगों को देश की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए मनाया जाता है। इस दिवस का उद्देश्य समाज में शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के साथ हो रहे भेद-भाव को समाप्त किया जाना है। इस भेद-भाव में समाज और व्यक्ति दोनों की भूमिका रेखांकित होती रही है। इस वर्ष  की थीम भविष्य के लिए निर्धारित किए गये सभी सत्रह लक्ष्यों की प्राप्ति है।

आजादी के सात दशक बाद भी विकलांग समुदाय का आर्थिक, शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़ा होना हमारे लिए शर्मनाक है। संयुक्त राष्ट्र संघ के आंकड़ों के अनुसार दुनिया के 100 करोड़ लोग विकलांग की श्रेणी में आते हैं। यह दुनिया की सम्पूर्ण जनसंख्या का 9 प्रतिशत है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक भारत में लगभग 2.68 करोड़ लोग विकलांग हैं। इनमें से लगभग 21.16 लाख लोग बहु-विकलांगता की श्रेणी में आते हैं। इन प्रयासों का मुख्य उद्देश्य विकलांग व्यक्तियों के सभी मानवाधिकारों की रक्षा और सुनिश्चित करना है, विशेष रूप से उन लोगों के लिए जिन्हें अधिक गहन सहायता की आवश्यकता होती है, अर्थात जो बहु-विकलांगता से प्रभावित व्यक्ति है । इनमें से करीब 70 फीसदी आबादी गांवों में रहती है। सरकार और समाज की उपेक्षा और प्रताड़ना के शिकार विकलांग सम्मान के साथ अपना जीवन यापन करना चाहते है मगर अत्यावश्यक जीवनोपयोगी सुविधाओं के अभाव ने इनका जीवन उजाड़ कर रख दिया है। हालाँकि सरकार ने विकलांगों के लिए पेंशन, शिक्षा और रोजगार की व्यवस्था की है जो नाकाफी है। सच तो यह है विकलांगता या अपंगता एक ऐसी अवस्था होती है जिसमें मनुष्य जीते हुए भी मरता रहता है। सरकार ने विकलांग व्यक्ति अधिनियम में व्यापक परिवर्तन भी किए है ताकि इसे और अधिक व्यापक और अंतर्राष्ट्रीय नियमों के अनुरूप बनाया जा सके। सरकार विकलांग व्यक्तियों को सहायक उपकरण, छात्रवृत्तियों, पुरस्कार और आर्थिक सहायता और शासकीय नौकरियों में आरक्षण की सुविधा प्रदान कर रही है वहीं निजी क्षेत्रों में विकलांग लोगों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने हेतु उन्हें अवसर उपलब्ध कराने वाले नियोक्ताओं को प्रोत्साहित करने जैसी अनेक योजनाओं के माध्यम से सरकार विकलांग कल्याण के कामों में लगी हुई है।

 प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने विकलांग को दिव्यांग का सम्बोधन देकर निश्चय ही उनकी हौसला अफजाई की है। मगर केवल हौसला अफजाई काफी नहीं है। सरकार को अपने स्तर पर इस वर्ग को हर सुविधा सुलभ करनी चाहिए। चाहे शिक्षा की हो या रोजगार की। दुनिया में आज हजारों- लाखों व्यक्ति विकलांगता का शिकार है। विकलांगता अभिशाप नहीं है क्योंकि शारीरिक अभावों को यदि प्रेरणा बना लिया जाये तो विकलांगता व्यक्तित्व विकास में सहायक हो जाती है। यदि सकारात्मक रहा जाये तो अभाव भी विशेषता बन जाते हैं।

हमारा दायित्व हैं कि हम विकलांगो की शारीरिक स्थिति को नजर अन्दाज करते हुए उनके आत्मविश्वास एवं मनोबल को बढ़ाये और उनकी कार्य क्षमताओं को देखते हुए उन्हें समाज की मुख्य धारा से जोडने का प्रसास करें। भारत का संविधान अपने सभी नागरिकों के लिए समानता, स्वतंत्रता, न्याय व गरिमा सुनिश्चित करता है और स्पष्ट रूप से यह विकलांग व्यक्तियों समेत एक संयुक्त समाज बनाने पर जोर डालता है। हाल के वर्षों में विकलांगों के प्रति समाज का नजरिया तेजी से बदला है। यह माना जाता है कि यदि विकलांग व्यक्तियों को समान अवसर तथा प्रभावी पुनर्वास की सुविधा मिले तो वे बेहतर गुणवत्तापूर्ण जीवन व्यतीत कर सकते हैं।

