सब्सक्रिप्शन के लिए खुला इंडो एसएमसी का आईपीओ

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16 तक लगा सकेंगे बोली

नई दिल्ली, 13 जनवरी (हि.स.)। इंडस्ट्रियल सेक्टर के लिए इलेक्ट्रिकल प्रोडक्ट बनाने वाली कंपनी इंडो एसएमसी का 91.95 करोड़ रुपये का आईपीओ आज सब्सक्रिप्शन के लिए लॉन्च कर दिया गया। इस आईपीओ में 16 जनवरी तक बोली लगाई जा सकती है। इश्यू की क्लोजिंग के बाद 19 जनवरी को शेयरों का अलॉटमेंट किया जाएगा, जबकि 20 जनवरी को अलॉटेड शेयर डीमैट अकाउंट में क्रेडिट कर दिए जाएंगे। कंपनी के शेयर 21 जनवरी को बीएसई के एसएमई प्लेटफॉर्म पर लिस्ट हो सकते हैं।

इस आईपीओ में बोली लगाने के लिए 141 रुपये से लेकर 149 रुपये प्रति शेयर का प्राइस बैंड तय किया गया है, जबकि लॉट साइज 1,000 शेयर का है। इंडो एसएमसी के इस आईपीओ में रिटेल इनवेस्टर्स दो को लॉट यानी 2,000 शेयरों के लिए बोली लगा सकते हैं, जिसके लिए उन्हें 2,98,000 रुपये का निवेश करना होगा। इस आईपीओ के तहत 10 रुपये फेस वैल्यू वाले कुल 61.71 लाख नए शेयर जारी हो रहे हैं।

आईपीओ खुलने से एक कारोबारी दिन पहले 12 जनवरी को इंडो एसएमसी ने 11 एंकर इनवेस्टर्स से 26.16 करोड़ रुपये जुटाए। इन एंकर इनवेस्टर्स में बंगाल फाइनेंस एंड इनवेस्टमेंट प्राइवेट लिमिटेड सबसे बड़ा इनवेस्टर रहा। इसने कंपनी से अपर प्राइस लिमिट 149 रुपये प्रति शेयर की दर से 3.05 लाख शेयर खरीदे हैं। इसी तरह 360 वन एलवीएफ ट्रेजरी सॉल्यूशंस फंड कंपनी से 1.18 लाख शेयर खरीद कर दूसरा सबसे बड़ा एंकर इनवेस्टर बना है।

इस आईपीओ में क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल बायर्स (क्यूआईबी) के लिए 47.45 प्रतिशत हिस्सा रिजर्व किया गया है। इसके अलावा रिटेल इनवेस्टर्स के लिए 33.25 प्रतिशत हिस्सा, नॉन इंस्टीट्यूशनल इनवेस्टर्स (एनआईआई) के लिए 14.29 प्रतिशत हिस्सा और मार्केट मेकर्स के लिए 5.01 प्रतिशत हिस्सा रिजर्व है। इस इश्यू के लिए जीवाईआर कैपिटल एडवाइजर्स प्रा.लि. को बुक रनिंग लीड मैनेजर बनाया गया है, जबकि केफिन टेक्नोलॉजी लिमिटेड को रजिस्ट्रार बनाया गया है। वहीं गिरिराज स्टॉक ब्रोकिंग प्रा.लि. और निकुंज स्टॉक ब्रोकर्स लिमिटेड कंपनी के मार्केट मेकर हैं।

कंपनी की वित्तीय स्थिति की बात करें तो कैपिटल मार्केट रेगुलेटर सेबी के पास जमा कराए गए ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (डीआरएचपी) में किए गए दावे के मुताबिक इसकी वित्तीय सेहत में लगातार मजबूती आई है। वित्त वर्ष 2022-23 में कंपनी को 46 लाख रुपये का शुद्ध लाभ हुआ था, जो अगले वित्त वर्ष 2023-24 में बढ़ कर तीन करोड़ रुपये हो गया। वित्त वर्ष 2024-25 में कंपनी का शुद्ध लाभ उछल कर 15.44 करोड़ रुपये रह गया। मौजूदा वित्त वर्ष की पहली छमाही यानी अप्रैल से सितंबर 2025 में कंपनी को 11.46 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ हो चुका है।

इस दौरान कंपनी की राजस्व प्राप्ति में भी लगातार बढ़ोतरी होती रही। वित्त वर्ष 2022-23 में इसे 7.30 करोड़ का कुल राजस्व प्राप्त हुआ, जो वित्त वर्ष 2023-24 में बढ़ कर 28.06 करोड़ और वित्त वर्ष 2024-25 में उछल कर 138.78 करोड़ रुपये के स्तर पर आ गया। मौजूदा वित्त वर्ष की पहली छमाही यानी अप्रैल से सितंबर 2025 में कंपनी को 112.62 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हो चुका है।

इस अवधि में कंपनी के कर्ज में भी लगातार बढ़ोतरी हुई। वित्त वर्ष 2022-23 के अंत में कंपनी पर 10.43 करोड़ रुपये के कर्ज का बोझ था, जो वित्त वर्ष 2023-24 में बढ़ कर 17.70 करोड़ रुपये और वित्त वर्ष 2024-25 में उछल कर 35.76 करोड़ रुपये के स्तर पर आ गया। मौजूदा वित्त वर्ष की पहली छमाही के अंत यानी 30 सितंबर तक कंपनी पर लदे कर्ज का बोझ 49.35 करोड़ रुपये के स्तर पर आ गया।

इस अवधि में कंपनी के रिजर्व और सरप्लस में भी बढ़ोतरी हुई। वित्त वर्ष 2022-23 में ये 52 लाख रुपये के स्तर पर था, जो 2023-24 में बढ़ कर 5.06 करोड़ रुपये हो गया। इसी तरह 2024-25 में कंपनी का रिजर्व और सरप्लस 19 करोड़ रुपये के स्तर पर आ गया। वहीं मौजूदा वित्त वर्ष की पहली छमाही यानी अप्रैल से सितंबर 2025 तक ये 30.46 करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच गया।

इसी तरह ईबीआईटीडीए (अर्निंग बिफोर इंट्रेस्ट, टैक्सेज, डिप्रेशिएशंस एंड एमॉर्टाइजेशन) 2022-23 में 1.15 करोड़ रुपये के स्तर पर था, जो 2023-24 में बढ़ कर 5.08 करोड़ रुपये हो गया। साल 2024-25 में कंपनी का ईबीआईटीडीए उछल कर 22.83 करोड़ रुपये के स्तर पर आ गया। वहीं मौजूदा वित्त वर्ष की पहली छमाही के अंत यानी सितंबर 2025 तक ये 17.19 करोड़ रुपये के स्तर पर था।

