सशस्त्र बलों के अदम्य साहस पर भारत को गर्व

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सशत्र सेना झंडा दिवस :

                                                          बाल मुकुन्द ओझा

झंडा दिवस यानी देश की सेना के प्रति सम्मान प्रकट करने का दिन। सशस्त्र सेना झंडा दिवस प्रत्येक वर्ष 7 दिसंबर को मनाया जाता है। यह दिवस 1949 से हर साल 7 दिसंबर को मनाया जाता है।। झंडा दिवस का उद्देश्य भारत की जनता द्वारा देश की सेना के प्रति सच्ची श्रद्धा और सम्मान प्रकट करना है। सरहद की रक्षा के लिए हमारे जवान रात-दिन मुस्तैदी से राष्ट्र की सेवा में लगे रहते हैं। तिरंगे की रक्षा के साथ ही सैन्य फ्लैग उनकी आन-बान-शान का प्रतीक है। उन जांबाज सैनिकों के प्रति एकजुटता दिखाने का दिन, जो देश की तरफ आंख उठाकर देखने वालों से लोहा लेते हुए शहीद हो गए।  देश की सीमा की सुरक्षा नौसेना, थल सेना एवं वायु सेना करती है। भारतीय सेना झंडा दिवस तीनों सेनाओं के जवानों के कल्याण के लिए मनाया जाता है। इस दिन शहीदों और वीर सेनानियों के उन लोगों को सम्मानित किया जाता है, जिन्होंने देश की रक्षा के किए दुश्मनों का मुकाबला किया है और अपना सब कुछ देश के नाम कर दिया है। सशस्त्र झंडा दिवस पर जांबाज सैनिकों व उनके परिजनों के प्रति नागरिक एकजुटता प्रदर्शित करने का दिन है। हर एक नागरिक का कर्तव्य है कि वे सात दिसंबर को सैनिकों के सम्मान व उनके कल्याण में अपना योगदान दें। इस दिन जो राशि एकत्र की जाती है. वह झंडा दिवस कोष में जमा कर दी जाती है। इस राशि का इस्तेमाल युद्धों में शहीद हुए सैनिकों के परिवार, हताहत हुए सैनिकों के कल्याण व पुनर्वास में खर्च की जाती है। यह राशि सैनिक कल्याण बोर्ड की माध्यम से खर्च की जाती है। देश के हर नागरिक को चाहिए कि वह झंडा दिवस कोष में अपना योगदान देकर देश के झंडे का सम्मान हमेशा बनाए रखे ।

7 दिसंबर, 1949 से शुरू हुआ यह सफर आज तक जारी है। आजादी के तुरंत बाद सरकार को लगने लगा कि सैनिकों के परिवार वालों की भी जरूरतों का ख्याल रखने की आवश्यकता है और इसलिए 7 दिसंबर को झंडा दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया। इसके पीछे सोच थी कि जनता में छोटे-छोटे झंडे बांट कर दान अर्जित किया जाएगा जिसका फायदा शहीद सैनिकों के आश्रितों को होगा। शुरूआत में इसे झंडा दिवस के रूप में मनाया जाता था लेकिन 1993 से इसे सशस्त्र सेना झंडा दिवस का रूप दे दिया गया। सशस्त्र सेना झंडा दिवस निधि मातृभूमि के लिए सर्वोच्च बलिदान को समर्पित है।

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरु ने कहा था,  मैंने भारत और चीन के बॉर्डर का दौरा किया। मैं सेना के अधिकारियों और जवानों से मिला जो वहां पर अंतराष्ट्रीय मिशन से जुड़े हुए थे। मुझे उन्हें देखकर एक अजीब सा रोमांच पैदा हुआ जब मैंने देखा कि वह कैसे अपने अच्छे काम को एक ऐसी जगह पर अंजाम दे रहे हैं जो घर से काफी दूर और सूनसान है। उन्होंने आगे कहा, इससे भी ज्यादा मुझे यह देखकर काफी अच्छा लगा कि सैनिक आम जनता के बीच भी काफी लोकप्रिय थे। मुझे उम्मीद है कि देशवासी उनसे कुछ सीखेंगे और उनकी प्रशंसा करेंगे। फ्लैग डे फंड में योगदान देना भी उनकी इसी प्रशंसा का एक हिस्सा है। मोदी सरकार केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल के कर्मियों के लिए बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और परिवार के साथ बिताये जाने वाले समय में वृद्धि सुनिश्चित करने के लिए काम कर रही है, जो बहुत कठिन परिस्थितियों में भारत के सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं। हम वैज्ञानिक रूप से यह सुनिश्चित करने के लिए भी काम कर रहे हैं कि प्रत्येक जवान को हर साल अपने परिवारों के साथ 100 दिन बिताने का मौका मिले। आज के दिन लोगों को सैनिकों के कल्याण व सम्मान के लिए गहरे लाल व नीले रंग के झंडे के स्टीकर देकर धनराशि एकत्रित की जाती हैं। झंडा दिवस पर सशस्त्र बलों में योगदान देने के लिए ऑनलाइन योगदान कर सकते हैं या चेक या सीधे बैंक जमा कर सकते हैं। आम लोगों से एकत्र किये गये फंड का उपयोग जरूरतमंद पूर्व सैनिकों, युद्ध में शहीद हुए सैनिकों की विधवाओं, उनके आश्रितों और उनके पुनर्वास में शामिल संगठनों को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए किया जाता है, क्योंकि यह शहीदों और सैनिकों के परिवारों का ख्याल रखना देश के सभी नागरिकों की जिम्मेदारी है। गौरतलब है कि भारतीय सशस्त्र बल 1.4 मिलियन से अधिक सक्रिय कर्मियों की ताकत के साथ दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है। साथ ही, यह दुनिया की सबसे बड़ी स्वयंसेवी सेना है। अतः आप भी झण्डा दिवस कोष में अपना योगदान दें।

– बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी-32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

अरावली की सिकुड़ती ढाल और दिल्ली का डूबता पर्यावरण

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अरावली संरक्षण के दायरे को 100 मीटर की परिभाषा से सीमित कर देना—दिल्ली-एनसीआर की हवा, पानी और तापमान के लिए एक गहरी पर्यावरणीय चोट। 

– डॉ. सत्यवान सौरभ

भारत के उत्तरी भूगोल में अरावली केवल एक पर्वतमाला नहीं, बल्कि एक जीवित पारिस्थितिक दीवार, एक भूजल भंडार, एक शीतलन तंत्र और एक धूल-रोधी प्राकृतिक ढाल के रूप में जानी जाती है। किंतु हाल में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पर्यावरण मंत्रालय की उस अनुशंसा को मान्यता देना, जिसमें केवल वे भूमि संरचनाएँ—जो स्थानीय भू-स्तर से 100 मीटर से अधिक ऊँची हों—“अरावली की पहाड़ी” कही जाएँगी, इस पूरी पर्वतमाला को अभूतपूर्व कानूनी और पारिस्थितिक संकट में डाल देता है। 100 मीटर से नीचे के छोटे-बड़े कटक, क्रीड़ा-रूप, पथरीली ढालें, झाड़-झंखाड़ वाले क्षेत्र और टूटे पहाड़, जो वास्तविक पारिस्थितिकी में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं, वे इस परिभाषा से लगभग बाहर हो जाते हैं। अनुमानतः 80–90% तक का वह भू-क्षेत्र, जो आज भी दिल्ली-एनसीआर को धूल, गर्मी, बाढ़ और जल-संकट से बचाता है, उसकी कानूनी रक्षा क्षीण हो जाने का डर स्पष्ट दिख रहा है।

इस परिभाषात्मक परिवर्तन से जो सबसे बड़ा खतरा खड़ा होता है, वह यह कि अरावली का संरक्षण अब “ऊँचाई” पर आधारित हो गया है, “परिस्थितिक कार्यों” पर नहीं। कोई भी पहाड़ी तंत्र अपनी जैव-भूगर्भीय भूमिका ऊँचाई से नहीं, बल्कि अपनी स्थिति, उसके जुड़ाव, उसकी जल-नालियों, मिट्टी की परतों, वनस्पति, पशु-आवागमन, हवा-रोध क्षमता, रंध्रिता और वर्षा संचयन पर आधारित होता है। अरावली की निम्न ऊँचाई वाली श्रृंखलाएँ, जो दूर से देखने पर साधारण टीले लगती हैं, वास्तव में NCR-Delhi के पारिस्थितिक संतुलन की रीढ़ हैं। इन्हें हटाने, काटने या इनके बीच कृत्रिम दरारें डाल देने का अर्थ है—दिल्ली का प्रदूषण और बदतर, पानी और गहरा, तथा गर्मी और अधिक झुलसानेवाली।

