नई दिल्ली, 13 जनवरी (हि.स.)। स्टील गैबियंस का निर्माण करने वाली कंपनी गैबियन टेक्नोलॉजी इंडिया लिमिटेड के शेयरों ने आज स्टॉक मार्केट में प्रीमियम एंट्री करके अपने आईपीओ निवेशकों को खुश कर दिया। आईपीओ के तहत कंपनी के शेयर 81 रुपये के भाव पर जारी किए गए थे। आज बीएसई के एसएमई प्लेटफॉर्म पर इसकी लिस्टिंग 9.88 प्रतिशत प्रीमियम के साथ 89 रुपये के स्तर पर हुई। हालांकि लिस्टिंग के बाद निवेशकों को तब झटका लगा, जब बिकववाली के दबाव में इस इस शेयर की चाल में गिरावट आ गई। लिस्टिंग होने के बाद से ही मुनाफा वसूली शुरू हो जाने के कारण कंपनी के शेयर सुबह 10 बजे तक लुढ़क कर 84.55 रुपये के लोअर सर्किट लेवल तक पहुंच गए। लोअर सर्किट लगने के बावजूद कंपनी के आईपीओ निवेशक आज 4.38 प्रतिशत के फायदे में हैं।
गैबियन टेक्नोलॉजी इंडिया लिमिटेड का 29.16 करोड़ रुपये का आईपीओ 6 से 8 जनवरी के बीच सब्सक्रिप्शन के लिए खुला था। इस आईपीओ को निवेशकों की ओर से शानदार रिस्पॉन्स मिला था। इसके कारण ये ओवरऑल 826 गुना सब्सक्राइब हुआ था। इनमें क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल बायर्स (क्यूआईबी) के लिए रिजर्व पोर्शन 271.13 गुना (एक्स एंकर) सब्सक्राइब हुआ था। वहीं नॉन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (एनआईआई) के लिए रिजर्व पोर्शन में 1,476.78 गुना सब्सक्रिप्शन आया था। इसी तरह रिटेल इन्वेस्टर्स के लिए रिजर्व पोर्शन 867.23 गुना सब्सक्राइब हो सका था। इस आईपीओ के तहत 10 रुपये फेस वैल्यू वाले 36 लाख नए शेयर जारी किए गए हैं। आईपीओ के जरिये जुटाए गए पैसे का इस्तेमाल कंपनी नए प्लांट और मशीनरी की खरीदारी करने, वर्किंग कैपिटल की जरूरतों को पूरा करने और आम कॉरपोरेट उद्देश्यों में करेगी।
कंपनी की वित्तीय स्थिति की बात करें तो कैपिटल मार्केट रेगुलेटर सेबी के पास जमा कराए गए ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (डीआरएचपी) में किए गए दावे के मुताबिक इसकी वित्तीय सेहत लगातार मजबूत हुई है। वित्त वर्ष 2022-23 में कंपनी को 3.41 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ हुआ था, जो अगले वित्त वर्ष 2023-24 में बढ़ कर 5.82 करोड़ रुपये और वित्त वर्ष 2024-25 में उछल कर 6.63 करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच गया। मौजूदा वित्त वर्ष में नवंबर 2025 के अंत तक कंपनी को 4.30 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ हो चुका है।
इस दौरान कंपनी की राजस्व प्राप्ति में भी मामूली उतार चढ़ाव होता रहा। वित्त वर्ष 2022-23 में इसे 78.88 करोड़ का कुल राजस्व प्राप्त हुआ, जो वित्त वर्ष 2023-24 में बढ़ कर 104.97 करोड़ और वित्त वर्ष 2024-25 में फिसल कर 101.17 करोड़ रुपये के स्तर पर आ गया। मौजूदा वित्त वर्ष में 30 नवंबर 2025 तक कंपनी को 60.66 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हो चुका है।
इस अवधि में कंपनी के कर्ज में भी लगातार बढ़ोतरी हुई। वित्त वर्ष 2022-23 के अंत में कंपनी पर 29.46 करोड़ रुपये के कर्ज का बोझ था, जो वित्त वर्ष 2023-24 में बढ़ कर 36.37 करोड़ रुपये और वित्त वर्ष 2024-25 में उछल कर 46.71 करोड़ रुपये के स्तर पर आ गया। मौजूदा वित्त वर्ष में नवंबर 2025 तक कंपनी पर लदे कर्ज का बोझ 52.05 करोड़ रुपये के स्तर पर आ गया।
इस अवधि में कंपनी के रिजर्व और सरप्लस में भी बढ़ोतरी हुई। वित्त वर्ष 2022-23 में ये 7.97 करोड़ रुपये के स्तर पर था, जो 2023-24 में बढ़ कर 13.71 करोड़ रुपये हो गया। इसी तरह 2024-25 में कंपनी का रिजर्व और सरप्लस 12.02 करोड़ रुपये के स्तर पर आ गया। वहीं मौजूदा वित्त वर्ष में 30 नवंबर 2025 तक ये 16.32 करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच गया।
इसी तरह ईबीआईटीडीए (अर्निंग बिफोर इंट्रेस्ट, टैक्सेज, डिप्रेशिएशंस एंड एमॉर्टाइजेशन) 2022-23 में 6.39 करोड़ रुपये के स्तर पर था, जो 2023-24 में बढ़ कर 13.16 करोड़ रुपये हो गया। इसी तरह 2024-25 में कंपनी का ईबीआईटीडीए 15.06 करोड़ रुपये के स्तर पर आ गया। वहीं मौजूदा वित्त वर्ष 30 नवंबर 2025 तक ये 10.76 करोड़ रुपये के स्तर पर रहा।
नई दिल्ली, 13 जनवरी (हि.स)। यात्री वाहनों की थोक बिक्री में यूटिलिटी वाहनों की मजबूत मांग के दम पर दिसंबर 2025 में सालाना आधार पर 27 फीसदी बढ़ी है।
उद्योग निकाय सोसायटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (सियाम) ने मंगलवार को एक बयान में बताया कि दिसंबर में यात्री वाहनों की कुल बिक्री 3,99,216 इकाई रही, जो दिसंबर 2024 की 3,14,934 इकाई की तुलना में 26.8 फीसदी अधिक है। सियाम के मुताबिक दिसंबर महीने में दोपहिया वाहनों की थोक बिक्री सालाना आधार पर 11,05,565 इकाई के मुकाबले 39 फीसदी की बढ़ोत्तरी के साथ 15,41,036 इकाई हो गई। वहीं, तिपहिया वाहनों की कुल बिक्री 61,924 इकाई रही है, जो दिसंबर 2024 की 52,733 इकाई की तुलना में 17 फीसदी अधिक है।
सियाम ने बिक्री के परिदृश्य पर कहा कि वाहन उद्योग वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में मजबूत गति के साथ प्रवेश कर रहा है, क्योंकि 2025 के अंत में सभी वाहन खंडों में मजबूत दोहरे अंकों की वृद्धि दर्ज की गयी। चौथी तिमाही के दौरान वाहनों की थोक एवं खुदरा बिक्री की मात्रा में स्थिर वृद्धि की उम्मीद है।
