उत्तराखंड में लगातार हो रही भारी बारिश और भूस्खलन के चलते चारधाम और हेमकुंड साहिब यात्रा को पांच सितंबर 2025 तक स्थगित कर दिया गया है।गढ़वाल मंडल आयुक्त, विनय शंकर पांडे ने मौसम विभाग द्वारा जारी रेड व ऑरेंज अलर्ट के मद्देनज़र यह निर्णय लिया।
आयुक्त ने बताया कि मौसम की गंभीर परिस्थितियों को देखते हुए यात्रियों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है। पर्वतीय क्षेत्रों में हो रहे भूस्खलन, रास्तों के क्षतिग्रस्त होने और बारिश के कारण बढ़े खतरे को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया है।उन्होंने श्रद्धालुओं से अपील की है कि वे फिलहाल यात्रा स्थलों की ओर रुख न करें । स्थानीय प्रशासन व मौसम विभाग की चेतावनियों का पालन करें।
बाल मुकुन्द ओझा राजस्थान विधानसभा के चौथे सत्र का पहला ही दिन सोमवार को हंगामे की भेंट चढ़ गया। दिल्ली की तर्ज़ पर राज्यों में भी कांग्रेस और सहयोगी दलों का एक सूत्री प्रोग्राम भाजपा शासित राज्यों में निर्वाचित सदनों को ठप्प करना है। ऐसा लगता है कांग्रेस ने अब तय कर लिया है कि वोट चोरी के आरोप को गरमाये रखना है। बिहार से शरू हुआ ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’ का यह अभियान अब राजस्थान में भी जोर-शोर से पहुंच गया है। कांग्रेस विधायकों के जोरदार हंगामे और नारेबाजी के बीच विधानसभा स्पीकर वासुदेव देवनानी ने हालांकि कड़ा रुख अपनाते हुए नाराजगी जाहिर की, मगर हंगामा करने वाले सदस्यों पर कोई असर नहीं हुआ। उन्होंने विधायकों को शांत रहने की हिदायत दी । कहा कि सदन की गरिमा बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है, यह कोई बाजार या चौराहा नहीं है। आधे घंटे के भारी शोर शराबे के बाद आखिर स्पीकर ने तीन सितम्बर तक सदन स्थगित कर दिया। आगे भी कार्यवाही शांति से चलेगी और जनता की समस्याओं को उठाया जायेगा, इसकी भी कोई गारंटी नहीं है। राहुल गाँधी ने एटम बम के बाद हाइड्रोजन बम के विस्फोट का ऐलान कर दिया है। पटना में उन्होंने ‘वोटर अधिकार यात्रा’ के समापन के मौके पर यह दावा किया कि वोट चोरी का “हाइड्रोजन बम” आने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जनता को अपना चेहरा नहीं दिखा पाएंगे। राहुल गाँधी पिछले कई सालों से मोदी सहित अन्य संवैधानिक संस्थाओं पर सनसनी खेज आरोप लगाते रहे है। अब राजस्थान के कांग्रेसी कहां पीछे रहने वाले थे, उन्होंने भी अपने नंबर बढ़ाने के लिए वोट चोरी का मुद्दा लपक लिया। देश की संसद और राज्यों की विधानसभाएं आजकल लगातार हंगामे की शिकार हो रही है। विधायिका की सार्थकता पर अब सवाल उठने लगे हैं। समूचे देश की विधायिकाओं में स्वस्थ और रचनात्मक वाद विवाद और बहस के बजाय हंगामा ही हो रहा है। लगता है विपक्ष का एकमात्र काम हंगामा ही रह गया है। किसी न किसी बहाने हंगामा करना स्वस्थ बहस से ज्यादा जरुरी हो गया है। विरोध का भी एक तरीका होता है। कहावत है पीने वाले को पीने का बहाना चाहिए और हंगामा करने वाले को हंगामे का बहाना चाहिए और बहाना मिल गया है वोट चोरी का। साफ है कि विपक्ष को विधान सभा ठप करने का बहाना चाहिए। सच तो यह है कांग्रेस उन मसलों की खोज करती दिख रही है जिनके जरिये हंगामा किया जा सके और अब हंगामे का मतलब किसी मसले पर सरकार