समाज में आज भी विकलांगों के प्रति सोच में कोई खास परिवर्तन नहीं ला पाया है।  अधिकतर लोगों के मन में विकलांगों के प्रति तिरस्कार या दया भाव ही रहता है। यह दोनों भाव विकलांगों के स्वाभिमान पर चोट करते हैं। दिव्यांग कह भर देने से इनके जीवन में कोई बदलाव नहीं आएगा दिव्यांग लोगों के प्रति अपनी सोच और मानसिकता को बदलने का समय आ गया है। विकलांगों को समाज की मुख्यधारा में तभी शामिल किया जा सकता है जब समाज इन्हें अपना हिस्सा समझे, इसके लिए एक व्यापक जागरूकता अभियान की जरूरत है। विकलांगों को शिक्षा से जोड़ना जरूरी है। इस वर्ग के लिए, खासतौर पर, मूक-बधिरों के लिए विशेष स्कूलों का अभाव है जिसकी वजह से अधिकांश विकलांग ठीक से पढ़-लिखकर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं बन पाते। हमें दिव्यांगों के जीवन में मुस्कराहट लाने के लिए अपना नजरिया बदलना होगा तभी हम अपनी जिम्मेदारी का सही निर्वहन कर सकेंगे। 

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

9414441218

दिग्गज उद्योगपति पद्मश्री धर्मपाल गुलाटी

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दिग्गज मसाला कंपनी एमडीएच (MDH) के मालिक पद्मश्री भारतीय उद्यम, संघर्ष और सामाजिक जिम्मेदारी का एक अद्भुत प्रतीक माने जाते हैं। उनका जीवन बताता है कि कठिन परिस्थितियाँ भी इंसान को रोक नहीं सकतीं, यदि मन में लगन, ईमानदारी और आगे बढ़ने का साहस हो। धर्मपाल गुलाटी न केवल मसाला उद्योग के सफल व्यवसायी थे, बल्कि समाज सेवा में भी उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। नीचे उनका जीवन परिचय और समाज के प्रति उनकी भूमिका सरल (ऑर्थो) शब्दों में प्रस्तुत है।

धर्मपाल गुलाटी का जन्म 27 मार्च 1923 को पाकिस्तान के सियालकोट में हुआ। उनके पिता का एक छोटा सा मसालों का कारोबार था, जिसका नाम “महाशियां दी हट्टी” था। बचपन से ही धर्मपाल जी पढ़ाई में अधिक मन नहीं लगाते थे। वे कुछ कक्षाओं तक पढ़कर ही व्यापार के प्रति आकर्षित होने लगे थे। अपने पिता की दुकान पर बैठकर लोगों के बीच मसाले बेचते हुए उन्होंने व्यापार की बारीकियाँ सीखीं। उनका स्वभाव सरल था और ईमानदारी उनकी पूँजी थी।

सन् 1947 में बंटवारे के समय उनका परिवार पाकिस्तान छोड़कर भारत आया। शुरू के दिन बहुत मुश्किलों से भरे थे। उन्होंने दिल्ली में पहले तांगा चलाया, क्योंकि आजीविका चलाने के लिए तुरंत कोई काम जरूरी था। कुछ समय बाद उन्होंने अपने पुराने काम की पहचान को फिर से जी उठाने का निश्चय किया और करोल बाग में मसाले बेचने की छोटी सी दुकान खोल दी। यही दुकान आगे चलकर प्रसिद्ध “एमडीएच मसाले” के रूप में दुनिया भर में मशहूर हुई। मेहनत, गुणवत्ता और ग्राहक भरोसे को अपनी नींव बनाकर धर्मपाल जी ने अपने कारोबार को देश-विदेश तक फैलाया।

एमडीएच मसाले की सफलता में उनका व्यक्तिगत समर्पण बहुत बड़ा कारण था। वे मसालों की साफ-सफाई, शुद्धता और स्वाद को सर्वोच्च महत्व देते थे। उनका मानना था कि मसाले केवल व्यापार नहीं, बल्कि लोगों के भोजन और स्वास्थ्य से जुड़े होते हैं। यही वजह थी कि एमडीएच आज भी शुद्धता और विश्वसनीयता के प्रतीक के रूप में जाना जाता है। धर्मपाल गुलाटी ने खुद को कंपनी का चेहरा भी बनाया। टीवी विज्ञापनों में उनकी मुस्कान और पारंपरिक पगड़ी लोगों को बेहद पसंद आई, जिससे उनकी पहचान ‘एमडीएच वाले दादाजी’ के रूप में घर-घर में बनी।

व्यवसाय की ऊँचाइयों पर पहुँचने के बाद भी धर्मपाल गुलाटी का मन समाज सेवा की ओर ही लगा रहा। वे मानते थे कि कमाई का असली आनंद तब है जब उसे समाज के हित में लगाया जाए। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और गरीब बच्चों की सहायता के लिए कई संस्थाएँ चलाईं। वे दिल्ली में अनेक स्कूलों, धर्मशालाओं और अस्पतालों को आर्थिक सहयोग देते थे। एमडीएच परिवार द्वारा चलाए जा रहे कई स्कूलों और चैरिटेबल अस्पतालों की स्थापना में उनका सबसे बड़ा योगदान रहा। वे हजारों बच्चों की फीस, किताबें और शिक्षा की जिम्मेदारी उठाते थे।