अरावली का यह क्षरण केवल एक भूगोलिक घटना नहीं है, बल्कि यह दिल्ली की साँसों, नलकों, खेतों, हवा की दिशा, तापमान की प्रवृत्तियों और पूरे उत्तरी भारत के मानसूनी पैटर्न से सीधे जुड़ा हुआ प्रश्न है। दिल्ली-एनसीआर आज पहले से ही चरम प्रदूषण, गिरते भूजल, सूखे होते जलाशयों और 50 डिग्री के आसपास पहुँचती गर्मी से संघर्ष कर रहा है। ऐसे समय में, अरावली के प्राकृतिक कवच का सिकुड़ना, टूटना और उसकी निरंतर अवैध खनन-निर्माण से कमजोर होना एक ऐसे भारी पारिस्थितिक पतन का संकेत है, जो आने वाले वर्षों में दिल्ली की रहने-लायक स्थिति को ही बदल सकता है।

जब अरावली के पहाड़ काटे जाते हैं, तो सबसे पहले उनकी मिट्टी की पकड़ छूट जाती है। यह मिट्टी हवा के पहले झोंके में धूल बनकर उड़ती है। रेतीले कण, पथरीले अवशेष, टूटे हुए क्वार्ट्जाइट की महीन परतें—ये सभी दिल्ली की हवा में बड़े सूक्ष्म कणों का हिस्सा बन जाते हैं। दिल्ली की भौगोलिक संरचना पहले ही ऐसी है कि हवा की प्रवाह गति शीतकाल में धीमी पड़ जाती है, और प्रदूषण फँसकर परतें जमा कर लेता है। अरावली की टूटी दीवारें इस प्रदूषण को न केवल कई गुना बढ़ा देती हैं, बल्कि राजस्थान की तरफ से आने वाली पश्चिमी हवाओं को बिना किसी अवरोध के धूल और गर्मी लेकर आने का रास्ता भी प्रदान करती हैं।

इस स्थिति का दूसरा पहलू दिल्ली के पानी से जुड़ा है। अरावली की पहाड़ियाँ भूमिगत जल के लिए प्राकृतिक पुनर्भरण क्षेत्र हैं। उनकी पथरीली सतहों में प्राकृतिक दरारें, बिखरे हुए खनिज, पथरीली नालियाँ और रंध्रता—ये सभी वर्षा जल को धरती के भीतर कई सौ फीट तक खींचकर ले जाती हैं। किंतु जब पहाड़ियों को काटकर समतल कर दिया जाता है, या उन पर कंक्रीट और बस्तियाँ उग आती हैं, तब यह पूरी प्राकृतिक जल-प्रवाह प्रणाली टूट जाती है। पानी अब रिसता नहीं, बह जाता है। मिट्टी कटाव बढ़ता है, छोटे जलस्रोत नष्ट होते हैं, और भूजल recharge लगभग समाप्त हो जाता है। परिणाम यह कि दिल्ली-गुड़गाँव-फरीदाबाद-सोहना क्षेत्र में जलसंकट और गहरा हो जाता है। अनेक इलाकों में भूजल पहले ही 800–1000 फीट तक जा चुका है; अरावली के और कटने से यह स्तर खतरनाक रूप से और नीचे जाएगा।

लेकिन आज सबसे बड़ा संकट, जिसे दिल्ली हर गर्मियों में महसूस करती है, वह है “चरम ऊष्मा”—extreme heat. अरावली का विस्तृत वन-तंत्र, उसकी झाड़ियाँ, उसके वृक्ष, उसकी ऊबड़-खाबड़ ढालें—ये सभी प्राकृतिक शीतलन तंत्र (कूलिंग सिस्टम) का हिस्सा हैं। यह प्रणाली न केवल छाया और वाष्पोत्सर्जन से गर्मी कम करती है, बल्कि गर्म हवाओं को रोकने की प्राकृतिक क्षमता भी रखती है। परंतु जब पहाड़ियों को कंक्रीट, पक्की सड़कें और भवन निगल जाते हैं, तब पूरा क्षेत्र “हीट-आइलैंड” में बदल जाता है। अरावली का हर टूटा टुकड़ा दिल्ली के तापमान में 0.2–0.4 डिग्री की वृद्धि जोड़ देता है। और जब यह प्रक्रिया कई किलोमीटर तक फैल जाती है, तो दिल्ली की गर्मी औसतन कई डिग्री तक बढ़ जाती है।

और तब आता है अरावली का वह पहलू, जिसे भारत के कई भाग गंभीरता से नहीं लेते—अरावली एक “रेगिस्तान-रोधी दीवार” है। यह पर्वतमाला थार मरुस्थल की पूर्वी सीमा के ठीक आगे खड़ी है। यदि यह पर्वतमाला कमजोर हो जाए, इनके बीच कृत्रिम रास्ते बन जाएँ, वृक्ष कट जाएँ या खनन से दरारें खुल जाएँ, तो राजस्थान की ओर से चलने वाली धूल, रेत और शुष्क हवाएँ बड़ी मात्रा में हरियाणा और दिल्ली तक पहुँचने लगेंगी। अरावली सदियों से रेगिस्तान को रोकने वाली प्राकृतिक सीमा रही है। यह सीमा कमजोर पड़ने का अर्थ है कि रेतीले क्षेत्र धीरे-धीरे दिल्ली की ओर खिसकेंगे—इसे वैज्ञानिक भाषा में “डेजर्टिफिकेशन की पूर्वगामी प्रवृत्ति” कहा जाता है। इसका खतरा केवल धूल तक सीमित नहीं, बल्कि यह पूरी भूमि-उपजाऊ क्षमता, मिट्टी का प्रकार, जल-न्यूनता और स्थानीय जलवायु तक को बदल सकता है।

इस पूरे परिदृश्य में सबसे चिंता की बात यह है कि 100 मीटर की परिभाषा अरावली को “टुकड़ों” में बदल देगी। जब कोई भी पर्वतमाला एक सतत श्रृंखला रहती है, तभी वह अपनी पर्यावरणीय भूमिका निभा सकती है। लेकिन जब उसे 50–100 मीटर के अंतराल पर काट-काटकर अलग कर दिया जाता है, तो उसकी हवा, जल और तापमान से संबंधित भूमिकाएँ ध्वस्त हो जाती हैं। यह fragmentation न केवल कानूनी सुरक्षा को कम करता है, बल्कि अवैध निर्माणकर्ताओं को खुला निमंत्रण देता है कि वे उन भू-भागों को निर्माण योग्य मानें, जो अब “पहाड़” नहीं माने जाएँगे। नतीजतन—खनन, फार्महाउस, कंक्रीट, सड़कें, विला, रिज़ॉर्ट और उद्योग अरावली के शरीर को खोखला करते जाएँगे।

यह स्थिति दिल्ली के प्रदूषण को केवल बढ़ाती नहीं, बल्कि उसे स्थायी बनाती है। हवा में धूल बढ़ने का अर्थ है कि दिल्ली के समूचे वायुमंडल में PM-10 और PM-2.5 दोनों की मात्रा लगातार उच्चतर स्तर पर रहना। जब हवा के प्रवाह में अरावली की ढालें टूट जाती हैं, तो स्मॉग का बाहर निकलना कठिन हो जाता है। दिल्ली का भौगोलिक कटोरा-नुमा स्वरूप वैसे ही प्रदूषण को फँसा कर रखता है; यदि उसके एकमात्र पश्चिमी-दक्षिणी “सांस लेने के रास्ते” अर्थात् अरावली के छिद्र भर दिए जाएँ, तो यह संकट और भी विकराल हो जाएगा।