उद्योग जगत ने कहा, ‘‘भू-राजनीतिक घटनाक्रमों पर नजर रखते हुए उद्योग निकाय को उम्मीद है कि वित्त वर्ष 2025-26 सकारात्मक वृद्धि के साथ समाप्त होगा। इसमें नीतिगत रूप से समर्थित कारक मजबूती से मौजूद रहेंगे जिससे हाल के वर्षों के मजबूत प्रदर्शन को बनाए रखने में मदद मिलेगी।’’
कोलकाता, 13 जनवरी (हि. स.)। निपाह वायरस से संक्रमित पश्चिम बंगाल की दो नर्सों की हालत फिलहाल गंभीर बनी हुई है। दोनों बारासात इलाके के एक अस्पताल में कार्यरत हैं और वहीं के आईसीयू आइसोलेशन वार्ड में उनका इलाज चल रहा है। अस्पताल में कोविड काल के दौरान लागू की गई सभी गाइडलाइनों को फिर से सख्ती से लागू किया गया है।पश्चिम बंगाल में निपाह वायरस के दो संदिग्ध मामलों के सामने आने के बाद झारखंड सरकार पूरी तरह सतर्क हो गई है। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी ने मंगलवार को प्रदेश के सभी जिलों के सिविल सर्जनों को अलर्ट मोड में रहने का निर्देश दिया है।
संक्रमित नर्सों में से एक पूर्व बर्धमान जिले की निवासी हैं, जबकि दूसरी नदिया जिले से हैं। अस्पताल सूत्रों के मुताबिक, दोनों 5 जनवरी से शारीरिक रूप से अस्वस्थ थीं। उनकी स्थिति पर 24 घंटे कड़ी नजर रखी जा रही है। फिलहाल, स्थिति में न तो कोई गिरावट आई है और न ही अब तक कोई सुधार देखा गया है।
संक्रमण के प्रसार को रोकने के लिए अस्पताल प्रशासन ने सख्त एहतियाती कदम उठाए हैं। निर्देश के तहत अस्पताल के सभी कर्मचारी और चिकित्सकों के लिए मास्क पहनना अनिवार्य कर दिया गया है। सुरक्षा कर्मियों और मरीजों के परिजनों पर भी यही नियम लागू किया गया है। निपाह संक्रमित स्वास्थ्यकर्मियों के इलाज में लगे डॉक्टरों और स्टाफ को पीपीई किट पहनकर ड्यूटी करनी पड़ रही है।
केंद्र सरकार ने राज्य सरकार को सहयोग देने के लिए एक राष्ट्रीय संयुक्त आउटब्रेक प्रतिक्रिया टीम तैनात की है। इस टीम में कोलकाता स्थित ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ एंड पब्लिक हाइजीन, पुणे का नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (एनआईवी), चेन्नई का नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एपिडेमियोलॉजी (एनआईई), एम्स कल्याणी तथा पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के वन्यजीव विभाग के विशेषज्ञ शामिल हैं।
निपाह वायरस को लेकर संक्रामक रोग अलर्ट के तहत दिशा-निर्देश राज्य की इंटीग्रेटेड डिजीज सर्विलांस प्रोग्राम (आईडीएसपी) इकाई को साझा किए गए हैं। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी), दिल्ली में पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी ऑपरेशंस सेंटर को सक्रिय कर राष्ट्रीय स्तर पर समन्वय किया जा रहा है।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को पत्र लिखकर केंद्र की ओर से पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया है। नड्डा ने मुख्यमंत्री से टेलीफोन पर भी बातचीत कर आवश्यक हर प्रकार की सहायता उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धता दोहराई।
उल्लेखनीय है कि, केंद्र सरकार ने इस मामले में एक ज्वाइंट एक्शन कमेटी बनाई है।
) निपाह वायरस को लेकर झारखंड सरकार अलर्ट, सभी जिलों के सिविल सर्जनों को सतर्क रहने के निर्देश
रांची, 13 जनवरी (हि.स.)। पश्चिम बंगाल में निपाह वायरस के दो संदिग्ध मामलों के सामने आने के बाद झारखंड सरकार पूरी तरह सतर्क हो गई है। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी ने मंगलवार को प्रदेश के सभी जिलों के सिविल सर्जनों को अलर्ट मोड में रहने का निर्देश दिया है। इस संबंध में स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव अजय कुमार सिंह को भी आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं।
स्वास्थ्य मंत्री की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया है कि निपाह वायरस एक अत्यंत खतरनाक ज़ूनोटिक बीमारी है, जो जानवरों से मनुष्यों में फैलती है। यह वायरस मुख्य रूप से फल खाने वाले चमगादड़ों (फ्रूट बैट) से फैलता है। इसके अलावा संक्रमित जानवरों, विशेषकर सूअरों के सीधे संपर्क, उनके संक्रमित मांस के सेवन अथवा संक्रमित व्यक्ति के शरीर से निकलने वाले लार, रक्त और अन्य द्रवों के संपर्क में आने से भी संक्रमण फैल सकता है।
डॉ. इरफान अंसारी ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि राज्य के सभी जिलों में सख्त निगरानी, त्वरित रिपोर्टिंग प्रणाली और जन-जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाएं, ताकि लोगों को निपाह वायरस के लक्षण, बचाव और आवश्यक सावधानियों की पूरी जानकारी मिल सके और राज्य में इसके किसी भी संभावित प्रकोप को रोका जा सके।
स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि झारखंड सरकार इस खतरनाक बीमारी की रोकथाम के लिए पूरी तरह मुस्तैद है और स्वास्थ्य विभाग को हर स्तर पर सतर्क रहने के निर्देश दिए गए हैं।
विज्ञप्ति में बताया गया है कि निपाह वायरस की मृत्यु दर (फैटेलिटी रेट) काफी अधिक होती है, जो प्रकोप की गंभीरता के अनुसार 40 प्रतिशत से 75 प्रतिशत तक हो सकती है। इसी कारण इसे एक अत्यंत गंभीर और घातक रोग माना जाता है।