धर्मपाल गुलाटी बेहद सरल, विनम्र और अनुशासित व्यक्ति थे। कंपनी के मालिक होने के बावजूद वे रोज सुबह दफ्तर जाते और अपने कर्मचारियों को परिवार की तरह मानते थे। उनका कहना था कि “व्यापार ईमानदारी से चलो, ग्राहकों को अच्छे उत्पाद दो, कर्मचारियों का सम्मान करो — यही सफलता का रास्ता है।” उनकी उम्र 90 से पार होने पर भी वे रोज ऑफिस जाते थे। काम के प्रति उनका समर्पण युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा।

उनके सामाजिक योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया। यह सम्मान उनके काम, उनके चरित्र और देश के प्रति उनकी भावना की पहचान था। 3 दिसंबर 2020 को दिल्ली में उनका निधन हुआ। उनके जाने से मसाला उद्योग ही नहीं, बल्कि समाज सेवा की एक रोशनी भी मंद पड़ गई। परंतु उनके द्वारा किया गया काम आज भी जीवित है और लोगों को प्रेरित करता है।

धर्मपाल गुलाटी का जीवन बताता है कि इंसान यदि मेहनत, ईमानदारी और समाज के प्रति जिम्मेदारी को अपना आधार बना ले, तो वे सामान्य परिस्थितियों से उठकर भी अद्भुत ऊँचाइयाँ छू सकता है। उन्होंने साबित किया कि सफलता केवल पैसों में नहीं, बल्कि लोगों के दिलों में सम्मान पाने में है। उनका जीवन और योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए एक उज्ज्वल उदाहरण है

पटकथा लेखिका डॉ. अचला नागर

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डॉ. अचला नागर का जन्म 2 दिसंबर, 1939 को लखनऊ, उत्तर प्रदेश में हुआ था। वे प्रसिद्ध फ़िल्म पटकथा एवं संवाद लेखिका हैं।

वे मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय अमृतलाल नागर की बेटी हैं। साहित्य उनकी विरासत रहा है और पूरब में साहित्य, संस्कृति और परम्परा का जो यशस्वी अतीत है, उसका सर्वोत्कृट उन्होंने बचपन और जीवन से पाया है। डॉ. अचला नागर का बचपन लखनऊ में बीता। मायानगरी मुम्बई का आकर्षण उनके बाबूजी को मुम्बई ले आया था मगर वे चकाचौंध भरी दुनिया से जल्दी ही भरपाये। यद्यपि वे जितने दिन वहाँ रहे, अपनी गरिमा और ठसक के साथ और लौटे तो फिर लखनऊ में अपने सृजन में मग्न हो गये।

डॉ. अचला नागर प्रख्यात फ़िल्मकार बी.आर. चोपड़ा की निर्माण संस्था बी.आर. फ़िल्म्स से जुड़ीं और उनके लिए एक सफल फ़िल्म ‘निकाह’ की पटकथा लिखी। यह फ़िल्म बहुत चर्चित हुई थी। जे. ओमप्रकाश निर्देशित फ़िल्म ‘आखिर क्यों’ को एक स्त्री की सशक्त अभिव्यक्ति के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण फ़िल्म माना जाता है। इसमें स्मिता पाटिल की निभायी गयी भूमिका यादगार है और याद की जाती है।

डॉ. अचला नागर की पटकथा में रिश्ते-नाते, जवाबदारियाँ, वफाएँ, प्रेम, जज्बात, निबाह के छोटे-छोटे दृश्य इतने सशक्त होते हैं कि दर्शक बँधा रहता है। यह सचमुच रेखांकित करने वाली चीज़ है कि एक स्त्री-सर्जक मानवीय जीवन के समूचे परिदृश्य को जिस संवेदना की निगाह से देखती है, जिस गहराई से उसका आकलन करती है, उतनी नजदीकी पुरुष पटकथाकारों में शायद नहीं होती। डॉ. अचला नागर का ज़िक्र करते हुए ख़ासतौर पर उनकी एक सशक्त फ़िल्म ‘बागवान’ की बात करना बहुत उचित इसलिए लगता है कि इस फ़िल्म के माध्यम से ही अमिताभ बच्चन अरसे बाद किसी अच्छी भूमिका के लिए एकदम नोटिस किए गये थे। बागवान बिना किसी अतिरिक्त व्यावसायिक सावधानी या प्रचार के प्रदर्शित फ़िल्म थी जो परिवारों ने पसन्द की थी और सफल भी थी। बागवान बरसों याद रहने वाली फ़िल्म थी। बाद में डॉ. अचला नागर ने रवि चोपड़ा के लिए ‘बाबुल’ फ़िल्म की पटकथा भी लिखी थी, यद्यपि वह उतनी सफल नहीं हुई मगर उसका विषय आज के सन्दर्भ में काफ़ी साहसिक था। डॉ. अचला नागर की पटकथा की यह विशेषता है कि उसकी हिन्दी और भाषा-विन्यास बहुत मायने रखता है। कलाकार उसे परदे पर प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त करते हैं और वह रूटीन फ़िल्मों से अलग हटकर होती है। ईश्वर, मेरा पति सिर्फ मेरा है, निगाहें, नगीना, सदा सुहागन आदि उनकी अन्य चर्चित फ़िल्में हैं।