हरिद्वार से भुवनेश्वर तक उड़ान भरती बेटियों की उम्मीदें

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हरिद्वार, 13 जनवरी (हि.स.)। उत्तराखंड की बालिकाओं की अंडर-15 सब-जूनियर रग्बी टीम ने नेशनल रग्बी प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए भुवनेश्वर, ओडिशा के लिए मंगलवार काे रुड़की रेलवे स्टेशन से प्रस्थान किया। खिलाड़ियों के जोश और आत्मविश्वास से भरे इस पल ने खेल प्रेमियों का मन उत्साह से भर दिया।

इस अवसर पर उत्तराखंड रग्बी संघ के प्रदेश अध्यक्ष सूर्यकांत सैनी, उत्तराखंड रग्बी एसोसिएशन के कोषाध्यक्ष एवं कोच आयुष सैनी, साहिल नेगी, फिटनेस ट्रेनर आकाश सिंह नेगी एवं वासु विशेष रूप से उपस्थित रहे। सभी पदाधिकारियों व प्रशिक्षकों ने टीम को शुभकामनाएं देते हुए हरी झंडी दिखाकर रवाना किया।

मौजूद गणमान्य व्यक्तियों ने खिलाड़ियों का हौसला बढ़ाते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य और शानदार प्रदर्शन की कामना की। पूरे प्रदेश को इन बेटियों से बेहतरीन खेल और पदक जीतने की उम्मीद है। उत्तराखंड की बेटियां मैदान में उतरेंगी पूरे जोश के साथ, देश को दमखम उनका दिखेगा।

रक्तहीन क्रांति के 105 साल

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प्रयाग पाण्डे

भारत की आजादी के लिए हुए जन संघर्षों की विस्तृत शृंखला में 14 जनवरी, 1921 की तारीख को नहीं भुलाया जा सकता । इसी रोज उत्तराखंड की जनता ने अहिंसक सामूहिक प्रतिरोध के बूते न केवल सर्वशक्तिमान ब्रिटिश सत्ता को घुटनों के बल ला दिया, बल्कि पिछले लंबे समय से चली आ रही कुली-बेगार जैसी अमानुषिक कुप्रथा से मुक्ति पा ली थी। उत्तराखंड में कुली-बेगार उन्मूलन आंदोलन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के भारत में प्रारंभ किए गए असहयोग आंदोलन के रूप में अभिव्यक्त हुआ और पूर्णतः सफल रहा। उत्तराखंड को गोरखा सैनिक शासन के जुल्मी शिकंजे से मुक्त करा कर अंग्रेजों ने 1815 में यहां अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया था। ब्रिटिश राज कायम होने के बाद बेशक हरिद्वार का ‘दास बाजार’ धीरे-धीरे कमजोर पड़ा, लेकिन अंग्रेज यहां के पूर्ववर्ती राजाओं की भांति गांवों के प्रधानों/ पटवारियों के माध्यम से इस क्षेत्र के काश्तकारों से कुलियों का काम अनवरत लेते रहे। 1815 में यहां ईष्ट इंडिया कंपनी और 1858 में ब्रिटिश शासनकाल में यह कुप्रथा उत्तराखंड के भोले – भाले ग्रामीण काश्तकारों के अपमान और शोषण का औजार बन गई थी। 1863 -73 के दसवें भूमि बंदोबस्त में जे.ओ.बी. बेकट ने बड़ी चालाकी से कुली – बेगार, कुली – उतार और कुली – बर्दायश को भूमि बंदोबस्ती इकरारनामों का हिस्सा बना दिया था।

कुली- बेगार कुप्रथा के तहत यहां के प्रत्येक जमींदार, हिस्सेदार और आसामी को सरकार ने कुली का दर्जा दिया था। जिनके पास भी काश्तकारी की जमीन हो, वे सभी कुली कहलाते थे। भूमिहीन इस कलंक से मुक्त थे। तब पहाड़ में भूमिधर होना सम्मान की नहीं बल्कि ‘कुली’ होने का अभिशाप था। यह कुख्यात कुली प्रथा तीन चरणों में विभक्त थी, जिसे कुली – उतार, कुली – बेगार और कुली- बर्दाश्त कहा जाता था। अंग्रेज साहबों के दौरों और सैर-सपाटों के वास्ते पटवारी कुलियों की मांग तथा कुली बर्दाश्त का रूक्का प्रधानों/ थोकदारों को भेजते थे। कुली -उतार के तहत सरकारी आदेश पर लोगों को सामान ढोने के लिए गांव से उतर कर सड़क में बने पड़ावों में एकत्र होना पड़ता था। दौरे पर आने वाले पुलिस, प्रशासन, जंगलात विभाग एवं सेना के अधिकारियों, सैलानियों, सर्वे दलों और अंग्रेज काश्तकारों का सारा सामान, यहां तक कि कमोड, जूते और ऐसी सामग्री ढोने को मजबूर किया जाता था, जिससे यहां की धर्मभीरु जनता की धार्मिक भावनाएं आहत होती हों। स्कूल, सड़कें, पुल, डाक बंगले और वन विभाग की चौकियां आदि सार्वजनिक उपयोग के निर्माण कार्य भी बेगार द्वारा कराए जाते थे। साहब लोगों के रहने के लिए मुफ्त में टेंट गाड़ना, पानी भरना, उनके जूठे बर्तन साफ करना, उनके घोड़ों के लिए घास और जलावन के लिए ईंधन की व्यवस्था करना आदि छोटे-मोटे काम कुली- बेगार कहलाते थे। जबकि कुली- बर्दाश्त कुप्रथा रसद से जुड़ी थी। इसके अंतर्गत साहब लोगों के दौरों के दौरान पटवारी गांव वालों से घास, लकड़ी, कोयला, अन्न, घी, दूध – दही, अंडा-मुर्गा, दालें, सब्जी, बर्तन और अन्य खाद्य सामग्री मुफ़्त अथवा नाममात्र की कीमत पर लेते थे।