से जवाब मांगना या किसी मसले पर कार्रवाई करना नहीं, बल्कि ऐसे हालात पैदा करना होता है जिससे वहां कोई काम ही न हो सके। इसके भरे-पूरे आसार हैं कि अगर कांग्रेस हंगामा करने लायक कोई मसले नहीं खोज पाई तो उसे ऐसे मसले उपलब्ध करा दिए जाएंगे। अब यह मसला बिहार चुनाव और वोट चोरी के कथित आरोप ने कांग्रेस के हाथों में थमा दिया है। इससे बुरी बात और कोई नहीं हो सकती कि देश और प्रदेश विधायकी चलने की बाट जोहे और कुछ राजनीतिक दल अपना सारा जोर निर्वाचित सदनों को न चलने देने में लगाएं। यह सही है कि विधायकी सत्र पहले भी बर्बाद हुए हैं। मगर अब हर छोटी मोटी बात पर संसद में हंगामा मामूली बात रह गया है। 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद पक्ष और विपक्ष में जो कटुता देखने को मिली वह लोकतंत्र के हित में नहीं कही जा सकती। इससे हमारी लोकतान्त्रिक प्रणाली का ह्रास हुआ है। आज सत्ता और विपक्ष के आपसी सम्बन्ध इतने खराब हो गए है की आपसी बात तो दूर एक दूसरे को फूटी आँख भी नहीं सुहाते। दुआ सलाम और अभिवादन भी नहीं करते। औपचारिक बोलचाल भी नहीं होती। लोकतंत्र में सत्ता के साथ विपक्ष का सशक्त होना भी जरुरी है मगर इसका यह मतलब नहीं है की कटुता और द्वेष इतना बढ़ जाये की गाली गलौज की सीमा भी लाँघी जाये। हमारे देश में राजनीतिक माहौल इतना कटुतापूर्ण हो गया है कि लोकतांत्रिक राजनीति के इतिहास में कहीं नहीं हुआ होगा। भारतीय राजनीति में विपक्ष का अर्थ, जो सत्ता में नहीं है, से है। विपक्ष के रूप में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है। स्वस्थ विपक्ष का कार्य सरकार की सकारात्मक तरीके से आलोचना करना होना चाहिए। स्वस्थ विपक्ष के रूप में विपक्ष को जनता के हित से जुड़े मुद्दों पर सरकार की आलोचना व बहस करना चाहिए। आज स्थिति बिलकुल उलट है। वर्तमान के विपक्षी दलों में न तो विचारों के साथ चलने को लेकर कोई उत्साह है, न प्रतिबद्धता।
बाल मुकुन्द ओझा वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
लड़कियों की शिक्षा के लिए काम करने वाली भारतीय संस्था ‘एजुकेट गर्ल्स’ को वर्ष 2025 के रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेताओं में शामिल किया गया है। एशिया का प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त करने वाली पहली भारतीय संस्था बनकर इसने इतिहास रच दिया है।यह संस्था दूरदराज के गांवों में स्कूल न जाने वाली लड़कियों की शिक्षा के माध्यम से सांस्कृतिक रूढ़िवादिता को दूर करने का प्रयास करती है।
एशिया के सबसे बड़े अवार्ड का नाम रेमन मैग्सेसे अवार्ड (Ramon Magsaysay Award) है। रेमन मैग्सेसे अवार्ड की तुलना दुनिया के सबसे बड़े अवार्ड नोबेल अवार्ड से की जाती है। दुनिया के ज्यादातर नागरिकों का स्पष्ट मत है कि एशिया में रेमन मैग्सेसे अवार्ड की हैसियत वही है जो विश्व में नोबेल अवार्ड की है।
‘एजुकेट गर्ल्स ’भारत की बेटियों को शिक्षित करने का काम कर रही है। भारत की जो बेटियां किसी भी कारण से शिक्षा प्राप्त करने से वंचित रह जाती हैं उन बेटियों को शिक्षा का अधिकार दिलाने का बीड़ा ‘एजुकेट गल्र्स’ ने उठा रखा है। ‘एजुकेट गर्ल्स’ की स्थापना सफीना हुसैन ने की थी। शुरूआती दिनों में संस्था मुस्लिम समाज में अधिक सक्रिय थी। धीरे-धीरे इस संस्था ने भारत के हर वर्ग में कामकाज शुरू कर दिया।