डॉ. अचला नागर की प्रमुख कृतियाँ जिसमें कहानी संग्रह, संस्मरण एवं हिन्दी फ़िल्मों की पटकथा सूची शामिल है, निम्नलिखित हैं-

कहानी संग्रह-नायक-खलनायक, बोल मेरी मछली

संस्मरण-बाबूजी बेटाजी एंड कंपनी

फ़िल्म पटकथा-निकाह, आखिर क्यों, बागबान, बाबुल, ईश्वर, मेरा पति सिर्फ मेरा है, निगाहें, नगीना, सदा सुहागन

लगभग दो-तीन दर्जन सफल फ़िल्मों और धारावाहिकों की पटकथा एवं संवाद लेखिका अचला नागर का अपने पिता सुप्रसिद्ध साहित्यकार अमृतलाल नागर के संबंध में लिखे गए संस्मरणों का संग्रह-बाबूजी बेटाजी एंड कंपनी है। इन संस्मरणों में उन्होंने अपने होश संभालने से लेकर पिता की मृत्यु तक के विभिन्न कालखंडों का जीवंत चित्रण किया है। चित्रण की इस जीवंतता के कारण ही यह पुस्तक अत्यंत पठनीय और रुचिकर बन पड़ी है।

इसमें अमृतलाल नागर के लेखकीय और गैर-लेखकीय दोनों व्यक्तित्व बखूबी उभर कर सामने आए हैं। यह लेखिका के रचनात्मक कौशल का कमाल है। इन संस्मरणों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये संस्मरण एक बेटी का अपने साहित्यकार पिता के प्रति भावुक उद्गार नहीं है बल्कि इनमें उन्हीं पक्षों को उठाया गया है जिनका महत्व निजी के साथ-साथ सार्वजनिक भी हो। घटनाओं के चयन संबंधी इस लेखकीय विवेक के कारण ये संस्मरण स्थायी महत्व के हो गए हैं।

साहित्य भूषण पुरस्कार

हिन्दी उर्दू साहित्य एवार्ड कमेटी सम्मान

यशपाल अनुशंसा सम्मान

साहित्य शिरोमणि सम्मान

−रजनीकान्त शुक्ल

बहुमुखी प्रतिभा का सशक्त चेहरा : फिल्म अभिनेता राकेश बेदी

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राकेश बेदी का जन्म 1 दिसंबर 1954 को दिल्ली में हुआ। वे एक भारतीय फ़िल्म, रंगमंच और टेलीविज़न अभिनेता हैं । उन्हें मुख्यतः मेरा दामाद, चश्मे बद्दूर (1981), और ये जो है ज़िंदगी (1984), श्रीमान श्रीमती (1995) और यस बॉस (1999-2009) जैसी फ़िल्मों में उनकी हास्य भूमिकाओं के लिए जाना जाता है।
बेदी ने अपनी पढ़ाई दिल्ली में पूरी की। उन्होंने दिल्ली के एंड्रयूजगंज स्थित केंद्रीय विद्यालय में पढ़ाई की। स्कूल के दौरान, बेदी मोनो एक्टिंग प्रतियोगिताओं में भाग लेते थे। बेदी ने नई दिल्ली के थिएटर ग्रुप पिएरोट्स ट्रूप के साथ भी काम किया है और पुणे स्थित भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान से अभिनय की पढ़ाई की है।
बेदी ने अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत 1979 में संजीव कुमार अभिनीत फ़िल्म हमारे तुम्हारे में एक सहायक अभिनेता के रूप में की और फिर 150 से अधिक फिल्मों और कई टीवी धारावाहिकों में अभिनय किया। उनकी कुछ सबसे यादगार भूमिकाएँ 1981 की फ़िल्म चश्मे बद्दूर में फारूक शेख और रवि बासवानी के साथ थीं और के. बालचंदर द्वारा निर्देशित एक दूजे के लिए और टीवी सिटकॉम श्रीमान श्रीमती (1995), यस बॉस (1999-2009) में मोहन श्रीवास्तव के रूप में, उनकी सर्वश्रेष्ठ भूमिकाओं में से एक है और इसके लिए उन्हें बहुत सराहना मिली।
उन्होंने ज़ीक्यू पर एक विज्ञान शो, साइंस विद ब्रेनकैफे की मेजबानी की और मुंबई में थिएटर करना जारी रखा। विशेष रूप से, उन्होंने विजय तेंदुलकर के लोकप्रिय वन-मैन प्ले मसाज में 24 अलग-अलग किरदार निभाए। 2012 में, वह अपने पहले टेलीविजन ड्रामा डेली सोप, शुभ विवाह में दिखाई दिए। 2015 से, वह टेलीविजन शो भाबी जी घर पर हैं! में दिखाई देते हैं!