पहाड़ के प्रत्येक गांव में कुली रजिस्टर बनते थे, इन रजिस्टरों में ‘कुलियों’ के नाम कटते और जुड़ते रहते थे। हरेक गांव में कुलियों की संख्या निर्धारित थी। सरकारी आज्ञा पर इन्हें निर्धारित कुली पड़ावों में हर हालत में हाज़िर होना पड़ता था। व्यक्तिगत अथवा पारिवारिक सुख-दुःख, प्रतिकूल मौसम और तीज- त्यौहार, किसी भी परिस्थिति में कुली को बारी से छूट नहीं मिलती थी। बोझा नहीं ढोने वालों को अर्थदंड देना पड़ता था। अंग्रेज साहबों की सुविधा के लिए बेगारी देना उत्तराखंड के लोगों विशेषकर ग्रामीण काश्तकारों के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी था। इस अमानुषिक कुप्रथा से संपूर्ण उत्तराखंड की जनता त्रस्त थी। अपमान सहने को विवश थी। उत्तराखंड में प्रचलित इस अमानुषिक व्यवस्था के विरुद्ध अतीत में अनेक बार विरोध के छुटपुट स्वर मुखरित होते रहे, लेकिन कोई बड़ा जनांदोलन खड़ा नहीं हो पाया था। 1913 में बदरी दत्त पाण्डे ने ‘अल्मोड़ा अखबार’ के संपादक का दायित्व संभाला। इसके बाद उन्होंने इस प्रथा के विरुद्ध लिखना शुरू किया। बदरी दत्त पाण्डे ने लाला चिरंजीलाल और लक्ष्मीदत्त त्रिपाठी के साथ ग्रामीण क्षेत्रों का भ्रमण कर इस कुप्रथा के विरुद्ध जन जागरण अभियान की शुरुआत की।

1904 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस प्रथा को नियम विरुद्ध और गैर कानूनी करार दिया। व्यवस्थापिका सभा में भी इस प्रथा के विरोध में प्रस्ताव पारित हुआ। बावजूद इसके तब उत्तराखंड में तैनात मनबढ़ अंग्रेज अधिकारियों ने इस व्यवस्था को कायम रखा। यही नहीं 1913 में अल्मोड़ा के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर ने अल्मोड़ा शहरवासियों को भी कुली उतार देने के आदेश जारी कर दिए। बोझा नहीं ढोने वालों के ऊपर प्रतिवर्ष दो रुपया कुली-कर लगा दिया गया। रायबहादुर तारा दत्त गैरोला ने प्रांतीय कौंसिल में इस व्यवस्था के विरुद्ध आवाज उठाई, लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। इस विषय में ब्रिटिश पार्लियामेंट में भी चर्चा हुई। ब्रिटिश पार्लियामेंट में तत्कालीन भारत मंत्री ने यह कह कर अपना पल्ला झाड़ लिया कि यह व्यवस्था अंग्रेजों ने कायम नहीं की है, इसलिए इसे हटाने का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता। कालांतर में भारत मंत्री के इस वक्तव्य का उत्तराखंड की जनता ने ऐसा प्रतिउत्तर दिया, जिसकी मिसाल दुनिया के इतिहास में कम ही पाई जाती है।

1916 में नैनीताल में कुमाऊं परिषद का गठन हुआ। तब कुमाऊं परिषद को ‘कुमाऊं की कांग्रेस’ कहा जाता था। इसी साल कुमाऊं परिषद का अल्मोड़ा में पहला अधिवेशन हुआ। इस अधिवेशन में कुली-बेगार कुप्रथा के विरोध में प्रस्ताव पास हुआ। इसके बाद गोविंद बल्लभ पन्त, हरगोविंद पन्त और बदरी दत्त पाण्डे ने कुली बेगार व्यवस्था के विरोध में गांव-गांव जन सभाएं करनी प्रारंभ कर दी। 1918 में कुमाऊं परिषद का हल्द्वानी में सम्मेलन हुआ। सम्मेलन की अध्यक्षता रायबहादुर तारा दत्त गैरोला ने की। इस सम्मेलन में ब्रिटिश सरकार को दो साल के भीतर कुली-बेगार प्रथा को बंद करने का नोटिस देने का निर्णय लिया गया। नोटिस में कहा गया कि यदि तय समयावधि में इस प्रथा को नहीं हटाया गया तो उत्तराखंड की जनता सत्याग्रह करेगी। इसी के साथ कुली- बेगार प्रथा के विरुद्ध गांव-गांव जन जागरण अभियान शुरू हो गया।

इसी कालखंड में भारत के राजनैतिक क्षितिज में महात्मा गांधी का पदार्पण हुआ। भारत की राजनीति में गांधी युग की शुरुआत हुई। 1918 में बदरीदत्त पाण्डे कोलकाता गए, वहां उन्होंने महात्मा गांधी से भेंट की और उन्हें उत्तराखंड के इस कुली कलंक से अवगत कराया। 1920 में हरगोविंद पन्त की अध्यक्षता में कुमाऊं परिषद का काशीपुर में अधिवेशन हुआ। अधिवेशन में कुली – उतार उन्मूलन का संकल्प पारित हुआ। इसी साल दिसंबर में कांग्रेस का नागपुर में अधिवेशन हुआ। इस अधिवेशन में बदरीदत्त पाण्डे, भुवनेश्वर पाण्डे, हरगोविंद पन्त, लाला चिरंजीलाल, लक्ष्मण दत्त भट्ट एवं शिवनंदन पाण्डे आदि पहाड़ के 22 नेता नागपुर गए। इन नेताओं ने गांधी जी से अल्मोड़ा आने का आग्रह किया। गांधी जी ने कहा: ‘भाई मुझे बहुत काम है। मेरे कुर्मांचली भाइयों से कह दें कि कुली देना नहीं होता है।’ एक अगस्त,1920 से गांधी जी ने ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध देशव्यापी असहयोग आंदोलन शुरू कर दिया था। उत्तराखंड में असहयोग आंदोलन कुली-बेगार विरोधी आंदोलन के रूप में अभिव्यक्त हुआ। 10 जनवरी,1921 को बदरी दत्त पाण्डे, हरगोविंद पन्त एवं लाला चिरंजीलाल के नेतृत्व में पचास नवयुवकों का दल बागेश्वर को कूच कर गया। 12 जनवरी की रात तक बागेश्वर में हजारों लोग एकत्र हो गए। इसी बीच अल्मोड़ा के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर डब्ल्यू.सी. डाइबिल भी 21 अंग्रेज अधिकारियों और पचास सशत्र पुलिस जवानों के साथ बागेश्वर पहुंच गए थे।

बागेश्वर में विशाल जनसभा हुई, जिसमें पचास हजार से अधिक लोग सम्मिलित हुए।सभा में महात्मा गांधी जी के जयकारे लगे और उन्हें अवतार बताया गया। कुली – बेगार आंदोलन के अन्य नेताओं के अलावा मोहन सिंह मेहता, रामदत्त, जीत सिंह एवं पुरुषोत्तम आदि ने इस विशाल जनसभा को संबोधित किया। सभा में मौजूद सभी लोगों ने मकर संक्रांति के दिन भगवान बागनाथ जी के मंदिर में कुली-बेगार नहीं देने की शपथ ली। सरयू नदी के पवित्र जल को अंजलि में लेकर कुली-बेगार से मुक्ति का संकल्प लिया। सभी प्रधान और मालगुजारों ने कुली -बेगार के रजिस्टर सरयू नदी के पवित्र जल में प्रवाहित कर दिए। कुली-बेगार आंदोलन सफल हुआ। अपार जनशक्ति के सामने अत्याचारी अंग्रेज शासक बौने साबित हुए। बागेश्वर राष्ट्रीय जागृति का केंद्र बन गया। कुली -बेगार आंदोलन की इस सफलता के बाद यहां की जनता ने बड़ी श्रद्धा एवं कृतज्ञता के साथ बदरी दत्त पाण्डे जी को ‘कुमाऊं केसरी’ की उपाधि से विभूषित किया।