एजुकेट गर्ल्स की संस्थापक सफीना हुसैन ने कहा – यह उपलब्धि हमारी टीम, बालिका स्वयंसेवकों, पार्टनर्स, समर्थकों और सबसे बढक़र उन बच्चियों के नाम है, जिन्होंने अपनी सबसे बड़ी ताकत, शिक्षा को फिर से हासिल किया। आने वाले दस वर्षों में एजुकेट गर्ल्स एक करोड़ से भी ज़्यादा शिक्षार्थियों तक पहुँचने का है।
एजुकेट गर्ल्स की सीईओ गायत्री नायर लोबो ने कहा – हमारे लिए शिक्षा सिर्फ़ विकास का साधन नहीं, बल्कि हर लडक़ी का बुनियादी अधिकार है। यह सम्मान इस बात का प्रमाण है कि जब सरकार, कॉरपोरेट, डोनर्स और समुदाय मिलकर काम करते हैं, तो गहरी सामाजिक और संरचनात्मक चुनौतियों को बदला जा सकता है। हम भारत सरकार के प्रयासों और सहयोग के लिए आभारी हैं, जिन्होंने इस मिशन को संभव बनाया।
2007 में स्थापित एजुकेट गर्ल्स आज तक 30,000 से अधिक गाँवों में अपनी पहुँच बना चुकी है। 55,000 से ज्यादा सामुदायिक स्वयंसेवकों के सहयोग से संस्था ने 20 लाख से अधिक बशिक्षा से जोडऩे के लिए प्रेरित किया है और 24 लाख से ज्यादा बच्चों की पढ़ाई को बेहतर बनाया है। आने वाले समय में एजुकेट गर्ल्स का लक्ष्य एक करोड़ से अधिक बच्चों तक पहुँचना है, ताकि शिक्षा के माध्यम से गऱीबी और अशिक्षा के चक्र को तोड़ा जा सके। एजुकेट गर्ल्स एक सामाजिक संस्था है जो राज्य सरकारों के साथ मिलकर ग्रामीण और शैक्षिक रूप से पिछड़े इलाकों में लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देती है। इसका काम ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’, ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम’ और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के उद्देश्यों के अनुरूप है। 2007 से अब तक, संस्था ने राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार के 30 हज़ार से अधिक गांवों में 20 लाख से ज़्यादा लड़कियों का स्कूल में दाखिला करवाने मे मदद की है। इसके साथ ही 55,000 से अधिक सामुदायिक वालंटियर्स का नेटवर्क भी खड़ा किया है।
यह पुरस्कार हर साल 31 अगस्त को फिलीपींस के पूर्व राष्ट्रपति रेमन मैग्सेसे की जयंती पर दिया जाता है। आरएमएएफ का न्यासी बोर्ड एक गोपनीय नामांकन प्रक्रिया और अपनी जांच के बाद विजेताओं का चयन करता है। विजेताओं को एक प्रमाण पत्र और एक पदक प्रदान किया जाता है।
सफीना हुसैनके नेतृत्व में एक छोटी स्थानीय टीम ने राजस्थान के पाली जिले के 50 स्कूलों में प्रारंभिक परीक्षण परियोजना का संचालन किया । यह 50-स्कूल परियोजना राजस्थान शिक्षा पहल (आरईआई) के तत्वावधान में शुरू की गई थी। यह पहल 2008 में 500 स्कूलों से शुरू होकर 2013 में 4,425 से अधिक स्कूलों तक पहुँच गई, जिसका उद्देश्य ग्रामीण राजस्थान में लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देना था और सफीना ने एक स्थायी मॉडल तैयार किया जहाँ पूरा समुदाय लड़कियों को सरकारी स्कूलों में दाखिला दिलाने के लिए हाथ से काम करता है और सामुदायिक भागीदारी के कारण यह पहल सफल हुई।