फिल्म और रंगमंच की दुनिया में राकेश बेदी अपनी सादगी, सहज अभिनय और स्वभाविक हास्य के बल पर दर्शकों के दिलों में विशेष स्थान बनाया। हिन्दी फ़िल्मों, धारावाहिकों और नाटकों में सक्रिय रहने वाले राकेश बेदी ने अभिनय को केवल मनोरंजन का साधन नहीं माना, बल्कि उसे समाज और मनुष्य की भावनाओं को सहज रूप में व्यक्त करने का माध्यम बनाया। उनकी अभिनय यात्रा चार दशक से अधिक समय में फैली है, जिसमें उन्होंने हर प्रकार की भूमिका निभाई और अपनी अलग पहचान स्थापित की।

यद्यपि राकेश बेदी ने विविध भूमिकाएँ निभाईं, परन्तु हास्य कलाकार के रूप में उन्हें विशेष लोकप्रियता मिली। हिन्दी फ़िल्मों और धारावाहिकों में उनका हास्य कभी भी आक्रामक या असभ्य नहीं रहा, बल्कि सादगी से भरा, सरल और घरेलwपन लिये हुए रहा। उनके संवादों की प्रस्तुति, चेहरे की भाव-भंगिमाएँ और समयानुसार प्रतिक्रिया दर्शकों को सहज ही हँसा देती थी। इसी स्वाभाविकता ने उन्हें हिन्दी सिनेमा की हास्य परम्परा में एक सम्मानजनक स्थान दिया।


फ़िल्मों के अलावा राकेश बेदी ने दूरदर्शन और बाद के निजी चैनलों पर प्रसारित अनेक धारावाहिकों में यादगार भूमिकाएँ निभाईं। उन्होंने ऐसे पात्रों को जीवंत किया जो आम भारतीय घरों में देखे-सुने जाते हैं। उन्होंने परिवार आधारित धारावाहिकों से लेकर सामाजिक विषयों पर केन्द्रित प्रसंगों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। उनके अभिनय में अपनापन इतना अधिक था कि दर्शक उन्हें अपने ही घर का सदस्य समझने लगते थ


राकेश बेदी का रंगमंच से विशेष लगाव रहा है। फ़िल्मों और धारावाहिकों के व्यस्त समय में भी उन्होंने नाटकों से दूरी नहीं बनाई। रंगमंच ने उनके अभिनय को माँजने का काम किया। मंच पर वे हर बार नई ऊर्जा, नया रूप और नया अनुभव लेकर आते हैं। उनका मानना है कि रंगमंच किसी भी कलाकार को नई दृष्टि देता है और निरन्तर अभ्यास करवाता है। उनकी अनेक नाट्य प्रस्तुतियाँ आज भी दर्शकों के बीच लोकप्रिय है!

राकेश बेदी की अभिनय शैली बड़े स्वाभाविक ढंग से दर्शक को छू लेती है। वे पात्र को वही रूप देते हैं, जैसा वह कथानक में दिखता है—न अधिक, न कम। चरित्र निर्माण में उनकी सबसे बड़ी विशेषता है सूक्ष्म अवलोकन शक्ति। वे जीवन के छोटे-छोटे अनुभवों का उपयोग अपनी भूमिकाओं में करते हैं, जिससे उनका अभिनय जीवंत हो उठता है। उनका चेहरा सहज ही भावना व्यक्त कर देता है और संवादों की प्रस्तुति में भी वे अत्यधिक सरलता बनाए रखते हैं।लम्बे समय से राकेश बेदी भारतीय फ़िल्म और मनोरंजन जगत का हिस्सा रहे हैं। उन्होंने ढेरों फ़िल्मों, धारावाहिकों और नाटकों के माध्यम से जो योगदान दिया है, वह अत्यन्त मूल्यवान है। अनेक पुरस्कार और सम्मान उन्हें प्राप्त हुए हैं, किन्तु उनके अनुसार सबसे बड़ा सम्मान दर्शकों का विश्वास और स्नेह है। वे नवोदित कलाकारों को हमेशा यह सीख देते हैं कि अभिनय केवल प्रतिभा नहीं, बल्कि निरन्तर अभ्यास और अनुशासन का विषय है


राकेश बेदी ने मनोरंजन जगत के संसार में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। वे उन कलाकारों में गिने जाते हैं जिन्होंने कला को बाज़ार की वस्तु नहीं बनने दिया, बल्कि उसे संस्कृतिमय और मानवीय स्पर्श प्रदान किया। उनकी विनम्रता, सहजता और दार्शनिक दृष्टि उन्हें सामान्य कलाकारों से अलग बनाती है। आज भी वे सक्रिय हैं और दर्शकों को उत्कृष्ट मनोरंजन प्रदान कर रहे हैं। निःसन्देह, राकेश बेदी भारतीय अभिनय जगत के उन स्तंभों में से हैं, जिनकी उपस्थिति ने मनोरंजन को सौम्यता और संवेदनशीलता के साथ समृद्ध किया है।