भूजल के स्तर के गिरने का प्रभाव केवल पानी की उपलब्धता तक सीमित नहीं रहता। यह पूरे पारिस्थितिकी तंत्र में असंतुलन उत्पन्न करता है। जब भूजल की सतह लगातार नीचे जाती है, तो मिट्टी की नमी कम होती है, खेतों की सिंचाई कठिन होती है, शहरी हरियाली सूखती है, और अंततः तापमान और तेजी से बढ़ता है। इस प्रकार अरावली का क्षरण दिल्ली की गर्मी को अप्रत्यक्ष रूप से भी बढ़ाता है।

गर्मी बढ़ने से न केवल अस्वस्थता, बल्कि बिजली की खपत, जल की माँग, शहरी ताप-दबाव और दुर्घटनाएँ तक बढ़ जाती हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों में स्पष्ट किया गया है कि दिल्ली में गर्मी का 30–40% नियंत्रण अरावली के वन-कवच पर निर्भर है। इस कवच के हटते ही दिल्ली को आने वाले दशक में 50–52 डिग्री की गर्मी स्थायी रूप से महसूस होने लगेगी।

प्रश्न यह है कि समाधान क्या है? पहला समाधान यही है कि अरावली की कानूनी परिभाषा “ऊँचाई आधारित” नहीं, बल्कि “परिस्थितिक कार्य आधारित” होनी चाहिए। दूसरा यह कि वन, चरागाह, झाड़ी-वन, पथरीले परिदृश्य—इन सभी को अरावली का हिस्सा मानकर संरक्षित किया जाए। तीसरा, खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लागू किया जाए और अवैध निर्माणों को कठोरता से हटाया जाए। चौथा, टूटे पहाड़ों का पुनरुत्थान किया जाए—मिट्टी भरकर, देशज प्रजातियों के वृक्ष लगाकर और जलसंचयन संरचनाएँ बनाकर। पाँचवाँ, भौतिक-प्राकृतिक निरंतरता पुनः स्थापित की जाए, ताकि पूरे NCR-Delhi को एक सघन, अविच्छिन्न पर्यावरणीय कवच प्राप्त हो सके।

अरावली केवल हरियाणा, राजस्थान या दिल्ली का संगठनात्मक मसला नहीं, बल्कि यह उत्तरी भारत की जलवायु सुरक्षा दीवार है। इसे कमजोर करने का अर्थ है—दिल्ली की हवा को और जहरीला, उसका पानी और गहरा संकटग्रस्त, और उसकी गर्मी और अधिक घनघोर बना देना। अरावली का टूटना, दिल्ली का टूटना है। यदि अरावली जीवित रहेगी, तभी दिल्ली सांस ले पाएगी। यदि अरावली बचेगी, तभी दिल्ली बचेगी।

– डॉ. सत्यवान सौरभ

रूस के राष्ट्रपति पुतिन की भारत यात्रा का ऐतिहासिक महत्व

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रूस के राष्ट्रपति पुतिन की यात्रा का ऐतिहासिक महत्व इसलिए है क्योंकि यह युद्ध उपरांत पुतिन का पहला भारत दौरा है — उस समय जब अंतरराष्ट्रीय माहौल रूस के प्रति कठोर हो चुका है। इसके अलावा, यह दौरा India–Russia Annual Summit (भारत–रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन) का 23वाँ संस्करण है, और भारत–रूस रणनीतिक साझेदारी की तीसरी दशक में प्रवेश कर चुकी है।

दौरे से पूर्व यह आशंका थी कि पश्चिम खासकर अमेरिकी दबाव के बीच, भारत–रूस रिश्तों को लेकर भारत की विदेश-नीति को संतुलित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ऐसे में यह देखना था कि भारत इस दौरे से किस प्रकार का परिणाम चाहता है — राजनयिक मजबूती, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा सहयोग या आर्थिक समर्थन?


मुख्य समझौते और घोषणाएँ

आर्थिक और व्यापारिक साझेदारी, सहमति (Economic Cooperation till 2030)

दौरे के दौरान, दोनों देशों ने 2030 तक आर्थिक सहयोग की रूपरेखा (economic cooperation programme) स्वीकार की।

उद्देश्य है कि पारंपरिक ऊर्जा-और रक्षा-आधारित व्यापार से आगे निकलकर, वाणिज्य, कृषि, उर्वरक, श्रम-आंदोलन, पन-पुर्निर्माण (manufacturing), और अन्य क्षेत्रों में सहयोग बढ़े। उदाहरण के रूप में, रूस और भारत के उर्वरक उत्पादकों ने मिलकर रूस में यूरिया संयंत्र लगाने का समझौता किया है।

दोनों नेताओं ने मुक्त व्यापार (Free Trade Agreement — FTA) की दिशा में चर्चा की और जल्द इसे पूरा करने की इच्छा जताई।

महत्व: यह कदम पारंपरिक ‘‘तेल–अस्त्र’’ आधारित भारत–रूस रिश्ते से इतर है; यदि सफल हुआ, तो इसे नए युग की साझेदारी माना जा सकता है — अधिक विविध, व्यापक और स्थायी।

ऊर्जा सुरक्षा एवं ईंधन आपूर्ति — बिना रुकावट तेल/ईंधन की गारंटी

पुतिन ने स्पष्ट कहा कि रूस भारत को तेल, गैस, कोयला और अन्य आवश्यक ऊर्जा आपूर्ति में निरंतरता सुनिश्चित करेगा।

भारत के लिए यह बड़ी बात है, क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और ऊर्जा मांग भी बढ़ रही है।

महत्व: यह शाश्वत ऊर्जा आपूर्ति भारत की आर्थिक वृद्धि और ऊर्जा-सुरक्षा के लिए सहायक हो सकती है; साथ ही रूस के लिए, यह साझेदारी उस आर्थिक दबाव को कुछ कम कर सकती है जो युद्ध व पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण है।

परमाणु ऊर्जा और प्रमुख ऊर्जा-भवन परियोजनाएँ

इस दौरान, पुतिन और मोदी ने यह भरोसा जताया कि रूस भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग को और आगे बढ़ाएगा। ख़ासकर, Kudankulam Nuclear Power Plant (कुडनकुलम परमाणु संयंत्र) को पूरी क्षमता पर ले जाने की योजना पर जोर दिया गया।

साथ ही, संयुक्त लॉजिस्टिक एवं परिवहन मार्ग — जैसे अंतरराष्ट्रीय उत्तर–दक्षिण परिवहन मार्ग (International North–South Transport Corridor) को बढ़ावा देने की भी घोषणा की गयी, जिससे भारत-रूस के बीच व्यापार एवं माल-आवागमन में आसानी होगी।

महत्व: परमाणु ऊर्जा पर यह साझेदारी भारत की ऊर्जा विविधता और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा दे सकती है। लॉजिस्टिक एवं मार्गों के विस्तार से व्यापार संबंधों को दूर-गामी मजबूती मिल सकती है।

रक्षा सहयोग, सैन्य-तकनीकी साझेदारी और हथियार सौदे

दोनों देशों ने रक्षा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई है — इसमें संयुक्त अनुसंधान-विकास, स्थानीय उत्पादन, रखरखाव, आपूर्ति इत्यादि शामिल हैं।

विशेष रूप से, वे नई पीढ़ी के हथियार प्रणालियों पर विचार कर रहे हैं — जिसमें संभावित रूप से आधुनिक वायु रक्षा प्रणालियाँ (जैसे कि S-400 missile system के अतिरिक्त), आधुनिक लड़ाकू विमान जैसे Su-57 आदि शामिल हो सकते हैं।

रक्षा सहयोग अब पारंपरिक ‘‘खरीद-विक्रय’’ से आगे बढ़कर ‘‘संयुक्त उत्पादन व विकास’’ की दिशा में है।

महत्व: भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता (self-reliance) की दिशा में यह रूसी साझेदारी महत्वपूर्ण हो सकती है। साथ ही, अगर स्थानीय उत्पादन हुआ, तो लागत घट सकती है और रक्षा क्षमताके लिहाज़ से भारत मजबूत हो सकता है।

मानव-श्रम, कृषि, खाद्य-सुरक्षा, और अन्य नागरिक सहयोग

यात्रा के दौरान, श्रम (माइग्रेशन और मोबिलिटी), खाद्य एवं कृषि, स्वास्थ्य और खाद्य-सुरक्षा जैसे नागरिक क्षेत्रों में सहयोग की भी बात हुई।

इससे संकेत मिलता है कि साझेदारी सिर्फ रक्षा और ऊर्जा तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि आम नागरिक, कृषि और उद्योग से जुड़े हितों को भी शामिल किया गया है।

महत्व: यह व्यापक दृष्टिकोण है — जो भारत-रूस रिश्तों को केवल रणनीतिक नहीं, बल्कि नागरिक आधार पर मजबूत बनाता है।


सकारात्मक पक्ष — क्या हासिल हो सकता है?