आज पूरे देश में बाढ़ का प्रकोप है। नदियों की बाढ़ से रास्ते बंद हैं।सड़कों में पानी भरा है।स्कूल भवनों की हालत बहुत खराब है। ऐसे में स्कूल खोलकर बच्चों और शिक्षकों की जान से खिलवाड़ किया जा रहा है। बच्चों को देश का भविष्य बताया जाता है।, किंतु इस देश के भविष्य की चिंता किसी को नही। देश और समाज की पहली चिंता बच्चों की सुरक्षख होनी चाहिए, किंतु इस विषय पर किसी का ध्यान नहीं।बारिश और बाढ़ की स्थिति में बच्चों और शिक्षकों को स्कूल बुलाना उनकी जान से खिलवाड़ है। जर्जर इमारतें, गंदगी, जलभराव और यातायात बाधाएँ पहले से ही खतरनाक हालात पैदा कर चुकी हैं। ऐसे में पढ़ाई से ज़्यादा बच्चों की सुरक्षा पर ध्यान देना ज़रूरी है। शिक्षा तभी सार्थक है जब बच्चे सुरक्षित माहौल में सीखें। सरकार को चाहिए कि संकट की घड़ी में औपचारिकताओं से ऊपर उठकर तुरंत अवकाश घोषित करे, ताकि संभावित हादसों से बचा जा सके।
– डॉ. सत्यवान सौरभ
बरसात का मौसम बच्चों के लिए रोमांच और खेलने का समय माना जाता है, लेकिन जब यही मौसम बाढ़, गंदगी और जीवन-जोखिम का कारण बन जाए, तब सवाल उठता है कि हमारी व्यवस्था आखिर बच्चों और शिक्षकों की सुरक्षा के प्रति कितनी संवेदनशील है। हाल ही में हरियाणा प्रदेश के 18 जिलों में बाढ़ का हाई अलर्ट घोषित होने के बावजूद स्कूलों को बंद न करने का निर्णय इस संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।
स्कूल भवनों की जर्जर हालत किसी से छिपी नहीं है। कई जगहों पर दीवारों में दरारें हैं, छतों से पानी टपकता है और फर्श गीले होकर दुर्घटनाओं को न्यौता देते हैं। जिन इमारतों में सामान्य दिनों में पढ़ाई मुश्किल हो, वहां लगातार बारिश के दौरान बच्चों और स्टाफ की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जा सकती है? कई सरकारी और ग्रामीण स्कूल तो वैसे भी मरम्मत और रखरखाव के अभाव में खंडहर जैसी स्थिति में हैं।
साफ-सफाई की समस्या भी गंभीर है। गंदगी, पानी भराव और खुले नाले स्कूल परिसरों को अस्वस्थ और खतरनाक बना देते हैं। बारिश के दिनों में मच्छरों और संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में बच्चों को स्कूल बुलाना केवल उनकी जान से खिलवाड़ करना है।
यही नहीं, बाढ़ और जलभराव के कारण परिवहन व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हो जाती है। बच्चे और शिक्षक स्कूल तक पहुँचने में भारी कठिनाइयों का सामना करते हैं। कई इलाकों में सड़कों पर घुटनों-घुटनों पानी भरा होता है, कहीं पुल टूटे हैं तो कहीं नदियाँ उफान पर हैं। बच्चों का ऐसे हालात में रोज़ाना आना-जाना केवल प्रशासन की संवेदनहीनता का उदाहरण है।
सबसे हैरानी की बात यह है कि सरकार और उच्च अधिकारी जानते हुए भी स्कूल बंद करने का आदेश नहीं देते। यह निर्णय किसी मजबूरी से अधिक औपचारिकता जैसा लगता है—जैसे केवल आदेश देकर अपनी ज़िम्मेदारी निभा दी गई हो। सवाल यह उठता है कि क्या बच्चों की सुरक्षा से बढ़कर भी कोई औपचारिकता हो सकती है? अगर हादसा हो जाए तो क्या प्रशासन की यह चुप्पी और लापरवाही माफ़ की जा सकेगी?
दुनिया भर में आपदा और संकट के समय शिक्षा व्यवस्था पर अस्थायी रोक लगाना कोई नई बात नहीं है। कोरोना काल में महीनों तक स्कूल बंद रहे और वैकल्पिक माध्यमों से शिक्षा को आगे बढ़ाया गया। जब महामारी के दौर में बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि मानी गई, तो बाढ़ और प्राकृतिक आपदा की स्थिति में वही संवेदनशीलता क्यों नहीं दिखाई जाती?