संसद में हंगामा : जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा हो रहा है स्वाहा

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बाल मुकुन्द ओझा

संसद का शीतकालीन सत्र सोमवार को मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के मुद्दे पर विपक्ष के जोरदार हंगामे और विरोध प्रदर्शनों के साथ शरू हुआ। यह सत्र 19 दिसंबर तक चलेगा। विपक्ष के नेताओं ने पहले ही कह दिया था कि यदि SIR पर चर्चा नहीं हुई तो वह संसद की कार्यवाही चलने नहीं देगी। और वही हुआ, विपक्ष के जोरदार हंगामे के बीच सत्ता पक्ष ने कार्यवाही चालू रखी। एसआईआर के मुद्दे पर विपक्ष के जोरदार हंगामे के बीच मणिपुर जीएसटी (दूसरा संशोधन) विधेयक 2025 बिना चर्चा के पारित हो गया। यह बिल पारित होने के बाद सदन की कार्यवाही दिनभर के लिए स्थगित हो गई है।

संसद  के पिछले कुछ सत्रों की कार्यवाही पर एक नज़र डालें तो लगेगा संसद में काम कम और हंगामा ज्यादा होता है। जनता के खून पसीने की कमाई हंगामे की भेंट चढ़ जाती है जो किसी भी स्थिति में लोकतंत्र के लिए हितकारी नहीं है। देश की संसद आजकल कामकाज की जगह हंगामे की ज्यादा शिकार हो रही है।  संसद आम आदमी की समस्याओं को दूर करेगा। मगर हो रहा है ठीक इसके उल्टा।  संसद के पिछले कुछ सत्रों में ऐसा ही कुछ हो रहा है। संसदीय लोकतंत्र में संसद ही सर्वोच्च है। हमारे माननीय संसद सदस्य इस सर्वोच्चता का अहसास कराने का कोई मौका भी नहीं चूकते, पर खुद इस सर्वोच्चता से जुड़ी जिम्मेदारी-जवाबदेही का अहसास करने को तैयार नहीं। बेशक विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की ऐसी तस्वीर बेहद निराशाजनक ही नहीं, चिंताजनक भी है । संसद ठप रहने की बढ़ती प्रवृत्ति भी कम खतरनाक नहीं है। संसद सत्र अपने कामकाज के बजाय हंगामे के लिए ही समाचार माध्यमों में सुर्खियां बनता जा रहा है। अगर हम संसद की घटती बैठकों के मद्देनजर देखें तो सत्र के दौरान बढ़ता हंगामा और बाधित कार्यवाही हमारे माननीय सांसदों और उनके राजनीतिक दलों के नेतृत्व की लोकतंत्र में आस्था पर ही सवालिया निशान लगा देती है। संसद की सर्वोच्चता का स्पष्ट अर्थ यह भी है कि वह देश हित-जनहित में कानून बनाने के अलावा सरकार के कामकाज की कड़ी निगरानी और समीक्षा भी करे, लेकिन हमारे देश में लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर का हाल यह है कि देश का बजट तक बिना चर्चा के पारित हो गया।

भारत की संसद लोकतंत्र की धुरी है। यह संविधान के अनुच्छेद 79 के तहत स्थापित है। लोकसभा और राज्यसभा, जनता और राज्यों का प्रतिनिधित्व करते हुए, कानून निर्माण, बजट स्वीकृति और महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा करते हैं। लोकसभा अस्थायी सदन है जिसका कार्यकाल 5 वर्ष होता है, जबकि राज्यसभा स्थायी सदन है जिसमें सदस्य 6 वर्ष के लिए चुने जाते हैं। यह निर्विवाद रूप से सत्य है कि संसद के सुचारू और प्रभावी कामकाज के लिए सरकार और विपक्ष दोनों की सामूहिक जिम्मेदारी है। सदन में अनुशासन, मर्यादा संसदीय संस्थाओं की अनिवार्य शर्त है। संसद में कोई व्यवधान या रुकावट नहीं बल्कि अधिक बहस, संवाद, चर्चा, विचार-विमर्श होना चाहिए। स्वस्थ और सशक्त लोकतंत्र के लिए विवाद और प्रतिरोध के स्थान पर संवाद और सहयोग का माहौल बनाने की जरूरत है। संसद में रचनात्मक बहस और संवाद लोकतंत्र का आभूषण है।