महात्मा गाधी के पौत्र एवं साबरमती सत्याग्रहाश्रम के साधक प्रभुदास गांधी ने कुली-बेगार आंदोलन के बारे में लिखा था- ”गांधी जी ने सन 1920 में नागपुर की कांग्रेस में विदेशी सरकार का अन्याय और उत्पीड़न मिटाने के लिए आत्म बल का प्रयोग करने की बात कही थी और शांतिमय असहकार का मंत्र दिया था। किंतु उन्होंने उस समय अपने किसी दूत को अल्मोड़ा भेजा नहीं था। पहाड़ की जुझारू जनता ने शांत, असहयोग के युद्ध की विद्या गांधी जी के नाम पर स्वयं ही सीख ली और रक्तपात की एक भी घटना अपनी ओर से पैदा न होने देने की सावधानी रखते हुए जी-जान से उन्होंने बड़े-बड़े अधिकारियों से मोर्चा लिया। बागेश्वर के पास पुण्य सलिला सरयू में खड़े रह कर अंजलि से सूर्य भगवान को अर्ध्य चढ़ाते हुए, उन्होंने प्रतिज्ञा की कि मर जायेंगे, परन्तु बेगारी जुल्म को जरा भी बर्दाश्त नहीं करेंगे। इन सबका आत्म बल इतना ऊंचा सिद्ध हुआ कि तत्काल बेगारी के असुर को उत्तराखंड से विदा लेनी पड़ी। गांव-गांव में प्रत्येक घर के ऊपर बेगारी की बारी का जो क्रम बना हुआ था, उस क्रम वाली बहियों को सरयू जल में समाधि दे दी गई और ब्रिटिश सेना के गोरे सैनिकों का अत्याचार भी बेगारी को पुनः चालू नहीं करा सका। इस प्रकार भयानक पशुबल के सामने पहाड़ी भाइयों के आत्मबल ने शत प्रतिशत विजय पाई।”

(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

जिन्ना विभाजन का खलनायक−कांग्रेस की नजर में आज भी है‘जी’

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भारत के स्वतंत्रता संग्राम और विभाजन का इतिहास आज की हर देश भक्‍त को दर्द से भर देता है। मध्‍य प्रदेश के इंदौर में युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष उदय भानु चिब द्वारा दिए गए बयान ने इसी इतिहास को एक बार फिर बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान स्वतंत्रता संग्राम के नेताओं का उल्लेख करते हुए ‘जिन्ना’ को सम्मानसूचक भाषा में याद करना वास्‍तव में शब्दों की चूक नहीं माना जा सकता। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इसे देश की स्‍वाधीनता के बलिदानियों के बलिदान का अपमान बताते हुए कांग्रेस की मानसिकता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। वस्‍तुत: यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह कांग्रेस के ऐतिहासिक फैसलों, उसकी वैचारिक दिशा और विभाजन की त्रासदी में उसकी भूमिका को फिर से कठघरे में लाता है।

क्‍या यह भुलाया जा सकता है कि जिन्ना 1947 के विभाजन के मुख्य प्रतीक और सूत्रधार थे? ऐसे व्यक्ति को “महापुरुष” जैसी भाषा में याद करना उन लाखों लोगों के घावों को कुरेदने जैसा है, जिन्होंने विभाजन के दौरान अपना घर, परिवार और जीवन खो दिया। निश्‍चित ही भाजपा नेता आशीष ऊषा अग्रवाल ने सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को जोरदार ढंग से उठाया है। उनका ये कहना, “पहले ओसामा जी, अब जिन्ना जी- यह कांग्रेस की सोच का आईना है।” वास्‍तव में इस सोच को देखकर आज यही कहना उचित होगा कि कांग्रेस की राजनीति में राष्ट्र पहले नहीं, बल्कि तुष्टिकरण और वैचारिक भ्रम सबसे पहले आता है।

आज हम यदि भारत विभाजन और इतिहास के आइने में देखें तो फिर से ये साफ हो जाता है कि जिन्ना का राजनीतिक जीवन विभाजनवादी था। आर.सी. मजूमदार अपनी ऐतिहासिक कृति The History and Culture of the Indian People में लिखते हैं कि 1937 के बाद जिन्ना ने मुस्लिम समुदाय के भीतर असुरक्षा और भय की भावना को राजनीतिक हथियार बनाया। यहीं से दो-राष्ट्र सिद्धांत को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाया गया। यह सिद्धांत इस विचार पर आधारित था कि हिंदू और मुस्लिम अलग-अलग राष्ट्र हैं और साथ नहीं रह सकते। यह अवधारणा भारत की साझा संस्कृति और इतिहास को नकारती थी, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को भी गहरा करती थी।

1940 का लाहौर प्रस्ताव इस दिशा में निर्णायक कदम साबित हुआ। बिपिन चंद्र अपनी पुस्तक India’s Struggle for Independence में लिखते हैं कि यह प्रस्ताव भारत के एकीकृत राष्ट्रवाद पर सीधा हमला था। जिन्ना ने इसे मुस्लिमों के राजनीतिक अधिकारों की रक्षा का माध्यम बताया, लेकिन वास्तव में यह विभाजन की औपचारिक घोषणा थी। इसके बाद की राजनीति में समझौते की संभावनाएं लगातार कमजोर होती गईं।

विभाजन की ओर बढ़ते कदमों में सबसे भयावह अध्याय 16 अगस्त 1946 का ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ था। जिन्ना द्वारा घोषित इस आंदोलन का उद्देश्य ब्रिटिश सरकार और कांग्रेस पर पाकिस्तान की मांग स्वीकार करने का दबाव बनाना था। रामचंद्र गुहा ने अपनी पुस्तक India After Gandhi में जानकारी दी है कि ‘इस दिन की हिंसा ने यह स्पष्ट कर दिया कि जिन्ना की राजनीति अब संवाद नहीं, टकराव और हिंसा के रास्ते पर चल पड़ी थी। कलकत्ता से शुरू हुई हिंसा ने पूरे देश में आग की तरह फैलकर हजारों लोगों की जान ले ली।’