निपाह वायरस के प्रमुख लक्षणों में तेज बुखार, सिरदर्द, खांसी, सांस लेने में तकलीफ, गले में खराश, मानसिक भ्रम, मस्तिष्क पर गंभीर प्रभाव (एन्सेफेलाइटिस) और कोमा जैसी गंभीर स्थितियां शामिल हैं।———-
लखनऊ, 13 जनवरी (हि.स.)। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मंगलवार को कहा कि प्रगति पोर्टल (प्रोएक्टिव गवर्नेंस एण्ड टाइमली इंप्लीमेंटेशन) ने मिनिमम गवर्नमेंट और मैक्सिमम गवर्नेंस को सार्थकता प्रदान की है। प्रगति पोर्टल से समय और लागत की बर्बादी रुकी है। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रगति के माध्यम से देश नई ऊंचाइयों को छू रहा है तो उत्तर प्रदेश देश का ग्रोथ इंजन बनकर उभरा है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मंगलवार को अपने सरकारी आवास पांच कालिदास मार्ग पर पत्रकार वार्ता कर प्रगति पोर्टल के माध्यम से प्रदेश और देश को हो रहे लाभ के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2014 में सत्ता में आने के साथ ही डिजिटलीकरण को बढ़ावा देना शुरू कर दिया। इससे पहले उन्हाेंने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में इस कार्य का शुभारंभ राज्य स्तर पर किया था। उसी क्रम में 2015 में प्रगति पोर्टल लांच किया गया । यह केवल देश के अंदर बड़े प्रोज्क्ट की समीक्षा ही नहीं है बल्कि देश के अंदर एक नयी कार्य संस्कृति का उदाहरण बन चुका है। इसकी मानिटरिंग प्रधानमंत्री कार्यालय से की जा रही है। इस पोर्टल के माध्यम से केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय बनाकर योजनाओं को आगे बढ़ाने का कार्य किया जा रहा है। इसी प्रकार अलग-अलग राज्य की सरकारों और सरकारों में विभागों के बीच समन्वय स्थापित कर सरकार की योजनाओं को आगे बढ़ाया जा रहा है।
मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि आज जो कुछ भी परिणाम देखने को मिल रहा है, वह प्रधानमंत्री मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में बेहतरीन टेक्नालॉजी का इस्तेमाल करने से संभव हो पा रहा है। वर्ष 2003 में गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नागरिक शिकायतों और जवाबदेही बनाने के उद्देश्य से इसे विकसित किया था। प्रगति उसी का राष्ट्रीय स्वरूप है। मतलब प्रोएक्टिव गवर्नेंश एण्ड टाइमली इंप्लीमेंटेशन का मतलब है कि मिनिमम गवर्नमेंट मैक्सिमम गवर्नेंस का यह पोर्टल महत्वपूर्ण आधार बना है। इसके माध्यम से निर्णय तेज हुए हैं। इससे समय और लागत की बर्बादी रुकी है। केन्द्र और राज्य के मंत्रालयों विभागों के बीच समन्वय मजबूत हुआ है। जवाबदेही तय हुई है।
उन्हाेंने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर देखा जाए तो प्रगति के माध्यम से 86 लाख करोड़ की परियोजनाओं को गति मिली है। जिनमें 377 प्रमुख परियोजनाओं को सीधे प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर समीक्षा की जाती है। 3152 में 2958 मुद्दों का समाधान हुआ है। यह केवल आंकड़ा नहीं है। सरकार के कार्य भी दर्शाता है। उप्र जैसे राज्य को देखें तो प्रगति गेंम चेंजर के रूप में साबित हुआ है। उप्र देश का ग्रोथ इंजन बनकर उभरा है। आज उप्र की नई पहचान बनी है। इस मौके पर उप्र सरकार के वित्त एवं संसदीय कार्य मंत्री सुरेश खन्ना मौजूद रहे।
नई दिल्ली, 13 जनवरी (हि.स.)। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और गृहमंत्री अमित शाह समेत तमाम नेताओं ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर देशवासियों को लोहड़ी, मकर संक्रांति, पोंगल और माघ बिहु की शुभकामनाएं दी हैं। सभी नेताओं ने लोगों के सुख, समृद्धि, खुशियां और नई ऊर्जा की कामना की। नेताओं ने कहा कि समृद्ध कृषि परंपराओं, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक के रूप में उभरे।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने दुनिया भर में रहने वाले भारतीयों को लोहड़ी, मकर संक्रांति, पोंगल और माघ बिहु की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि ये पर्व भारत की समृद्ध कृषि परंपराओं और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक हैं। इस अवसर पर हम प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते और अन्नदाता किसानों का आभार प्रकट करते हैं। मेरी मंगलकामना है कि ये पर्व सबके जीवन में सुख-समृद्धि का संचार करें।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि तिल-गुड़ की मिठास, ढोल की गूंज और गिद्दा, भांगड़ा की ऊर्जा के साथ लोहड़ी आपके जीवन में सुख, समृद्धि और नई खुशियां लेकर आए यही मंगलकामना है। गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि उत्साह, उमंग व नई ऊर्जा के प्रतीक लोहड़ी पर्व सभी की सुख-समृद्धि का माध्यम बने।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि आशा है हर्ष और उल्लास का यह त्योहार आपके जीवन में अपार खुशियां व समृद्धि लेकर आए। केन्द्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि यह पावन पर्व सभी को खुशहाली, सुख-शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करे।
केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने कहा कि यह लोक पर्व सभी के जीवन में नई ऊर्जा और उत्साह का संचार करे तथा समाज में सौहार्द, समृद्धि व खुशहाली को और सुदृढ़ करे, यही मंगलकामना है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा कि यह पावन त्योहार सभी के जीवन में ढेर सारी खुशियां, सुख और शांति ले कर आए। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने मां मां प्रकृति सभी पर अपनी कृपा बनाए रखने की कामने करते हुए कहा कि और सभी का जीवन आनंद तथा खुशियों से भरा रहे।
केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान देशवासियों की खुशहाली की कामना करते हुए कहा कि हर घर-आंगन धन-धान्य, सुख, समृद्धि से भर जाये। हर खेत में फसल लहलहाये तथा लोहड़ी का पावन प्रकाश आप सबके जीवन में नव आशा, नव ऊर्जा और अपार खुशियां लाये, यही उनकी प्रार्थना है। केन्द्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने कहा कि उमंग, उल्लास और खुशहाली के पावन पर्व लोहड़ी की सभी देशवासियों विशेषकर पंजाब के मेरे भाइयों-बहनों को ऊर्जा एवं आरोग्यता से भरी बधाई। केन्द्रीय कपड़ा मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा कि लोहड़ी का पावन पर्व आप सभी के जीवन में सुख, समृद्धि और खुशहाली लेकर आए।
ओस्लो, 13 जनवरी (हि.स.)। विश्व के सबसे प्रतिष्ठित शतरंज टूर्नामेंटों में शामिल नॉर्वे चेस अब एक नए दौर में प्रवेश करने जा रहा है। 13 वर्षों तक स्टावेंगर में आयोजित होने के बाद वर्ष 2026 से नॉर्वे चेस और नॉर्वे चेस विमेंस टूर्नामेंट का आयोजन नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में किया जाएगा। दोनों टूर्नामेंटों का मुख्य आयोजन स्थल डाइखमन ब्योर्विका होगा। यह प्रतिष्ठित प्रतियोगिता 25 मई से 5 जून तक खेली जाएगी, जिसमें विश्व शतरंज के दिग्गज खिलाड़ी मैग्नस कार्लसन भी भाग लेंगे।
नॉर्वे चेस की शुरुआत वर्ष 2013 में हुई थी और तब से लेकर अब तक स्टावेंगर इस टूर्नामेंट का स्थायी घर रहा। इस शहर ने टूर्नामेंट को एक अलग पहचान दी और इसे अंतरराष्ट्रीय शतरंज कैलेंडर का एक अहम हिस्सा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
नॉर्वे चेस के संस्थापक और सीईओ केजेल मैडलैंड ने स्टावेंगर शहर के योगदान की सराहना करते हुए कहा, “स्टावेंगर के सभी राजनीतिक दलों के समर्थन और सहयोग के बिना नॉर्वे चेस आज जिस मुकाम पर है, वहां तक पहुंचना संभव नहीं था। खासतौर पर नॉर्वे चेस विमेंस के विकास में शहर की भूमिका ऐतिहासिक रही है, जहां पुरुषों के बराबर पुरस्कार राशि दी गई। हम अपने स्थानीय प्रायोजकों और स्वयंसेवकों के भी आभारी हैं, जिन्होंने मिलकर नॉर्वेजियन खेल इतिहास का एक अध्याय लिखा।”
ओस्लो में आयोजन को लेकर नॉर्वे चेस की सीओओ बेनेडिक्टे वेस्ट्रे स्कोग ने कहा कि राजधानी में आने से टूर्नामेंट को और अधिक अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलेगी। उन्होंने कहा, “ओस्लो एक वैश्विक मिलन स्थल है और यहां नॉर्वे चेस की स्थापना से हम दर्शकों, भागीदारों और युवा शतरंज प्रेमियों तक और व्यापक रूप से पहुंच सकेंगे।”
मैडलैंड ने आगे कहा कि स्टावेंगर हमेशा नॉर्वे चेस की पहचान का हिस्सा रहेगा, लेकिन टूर्नामेंट को विश्व स्तर पर और आगे ले जाने के लिए ओस्लो एक स्वाभाविक अगला कदम है।
डाइखमन ब्योर्विका लाइब्रेरी में नॉर्वे चेस 2026 के आयोजन को लेकर वहां की प्रमुख लाइब्रेरियन मेरिटे ली ने खुशी जताई। उन्होंने कहा, “हमें गर्व है कि डाइखमन ब्योर्विका नॉर्वे चेस 2026 की मेजबानी करेगा। हम इस ऐतिहासिक भवन को शतरंज खिलाड़ियों, दर्शकों और जिज्ञासु आगंतुकों से भरने के लिए उत्साहित हैं।”
विश्व के पूर्व नंबर-1 खिलाड़ी मैग्नस कार्लसन ने नॉर्वे चेस 2026 में भाग लेने की आधिकारिक पुष्टि कर दी है। बाकी प्रतिभागियों के नाम आने वाले हफ्तों में घोषित किए जाएंगे, साथ ही नॉर्वे चेस विमेंस की लाइन-अप भी सामने आएगी।
नॉर्वे चेस का यह 14वां संस्करण होगा, जबकि नॉर्वे चेस विमेंस तीसरी बार आयोजित किया जाएगा। मैग्नस कार्लसन अब तक नॉर्वे चेस के हर संस्करण में खेले हैं और सात बार खिताब अपने नाम कर चुके है!
नई दिल्ली, 13 जनवरी (हि.स.)। इंडस्ट्रियल सेक्टर के लिए इलेक्ट्रिकल प्रोडक्ट बनाने वाली कंपनी इंडो एसएमसी का 91.95 करोड़ रुपये का आईपीओ आज सब्सक्रिप्शन के लिए लॉन्च कर दिया गया। इस आईपीओ में 16 जनवरी तक बोली लगाई जा सकती है। इश्यू की क्लोजिंग के बाद 19 जनवरी को शेयरों का अलॉटमेंट किया जाएगा, जबकि 20 जनवरी को अलॉटेड शेयर डीमैट अकाउंट में क्रेडिट कर दिए जाएंगे। कंपनी के शेयर 21 जनवरी को बीएसई के एसएमई प्लेटफॉर्म पर लिस्ट हो सकते हैं।
इस आईपीओ में बोली लगाने के लिए 141 रुपये से लेकर 149 रुपये प्रति शेयर का प्राइस बैंड तय किया गया है, जबकि लॉट साइज 1,000 शेयर का है। इंडो एसएमसी के इस आईपीओ में रिटेल इनवेस्टर्स दो को लॉट यानी 2,000 शेयरों के लिए बोली लगा सकते हैं, जिसके लिए उन्हें 2,98,000 रुपये का निवेश करना होगा। इस आईपीओ के तहत 10 रुपये फेस वैल्यू वाले कुल 61.71 लाख नए शेयर जारी हो रहे हैं।
आईपीओ खुलने से एक कारोबारी दिन पहले 12 जनवरी को इंडो एसएमसी ने 11 एंकर इनवेस्टर्स से 26.16 करोड़ रुपये जुटाए। इन एंकर इनवेस्टर्स में बंगाल फाइनेंस एंड इनवेस्टमेंट प्राइवेट लिमिटेड सबसे बड़ा इनवेस्टर रहा। इसने कंपनी से अपर प्राइस लिमिट 149 रुपये प्रति शेयर की दर से 3.05 लाख शेयर खरीदे हैं। इसी तरह 360 वन एलवीएफ ट्रेजरी सॉल्यूशंस फंड कंपनी से 1.18 लाख शेयर खरीद कर दूसरा सबसे बड़ा एंकर इनवेस्टर बना है।