2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद पक्ष और विपक्ष में जो कटुता देखने को मिली वह लोकतंत्र के हित में नहीं कही जा सकती। इससे हमारी लोकतान्त्रिक प्रणाली का ह्रास हुआ है। आज सत्ता और विपक्ष के आपसी सम्बन्ध इतने खराब हो गए है की आपसी बात तो दूर एक दूसरे को फूटी आँख भी नहीं सुहाते। दुआ सलाम और अभिवादन भी नहीं करते। औपचारिक बोलचाल भी नहीं होती। लोकतंत्र में सत्ता के साथ विपक्ष का सशक्त होना भी जरुरी है मगर इसका यह मतलब नहीं है की कटुता और द्वेष इतना बढ़ जाये की गाली गलौज की सीमा भी लाँघी जाये। हमारे देश में राजनीतिक माहौल इतना कटुतापूर्ण हो गया है कि लोकतांत्रिक राजनीति के इतिहास में कहीं नहीं हुआ होगा। लोकतांत्रिक जिम्मेदारी-जवाबदेही याद दिलाती थी। दरअसल तर्क कुछ भी दिया जाये, लेकिन कोई भी सदन सत्तापक्ष और विपक्ष, दोनों के बीच सहयोग के बिना चल ही नहीं सकता। हां, सरकार में होने के नाते सत्तापक्ष विपक्ष की मांगों पर बड़प्पन और लचीला रुख दिखाते हुए सदन सुचारु रूप से चलाने की गंभीर पहल अवश्य कर सकता है। मगर विपक्ष का अड़ियल रवैया किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है।    

आजादी के बाद देश में लोकतान्त्रिक प्रणाली को चुना गया। लोकतांत्रिक संसदीय व्यवस्था में बहुमतवाला दल शासन सँभालता है, अन्य दलों के सदस्य सत्तारूढ़ दल के कार्यकलापों की आलोचना करते हैं। सरकार बनने के बाद जो दल शेष बचते हैं, उनमें सबसे अधिक सदस्योंवाले दल को विरोधी दल कहा जाता है । भारतीय राजनीति में विपक्ष का अर्थ, जो सत्ता में नहीं है,से है। विपक्ष के रूप में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है। स्वस्थ विपक्ष का कार्य सरकार की सकारात्मक तरीके से आलोचना करना होना चाहिए। स्वस्थ विपक्ष के रूप में विपक्ष को जनता के हित से जुड़े मुद्दों पर सरकार की आलोचना व बहस करना चाहिए। आजादी के बाद जो संघर्ष तत्कालीन विपक्षी दलों ने शुरू किया था वह सत्ता की नहीं बल्कि विचारों की प्रत्यक्ष लड़ाई थी। उनके विचारों में राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के तत्व मौजूद थे।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी .32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

संसद शुरू होते ही विपक्ष का हंगामा

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आज से Parliament Winter Session 2025 शुरू हो गया है। सत्र 19 दिसंबर तक चलेगा।

दोनों सदनों — Lok Sabha तथा Rajya Sabha — की कार्यवाही आरंभ हुई। राज्यसभा में नए सभापति C. P. Radhakrishnan को अध्यक्षता सौंपा गया।

सरकार ने कई महत्वपूर्ण विधेयकों को पहले दिन सदन में पेश किया, जिनमें Central Excise (Amendment) Bill 2025 तथा Health Security se National Security Cess Bill 2025 शामिल हैं। इन विधेयकों के माध्यम से तंबाकू और उससे जुड़ी वस्तुओं पर उत्पाद शुल्क/उपकर लगाने का प्रावधान है।

इसके अलावा, सत्र में कई अन्य बिलों पर चर्चा और प्रस्तावित पारित की जाने की योजना है।

इस सत्र की शुरुआत के साथ ही विपक्षी दलों ने Special Intensive Revision (SIR) — मतदाता सूची सुधार प्रक्रिया — एवं चुनाव-परिपालन से जुड़े मुद्दों को लेकर तीखी आपत्ति जताई।

विपक्ष ने इसे लोकतंत्र के लिए खतरा बताया और सदन में हंगामा शुरू कर दिया। परिणामस्वरूप लोकसभा की कार्यवाही दोपहर तक स्थगित हुई, और बाद में सदन को दिन भर के लिए स्थगित कर दिया गया।

प्रधानमंत्री का आह्वान व सत्र की दिशा

सत्र आरंभ होने से पूर्व, Narendra Modi ने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि यह सत्र सिर्फ औपचारिकता नहीं बल्कि देश की प्रगति के लिए महत्वपूर्ण है। उन्होंने सदन के सदस्यों से अनुरोध किया कि वे “ड्रामा” नहीं बल्कि “डिलीवरी” (कार्यक्षमता) पर ध्यान दें।

उन्होंने साथ ही नई-नई युवा सांसदों को सुनवाई का अवसर देने की जरूरत पर जोर दिया।

प्रधानमंत्री ने बीएसएफ के स्थापना दिवस पर बधाई दी

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प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के स्थापना दिवस पर उनके कर्मियों को बधाई दी है। श्री मोदी ने कहा कि बीएसएफ भारत के अटूट संकल्प और सर्वोच्च व्यावसायिकता का प्रतीक है। श्री मोदी ने कहा, “वे सबसे चुनौतीपूर्ण कुछ इलाकों में सेवा करते हैं। उनकी वीरता के साथ-साथ, उनकी मानवीय भावना भी असाधारण है।”

प्रधानमंत्री ने एक्‍स पर पोस्ट किया:

“बीएसएफ के स्थापना दिवस पर, उनके सभी कर्मियों को मेरी शुभकामनाएं। बीएसएफ भारत के अटूट संकल्प और सर्वोच्च व्यावसायिकता का प्रतीक है। उनकी कर्तव्यनिष्ठा अनुकरणीय है। वे कुछ सबसे चुनौतीपूर्ण इलाकों में सेवा करते हैं। उनकी वीरता के साथ-साथ, उनकी मानवीय भावना भी असाधारण है। हमारे राष्ट्र की सेवा और सुरक्षा के उनके प्रयासों के लिए इस बल को मेरी शुभकामनाएं

भारत फुटवियर उत्पादन और खपत के मामले में विश्व में दूसरे स्थान पर −राष्ट्रपति

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राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने आज सामवार को नई दिल्ली में फुटवियर डिजाइन एवं विकास संस्थान के दीक्षांत समारोह में भाग लिया। अपने संबोधन में इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि भारत फुटवियर उत्पादन और इसके खपत के मामले में विश्व में दूसरे स्थान हँ। उन्होंने कहा कि भारत तेज़ी से आत्मनिर्भर बन रहा है और वैश्विक आर्थिक मंच पर आर्थिक भूमिका विस्तारित करने में सक्षम है। राष्ट्रपति ने कहा कि उन्हें यह जानकर प्रसन्नता हुई है कि वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग ने आत्मनिर्भर भारत अभियान के अंतर्गत फुटवियर क्षेत्र को ‘चैंपियन सेक्टर’ का दर्जा दिया है। उन्होंने कहा कि सरकार फुटवियर क्षेत्र में निवेश आकर्षित करने के लिए पारिस्थितिकी तंत्र स्थापित करने के साथ ही प्रोत्साहन दे रही है।

राष्ट्रपति ने कहा कि भारत फुटवियर उत्पादन और इसके खपत के मामले में विश्व में दूसरे स्थान पर है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत का फुटवियर निर्यात 2500 मिलियन डॉलर से कुछ अधिक था जबकि इसका आयात लगभग 680 मिलियन डॉलर था। इसे देखते हुए भारत का फुटवियर निर्यात आयात का लगभग चार गुना है। उन्होंने कहा कि भारत विश्व में फुटवियर का प्रमुख निर्यातक है पर इसे और बढ़ाने के लिए फुटवियर व्यवसाय का विस्तार ज़रूरी है जिससे इस क्षेत्र के विद्यार्थियों को उद्यम स्थापित कर रोज़गार सृजन या उद्यमों में रोज़गार पाने के अवसर बढ़ेंगे।

राष्ट्रपति ने फुटवियर डिजाइन एंड डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट और नॉर्थम्प्टन विश्वविद्यालय के बीच समझौता ज्ञापन पर हर्ष प्रकट किया। उन्होंने कहा कि इससे भारत और ब्रिटेन के बीच मुक्त व्यापार समझौते के अंतर्गत सहयोग और गहन होगा। उन्होंने रेखांकित कि यह समझौता ज्ञापन टिकाऊ सामग्रियों और चक्रीय अर्थव्यवस्था पर विशेष ज़ोर देता है। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रयास पर्यावरण संरक्षण के प्रति दोनों देशों की प्रतिबद्धता दर्शाते हैं।

राष्ट्रपति ने कहा कि फुटवियर डिज़ाइन के क्षेत्र के कई महत्वपूर्ण पहलू हैं। उन्होंने स्नातक उत्तीर्ण विद्यार्थियों को अपने कार्यों द्वारा समाज और देश के लिए बहुमुखी योगदान देने के व्यापक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ने की सलाह दी। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि वे फुटवियर डिज़ाइन से लोगों के स्वास्थ्य और उपादेयता, कार्यक्षमता में सुधार, अपने कार्य द्वारा लोगों के लिए रोज़गार सृजित करने, अपेक्षाकृत पीछे रह गए लोगों को आर्थिक विकास में भागीदार बनाने, भारत के निर्यात में योगदान देकर अर्थव्यवस्था को मज़बूत बनाने, गुणवत्तापूर्ण उत्पादों द्वारा वैश्विक बाज़ार में भारत को ब्रांड एंबेसडर बनाने और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के राष्ट्रीय लक्ष्य की दिशा में अपना योगदान देने की हेतु कार्य करें।

कहा कि भारत तेज़ी से आत्मनिर्भर बन रहा है और वैश्विक आर्थिक मंच पर आर्थिक भूमिका विस्तारित करने में सक्षम है। राष्ट्रपति ने कहा कि उन्हें यह जानकर प्रसन्नता हुई है कि वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग ने आत्मनिर्भर भारत अभियान के अंतर्गत फुटवियर क्षेत्र को ‘चैंपियन सेक्टर’ का दर्जा दिया है। उन्होंने कहा कि सरकार फुटवियर क्षेत्र में निवेश आकर्षित करने के लिए पारिस्थितिकी तंत्र स्थापित करने के साथ ही प्रोत्साहन दे रही है।