विविधीकरण और दीर्घकालिक साझेदारी

पहले अधिकांश सहयोग (तेल, हथियार) तक सीमित था। इस बार, समझौते बहु-क्षेत्रीय (मल्टी-सेक्टोरल) हैं — ऊर्जा, रक्षा, कृषि, उद्योग, श्रम। इससे साझेदारी अधिक स्थायी व व्यापक बन सकती है।

ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक विकास

भारत की ऊर्जा जरूरतें तेजी से बढ़ रही हैं। रूस की गारंटीकृत ईंधन/ऊर्जा आपूर्ति और परमाणु ऊर्जा सहयोग, भारत को ऊर्जा-संकट से राहत दे सकते हैं। इसके साथ ही, कृषि व उर्वरक सहयोग खाद्य सुरक्षा में सहायक हो सकते हैं।

रक्षा आत्मनिर्भरता और ठोस रक्षा क्षमताएँ

संयुक्त उत्पादन व रक्षा-टेक सहयोग से भारत के रक्षा उद्योग को मजबूती मिल सकती है। आधुनिक मिसाइल, वायु रक्षा प्रणालियाँ, लड़ाकू विमान आदि से भारत की सैन्य क्षमता बढ़ सकती है।

भू-राजनीतिक संतुलन और स्वायत्त विदेश नीति

पश्चिमी दबाव, विशेषकर अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच भी, भारत ने संतुलित राह अपनाई है। यह रूस के साथ पुराने रिश्तों को बनाए रखने के साथ-साथ अपनी स्वायत्त विदेश नीति की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।


आलोचनात्मक दृष्टिकोण — किन चुनौतियों और सीमाओं पर सवाल बने हुए हैं

पश्चिमी — विशेष रूप से अमेरिकी — दबाव और वैश्विक प्रतिक्रिया

चूंकि रूस पर युद्ध के कारण पश्चिमी देशों — खासकर अमेरिका और यूरोपीय देशों — द्वारा प्रतिबंध लगे हैं, भारत का रूस के साथ गहरा सहयोग वैश्विक स्तर पर आलोचना का कारण बन सकता है। इस दौरे को लेकर पश्चिमी मीडिया ने इसे भारत की विदेश नीति में ‘‘बैलेंसिंग एक्ट’’ (संतुलन प्रयास) माना है।
यदि भारत रूस की ओर अधिक झुकता दिखा, तो उसकी अन्य साझेदारियों — विशेष रूप से पश्चिम के साथ — प्रभावित हो सकती हैं।

आर्थिक और व्यावसायिक बोझ तथा भारत की निर्भरता

ऊर्जा व उर्वरक आपूर्ति में रूस पर भरोसा करना, भारत को राजनीतिक और रणनीतिक रूप से रूस पर निर्भर बना सकता है। यदि भविष्य में रूस पर प्रतिबंध बढ़े, या अंतर्राष्ट्रीय कीमतों में अस्थिरता आई, तो भारत की अर्थव्यवस्था पर जोखिम हो सकता है।

रक्षा साझेदारी में राजनीतिक और नैतिक विवाद

रक्षा और हवाई रक्षा प्रणालियों के सौदे, विशेषकर युद्ध-क्षेत्रों में इस्तेमाल किए जाने वाले हथियार — पश्चिमी देशों की नज़र में — विवादित हो सकते हैं। इससे भारत को अंतर्राष्ट्रीय आलोचना का सामना करना पड़ सकता है।

योजना बनाम वास्‍तविकता — कितने वादे निभेंगे?

बहुत सारे घोषणाएँ (plans, agreements) हुई हैं — परंतु उनकी जमीन पर वास्तविकता दिखने में समय लगेगा। ऊर्जा, परमाणु, उर्वरक संयंत्र, मुक्त व्यापार, रक्षा उत्पादन आदि — इन सभी पर निवेश, कानूनी व्यवस्था, आपूर्ति-श्रृंखला, समयबद्धता आदि चुनौतियाँ होंगी।

विदेश नीति में संतुलन बनाए रखना मुश्किल

भारत की स्थिति जटिल है — एक ओर रूस के साथ पुराने, गहरे रिश्ते; दूसरी ओर अमेरिका, यूरोप और अन्य पश्चिमी देशों के साथ सुधारते रिश्ते और व्यापारिक/रणनीतिक साझेदारी। इस दौरे के बाद, भारत को अपने अन्य साझेदारों के साथ संतुलन बनाये रखना होगा — यदि वह रूस की ओर बहुत झुकेगा, तो अन्य साझेदार असंतुष्ट हो सकते हैं।


निष्कर्ष: दूरदृष्टि और सावधानी दोनों ही आवश्यक

पुतिन का यह दौरा — और जो समझौते हुए हैं — निश्चित ही भारत–रूस संबंधों को एक नए युग में ले जाने का प्रयास है। ऊर्जा, रक्षा, कृषि, उत्पादन, वाणिज्य, परमाणु — लगभग हर क्षेत्र में सहयोग की गहराई बढ़ाने का संकेत है। यदि ये समझौते सफल रहे और कार्यान्वित हुए, तो यह भारत की आर्थिक, रक्षा और ऊर्जा-सुरक्षा के लिए बहुत लाभदायक साबित हो सकते हैं।

लेकिन — जैसा हमेशा होता है — वादों (Promises) और जमीन पर हकीकत (Reality) के बीच खाई हो सकती है। वैश्विक भू-राजनीति, अंतर्राष्ट्रीय दबाव, पश्चिमी देश आदि की प्रतिक्रिया, आपूर्ति-श्रृंखला, निवेश और समयबद्धता जैसी चुनौतियाँ हैं।

भारत के सामने अब यह काम है कि वह — अपनी राष्ट्रीय हित, स्वायत्त विदेश नीति, और बहुआयामी साझेदारी के बीच — संतुलन बनाए रखे।

यदि इस दौरे को सिर्फ दिखावा न बना, बल्कि ठोस काम, निवेश, नीति एवं दीर्घकालिक रणनीति के साथ आगे बढ़ाया जाए — तो यह भारत–रूस साझेदारी के इतिहास में एक नया अध्याय हो सकता है।

पुतिन का दौरा, पश्चिमी दवाब के बावजूद भारत अपनी स्वायत्त विदेश नीति व साझेदारियों को आगे ले जाने के लिए तैयार

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पुतिन का यह दौरा उस समय हो रहा है जब रूस पर उसके यूक्रेन युद्ध के कारण पश्चिमी संकुचन (sanctions) व राजनीतिक असंतोष गहरा चुका है। पश्चिमी देश — विशेषकर यूएसए तथा कई यूरोपीय देश — रूस को अलग-थलग करने की कोशिश कर रहे थे, ताकि उसकी आर्थिक व सैन्य क्षमता सीमित हो सके। इस पृष्ठभूमि में, जब रूस और भारत के बीच पुराने सैन्य व ऊर्जा-आधारित साझेदारी के अलावा कई नए व्यावसायिक, व्यापारिक व कूटनीतिक समझौते तय हो रहे हैं, तो यह दौरा सिर्फ एक नियमित विदेश यात्रा नहीं बल्कि एक संकेत बनकर उभरा — कि पश्चिमी दवाब व प्रयासों के बावजूद भारत अपनी स्वायत्त विदेश नीति व साझेदारियों को आगे ले जाने के लिए तैयार है।

इस रूप में इस दौरे को कई पश्चिमी मीडिया व विश्लेषकों ने एक प्रकार की ‘चुनौती’ व ‘प्रतिरोध’ का प्रतीक माना है — जिसमें भारत ने पश्चिम विशेषकर अमेरिका द्वारा लगाए जा रहे दवाबों के बावजूद रूस के साथ संबंधों को जारी रखने व गहरा करने का फैसला किया है।