इस आईपीओ में क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल बायर्स (क्यूआईबी) के लिए 47.45 प्रतिशत हिस्सा रिजर्व किया गया है। इसके अलावा रिटेल इनवेस्टर्स के लिए 33.25 प्रतिशत हिस्सा, नॉन इंस्टीट्यूशनल इनवेस्टर्स (एनआईआई) के लिए 14.29 प्रतिशत हिस्सा और मार्केट मेकर्स के लिए 5.01 प्रतिशत हिस्सा रिजर्व है। इस इश्यू के लिए जीवाईआर कैपिटल एडवाइजर्स प्रा.लि. को बुक रनिंग लीड मैनेजर बनाया गया है, जबकि केफिन टेक्नोलॉजी लिमिटेड को रजिस्ट्रार बनाया गया है। वहीं गिरिराज स्टॉक ब्रोकिंग प्रा.लि. और निकुंज स्टॉक ब्रोकर्स लिमिटेड कंपनी के मार्केट मेकर हैं।
कंपनी की वित्तीय स्थिति की बात करें तो कैपिटल मार्केट रेगुलेटर सेबी के पास जमा कराए गए ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (डीआरएचपी) में किए गए दावे के मुताबिक इसकी वित्तीय सेहत में लगातार मजबूती आई है। वित्त वर्ष 2022-23 में कंपनी को 46 लाख रुपये का शुद्ध लाभ हुआ था, जो अगले वित्त वर्ष 2023-24 में बढ़ कर तीन करोड़ रुपये हो गया। वित्त वर्ष 2024-25 में कंपनी का शुद्ध लाभ उछल कर 15.44 करोड़ रुपये रह गया। मौजूदा वित्त वर्ष की पहली छमाही यानी अप्रैल से सितंबर 2025 में कंपनी को 11.46 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ हो चुका है।
इस दौरान कंपनी की राजस्व प्राप्ति में भी लगातार बढ़ोतरी होती रही। वित्त वर्ष 2022-23 में इसे 7.30 करोड़ का कुल राजस्व प्राप्त हुआ, जो वित्त वर्ष 2023-24 में बढ़ कर 28.06 करोड़ और वित्त वर्ष 2024-25 में उछल कर 138.78 करोड़ रुपये के स्तर पर आ गया। मौजूदा वित्त वर्ष की पहली छमाही यानी अप्रैल से सितंबर 2025 में कंपनी को 112.62 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हो चुका है।
इस अवधि में कंपनी के कर्ज में भी लगातार बढ़ोतरी हुई। वित्त वर्ष 2022-23 के अंत में कंपनी पर 10.43 करोड़ रुपये के कर्ज का बोझ था, जो वित्त वर्ष 2023-24 में बढ़ कर 17.70 करोड़ रुपये और वित्त वर्ष 2024-25 में उछल कर 35.76 करोड़ रुपये के स्तर पर आ गया। मौजूदा वित्त वर्ष की पहली छमाही के अंत यानी 30 सितंबर तक कंपनी पर लदे कर्ज का बोझ 49.35 करोड़ रुपये के स्तर पर आ गया।
इस अवधि में कंपनी के रिजर्व और सरप्लस में भी बढ़ोतरी हुई। वित्त वर्ष 2022-23 में ये 52 लाख रुपये के स्तर पर था, जो 2023-24 में बढ़ कर 5.06 करोड़ रुपये हो गया। इसी तरह 2024-25 में कंपनी का रिजर्व और सरप्लस 19 करोड़ रुपये के स्तर पर आ गया। वहीं मौजूदा वित्त वर्ष की पहली छमाही यानी अप्रैल से सितंबर 2025 तक ये 30.46 करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच गया।
इसी तरह ईबीआईटीडीए (अर्निंग बिफोर इंट्रेस्ट, टैक्सेज, डिप्रेशिएशंस एंड एमॉर्टाइजेशन) 2022-23 में 1.15 करोड़ रुपये के स्तर पर था, जो 2023-24 में बढ़ कर 5.08 करोड़ रुपये हो गया। साल 2024-25 में कंपनी का ईबीआईटीडीए उछल कर 22.83 करोड़ रुपये के स्तर पर आ गया। वहीं मौजूदा वित्त वर्ष की पहली छमाही के अंत यानी सितंबर 2025 तक ये 17.19 करोड़ रुपये के स्तर पर था।
हरिद्वार, 13 जनवरी (हि.स.)। उत्तराखंड की बालिकाओं की अंडर-15 सब-जूनियर रग्बी टीम ने नेशनल रग्बी प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए भुवनेश्वर, ओडिशा के लिए मंगलवार काे रुड़की रेलवे स्टेशन से प्रस्थान किया। खिलाड़ियों के जोश और आत्मविश्वास से भरे इस पल ने खेल प्रेमियों का मन उत्साह से भर दिया।
इस अवसर पर उत्तराखंड रग्बी संघ के प्रदेश अध्यक्ष सूर्यकांत सैनी, उत्तराखंड रग्बी एसोसिएशन के कोषाध्यक्ष एवं कोच आयुष सैनी, साहिल नेगी, फिटनेस ट्रेनर आकाश सिंह नेगी एवं वासु विशेष रूप से उपस्थित रहे। सभी पदाधिकारियों व प्रशिक्षकों ने टीम को शुभकामनाएं देते हुए हरी झंडी दिखाकर रवाना किया।
मौजूद गणमान्य व्यक्तियों ने खिलाड़ियों का हौसला बढ़ाते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य और शानदार प्रदर्शन की कामना की। पूरे प्रदेश को इन बेटियों से बेहतरीन खेल और पदक जीतने की उम्मीद है। उत्तराखंड की बेटियां मैदान में उतरेंगी पूरे जोश के साथ, देश को दमखम उनका दिखेगा।
भारत की आजादी के लिए हुए जन संघर्षों की विस्तृत शृंखला में 14 जनवरी, 1921 की तारीख को नहीं भुलाया जा सकता । इसी रोज उत्तराखंड की जनता ने अहिंसक सामूहिक प्रतिरोध के बूते न केवल सर्वशक्तिमान ब्रिटिश सत्ता को घुटनों के बल ला दिया, बल्कि पिछले लंबे समय से चली आ रही कुली-बेगार जैसी अमानुषिक कुप्रथा से मुक्ति पा ली थी। उत्तराखंड में कुली-बेगार उन्मूलन आंदोलन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के भारत में प्रारंभ किए गए असहयोग आंदोलन के रूप में अभिव्यक्त हुआ और पूर्णतः सफल रहा। उत्तराखंड को गोरखा सैनिक शासन के जुल्मी शिकंजे से मुक्त करा कर अंग्रेजों ने 1815 में यहां अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया था। ब्रिटिश राज कायम होने के बाद बेशक हरिद्वार का ‘दास बाजार’ धीरे-धीरे कमजोर पड़ा, लेकिन अंग्रेज यहां के पूर्ववर्ती राजाओं की भांति गांवों के प्रधानों/ पटवारियों के माध्यम से इस क्षेत्र के काश्तकारों से कुलियों का काम अनवरत लेते रहे। 1815 में यहां ईष्ट इंडिया कंपनी और 1858 में ब्रिटिश शासनकाल में यह कुप्रथा उत्तराखंड के भोले – भाले ग्रामीण काश्तकारों के अपमान और शोषण का औजार बन गई थी। 1863 -73 के दसवें भूमि बंदोबस्त में जे.ओ.बी. बेकट ने बड़ी चालाकी से कुली – बेगार, कुली – उतार और कुली – बर्दायश को भूमि बंदोबस्ती इकरारनामों का हिस्सा बना दिया था।