यहाँ तर्क दिया जा सकता है कि पढ़ाई का नुकसान न हो, इसलिए स्कूल बंद नहीं किए जा सकते। लेकिन क्या पढ़ाई का महत्व बच्चों और शिक्षकों की जान से बड़ा है? शिक्षा तभी सार्थक है जब छात्र और शिक्षक सुरक्षित हों। गीली और टूटती छतों के नीचे, पानी से भरे आंगनों में और बीमारी के खौफ में पढ़ाई कराने का निर्णय शिक्षा नहीं, बल्कि मजबूरी और लापरवाही कहलाएगी।
दरअसल, असली समस्या हमारी नीति और नीयत दोनों की है। जिन अधिकारियों को स्थानीय हालात देखकर तुरंत निर्णय लेना चाहिए, वे केवल ऊपर से आए आदेशों का इंतज़ार करते रहते हैं। और ऊपर बैठे नीति-निर्माता आमतौर पर कागज़ी रिपोर्टों और फाइलों के आधार पर निर्णय लेते हैं। नतीजा यह होता है कि जमीनी हालात और सरकारी आदेशों के बीच बड़ा अंतर रह जाता है।
आज ज़रूरत इस बात की है कि शिक्षा विभाग और आपदा प्रबंधन विभाग मिलकर एक स्पष्ट नीति बनाएँ। इसमें यह तय हो कि किन परिस्थितियों में स्वतः स्कूल बंद माने जाएँगे। जैसे – जब किसी जिले में बाढ़ का हाई अलर्ट जारी हो, जब लगातार बारिश से जीवन अस्त-व्यस्त हो जाए, या जब भवनों की सुरक्षा संदिग्ध हो। इससे निचले स्तर के अधिकारी समय रहते फैसला ले सकेंगे और बच्चों को जोखिम से बचाया जा सकेगा।इसके साथ-साथ स्कूल भवनों की नियमित मरम्मत और रखरखाव पर भी ज़ोर दिया जाना चाहिए। हर बरसात में छत टपकना और दीवारें गिरना हमारी शिक्षा व्यवस्था की पोल खोल देता है। यदि बच्चों के लिए सुरक्षित भवन तक उपलब्ध नहीं करा सकते तो फिर शिक्षा के अधिकार की बातें खोखली साबित होती हैं।
एक और पहलू पर ध्यान देना ज़रूरी है। जब सरकारें ‘स्मार्ट क्लास’, ‘डिजिटल एजुकेशन’ और ‘न्यू एजुकेशन पॉलिसी’ की बात करती हैं, तो क्यों न आपदा के समय ऑनलाइन या वैकल्पिक शिक्षा का सहारा लिया जाए? बच्चों की पढ़ाई बिना उनकी सुरक्षा से समझौता किए जारी रखी जा सकती है। लेकिन दुर्भाग्य है कि ऐसे दूरदर्शी कदमों की जगह केवल आदेश जारी करने की औपचारिकता निभाई जाती है।
बच्चे देश का भविष्य हैं—यह वाक्य हम बार-बार सुनते हैं। लेकिन जब इस भविष्य को सुरक्षित रखने का समय आता है, तो हमारी व्यवस्था सबसे ज्यादा असफल साबित होती है। बारिश और बाढ़ जैसे हालात में स्कूलों को खुला रखना बच्चों और शिक्षकों दोनों की जान को खतरे में डालने जैसा है। यह केवल संवेदनहीनता ही नहीं, बल्कि लापरवाही की पराकाष्ठा है।अब समय आ गया है कि सरकारें औपचारिकताओं से आगे बढ़कर वास्तव में बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता दें। स्कूलों को तुरंत बंद किया जाए और हालात सामान्य होने पर ही पुनः खोला जाए। शिक्षा का असली उद्देश्य तभी पूरा होगा जब बच्चे सुरक्षित माहौल में पढ़ें और सीखें। यदि यह न्यूनतम सुरक्षा भी सुनिश्चित नहीं की जा सकती, तो शिक्षा व्यवस्था पर गहन प्रश्नचिह्न खड़े होते हैं।
संवेदनशील शासन वही है जो संकट की घड़ी में अपने नागरिकों—खासकर बच्चों—की सुरक्षा सुनिश्चित करे। यदि इस बुनियादी दायित्व में भी हम असफल रहते हैं, तो विकास, शिक्षा और प्रगति के सारे दावे केवल खोखले नारे भर रह जाएंगे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली के यशोभूमि में सेमीकॉन इंडिया-2025 का उद्घाटन किया। सेमीकॉन इंडिया-2025 भारत का सबसे बड़ा सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स शो है। इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच अप्रैल-जून में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था ने सभी उम्मीदों से बेहतर प्रदर्शन किया। उन्होंने कहा, दुनिया भारत पर भरोसा करती है। भारत में विश्वास करती है और भारत के साथ सेमीकंडक्टर का भविष्य बनाने के लिए तैयार है। सेमीकॉन इंडिया-2025 चौथा संस्करण है। अब तक के इस सबसे बड़े आयोजन में 48 देशों की 350 से अधिक कंपनियां और रिकॉर्ड संख्या में वैश्विक प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं। इस पहल का उद्देश्य भारत को सेमीकंडक्टर महाशक्ति बनाना है।सेमीकॉन इंडिया सम्मेलन का उद्घाटन करने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, तेल काला सोना था, लेकिन चिप्स (सेमीकंडक्टर) हीरे हैं।