पश्चिमी मीडिया व अमेरिका-यूरोप की प्रतिक्रिया: मुख्य विषय एवं आलोचना एवं कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों ने इस दौरे को इसलिए महत्व दिया कि यह दर्शाता है कि पश्चिम — विशेषकर अमेरिका और यूरोप — द्वारा रूस को अलग-थलग करने के प्रयास सुचारू रूप से सफल नहीं हो रहे।

    विश्लेषकों का कहना है कि भारत-रूस संबंधों में यह पुनर्कमज़ोरी, पश्चिम को साफ संदेश है कि रूस अभी भी उसके कुछ पुराने साझेदारों के साथ मजबूती से खड़ा है। रियलिस्टिक भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाए, तो यह पश्चिम की “पीछे मुड़ कर देखो” की दी गई चेतावनी है — कि उसने रूस को पूरी तरह अकेला नहीं छोड़ा है।

    1. पश्चिमी मीडिया व पॉलिटिकल वृत्तों ने यह सवाल उठाया है कि भारत यदि रूस से तेल, ईंधन, हथियार व रक्षा प्रौद्योगिकियाँ लेता रहा, तो क्या यह रूस द्वारा युद्ध जारी रखने में अप्रत्यक्ष रूप से मदद नहीं करेगा? विशेष रूप से, जब रूस-यूक्रेन युद्ध अभी जारी है, तो रूस की ऊर्जा आपूर्ति व हथियार निर्यात को पश्चिम ‘युद्ध अर्थव्यवस्था’ का हिस्सा मानता है।

    कुछ आलोचकों ने यह भी कहा है कि भारत-रूस रक्षा व ऊर्जा साझेदारी, यदि गहराई से चली, तो यह एक प्रकार की सामरिक साझेदारी करने जैसा हो जाएगा — जिससे भारत की तटस्थ या संतुलित विदेश नीति पर सवाल खड़े हो सकते हैं। यूरोपीय मीडिया में इस पहलू को विशेष चिंता के रूप में पेश किया गया है।

    1. पश्चिम की एक आलोचना यह है कि भले समझौतों में बहुसंख्यक क्षेत्रों (श्रम, उर्वरक, कृषि, defence, ऊर्जा आदि) पर बात हो रही हो, लेकिन वास्तविक रूप से भारत-रूस का व्यापार अभी भी रूस के पक्ष में भारी असंतुलित है। यानी ऊर्जा व हथियारों के बदले भारत से लौटने वाला लाभ सीमित व अनिश्चित है।

    इस असंतुलन को देखते हुए पश्चिमी विश्लेषक जोर दे रहे हैं कि यदि भारत इस ओर आगे बढ़ा, तो वह आर्थिक दृष्टि से अधिक निर्भर बन जाएगा, और उसकी विदेश नीति मज़बूत ‘स्वतंत्रता’ धीरे-धीरे सीमित होती जाएगी।

    1. “बहु-अक्षीय” विदेश नीति या “पक्ष-पात”? — राजनीतिक भरोसेमंदता पर सवाल

    कुछ यूरोपीय व अमेरिकी अखबारों व विश्लेषकों ने यह तर्क दिया है कि भारत का रूस के साथ यह पुनरुत्थान, उसकी “बहु-अक्षीय” (multi-alignment) विदेश नीति की प्रामाणिकता पर सवाल खड़ा कर सकता है। वे कहते हैं कि यदि भारत रूस के साथ सैन्य व ऊर्जा सहयोग को आगे बढ़ाता है, तो पश्चिम उसे भरोसेमंद रणनीतिक भागीदार नहीं देख पाएगा।

    कुछ विश्लेषकों का कहना है कि यह दौरा भारत के लिए दीर्घकालीन कूटनीतिक जोखिम लेकर आता है — खासकर जब उस पर पश्चिमी देशों के साथ व्यापार व रक्षा समझौते भी निर्भर हो। ऐसे में, संतुलन बनाए रखने की रणनीति जोखिम–प्रधान हो सकती है।

    1. पश्चिमी देशों में यह चिंता जताई जा रही है कि यदि भारत तथा रूस ऐसे रिश्ते मजबूत करते रहेंगे, तो युद्ध विराम या रूस-यूक्रेन संघर्ष को हल करने में अंतरराष्ट्रीय दबाव कमजोर होगा। विशेषकर उन यूरोपीय देशों के लिए जो शांति प्रक्रिया का समर्थन करते आए हैं। इस दृष्टिकोण से, भारत-रूस गठजोड़ को युद्ध-विरोधी अंतरराष्ट्रीय एकता का कमजोर संकेत माना जा रहा है।

    कुछ आलोचक यह भी कहते हैं कि भारत-रूस संबंधों में यह “वार्ता व समझौते” का नया दौर — यदि हथियारों व ऊर्जा व्यापार तक सीमित रहा — तो यह शांति की दिशा में नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक धुरी (axis) मजबूत करने जैसा हो सकता है।

    भारत के लिए: वह अपनी ऊर्जा आवश्यकता, रक्षा जरूरतों, आर्थिक व रणनीतिक हितों के लिए रूस पर भरोसा करना चाहता है; वहीं पश्चिम से उससे बढ़ते रिश्ते — व्यापार, टेक्नोलॉजी, बहुपक्षीय गठजोड़ — भी उसके लिए महत्वपूर्ण हैं। इस संतुलन को बनाए रखना आसान नहीं।

    दूसरी ओर, अगर वह रूस के साथ खुले तौर पर आगे बढ़ा, तो पश्चिमी दबाव व आलोचनाएँ — राजनीतिक, आर्थिक व कूटनीतिक — बढ़ेंगी।

    यह दुविधा केवल रणनीतिक नहीं; नैतिक व कूटनीतिक स्तर पर भी है: क्या युद्धरत रूस के साथ गहरा जुड़ाव पूरी दुनिया की शांति व समाधान-प्रयासों से समझौता नहीं है?

    पश्चिमी मीडिया व विश्लेषकों की यह चिंताएँ — आर्थिक निर्भरता, असंतुलन, भरोसे की कमी, शांति-प्रतिकूल संकेत — भारत को दीर्घकालीन रणनीति बनाते समय ध्यान देने लायक बनाती हैं।

    जैसा कि पश्चिमी मीडिया कह रही है, भारत-रूस का यह नया गठजोड़ एक प्रकार की रणनीतिक उत्तरजीविता की कोशिश है — जिसमें भारत अपनी ऊर्जा व रक्षा सुरक्षा चाहता है, और रूस आर्थिक अस्थिरता से बचने के लिए भारत-भारत जैसे भरोसेमंद साझेदार तलाश रहा है। पर यह गठजोड़ अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में भारत के विश्वास-स्तर और विकल्पों को प्रभावित कर सकता है।

    यदि रूस-यूक्रेन संकट जारी रहा और पश्चिम ने सख्त प्रतिबंध बनाए रखे — तो भारत के लिए रूस-आश्रित ऊर्जा, रक्षा एवं व्यापार समझौतों को टिकाए रखना चुनौतीपूर्ण होगा। पश्चिमी देश भारत-पुतीन साझेदारी को दबाव व प्रतिक्रियात्मक नीति के रूप में देख सकते हैं।

    भारत को अपनी विदेश नीति में स्पष्टता — स्वायत्तता और पारदर्शिता दोनों — बनाए रखनी होगी ताकि वह न सिर्फ रक्षा व ऊर्जा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानकों, शांति व कूटनीति के दृष्टिकोण से विश्वसनीय बना रहे।

    पुतिन का यह भारत दौरा और जो समझौते हुए हैं — वे सिर्फ द्विपक्षीय साझेदारी नहीं, बल्कि एक प्रकार की रणनीतिक पिच (pitch) हैं: रूस चाहता है कि वह पश्चिम के दबाव के बीभी अपने पुराने मित्र को स्थिर रखे; भारत चाहता है कि उसकी ऊर्जा, रक्षा, आर्थिक व भू-राजनीतिक आवश्यकताएँ पूरी हों। पश्चिमी मीडिया व पॉलिटिकल वृत्तों की प्रतिक्रिया — चाहे वह अमेरिका हो या यूरोप — इस प्रयास के प्रति संदेह और सावधानी दिखाती है।