यहां कांग्रेस की भूमिका भी सवालों के घेरे में आती है। स्वतंत्रता आंदोलन की अगुआ कांग्रेस विभाजन को रोकने में क्यों असफल रही? ए.जी. नूरानी (The Muslim League and the Partition of India) के अनुसार, कांग्रेस नेतृत्व जिन्ना की हठधर्मिता और ब्रिटिश सरकार की “फूट डालो और राज करो” नीति का सही आकलन नहीं कर पाया। कैबिनेट मिशन योजना, जोकि भारत को एक रखने का अंतिम अवसर थी, आपसी अविश्वास और राजनीतिक अहंकार की भेंट चढ़ गई।

1947 में माउंटबेटन योजना के तहत विभाजन को स्वीकार करना कांग्रेस का सबसे विवादास्पद निर्णय माना जाता है। जसवंत सिंह अपनी पुस्तक Jinnah: India, Partition, Independence में इसलिए ही इन्‍हीं सब तथ्‍यों की गहराई से पड़ताल करते हैं और बताते हैं कि सत्ता हस्तांतरण की जल्दबाजी ने कांग्रेस नेतृत्व को दीर्घकालिक परिणामों पर गंभीर विचार करने से रोक दिया। सीमाओं का निर्धारण जल्दबाजी में हुआ, जिससे अभूतपूर्व नरसंहार और विस्थापन हुआ। इस संदर्भ में उर्वशी बुटालिया की पुस्‍तक (The Other Side of Silence) भी देखी जा सकती है जो विभाजन को इतिहास का सबसे बड़ा मानवीय विस्थापन बताती हैं। करीब डेढ़ करोड़ लोग अपने घरों से उजड़ गए और लाखों मारे गए। यह त्रासदी सिर्फ जिन्ना की जिद का परिणाम नहीं कही जा सकती है, वास्‍तव में यह तो कांग्रेस की राजनीतिक कमजोरियों और गलत आकलनों का भी नतीजा थी।

आज, जब यूथ कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा जिन्ना का उल्लेख सम्मानजनक शब्दों में किया जाता है, तब यह इतिहास के उन तमाम घावों को फिर से हरा कर देता है जोकि संघर्ष, बलिदान और समर्पण से भरा हुआ है, इसमें असंख्‍य मासूमों की चीखें है, जिसके लिए निश्‍चित ही कांग्रेस कभी अपने को अपराध से मुक्‍त नहीं कर सकती है, क्‍योंकि वही इसके लिए पूरी तरह से जिम्‍मेदार है, क्‍योंकि नेतृत्‍वकर्ता भी उस वक्‍त वही थी।

ऐसे में भाजपा नेताओं का कहना है कि यह कांग्रेस की वही पुरानी मानसिकता है, जो तुष्टिकरण के लिए ऐतिहासिक सच्चाइयों को धुंधला करती है, एक तरह से देखें तो आज पूरी तरह से सही नजर आता है। उसके आचरण से तो यही भाव झलकता है कि कांग्रेस अब भी विभाजन के सबक से नहीं सीख पाई है। फिर प्रश्न शब्दों का नहीं, सोच का भी है, जोकि भारतीय स्‍वाधीनता आन्‍दोलन के बलिदानियों के साथ जिन्ना को “इतिहास का मुख्‍य पात्र” बनाकर ‘जी’ के सम्‍बोधन के साथ पेश करती है।

ऐसे में स्‍वभाविक तौर पर एक बार फिर कांग्रेस की वैचारिक दिशा पर गंभीर प्रश्न खड़े होते दिखते हैं। ये तो सभी को समझना होगा कि जिन्ना का नाम भारतीय इतिहास में विभाजन, हिंसा और अलगाव से जुड़ा रहेगा, इसे कोई कभी नकार नहीं सकता है, क्‍योंकि जब तक इतिहास का अस्‍तित्‍व है। जिन्‍ना भारत के लिए एक खलनायक ही है । कांग्रेस यदि आज भी इस सच्चाई को स्वीकार करने और अपनी ऐतिहासिक भूलों पर ईमानदार आत्ममंथन करने से बचती है, तब फिर यही समझा जाए कि वह भारत से वास्‍तविक प्रेम नहीं करती। उसका आचरण देशभक्‍ति के संदर्भ में सिर्फ दिखावा है !

(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने बैठक कर दिया समन्वय का संदेश

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अयोध्या, 13 जनवरी (हि.स.)। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने अयोध्या प्रवास के दौरान सोमवार की रात्रि में अवध विश्विद्यालय के सभागार में उत्तर प्रदेश की क्षेत्रीय एवं संगठनात्मक बैठक की अध्यक्षता की। उन्होंने बताया कि इसमें उन्होंने आस्था और संगठन के समन्वय का संदेश दिया। बैठक के दौरान संगठनात्मक विषयों पर सार्थक चर्चा हुई। कार्यकर्ताओं से आत्मीय संवाद किया, उनके विचार और सुझाव सुने, जिससे संगठन को और अधिक मजबूत व गतिशील बनाने के हमारे संकल्प को नई ऊर्जा मिली।

इससे पूर्व भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने श्रीराम जन्मभूमि पहुंचकर श्रीराम लला के दर्शन किए और विधिवत पूजन-अर्चन कर प्रदेश की खुशहाली, संगठन की मजबूती तथा जनकल्याण की कामना की। मंदिर परिसर में उन्होंने श्रद्धापूर्वक शीश नवाया और कहा कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आदर्श सेवा, त्याग और कर्तव्यबोध उनके सार्वजनिक जीवन की प्रेरणा हैं।

नंदिनी माथुर का यूथ आइकन−पाथ ब्रेकर के रूप चयन

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उत्तर प्रदेश के जनपद बिजनौर जनपद की नंदिनी माथुर का चयन विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग 2026 में यूथ आइकन एवं पाथ ब्रेकर के रूप में हुआ है। यह प्रतिष्ठित राष्ट्रीय स्तर का आयोजन भारत सरकार के युवा कार्य एवं खेल मंत्रालय द्वारा 9 से 12 जनवरी 2026 तक भारत मंडपम, नई दिल्ली में आयोजित किया जा रहा है। जहाँ नंदिनी देश के प्रधानमंत्री की उपस्थिति में राष्ट्रीय मंच पर अपने विचार प्रस्तुत करेंगी।
​नंदिनी माथुर बनस्थली विद्यापीठ की विधि छात्रा हैं तथा अंतरराष्ट्रीय संबंधों की भी अध्ययनरत हैं। वे महिलाओं के अधिकारों, लैंगिक समानता और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में निरंतर कार्यरत हैं। इसके साथ ही वे UNICEF India की यूथ क्रिएटर भी हैं और जमीनी स्तर पर सामाजिक परिवर्तन हेतु सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
​केंद्रीय मंत्री एवं जनप्रतिनिधियों से सार्थक संवाद