दो से चार सितंबर तक चलने वाला यह तीन दिवसीय सम्मेलन भारत में एक मजबूत, लचीले व टिकाऊ सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र को आगे बढ़ाने पर केंद्रित होगा। सेमीकंडक्टर आधुनिक तकनीक का हृदय हैं। ये स्वास्थ्य, परिवहन, संचार, रक्षा और अंतरिक्ष जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए बेहद अहम है। जैसे-जैसे दुनिया डिजिटलाइजेशन और ऑटोमेशन की ओर बढ़ रही है, सेमीकंडक्टर आर्थिक सुरक्षा और रणनीतिक स्वतंत्रता का आधार बन गए हैं। यह सम्मेलन सेमीकंडक्टर फैब, एडवांस पैकेजिंग, स्मार्ट मैन्युफैक्चरिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर केंद्रित होगा। इसमें डिजाइन लिंक्ड इंसेंटिव योजना, स्टार्टअप इकोसिस्टम की प्रगति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसे मुद्दे भी शामिल होंगे
सम्मेलन में 150 से अधिक वक्ता और 50 से ज्यादा वैश्विक नेता भाग लेंगे। साथ ही 350 से अधिक प्रदर्शक अपनी तकनीकी क्षमताएं पेश करेंगे। छह देशों की राउंडटेबल चर्चाएं, स्टार्टअप और वर्कफोर्स डेवलपमेंट के लिए विशेष पवेलियन भी इस आयोजन का हिस्सा होंगे।2021 में इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (आईएसएम) शुरू होने के बाद केवल चार वर्षों में भारत ने अपनी सेमीकंडक्टर यात्रा के विजन को वास्तविकता में बदल दिया है। इस विजन को मजबूत करने के लिए सरकार ने 76,000 करोड़ की प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) योजना शुरू की है।
हरियाणा के करनाल से गिरफ्तार आम आदमी पार्टी के विधायक हरमीत सिंह पठानमाजरा पुलिस हिरासत से फरार हो गए हैं। मंगलवार की सुबह हरियाणा पुलिस उन्हें करनाल से गिरफ्तार करने के बाद पुलिस उन्हें थाने ले जा रही थी, तभी पठानमाजरा और उनके साथियों ने पुलिसकर्मियों पर फायरिंग कर दी । गाड़ी चढ़ाने की कोशिश की। इससे एक पुलिसकर्मी घायल हो गया।
पठान माजरा और उनके साथी एक स्कॉर्पियो और एक फॉर्च्यूनर में फरार हो गए। पुलिस ने फॉर्च्यूनर को पकड़ लिया है।पुलिस टीम स्कॉर्पियो में फरार विधायक का पीछा कर रही है।
पंजाब के पटियाला जिले के सनौर हल्के से विधायक हरमीत सिंह पठान माजरा को पुलिस ने हरियाणा के करनाल के गांव डबरी से गिरफ्तार किया था। जानकारी के अनुसार यह गिरफ्तारी धारा 376 के एक पुराने मामले में की गई है।
“प्रकृति चेतावनी देती है, रुष्ट नहीं होती – असली वजह इंसानी लापरवाही और असंतुलित विकास”
पंजाब में बाढ़ को केवल प्राकृतिक आपदा कहना सही नहीं होगा। नदियों का स्वरूप, असामान्य बारिश और जलवायु परिवर्तन तो कारण हैं ही, लेकिन असली दोषी अनियोजित निर्माण, अवैध खनन, ड्रेनेज की उपेक्षा और धान-प्रधान कृषि पद्धति भी है। प्रकृति चेतावनी देती है, रुष्ट नहीं होती। यदि हम नदियों को उनका मार्ग दें, जल का विवेकपूर्ण उपयोग करें और फसल विविधिकरण अपनाएँ, तो बाढ़ की मार को कम किया जा सकता है। पंजाब को चाहिए कि वह पर्यावरण के साथ संतुलन बनाकर विकास की नई राह तय करे।
– डॉ प्रियंका सौरभ