    यह समय भारत के लिए बहुत संवेदनशील है: वह निर्णय ले रहा है कि उसकी विदेश नीति “स्वतंत्र + सामरिक” रहे या “गतिशील + संतुलित” बने। यह तय करना होगा कि भारत-रूस साझेदारी उसकी स्व-रक्षा, विकास व आत्मनिर्भरता को स्थायी रूप दे पाएगी या पश्चिमी देशों के साथ उसके रिश्तों और उसकी अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता पर दीर्घकालीन असर डालेगी।

    (चैट जीपीटी)

    कुडनकुलम में सबसे बड़ा भारतीय परमाणु ऊर्जा संयंत्र

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    राष्ट्रपति पुतिन ने कहा: “हम भारत के कुडनकुलम में सबसे बड़ा भारतीय परमाणु ऊर्जा संयंत्र बना रहे हैं। छह में से दो इकाइयाँ पहले ही ग्रिड से जुड़ चुकी हैं और चार निर्माणाधीन हैं। पूरी तरह से चालू होने पर, यह भारत की स्वच्छ और सस्ती ऊर्जा आवश्यकताओं में एक बड़ा योगदान देगा।”

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ संयुक्त प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भारत–रूस रणनीतिक साझेदारी को ऊर्जा, चिकित्सा, तकनीक और वैश्विक मंचों पर नई दिशा देने वाली महत्वपूर्ण घोषणाएँ कीं। ”

    कुडनकुलम परियोजना को भारत–रूस परमाणु सहयोग का सबसे बड़ा प्रतीक बताया जा रहा है, जो आने वाले वर्षों में भारत की ऊर्जा क्षमता को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाएगा। पुतिन ने बताया कि दोनों देश अब पारंपरिक परियोजनाओं से आगे बढ़कर उन्नत तकनीकों पर भी काम कर रहे हैं- “हम चिकित्सा और कृषि में छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों, तैरते परमाणु संयंत्रों और गैर-ऊर्जा परमाणु तकनीकों की भी खोज कर रहे हैं।”

    स्वास्थ्य क्षेत्र में भी एक बड़ा कदम उठाते हुए पुतिन ने कहा- “उन्नत भारतीय तकनीक का उपयोग करके उच्च गुणवत्ता वाली ट्यूमर-रोधी दवाओं का उत्पादन करने के लिए कलुगा क्षेत्र में एक बड़ा रूसी–भारतीय दवा संयंत्र स्थापित किया जाएगा।

    पुतिन ने आगे कहा कि रूसी उद्यम मेक इन इंडिया कार्यक्रम के तहत विनिर्माण में भी भाग लेंगे।हमारे सांस्कृतिक और शैक्षिक आदान-प्रदान लगातार बढ़ रहे हैं, और भारत में रूसी चैनल आरटी के शुभारंभ से दर्शकों को रूस को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलेगी। रूस और भारत स्वतंत्र विदेश नीतियों का पालन करते हैं और एक अधिक न्यायसंगत और लोकतांत्रिक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के लिए ब्रिक्स और एससीओ में मिलकर काम करते हैं। हम अपनी बातचीत से संतुष्ट हैं और आश्वस्त हैं कि यह यात्रा हमारी रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करेगी।’

    पुतिन के संबोधन ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत–रूस संबंध सिर्फ रक्षा और ऊर्जा तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि परमाणु तकनीक, दवा निर्माण, मेक इन इंडिया, शिक्षा, संस्कृति और वैश्विक कूटनीति में भी नए युग की शुरुआत होने जा रही है।”

    इन्डिगो की फ्लाइट रद्द होने से किराए में आया सुनामी

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    भारत भर में इंडिगो की बड़े पैमाने पर उड़ानें रद्द होने से कई प्रमुख घरेलू मार्गों पर हवाई किराए में भारी उछाल आया है।कीमतें अभूतपूर्व स्तर तक पहुँच गई हैं, क्योंकि यात्री विकल्पों की तलाश में हैं। लोकप्रिय बुकिंग वेबसाइट मेकमाईट्रिप (एमएमटी) के आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली से प्रमुख महानगरों और राज्यों की राजधानियों के लिए मार्गों पर महत्वपूर्ण उछाल आया है, जहाँ एक ही दिन की नॉन-स्टॉप उड़ानों की कीमतें पड़ोसी तिथियों के लिए उपलब्ध दरों से दोगुनी तक हैं।

    मेकमाईट्रिप के बुकिंग आंकड़ों से पता चलता है कि 6 दिसंबर को दिल्ली-बेंगलुरु की सबसे सस्ती उड़ान की कीमत 40,000 रुपये से अधिक है, जबकि कुछ विकल्पों की कीमत 80,000 रुपये से अधिक है। एमएमटी के आंकड़ों के अनुसार, 6 दिसंबर को दिल्ली से मुंबई की यात्रा करने के इच्छुक यात्री को न्यूनतम 36,107 रुपये और अधिकतम 56,000 रुपये से अधिक का भुगतान करना होगा। वापसी यात्रा के लिए, राष्ट्रीय राजधानी पहुँचने के लिए न्यूनतम 23,000 रुपये का भुगतान करना होगा, जबकि अधिकतम राशि 37,000 रुपये से अधिक है। दिल्ली-चेन्नई मार्ग पर, अंतिम समय में किराया 62,000-82,000 रुपये तक पहुँच गया।

    दिल्ली से गुवाहाटी जाने वाले यात्रियों के लिए सबसे कम किराया 23,998 रुपये था, जबकि सबसे ज़्यादा किराया 35,015 रुपये था। इसे समझने के लिए, 6 दिसंबर (कल) को दिल्ली से दुबई की उड़ान का किराया लगभग 25,855 रुपये होगा, जिससे दो भारतीय शहरों के बीच उड़ान भरने की तुलना में अंतर्राष्ट्रीय यात्रा सस्ती हो जाएगी। इसी तरह, बेंगलुरु-दुबई का टिकट लगभग 15,000 रुपये में उपलब्ध है। इन दरों की तुलना में, अंतर्राष्ट्रीय यात्रा घरेलू यात्रा से कहीं ज़्यादा सस्ती है। दिल्ली से बैंकॉक की उड़ान के लिए एक व्यक्ति को लगभग 18,747 रुपये देने होंगे।

    इस व्यवधान के बाद इंडिगो में बड़े पैमाने पर परिचालन संबंधी रुकावटें आईं, देश भर में 500 से ज़्यादा उड़ानें देरी से या रद्द हुईं, जिससे हवाईअड्डों पर भीड़भाड़ हो गई और यात्री फंस गए। दिल्ली हवाईअड्डे से इंडिगो की सभी उड़ानें आधी रात तक रद्द कर दी गईं, हालाँकि अन्य एयरलाइनों ने निर्धारित समय पर अपना परिचालन जारी रखा। इंडिगो द्वारा परिचालन को स्थिर करने के प्रयासों के बीच, यात्रा प्लेटफार्मों का सुझाव है कि आने वाले दिनों में किराये सामान्य हो जाने की उम्मीद है, जैसा कि दिल्ली के मार्गों पर 9-12 दिसंबर के लिए प्रदर्शित काफी कम कीमतों से पता चलता है। 

    नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने इंडिगो के शेड्यूल संकट को हल करने के लिए आपातकालीन उपाय शुरू किए हैं, जिसमें उड़ान कार्यक्रम को तुरंत स्थिर करने और यात्री समस्याओं का समाधान करने के आदेश शामिल हैं। मंत्रालय ने दो आदेश जारी किए हैं, जिनमें पूर्ण धनवापसी, होटल आवास और वरिष्ठ नागरिकों के लिए विशेष व्यवस्थाओं की गारंटी दी गई है, साथ ही डीजीसीए ने क्रू ड्यूटी नियमों में अस्थायी छूट दी है। यह कदम यात्रियों को होने वाली असुविधा को कम करने और उड़ान सेवाओं में स्थिरता बहाल करने के लिए उठाया गया है, जिसमें 24×7 नियंत्रण कक्ष स्थिति की निगरानी करेगा।