कुली- बेगार कुप्रथा के तहत यहां के प्रत्येक जमींदार, हिस्सेदार और आसामी को सरकार ने कुली का दर्जा दिया था। जिनके पास भी काश्तकारी की जमीन हो, वे सभी कुली कहलाते थे। भूमिहीन इस कलंक से मुक्त थे। तब पहाड़ में भूमिधर होना सम्मान की नहीं बल्कि ‘कुली’ होने का अभिशाप था। यह कुख्यात कुली प्रथा तीन चरणों में विभक्त थी, जिसे कुली – उतार, कुली – बेगार और कुली- बर्दाश्त कहा जाता था। अंग्रेज साहबों के दौरों और सैर-सपाटों के वास्ते पटवारी कुलियों की मांग तथा कुली बर्दाश्त का रूक्का प्रधानों/ थोकदारों को भेजते थे। कुली -उतार के तहत सरकारी आदेश पर लोगों को सामान ढोने के लिए गांव से उतर कर सड़क में बने पड़ावों में एकत्र होना पड़ता था। दौरे पर आने वाले पुलिस, प्रशासन, जंगलात विभाग एवं सेना के अधिकारियों, सैलानियों, सर्वे दलों और अंग्रेज काश्तकारों का सारा सामान, यहां तक कि कमोड, जूते और ऐसी सामग्री ढोने को मजबूर किया जाता था, जिससे यहां की धर्मभीरु जनता की धार्मिक भावनाएं आहत होती हों। स्कूल, सड़कें, पुल, डाक बंगले और वन विभाग की चौकियां आदि सार्वजनिक उपयोग के निर्माण कार्य भी बेगार द्वारा कराए जाते थे। साहब लोगों के रहने के लिए मुफ्त में टेंट गाड़ना, पानी भरना, उनके जूठे बर्तन साफ करना, उनके घोड़ों के लिए घास और जलावन के लिए ईंधन की व्यवस्था करना आदि छोटे-मोटे काम कुली- बेगार कहलाते थे। जबकि कुली- बर्दाश्त कुप्रथा रसद से जुड़ी थी। इसके अंतर्गत साहब लोगों के दौरों के दौरान पटवारी गांव वालों से घास, लकड़ी, कोयला, अन्न, घी, दूध – दही, अंडा-मुर्गा, दालें, सब्जी, बर्तन और अन्य खाद्य सामग्री मुफ़्त अथवा नाममात्र की कीमत पर लेते थे।
पहाड़ के प्रत्येक गांव में कुली रजिस्टर बनते थे, इन रजिस्टरों में ‘कुलियों’ के नाम कटते और जुड़ते रहते थे। हरेक गांव में कुलियों की संख्या निर्धारित थी। सरकारी आज्ञा पर इन्हें निर्धारित कुली पड़ावों में हर हालत में हाज़िर होना पड़ता था। व्यक्तिगत अथवा पारिवारिक सुख-दुःख, प्रतिकूल मौसम और तीज- त्यौहार, किसी भी परिस्थिति में कुली को बारी से छूट नहीं मिलती थी। बोझा नहीं ढोने वालों को अर्थदंड देना पड़ता था। अंग्रेज साहबों की सुविधा के लिए बेगारी देना उत्तराखंड के लोगों विशेषकर ग्रामीण काश्तकारों के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी था। इस अमानुषिक कुप्रथा से संपूर्ण उत्तराखंड की जनता त्रस्त थी। अपमान सहने को विवश थी। उत्तराखंड में प्रचलित इस अमानुषिक व्यवस्था के विरुद्ध अतीत में अनेक बार विरोध के छुटपुट स्वर मुखरित होते रहे, लेकिन कोई बड़ा जनांदोलन खड़ा नहीं हो पाया था। 1913 में बदरी दत्त पाण्डे ने ‘अल्मोड़ा अखबार’ के संपादक का दायित्व संभाला। इसके बाद उन्होंने इस प्रथा के विरुद्ध लिखना शुरू किया। बदरी दत्त पाण्डे ने लाला चिरंजीलाल और लक्ष्मीदत्त त्रिपाठी के साथ ग्रामीण क्षेत्रों का भ्रमण कर इस कुप्रथा के विरुद्ध जन जागरण अभियान की शुरुआत की।
1904 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस प्रथा को नियम विरुद्ध और गैर कानूनी करार दिया। व्यवस्थापिका सभा में भी इस प्रथा के विरोध में प्रस्ताव पारित हुआ। बावजूद इसके तब उत्तराखंड में तैनात मनबढ़ अंग्रेज अधिकारियों ने इस व्यवस्था को कायम रखा। यही नहीं 1913 में अल्मोड़ा के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर ने अल्मोड़ा शहरवासियों को भी कुली उतार देने के आदेश जारी कर दिए। बोझा नहीं ढोने वालों के ऊपर प्रतिवर्ष दो रुपया कुली-कर लगा दिया गया। रायबहादुर तारा दत्त गैरोला ने प्रांतीय कौंसिल में इस व्यवस्था के विरुद्ध आवाज उठाई, लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। इस विषय में ब्रिटिश पार्लियामेंट में भी चर्चा हुई। ब्रिटिश पार्लियामेंट में तत्कालीन भारत मंत्री ने यह कह कर अपना पल्ला झाड़ लिया कि यह व्यवस्था अंग्रेजों ने कायम नहीं की है, इसलिए इसे हटाने का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता। कालांतर में भारत मंत्री के इस वक्तव्य का उत्तराखंड की जनता ने ऐसा प्रतिउत्तर दिया, जिसकी मिसाल दुनिया के इतिहास में कम ही पाई जाती है।
1916 में नैनीताल में कुमाऊं परिषद का गठन हुआ। तब कुमाऊं परिषद को ‘कुमाऊं की कांग्रेस’ कहा जाता था। इसी साल कुमाऊं परिषद का अल्मोड़ा में पहला अधिवेशन हुआ। इस अधिवेशन में कुली-बेगार कुप्रथा के विरोध में प्रस्ताव पास हुआ। इसके बाद गोविंद बल्लभ पन्त, हरगोविंद पन्त और बदरी दत्त पाण्डे ने कुली बेगार व्यवस्था के विरोध में गांव-गांव जन सभाएं करनी प्रारंभ कर दी। 1918 में कुमाऊं परिषद का हल्द्वानी में सम्मेलन हुआ। सम्मेलन की अध्यक्षता रायबहादुर तारा दत्त गैरोला ने की। इस सम्मेलन में ब्रिटिश सरकार को दो साल के भीतर कुली-बेगार प्रथा को बंद करने का नोटिस देने का निर्णय लिया गया। नोटिस में कहा गया कि यदि तय समयावधि में इस प्रथा को नहीं हटाया गया तो उत्तराखंड की जनता सत्याग्रह करेगी। इसी के साथ कुली- बेगार प्रथा के विरुद्ध गांव-गांव जन जागरण अभियान शुरू हो गया।