इस विशेष अवसर पर नंदिनी ने भारत सरकार के श्रम एवं रोजगार तथा युवा कार्य एवं खेल मंत्री श्री मनसुख मांडविया से शिष्टाचार भेंट की और विभिन्न युवा केंद्रित मुद्दों पर संवाद किया। इसके साथ ही उन्होंने कई अन्य सांसदों (MPs) और विधायकों (MLAs) से भी मुलाकात कर सामाजिक न्याय और युवाओं की भागीदारी पर चर्चा की। अनुभवी राजनेताओं के साथ इस वार्ता ने उनके विजन को और मजबूती प्रदान की है।
​शोध, विश्लेषणात्मक सोच और प्रभावी अभिव्यक्ति नंदिनी की विशेष पहचान है। उनका उद्देश्य समान विचारधारा वाले व्यक्तियों और संगठनों के साथ मिलकर लैंगिक समानता, मानवाधिकार और सामाजिक न्याय को आगे बढ़ाना है।
​विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग 2026 में उनका चयन और राष्ट्रीय नेतृत्व के साथ उनका यह संवाद बिजनौर और उत्तर प्रदेश के युवाओं के लिए एक प्रेरणादायी उपलब्धि है।

इतिहास के पन्नों में 14 जनवरी :1761–पानीपत का तीसरा युद्ध

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इस तारीख यानी 14 जनवरी 1761 को हरियाणा के पानीपत के मैदान में भारत के इतिहास की सबसे निर्णायक लड़ाइयों में से एक, पानीपत का तीसरा युद्ध, लड़ा गया। यह युद्ध मराठा साम्राज्य और अफगान शासक अहमदशाह अब्दाली (अहमदशाह दुर्रानी) के बीच हुआ था। इस संघर्ष में मराठा सेना का नेतृत्व सदाशिवराव भाऊ कर रहे थे, जबकि अहमदशाह अब्दाली अफगान और उसके सहयोगी बलों के साथ मैदान में उतरा था।

यह युद्ध अत्यंत भीषण और रक्तरंजित रहा, जिसमें लाखों सैनिकों की जान गई। अंततः इस युद्ध में अहमदशाह अब्दाली की विजय हुई और मराठा शक्ति को भारी क्षति पहुंची। पानीपत की इस तीसरी लड़ाई ने उत्तर भारत की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया और मराठा साम्राज्य के विस्तार को अस्थायी रूप से रोक दिया। इतिहास में यह युद्ध शक्ति-संतुलन बदलने वाली घटना के रूप में जाना जाता है, जिसने आने वाले वर्षों में भारत के राजनीतिक परिदृश्य की दिशा तय की।

महत्वपूर्ण घटनाचक्र

1514 – पोप लियो एक्स ने दासता के विरुद्ध आदेश पारित किया।

1641 – यूनाइटेड ईस्ट इंडिया कंपनी ने मलक्का शहर पर विजय प्राप्त की।

1659 – एलवास के युद्ध में पुर्तगाल ने स्पेन को पराजित किया।

1758 – इंग्लैंड के सम्राट के एक अधिकार पत्र के तहत ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में कंपनी या सम्राट के खिलाफ किसी भी युद्ध में लूटे गये धन एवं सम्पत्ति को रखने का अधिकार मिला।

1758 – ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में लड़ाई में जीती हुई संपत्ति अपने पास रखने का अधिकार इंग्लैंड नरेश ने दिया।

1760 – फ्रांसीसी जनरल लेली ने पांडिचेरी अंग्रेज़ों के हवाले कर दिया।

1761 – पानीपत की तीसरी लड़ाई मराठों और अहमदशाह अब्दाली के बीच हुई।

1761 – भारत में मराठा शासकों और अहमदशाह दुर्रानी के बीच पानीपत का तीसरा युद्ध हुआ।

1809 – इंग्लैंड और स्पेन ने ‘नेपोलियन बोनापार्ट’ के खिलाफ गठबंधन किया।

1784 – अमरीका ने ब्रिटेन के साथ शांति संधि की पुष्टि की।

1858 – नेपोलियन तृतीय की हत्या की साजिश का भंडाफोड़ हुआ।

1867 – पेरू ने स्पेन के ख़िलाफ जंग का ऐलान किया।

1907 – जमैका में भूकंप से किंगस्टन शहर तबाह हो गया और एक हज़ार से अधिक लोग मारे गये।

1907 – जमायका में आये भूकम्प में करीब 1000 लोगों की मौत हो गई।

1912 – रेमंड पोंकारे फ्रांस के प्रधानमंत्री बने।

1918 – फ्रांस के पूर्व प्रधानमंत्री जोसेफ कैलाक्स को देशद्रोह के आरोप में गिरफ़्तार किया गया।

1950 – ईरान में मुहम्मद सईद ने सरकार का गठन किया।

1954 – जगदगुरु कृपालु महाराज ने 7 दिनों तक 500 हिन्दू विद्वानों के समक्ष भाषण दिया। उन्हें पाँचवाँ जगदगुरु चुना गया।

1962 – अल्जीरिया के शहरों में आतंकवादी हमलों में 6 लोग मारे गये।

1966 – इंडोनेशिया ने राष्ट्रसंघ स्थित अपना मिशन बंद कर दिया।

1966 – भारत के दक्षिणी राज्य मद्रास का नाम बदलकर तमिलनाडु किया गया।

1974 – विश्व फुटबाल लीग की स्थापना की गयी।

1975 – सोवियत संघ ने अमेरिका के साथ व्यापार समझौते को समाप्त किया।

1982 – इंदिरा गांधी ने 20 सूत्री कार्यक्रम की घोषणा की।

1985 – हुन सेन कंबोडिया के प्रधानमंत्री निर्वाचित।

1986 – मध्य अमेरिकी देश ग्वाटेमाला में संविधान लागू हुआ।

1986 – ग्वाटेमाला में विनिसियों केरजो 6 वर्षों में पहले असैनिक राष्ट्रपति बने।

1989 – इलाहबाद में बारह वर्ष बाद कुम्भ का मेला प्रारम्भ हुआ।

1992 – इजराइल ने जार्डन के साथ शांतिवार्ता शुरू की।

1992 – पौलैंड के एक जहाज के बाल्टिक सागर में डूब जाने से 54 लोग मारे गये।

1994 – यूक्रेन, रूस तथा संयुक्त राज्य अमेरीका द्वारा मास्को में परमाणु अस्त्र कम करने सम्बन्धी समझौते पर हस्ताक्षर।

1998 – पाकिस्तान में एक अफगान कार्गो जहाज के दुर्घटनाग्रस्त होने से करीब 50 लोगों की मौत हो गई।