पंजाब, जिसे देश की अन्नदाता भूमि कहा जाता है, आज बाढ़ की विभीषिका से बार-बार जूझ रहा है। खेत जलमग्न हो जाते हैं, गाँव डूब जाते हैं, सड़कें और मकान ढह जाते हैं। हर बार यह सवाल उठता है कि आखिर पंजाब में बाढ़ क्यों आती है? क्या यह केवल प्रकृति की रुष्टता है या फिर इसके पीछे कहीं न कहीं हमारी अपनी भूलें भी जिम्मेदार हैं? सच यह है कि प्रकृति कभी किसी से नाराज़ नहीं होती, वह केवल अपने नियमों और संतुलन के आधार पर काम करती है। जब हम इंसान उसकी मर्यादाओं को लांघते हैं, तो परिणाम हमें बाढ़, सूखा, प्रदूषण और आपदा के रूप में भुगतने पड़ते हैं।
पंजाब की धरती पाँच नदियों की भूमि कहलाती है। सतलुज, ब्यास, रावी, चिनाब और झेलम ने इस राज्य की पहचान बनाई। इनमें से अधिकांश नदियाँ हिमालय से निकलती हैं और मानसून के मौसम में बर्फ़ पिघलने व वर्षा के कारण जलस्तर अचानक बढ़ा देती हैं। नदियों की धाराएँ तेज़ होती हैं और जब वे मैदानों में प्रवेश करती हैं तो पानी फैलकर बाढ़ का रूप ले लेता है। भाखड़ा, पोंग और रणजीत सागर जैसे बड़े बांध भले ही बाढ़ नियंत्रण और सिंचाई के लिए बने हों, लेकिन जब इनसे अचानक पानी छोड़ा जाता है तो आसपास के इलाके जलमग्न हो जाते हैं। यह प्राकृतिक कारणों के साथ-साथ प्रबंधन की कमी को भी उजागर करता है।
पिछले कुछ वर्षों में मानसून का पैटर्न काफी बदल गया है। पहले जहाँ बरसात धीरे-धीरे और लंबे समय तक होती थी, अब अचानक भारी वर्षा कम समय में हो जाती है। इससे नदियों और नालों में पानी का दबाव तेजी से बढ़ता है और फ्लैश फ्लड जैसी स्थिति पैदा हो जाती है। जलवायु वैज्ञानिक मानते हैं कि ग्रीनहाउस गैसों का बढ़ना और ग्लोबल वार्मिंग इसका बड़ा कारण है। इससे हिमालयी ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं। परिणामस्वरूप गर्मियों और बरसात के मौसम में नदियों का जलस्तर अनियंत्रित ढंग से बढ़ जाता है।
प्राकृतिक बाढ़ को विनाशकारी बनाने में सबसे बड़ी भूमिका इंसानी हस्तक्षेप की है। नदियों के किनारों और तलहटी में अंधाधुंध निर्माण कार्य हुए। गाँव और शहर नालों व पुरानी जलधाराओं पर बस गए। रेत और बजरी का अत्यधिक खनन नदियों की गहराई और धार बदल देता है। जब पानी का मार्ग रुकता है तो वह आसपास की बस्तियों में घुस आता है। पंजाब में ड्रेन और नहरों का जाल तो है लेकिन अधिकांश जगह इनकी सफाई व मरम्मत समय पर नहीं होती। नतीजतन बारिश का पानी निकलने की जगह वापस गाँव-शहरों में भर जाता है। इसके साथ ही धान जैसी फसलों ने भूजल का अत्यधिक दोहन किया। मिट्टी की जलधारण क्षमता कम हुई और प्राकृतिक जलसंचयन तंत्र टूट गया।
पंजाब हरित क्रांति का केंद्र रहा। यहाँ गेहूँ और चावल की खेती ने देश को अन्न सुरक्षा दी, लेकिन इसके दुष्परिणाम भी सामने आए। धान की फसल पानी की अत्यधिक मांग करती है। हर साल लाखों ट्यूबवेल से भूजल निकाला गया। इससे भूमिगत जलस्रोत तेजी से सूख गए। जब ऊपर से भारी बारिश या बाढ़ आई तो जमीन उसे सोख नहीं पाई और जलभराव की समस्या बढ़ गई। वनों की कटाई और हरित क्षेत्र के सिकुड़ने से भी प्राकृतिक संतुलन बिगड़ा। नदियों के किनारे पेड़ों की जड़ें पानी को रोकती और मिट्टी को बांधती थीं, लेकिन अब कटान तेज़ हो गया है।
पंजाब में बाढ़ केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक संकट भी है। हजारों एकड़ फसलें बर्बाद हो जाती हैं। किसान कर्ज़ में डूब जाते हैं। ग्रामीण आबादी बेघर हो जाती है और पलायन के लिए मजबूर होती है। सड़कों, पुलों और बिजली के ढांचे को भारी क्षति पहुँचती है। बीमारियों का प्रकोप फैलता है, खासकर डायरिया, मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियाँ। मानसिक आघात से समाज में असुरक्षा और हताशा की भावना पनपती है।
वास्तव में प्रकृति का कोई भाव नहीं होता। वह केवल संतुलन चाहती है। जब हम उसकी मर्यादाओं का उल्लंघन करते हैं, तब वह चेतावनी के रूप में बाढ़, सूखा या आपदा के रूप में सामने आती है। इसलिए यह कहना कि प्रकृति नाराज़ है, सही नहीं है। सच तो यह है कि इंसान ने प्रकृति को नाराज़ करने लायक हालात पैदा कर दिए हैं।