इसी कालखंड में भारत के राजनैतिक क्षितिज में महात्मा गांधी का पदार्पण हुआ। भारत की राजनीति में गांधी युग की शुरुआत हुई। 1918 में बदरीदत्त पाण्डे कोलकाता गए, वहां उन्होंने महात्मा गांधी से भेंट की और उन्हें उत्तराखंड के इस कुली कलंक से अवगत कराया। 1920 में हरगोविंद पन्त की अध्यक्षता में कुमाऊं परिषद का काशीपुर में अधिवेशन हुआ। अधिवेशन में कुली – उतार उन्मूलन का संकल्प पारित हुआ। इसी साल दिसंबर में कांग्रेस का नागपुर में अधिवेशन हुआ। इस अधिवेशन में बदरीदत्त पाण्डे, भुवनेश्वर पाण्डे, हरगोविंद पन्त, लाला चिरंजीलाल, लक्ष्मण दत्त भट्ट एवं शिवनंदन पाण्डे आदि पहाड़ के 22 नेता नागपुर गए। इन नेताओं ने गांधी जी से अल्मोड़ा आने का आग्रह किया। गांधी जी ने कहा: ‘भाई मुझे बहुत काम है। मेरे कुर्मांचली भाइयों से कह दें कि कुली देना नहीं होता है।’ एक अगस्त,1920 से गांधी जी ने ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध देशव्यापी असहयोग आंदोलन शुरू कर दिया था। उत्तराखंड में असहयोग आंदोलन कुली-बेगार विरोधी आंदोलन के रूप में अभिव्यक्त हुआ। 10 जनवरी,1921 को बदरी दत्त पाण्डे, हरगोविंद पन्त एवं लाला चिरंजीलाल के नेतृत्व में पचास नवयुवकों का दल बागेश्वर को कूच कर गया। 12 जनवरी की रात तक बागेश्वर में हजारों लोग एकत्र हो गए। इसी बीच अल्मोड़ा के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर डब्ल्यू.सी. डाइबिल भी 21 अंग्रेज अधिकारियों और पचास सशत्र पुलिस जवानों के साथ बागेश्वर पहुंच गए थे।
बागेश्वर में विशाल जनसभा हुई, जिसमें पचास हजार से अधिक लोग सम्मिलित हुए।सभा में महात्मा गांधी जी के जयकारे लगे और उन्हें अवतार बताया गया। कुली – बेगार आंदोलन के अन्य नेताओं के अलावा मोहन सिंह मेहता, रामदत्त, जीत सिंह एवं पुरुषोत्तम आदि ने इस विशाल जनसभा को संबोधित किया। सभा में मौजूद सभी लोगों ने मकर संक्रांति के दिन भगवान बागनाथ जी के मंदिर में कुली-बेगार नहीं देने की शपथ ली। सरयू नदी के पवित्र जल को अंजलि में लेकर कुली-बेगार से मुक्ति का संकल्प लिया। सभी प्रधान और मालगुजारों ने कुली -बेगार के रजिस्टर सरयू नदी के पवित्र जल में प्रवाहित कर दिए। कुली-बेगार आंदोलन सफल हुआ। अपार जनशक्ति के सामने अत्याचारी अंग्रेज शासक बौने साबित हुए। बागेश्वर राष्ट्रीय जागृति का केंद्र बन गया। कुली -बेगार आंदोलन की इस सफलता के बाद यहां की जनता ने बड़ी श्रद्धा एवं कृतज्ञता के साथ बदरी दत्त पाण्डे जी को ‘कुमाऊं केसरी’ की उपाधि से विभूषित किया।
महात्मा गाधी के पौत्र एवं साबरमती सत्याग्रहाश्रम के साधक प्रभुदास गांधी ने कुली-बेगार आंदोलन के बारे में लिखा था- ”गांधी जी ने सन 1920 में नागपुर की कांग्रेस में विदेशी सरकार का अन्याय और उत्पीड़न मिटाने के लिए आत्म बल का प्रयोग करने की बात कही थी और शांतिमय असहकार का मंत्र दिया था। किंतु उन्होंने उस समय अपने किसी दूत को अल्मोड़ा भेजा नहीं था। पहाड़ की जुझारू जनता ने शांत, असहयोग के युद्ध की विद्या गांधी जी के नाम पर स्वयं ही सीख ली और रक्तपात की एक भी घटना अपनी ओर से पैदा न होने देने की सावधानी रखते हुए जी-जान से उन्होंने बड़े-बड़े अधिकारियों से मोर्चा लिया। बागेश्वर के पास पुण्य सलिला सरयू में खड़े रह कर अंजलि से सूर्य भगवान को अर्ध्य चढ़ाते हुए, उन्होंने प्रतिज्ञा की कि मर जायेंगे, परन्तु बेगारी जुल्म को जरा भी बर्दाश्त नहीं करेंगे। इन सबका आत्म बल इतना ऊंचा सिद्ध हुआ कि तत्काल बेगारी के असुर को उत्तराखंड से विदा लेनी पड़ी। गांव-गांव में प्रत्येक घर के ऊपर बेगारी की बारी का जो क्रम बना हुआ था, उस क्रम वाली बहियों को सरयू जल में समाधि दे दी गई और ब्रिटिश सेना के गोरे सैनिकों का अत्याचार भी बेगारी को पुनः चालू नहीं करा सका। इस प्रकार भयानक पशुबल के सामने पहाड़ी भाइयों के आत्मबल ने शत प्रतिशत विजय पाई।”
भारत के स्वतंत्रता संग्राम और विभाजन का इतिहास आज की हर देश भक्त को दर्द से भर देता है। मध्य प्रदेश के इंदौर में युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष उदय भानु चिब द्वारा दिए गए बयान ने इसी इतिहास को एक बार फिर बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान स्वतंत्रता संग्राम के नेताओं का उल्लेख करते हुए ‘जिन्ना’ को सम्मानसूचक भाषा में याद करना वास्तव में शब्दों की चूक नहीं माना जा सकता। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इसे देश की स्वाधीनता के बलिदानियों के बलिदान का अपमान बताते हुए कांग्रेस की मानसिकता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। वस्तुत: यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह कांग्रेस के ऐतिहासिक फैसलों, उसकी वैचारिक दिशा और विभाजन की त्रासदी में उसकी भूमिका को फिर से कठघरे में लाता है।