1999 – भारत का पहला अत्याधुनिक ‘हवाई यातायात परिसर’, दिल्ली राष्ट्र को समर्पित किया गया।

1999 – बुलंट इसेविट तुर्की के नये प्रधानमंत्री नियुक्त।

2000 – कम्प्यूटर बादशाह बिल गेट्स ने स्टीव वाल्मर को विश्व की सबसे बड़ी कम्प्यूटर साफ्टवेयर कम्पनी सौंपी।

2001 – अल साल्वाडोर में भूकम्प, 234 लोग मारे गये।

2001 – मैच फ़िक्सिंग के प्रकरण में भारतीय सटोरिया संजीव चावला लंदन में गिरफ्तार व जमानत पर रिहा।

2002 – भारत के रक्षामंत्री जार्ज फर्नांडीज ने कहा कि आतंकवाद की समाप्ति के बाद ही सेना सीमा से हटेगी।

2002 – आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष में चीन भारत के साथ, न्यूयार्क में रक्षामंत्री जार्ज फ़र्नांडीस ने आतंकवाद की समाप्ति से पहले सीमा से भारतीय सेनाएं हटाने से इन्कार किया।

2005 – जम्मू – कश्मीर में दो मुठभेड़ों में पांच आतंकवादी मारे गये।

2007 – नेपाल में अंतरिम संविधान को मंजूरी मिली।

2008 – उत्तर प्रदेश शासन की निविदा मूल्यांकन कमेटी ने जेपी समूह को एक हजार किमी लम्बी ‘गंगा एक्सप्रेस वे योजना’ का काम सौंपने की संस्तृति की।

2008 – फ्रांस के मुख्य विपक्षी दल ने यूरोपीय संघ के पहले राष्ट्रपति पद के लिए पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर के नाम के प्रस्ताव को खारिज किया।

2009 – सरकार ने विदेशी पत्रों के फेसीमाइल (प्रति) संस्करणों से शत-प्रतिशत विदेशी निवेश को मंज़ूरी देने की घोषणा की।

2017- बिहार के पटना में गंगा नदी में नाव डूबने से कम से कम 24 लोगों की मृत्यु।

2020 – केरल सरकार ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। केरल नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जाने वाला पहला राज्य बना।

जन्म

1551 – अबुल फजल – मुगल काल में अकबर के नवरत्नों में से एक।

1804 – जॉन पार्क – मशहूर संगीतकार का जन्म हुआ।

1892 – डी. बी. देवधर – भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी थे, जिनके नाम पर क्रिकेट टूर्नामेंट ‘देवधर ट्रॉफी’ खेला जाता है।

1886 – मंगूराम – समाज सुधारक थे।

1896 – सी. डी. देशमुख, ब्रिटिश शासन के अधीन आई.सी.एस. अधिकारी और स्वतंत्रता के बाद भारत के तीसरे वित्त मंत्री।

1899 – ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह – ‘महावीर चक्र’ से सम्मानित भारतीय सैन्य अधिकारी थे।

1905 – दुर्गा खोटे, हिन्दी व मराठी फ़िल्मों की प्रसिद्ध अभिनेत्री।

1918 – सुधाताई जोशी – पुर्तग़ाली साम्राज्यवादियों से गोवा की मुक्ति के स्वतंत्रता संग्राम की प्रमुख नेता थीं।

1921 – बिन्देश्वरी दुबे – भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राजनीतिज्ञ तथा बिहार के मुख्यमंत्री थे।

1926 – महाश्वेता देवी – भारत की सामाजिक कार्यकर्ता और लेखिका।

1934 – दशरथ मांझी – एक ऐसे भारतीय व्यक्ति थे, जिन्हें ‘बिहार का माउंटेन मैन’ कहा जाता है।

1942 – योगेश कुमार सभरवाल – भारत के सर्वोच्च न्यायालय के 36वें भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश।

1950 – रामभद्राचार्य – एक हिंदू धर्मगुरु, शिक्षक, संस्कृत के विद्वान, बहुभाषाविद, लेखक, दार्शनिक व नाटककार हैं।

1951 – ओ. पन्नीरसेल्वम – भारतीय राजनीतिज्ञ, जो तमिलनाडु के भूतपूर्व छठे मुख्यमंत्री रहे हैं।

1967 – अमेरिकी अभिनेत्री एमिली वॉटसन का जन्म हुआ।

1977 – नारायण कार्तिकेयन – भारत के एकमात्र फ़ॉरमूला वन चालक।

निधन

1742 – एडमंड हैली, एक प्रसिद्ध खगोलशास्त्री।

2017 – सुरजीत सिंह बरनाला – पंजाब के राजनीतिक दल शिरोमणि अकाली दल के राजनीतिज्ञ तथा भूतपूर्व मुख्यमंत्री थे।

2024 – मुनव्वर राणा – भारतीय उर्दू कवि थे। उनकी कविता ‘शहदबा’ के लिए 2014 में ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ मिला था।

महत्वपूर्ण दिवस

-मकर संक्रांति।

-अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह दिवस (10 दिवसीय)।

-राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा सप्ताह (11 जनवरी- 17 जनवरी तक)।

उत्तराखंड के बागेश्वर में भूकंप के झटके,घरों से बाहर निकले लोग

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देहरादून, 13 जनवरी (हि.स.)। उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के बागेश्वर में आज सुबह 7:25 बजे भूकंप के झटके महसूस किए गए। रिक्टर पैमाने पर भूकंप की तीव्रता 3.5 मापी गई है। सुबह-सुबह भूकंप के झटके महसूस होने लोग घरों से बाहर निकल गए।

नेशनल सेंटर फॉर सिस्मोलॉजी के अनुसार, बागेश्वर में भूकंप का केंद्र था। जमीन के 10 किलोमीटर नीचे केंद्र होने के कारण लोगों को झटके महसूस हुए। भूकंप का असर बागेश्वर से 174 किलोमीटर दूर ऋषिकेश और 183 किलोमीटर दूर हरिद्वार तक महसूस किया गया। राज्य आपदा प्रधिकरण से मिली जानकारी के अनुसार भूकंप के बाद से स्थानीय प्रशासन को सतर्क कर दिया गया है। इससे किसी प्रकार के जान-माल के नुकसान की सूचना नहीं है। कुछ लोगों ने बताया कि झटकों के साथ गड़गड़ाहट जैसी आवाज सुनाई दी, जिससे डर और बढ़ गया।

प्रशासन स्थिति पर नजर बनाए हुए है। विशेषज्ञों के अनुसार कम तीव्रता का भूकंप आमतौर पर नुकसानदेह नहीं होता, लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों में सतर्कता बरतना जरूरी है। प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि वे घबराएं नहीं और किसी भी आपात स्थिति में स्थानीय प्रशासन से संपर्क करें।