    नागर विमानन मंत्रालय ने उड़ानों, खासकर इंडिगो एयरलाइंस की उड़ानों में जारी व्यवधान को दूर करने के लिए तत्काल कदम उठाए हैं। डीजीसीए के उड़ान ड्यूटी समय सीमा (एफडीटीएल) आदेशों को तत्काल प्रभाव से स्थगित कर दिया गया है। हवाई सुरक्षा से समझौता किए बिना यह निर्णय पूरी तरह से यात्रियों, खासकर वरिष्ठ नागरिकों, छात्रों, मरीजों और अन्य लोगों के हित में लिया गया है। यह आवश्यक आवश्यकताओं के लिए समय पर हवाई यात्रा पर निर्भर हैं।

    इसके अलावा सामान्य विमान सेवाओं को जल्द से जल्द बहाल करने और यात्रियों को होने वाली असुविधा को कम करने के लिए कई परिचालन उपाय करने के निर्देश दिए गए हैं। इन निर्देशों के तत्काल कार्यान्वयन के आधार पर हमें उम्मीद है कि कल तक उड़ान कार्यक्रम स्थिर होने लगेंगे और सामान्य हो जाएँगे। हमारा अनुमान है कि अगले तीन दिनों में सेवाओं की पूर्ण बहाली हो जाएगी।

    इस अवधि के दौरान यात्रियों की सहायता के लिए एयरलाइनों को उन्नत ऑनलाइन सूचना प्रणालियों के माध्यम से नियमित और सटीक अपडेट प्रदान करने का निर्देश दिया गया है। इससे यात्री अपने घर बैठे ही उड़ान की वास्तविक स्थिति पर नज़र रख सकें। किसी भी उड़ान के रद्द होने की स्थिति में, एयरलाइनें यात्रियों को बिना किसी अनुरोध के, स्वचालित रूप से पूरा रिफंड जारी कर देंगी। लंबी देरी के कारण फंसे यात्रियों को एयरलाइनों द्वारा सीधे होटल में ठहरने की व्यवस्था की जाएगी।

    वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांगजनों को विशेष प्राथमिकता दी जा रही है। उन्हें लाउंज की सुविधा और हर संभव सहायता प्रदान की जाएगी ताकि उनकी यात्रा आरामदायक रहे। इसके अलावा विलंबित उड़ानों से प्रभावित सभी यात्रियों को जलपान और आवश्यक सेवाएँ प्रदान की जाएँगी।

    नागर विमानन मंत्रालय ने एक 24×7 नियंत्रण कक्ष (011-24610843, 011-24693963, 096503-91859) स्थापित किया है जो त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई, प्रभावी समन्वय और उत्पन्न होने वाली समस्याओं के तत्काल समाधान को सुनिश्चित करने के लिए वास्तविक समय के आधार पर स्थिति की निगरानी कर रहा है।

    उच्च स्तरीय जांच के आदेश

    सरकार ने इस व्यवधान की एक उच्च-स्तरीय जाँच कराने का निर्णय लिया है। यह इस बात की जाँच करेगी कि इंडिगो में क्या गड़बड़ हुई, जहाँ भी आवश्यक हो, उचित कार्रवाई के लिए जवाबदेही तय की जाएगी और भविष्य में ऐसी किसी भी व्यवधान को रोकने के लिए उपाय सुझाए जाएँगे ताकि यात्रियों को फिर से ऐसी कठिनाइयों का सामना न करना पड़े।

    राष्ट्र के प्रति हमारा आश्वासन

    केंद्र सरकार हवाई यात्रियों को हो रही कठिनाइयों के प्रति पूरी तरह सचेत है और एयरलाइनों तथा सभी संबंधित हितधारकों के साथ निरंतर परामर्श कर रही है। डीजीसीए द्वारा अनुमत नियामक छूट सहित, एयरलाइन संचालन को स्थिर करने और लोगों की असुविधा को यथाशीघ्र दूर करने के लिए हर आवश्यक उपाय किए जा रहे हैं।

    यात्री देखभाल, सुरक्षा और सुविधा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता बनी हुई है

    सरकार का एकमात्र ध्येय − फॉर्मूला किसानों का कल्याण करना है- शिवराज सिंह

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    केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आज राज्य सभा में प्रश्न काल के दौरान कहा कि प्रधानमंत्री श्री मोदी के नेतृत्व में उत्पादन बढ़ाने, लागत घटाने और उत्पादन के ठीक दाम देने के तीन महत्वपूर्ण काम किए गए हैं। उन्होंने कहा कि सरकार का एक ही ध्येय और फॉर्मूला है और वह है किसानों का कल्याण करना। श्री चौहान ने कहा कि यह गर्व की बात है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में सरकार ने वर्ष 2019 में तय किया कि लागत पर 50% मुनाफा देकर MSP तय की जाएगी, वहीं अब किसानों से तुअर, मसूर व उड़द 100% खरीदी जाएगी, जबकि पिछली सरकार ने कह दिया था कि लागत पर सीधे 50% बढ़ोतरी निर्धारित करने से मंडी में विकृति आ सकती है।

    केंद्रीय मंत्री श शिवराज सिंह ने संसद में सवालों के जवाब में कहा कि हम स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को पूरी तरह मानते हुए कुल लागत पर 50% मुनाफा देकर एमएसपी पर फसल खरीदी कर रहे हैं और कई फसलों पर तो 50% से ज्यादा दाम भी देने का काम कर रहे हैं। 2014 के पहले इतनी खरीद नहीं होती थी और दलहन-तिलहन की फसल के लिए तो 2014 के पहले नाममात्र की खरीदी होती थी। हमने पीएम आशा योजना भी बनाई है। श्री शिवराज सिंह ने कहा कि कई राज्य सरकार खरीदी में ढिलाई करती है, पूरा नहीं खरीदती है, जिससे किसानों को दिक्कत होती है, वहीं हमने तय किया है कि तुअर, मसूर, उड़द राज्य सरकार अगर कम खरीदेगी या नहीं खरीदेगी तो नैफेड जैसी एजेंसी के माध्यम से सीधे भी हम खरीदने का काम करेंगे, ताकि किसानों को ठीक दाम मिल सके।

    श्री शिवराज सिंह ने बताया कि 2004 से 2014 के बीच सभी खरीफ की जो एमएसपी फसलें थी, वो केवल 46 करोड़ 89 लाख मीट्रिक टन खरीदी गई थी, जबकि प्रधानमंत्री श्री मोदी के नेतृत्व में सरकार ने 81 करोड़ 86 लाख मीट्रिक टन खरीदी की हैं। पिछली सरकार में रबी की फसल 23 करोड़ 2 लाख मीट्रिक टन खरीदी गई थी, वहीं वर्तमान में   सरकार ने 35 करोड़ 40 लाख मीट्रिक टन खरीदी है और अलग-अलग दलहन और तिलहन की खरीदी भी की। पहले तिलहन 47 लाख 75 हजार मीट्रिक टन खरीदी जाती थी पहले, वहीं एनडीए की सरकार ने 1 करोड़ 28 लाख मीट्रिक टन खरीदी है। दलहन 6 लाख मीट्रिक टन 10 साल में खरीदी गई थी, वहीं हमने 1 करोड़ 89 लाख मीट्रिक टन खरीदी है और इस तरह से किसानों को उसके उत्पाद का पूरा दाम देने का हमने प्रयास किया है।

    केंद्रीय मंत्री चौहान ने कहा कि कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और किसान उसके प्राण, किसानों का कल्याण ही प्रधानमंत्री और सरकार का सर्वोच्च संकल्प है। हमने MSP तय की,  पिछली सरकार के समय 2013-14 में जितनी MSP दी जाती थी, उससे दोगुनी MSP घोषित करने का काम प्रधानमंत्री श्री मोदी के नेतृत्व में किया गया है। श्री शिवराज सिंह ने उपजवार आंकड़े देते हुए बताया कि पिछली सरकार के समय धान, ज्वार, बाजरा, रागी, तुअर, मूंग, उड़द, मूंगफली, सूरजमुखी, गेहूं, जौ, चना, सरसों आदि पर बहुत कम दाम दिए जाते थे, जबकि वर्तमान में एमएसपी काफी बढ़ाकर दी जा रही हैं, साथ ही MSP पर खरीद भी बहुत बढ़ाई गई हैं। श्री शिवराज सिंह ने यह भी कहा कि यह श्री नरेंद्र मोदी सरकार है, जो किसान के हितों की चर्चा करती है। MSP फसलें जो पूर्व के 10 साल में खरीदी गई वह थी, 7 लाख 41 हजार करोड़ रुपये की, वहीं हमने 24 लाख 49 हजार करोड़ रु. की खरीद की है।