क्या यह भुलाया जा सकता है कि जिन्ना 1947 के विभाजन के मुख्य प्रतीक और सूत्रधार थे? ऐसे व्यक्ति को “महापुरुष” जैसी भाषा में याद करना उन लाखों लोगों के घावों को कुरेदने जैसा है, जिन्होंने विभाजन के दौरान अपना घर, परिवार और जीवन खो दिया। निश्चित ही भाजपा नेता आशीष ऊषा अग्रवाल ने सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को जोरदार ढंग से उठाया है। उनका ये कहना, “पहले ओसामा जी, अब जिन्ना जी- यह कांग्रेस की सोच का आईना है।” वास्तव में इस सोच को देखकर आज यही कहना उचित होगा कि कांग्रेस की राजनीति में राष्ट्र पहले नहीं, बल्कि तुष्टिकरण और वैचारिक भ्रम सबसे पहले आता है।
आज हम यदि भारत विभाजन और इतिहास के आइने में देखें तो फिर से ये साफ हो जाता है कि जिन्ना का राजनीतिक जीवन विभाजनवादी था। आर.सी. मजूमदार अपनी ऐतिहासिक कृति The History and Culture of the Indian People में लिखते हैं कि 1937 के बाद जिन्ना ने मुस्लिम समुदाय के भीतर असुरक्षा और भय की भावना को राजनीतिक हथियार बनाया। यहीं से दो-राष्ट्र सिद्धांत को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाया गया। यह सिद्धांत इस विचार पर आधारित था कि हिंदू और मुस्लिम अलग-अलग राष्ट्र हैं और साथ नहीं रह सकते। यह अवधारणा भारत की साझा संस्कृति और इतिहास को नकारती थी, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को भी गहरा करती थी।
1940 का लाहौर प्रस्ताव इस दिशा में निर्णायक कदम साबित हुआ। बिपिन चंद्र अपनी पुस्तक India’s Struggle for Independence में लिखते हैं कि यह प्रस्ताव भारत के एकीकृत राष्ट्रवाद पर सीधा हमला था। जिन्ना ने इसे मुस्लिमों के राजनीतिक अधिकारों की रक्षा का माध्यम बताया, लेकिन वास्तव में यह विभाजन की औपचारिक घोषणा थी। इसके बाद की राजनीति में समझौते की संभावनाएं लगातार कमजोर होती गईं।
विभाजन की ओर बढ़ते कदमों में सबसे भयावह अध्याय 16 अगस्त 1946 का ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ था। जिन्ना द्वारा घोषित इस आंदोलन का उद्देश्य ब्रिटिश सरकार और कांग्रेस पर पाकिस्तान की मांग स्वीकार करने का दबाव बनाना था। रामचंद्र गुहा ने अपनी पुस्तक India After Gandhi में जानकारी दी है कि ‘इस दिन की हिंसा ने यह स्पष्ट कर दिया कि जिन्ना की राजनीति अब संवाद नहीं, टकराव और हिंसा के रास्ते पर चल पड़ी थी। कलकत्ता से शुरू हुई हिंसा ने पूरे देश में आग की तरह फैलकर हजारों लोगों की जान ले ली।’
यहां कांग्रेस की भूमिका भी सवालों के घेरे में आती है। स्वतंत्रता आंदोलन की अगुआ कांग्रेस विभाजन को रोकने में क्यों असफल रही? ए.जी. नूरानी (The Muslim League and the Partition of India) के अनुसार, कांग्रेस नेतृत्व जिन्ना की हठधर्मिता और ब्रिटिश सरकार की “फूट डालो और राज करो” नीति का सही आकलन नहीं कर पाया। कैबिनेट मिशन योजना, जोकि भारत को एक रखने का अंतिम अवसर थी, आपसी अविश्वास और राजनीतिक अहंकार की भेंट चढ़ गई।
1947 में माउंटबेटन योजना के तहत विभाजन को स्वीकार करना कांग्रेस का सबसे विवादास्पद निर्णय माना जाता है। जसवंत सिंह अपनी पुस्तक Jinnah: India, Partition, Independence में इसलिए ही इन्हीं सब तथ्यों की गहराई से पड़ताल करते हैं और बताते हैं कि सत्ता हस्तांतरण की जल्दबाजी ने कांग्रेस नेतृत्व को दीर्घकालिक परिणामों पर गंभीर विचार करने से रोक दिया। सीमाओं का निर्धारण जल्दबाजी में हुआ, जिससे अभूतपूर्व नरसंहार और विस्थापन हुआ। इस संदर्भ में उर्वशी बुटालिया की पुस्तक (The Other Side of Silence) भी देखी जा सकती है जो विभाजन को इतिहास का सबसे बड़ा मानवीय विस्थापन बताती हैं। करीब डेढ़ करोड़ लोग अपने घरों से उजड़ गए और लाखों मारे गए। यह त्रासदी सिर्फ जिन्ना की जिद का परिणाम नहीं कही जा सकती है, वास्तव में यह तो कांग्रेस की राजनीतिक कमजोरियों और गलत आकलनों का भी नतीजा थी।
आज, जब यूथ कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा जिन्ना का उल्लेख सम्मानजनक शब्दों में किया जाता है, तब यह इतिहास के उन तमाम घावों को फिर से हरा कर देता है जोकि संघर्ष, बलिदान और समर्पण से भरा हुआ है, इसमें असंख्य मासूमों की चीखें है, जिसके लिए निश्चित ही कांग्रेस कभी अपने को अपराध से मुक्त नहीं कर सकती है, क्योंकि वही इसके लिए पूरी तरह से जिम्मेदार है, क्योंकि नेतृत्वकर्ता भी उस वक्त वही थी।
ऐसे में भाजपा नेताओं का कहना है कि यह कांग्रेस की वही पुरानी मानसिकता है, जो तुष्टिकरण के लिए ऐतिहासिक सच्चाइयों को धुंधला करती है, एक तरह से देखें तो आज पूरी तरह से सही नजर आता है। उसके आचरण से तो यही भाव झलकता है कि कांग्रेस अब भी विभाजन के सबक से नहीं सीख पाई है। फिर प्रश्न शब्दों का नहीं, सोच का भी है, जोकि भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के बलिदानियों के साथ जिन्ना को “इतिहास का मुख्य पात्र” बनाकर ‘जी’ के सम्बोधन के साथ पेश करती है।
ऐसे में स्वभाविक तौर पर एक बार फिर कांग्रेस की वैचारिक दिशा पर गंभीर प्रश्न खड़े होते दिखते हैं। ये तो सभी को समझना होगा कि जिन्ना का नाम भारतीय इतिहास में विभाजन, हिंसा और अलगाव से जुड़ा रहेगा, इसे कोई कभी नकार नहीं सकता है, क्योंकि जब तक इतिहास का अस्तित्व है। जिन्ना भारत के लिए एक खलनायक ही है । कांग्रेस यदि आज भी इस सच्चाई को स्वीकार करने और अपनी ऐतिहासिक भूलों पर ईमानदार आत्ममंथन करने से बचती है, तब फिर यही समझा जाए कि वह भारत से वास्तविक प्रेम नहीं करती। उसका आचरण देशभक्ति के संदर्भ में सिर्फ दिखावा है !