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने विनय कटियार का हाथ जोड़कर किया स्वागत

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-अयोध्या में भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष का मेगा शो

अयोध्या, 13 जनवरी (हि.स.)। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष का अयोध्या में यह पहला आगमन था। पहली बार पार्टी में ऐसा जोश किसी प्रदेश अध्यक्ष के लिए दिखा। ऐसा नहीं कि कुर्मी बिरादरी से पंकज चौधरी पहले प्रदेश अध्यक्ष हैं। इससे पहले ओमप्रकाश सिंह विनय कटियार व स्वतंत्र देव सिंह प्रदेश अध्यक्ष रहे हैं। इनमें विनय कटियार तो वही हैं जो अयोध्या विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने का दावा कर भाजपा के गले की हड्डी बन चुके हैं।

सोहावल के कांटा में स्थित मां वैष्णो देवी महिला महाविद्यालय में प्रदेश अध्यक्ष के स्वागत में प्रदेश अध्यक्ष जिस अंदाज में विनय कटियार से मिले, उसने सभी को चौंका दिया। पर्दे के पीछे प्रदेश अध्यक्ष के स्वागत कार्यक्रम की व्यवस्था भाजपा नेता सत्य प्रकाश वर्मा पप्पू के हवाले रही जो महाविद्यालय प्रबंधन से जुड़े हैं। कटियार के नजदीकी लोगों में शामिल हैं।जिले में प्रदेश अध्यक्ष का स्वागत अभूतपूर्व हुआ। स्वागत के पीछे पार्टी का नजरिया चाहे पूर्वांचल में बिदके कुर्मी वोटो को साधने का रहा हो या फिर कोई अन्य। विनय कटियार राम मंदिर आंदोलन के नेता रहे हैं। तीन बार अयोध्या के सांसद हुए दो बार के राज्यसभा सदस्य होने के बावजूद वह केंद्रीय मंत्री तो कभी नहीं बने लेकिन उनका व्यक्तिव राष्ट्रीय परिचय को भी मोहताज नहीं रहा। इधर कटियार अयोध्या विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की अंगड़ाई लेने लगे हैं जो विधानसभा चुनाव के करीब आते आते केंद्रीय व प्रांतीय नेतृत्व दोनों के सामने संकट खड़ा करेगा। अयोध्या सीट से दो बार जीते विधायक वेद प्रकाश गुप्त तीसरी बार चुनाव लड़ने की तैयारी में स्वयं या पुत्र अमल गुप्त को लेकर हैं तो पूर्व सांसद लल्लू सिंह सांसद बनने से पहले पांच बार इसी सीट से विधायक रह चुके हैं। अयोध्या सीट से लोकसभा चुनाव हारने के बाद उनके भी विधानसभा चुनाव में किस्मत आजमाने की चर्चा धीरे-धीरे तेजी पकड़ने लगी है। वैसे तो टिकट के दावेदार कई है।विनय कटियार ने जिस तरह से दावेदारी की है, उसे अन्य दावेदारों का परेशान होना स्वाभाविक है। ऐसे में यह कटियार के लिए भी किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं। अगर पार्टी नेतृत्व उनको अयोध्या सीट से टिकट नहीं देता है तो उनके चाहने के बावजूद भी जिले में उनका सजातीय कुर्मी वोटर भाजपा के साथ रहेगा, यह कहना मुश्किल है। भाजपा के लिए यही वह समीकरण है जो कमजोर कड़ी बनने के साथ डंके की चोट पर कटियार के विधानसभा चुनाव में अयोध्या सीट से लड़ने के ऐलान को मजबूती देता है। यह वैसा धर्म संकट है जो कटियार को हाशिए पर धकेलने वालों को आने वाले दिनों में बहुत परेशान करेगा।

‘बलोचिस्तान में पाक की सेना के काफिले पर हमला ,छह जवान मरे’

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क्वेटा (बलोचिस्तान), 13 जनवरी (हि.स.)। बलोचिस्तान लिबरेशन फ्रंट (बीएलएफ) के प्रवक्ता मेजर घोरम बलोच ने दावा किया है कि नौ जनवरी को पाकिस्तान की सेना के काफिले पर फ्रंट के हमले में छह जवान मारे गए। प्रवक्ता ने मीडिया को भेजे बयान में कहा कि फ्रंट के लड़ाकों ने दोपहर करीब एक बजे सेंट्रल हाइवे पर ओरनाच क्रॉस पर सेना के काफिले पर घात लगाकर हमला किया।

द बलोचिस्तान पोस्ट के अनुसार, प्रवक्ता ने कहा कि सैन्य काफिले के एक वाहन पर भीषण हमला हुआ। इस वाहन में सवार छह जवान मौके पर ही मारे गए। सैन्य वाहन बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। मेजर घोरम बलोच ने कहा कि बलोचिस्तान लिबरेशन फ्रंट ने ओरनाच में कब्जा करने वाली पाकिस्तान की सेना के काफिले पर हमले में छह कर्मियों की हत्या की जिम्मेदारी लेता है।

उल्लेखनीय है कि बीएलएफ बलोचिस्तान की आजादी के लिए लंबे समय से संघर्ष कर है। बलोचिस्तान में आजादी का आंदोलन 1947 में भारत के विभाजन के बाद शुरू हुआ। कलात रियासत को पाकिस्तान में जबरन मिलाने के बाद तब से बलोच राष्ट्रवादी अपने क्षेत्र की पूर्ण स्वतंत्रता और अपने प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। 2004 से बीएलएफ, बलोचिस्तान लिबरेशन फ्रंट (बीएलएफ) और बलोच रिपब्लिकन आर्मी (बीआरए) जैसे विद्रोही समूह सक्रिय हैं।

ऐतिहासिक तथ्य है कि 1947 में कलात रियासत ने खुद को स्वतंत्र घोषित किया, मगर 1948 में पाकिस्तान की सेना ने इसे जबरन पाकिस्तान में मिला लिया। बलोच विद्रोही अपने क्षेत्र की स्वतंत्रता, राजनीतिक स्वायत्तता और प्राकृतिक संसाधनों (जैसे गैस और खनिज) पर नियंत्रण चाहते हैं। बलोच राष्ट्रवादियों का मानना है कि चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) उनकी जमीन पर विदेशी कब्जे को मजबूत करता है। यह गलियारा नहीं बनना चाहिए। आज बलोचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा और सबसे कम विकसित प्रांत है। बलोच राष्ट्रवादियों और इस्लामाबाद के बीच संघर्ष जारी है। बलोच अपने शोषण और उपेक्षा के खिलाफ लगातार आवाज उठा रहे हैं।