    श्री शिवराज सिंह ने कहा कि पिछले साल कर्नाटक की सरकार ने 2024-25 में तुअर खरीदने की बात की, तो हमने कर्नाटक की सरकार से 100 फीसदी खरीद की बाद कही। उन्होंने 100% नहीं, बल्कि केवल 25% की स्वीकृति की मांग की। तब हमने 25% की स्वीकृति दी, लेकिन उतनी खरीद भी नहीं हो पाई। हमने स्वीकृति दी 3,06,150 MT की और कर्नाटक की सरकार ने खरीदी 2,16,303 MT, जो गारंटी है, उससे भी कम। श्री शिवराज ने कहा कि किसानों का कल्याण करना ही हमारा एकमात्र फॉर्मूला है। किसानों को उत्पाद के ठीक दाम देना हमारा संकल्प है और किसानों के हित में इस संकल्प को हम अवश्य पूरा करेंगे।

    योग, डिज़ाइन और डिजिटल लर्निंग के संग केटीएस 4.0 के चौथे दिन बच्चों का उत्साह चरम पर रहा

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    काशी तमिल संगमम् 4.0 के चौथे दिन कार्यक्रम की थीम तमिल करकलाम (तमिल सीखें) के अनुरूप नेशनल बुक ट्रस्ट (एनबीटी), इंडिया द्वारा बच्चों के लिए कई शिक्षाप्रद और रचनात्मक गतिविधियाँ आयोजित की गईं। दिनभर चले इन सत्रों ने बच्चों में स्वास्थ्य जागरूकता, रचनात्मक सोच और डिजिटल सीख को प्रोत्साहित किया।

    दिन की शुरुआत प्रशिक्षक आशीष द्वारा आयोजित योग सत्र “चलो, योग करें” से हुई, जिसमें बच्चों ने ऊर्जा, संतुलन और एकाग्रता बढ़ाने वाले विभिन्न योगासन सीखे। इसके बाद “आओ, पुस्तक का कवर डिजाइन करें” प्रतियोगिता ने बच्चों की कल्पनाशक्ति और कला कौशल को मंच दिया। बच्चों ने रंगों और रचनात्मक विचारों से अनोखे पुस्तक कवर बनाकर सबका ध्यान आकर्षित किया।

    इसके साथ ही  राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय  का परिचय सत्र भी आयोजित किया गया, जिसमें बच्चों को ई-बुक्स, डिजिटल पठन संसाधन और ऑनलाइन पुस्तकालय के उपयोग की जानकारी दी गई। एनबीटी द्वारा संचालित इन गतिविधियों ने काशी तमिल संगमम् के चौथे दिन को बच्चों के लिए शिक्षाप्रद, मनोरंजक और प्रेरणादायक बना दिया।

    भारत-मलेशिया राजस्थान में संयुक्त सैन्य प्रशिक्षण अभ्यास में भाग लेंगे

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    संयुक्त सैन्य अभ्यास “अभ्यास हरिमौ शक्ति-2025” का पांचवां संस्करण आज राजस्थान के महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में शुरू हुआ। यह अभ्यास 5 से 18 दिसंबर 2025 तक चलेगा।

    भारतीय दल का प्रतिनिधित्व मुख्यतः डोगरा रेजिमेंट की टुकडि़यां कर रही हैं। मलेशियाई पक्ष का प्रतिनिधित्व रॉयल मलेशियाई सेना की 25 वीं बटालियन की टुकडि़यां कर रही हैं।

    इस अभ्यास का उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र अधिदेश के अध्याय VII के अंतर्गत उप-पारंपरिक अभियानों का संयुक्त रूप से पूर्वाभ्यास करना है। इस अभ्यास का उद्देश्य आतंकवाद-रोधी अभियानों के दौरान संयुक्त प्रतिक्रियाओं का समन्वय करना है। दोनों पक्ष घेराबंदी, खोज और विध्‍वंस अभियानों, हेलीबोर्न अभियानों आदि जैसी सामरिक कार्रवाइयों का अभ्यास करेंगे। इसके अतिरिक्त, आर्मी मार्शल आर्ट्स रूटीन (एमएआप), कॉम्बैट रिफ्लेक्स शूटिंग और योग भी अभ्यास पाठ्यक्रम का हिस्सा होंगे।

    हरिमौ शक्ति – 2025 अभ्यास में, दोनों पक्ष आतंकवाद-रोधी अभियानों के दौरान हेलीपैड सुरक्षित करने और हताहतों को निकालने के लिए अभ्यास करेंगे। सामूहिक प्रयासों का उद्देश्य सैनिकों के बीच बेहतर अंतर-संचालन क्षमता प्राप्त करना और शांति वाहक प्रचालनों के दौरान संयुक्त राष्ट्र के हितों और कार्यसूची को सर्वोपरि रखते हुए जान-माल के जोखिम को कम करना है।

    दोनों पक्ष युद्ध कौशल के व्यापक क्षेत्र पर विचारों और संयुक्त अभ्यासों के अभ्यासों का आदान-प्रदान करेंगे जिससे प्रतिभागियों को एक-दूसरे से सीखने का अवसर मिलेगा। सर्वोत्तम अभ्यासों को साझा करने से भारतीय सेना और रॉयल मलेशियाई सेना के बीच रक्षा सहयोग का स्तर और बढ़ेगा। यह अभ्यास दोनों देशों के बीच मज़बूत द्विपक्षीय संबंधों को भी बढ़ावा देगा।

    भारत और रूस द्विपक्षीय कृषि व्यापार को बढ़ाने, खाद्यान्न और बागवानी निर्यात में नए अवसरों की खोज करने पर सहमत

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    केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान नdh 4 दिसंबर, 2 को कृषि भवन में रूसी संघ की कृषि मंत्री सुश्री ओक्साना लुट के साथ द्विपक्षीय बैठक में दोनों पक्षों ने मौजूदा सहयोग पर चर्चा की और भविष्य के सहयोग के क्षेत्रों की रूपरेखा तैयार की।

    भारत और रूस द्विपक्षीय कृषि व्यापार को बढ़ाने, खाद्यान्न और बागवानी निर्यात में नए अवसरों की खोज करने पर सहमत

    कृषि वस्तुओं का व्यापार बढ़ाने के लिए दोनों पक्षों ने भारत से खाद्यान्न और बागवानी उत्पादों के निर्यात की संभावनाओं का पता लगाया।

    बैठक के दौरान, कृषि अनुसंधान, नवाचार और क्षमता निर्माण में सहयोग को मजबूत करने के लिए आईसीएआर और फेडरल सेंटर फॉर एनिमल हेल्‍थ, रूस के बीच एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए।

    श्री चौहान ने रूसी पक्ष को अगले वर्ष भारत द्वारा आयोजित ब्रिक्स देशों के कृषि मंत्रियों की बैठक में भाग लेने के लिए भी आमंत्रित किया।

    दोनों देशों ने कृषि व्यापार, उर्वरकों, बीजों, बाज़ार पहुंच और संयुक्त अनुसंधान में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई और नवाचार को बढ़ावा देने तथा दोनों देशों के किसानों को लाभ पहुंचाने के लिए अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। सुश्री लुट ने कृषि क्षेत्र में व्यापार बढ़ाने और सहयोग मजबूत करने में गहरी रुचि दिखाई।

    कृषि मंत्री के अलावा, रूसी प्रतिनिधिमंडल में डिप्‍टी मिनिस्‍टर श्री मैक्सिम मार्कोविच, डिप्‍टी मिनिस्‍टर सुश्री मरीना अफोनिना, एफएसवीपीएस के प्रमुख श्री सर्गेई डंकवर्ट और एशिया प्रभाग की निदेशक श्रीमती डारिया कोरोलेवा शामिल थे।

    भारत का प्रतिनिधित्व कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के सचिव श्री देवेश चतुर्वेदी, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के सचिव श्री एम.एल. जाट और उर्वरक विभाग के सचिव श्री रजत कुमार मिश्र, विदेश मंत्रालय के प्रतिनिधि , कृषि एवं किसान कल्‍याण विभाग के संयुक्त सचिव तथा अन्य वरिष्ठ अधिकारी कर रहे थे।