समाधान स्पष्ट हैं। नदियों के किनारे बाढ़ क्षेत्र को चिन्हित कर वहाँ निर्माण पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। पुराने नालों और ड्रेनों की नियमित सफाई व चौड़ाई बढ़ाई जानी चाहिए। अवैध खनन पर सख्ती से रोक लगनी चाहिए ताकि नदियाँ अपने प्राकृतिक स्वरूप में बह सकें। धान के स्थान पर मक्के, दालों और सब्जियों की खेती को बढ़ावा दिया जाए, जिससे पानी की खपत कम होगी और भूजल का स्तर सुधरेगा। राज्य और केंद्र सरकार को मिलकर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए दीर्घकालिक योजना बनानी होगी। साथ ही स्थानीय लोगों को बाढ़ से बचाव और प्रबंधन के लिए प्रशिक्षित करना भी आवश्यक है।
पंजाब में बाढ़ का संकट केवल प्राकृतिक कारणों से नहीं है। यह हमारी विकास नीतियों की असंतुलित दिशा का परिणाम है। यदि हमने अभी भी सबक नहीं लिया तो आने वाले वर्षों में बाढ़ और भयावह हो सकती है। प्रकृति हमें बार-बार चेतावनी दे रही है कि उसके साथ छेड़छाड़ मत करो। हमें याद रखना होगा कि प्रकृति से लड़ाई नहीं, बल्कि उसके साथ तालमेल ही स्थायी समाधान है। पंजाब में बाढ़ केवल आपदा नहीं, बल्कि हमारी नीतियों, आदतों और प्राथमिकताओं की परीक्षा ह
चीन के तियानजिन में SCO सम्मेलन के दौरान पीएम मोदी और शी चिनफिंग की मुलाकात हुई। पिछले एक साल में यह उनकी दूसरी बैठक है। पीएम मोदी ने शी चिनफिंग को 2026 में भारत में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए आमंत्रित किया जिस पर चिनफिंग ने समर्थन का भरोसा दिया। दोनों नेताओं ने आपसी सहयोग और वैश्विक मुद्दों पर चर
शंघाई सहयोग संगठन सम्मेलन मोदी और चिनफिंग की तियानजिन में मुलाकात
पीएम मोदी ने शी जिनपिंग को 2026 भारत में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए न्योता दिया।दोनों नेताओं ने व्यापार, सीमा विवाद और आतंकवाद जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा की।
, नई दिल्ली। चीन के तियानजिन में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (SCO) सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग की मुलाकात हुई। यह दोनों नेताओं की पिछले एक साल में दूसरी बैठक है। पिछली बार अक्टूबर 2024 में कजान में मुलाकात हुई थी।
भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने बताया कि बैठक में पीएम मोदी ने शी चिनफिंग को 2026 में भारत में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए आमंत्रित किया। इस पर चिनफिंग ने धन्यवाद देते हुए भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता को पूरा समर्थन दिया
बैठक में वैश्विक और क्षेत्रीय मुद्दों पर भी बात हुई। पीएम मोदी ने चीन की मौजूदा SCO अध्यक्षता का समर्थन किया । तियानजिन सम्मेलन के लिए शुभकामनाएं दीं। दोनों नेताओं ने माना कि भारत और चीन की अर्थव्यवस्था वैश्विक व्यापार को स्थिर करने में अहम भूमिका निभा सकती
इस दौरान आपसी व्यापार घाटा कम करने, निवेश को बढ़ाने और नीतियों में पारदर्शिता लाने पर सहमति बनी। दोनों नेताओं के बीच सीमा मुद्दे पर भी चर्चा हुई। पीएम मोदी ने कहा कि सीमा पर शांति और स्थिरता जरूरी है ताकि रिश्ते सहज रूप से आगे बढ़ सकें।दोनों नेताओं ने पिछले साल हुए सफल डिसएंगेजमेंट की सराहना की और तय किया कि आगे भी बातचीत और मौजूद तंत्र से शांति बनाए रखी जाएगी। इसके अलावा, दोनों ने आतंकवाद से लड़ने, सीमा पार पर सहयोग और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने जैसे मुद्दों पर भी चर्चा की।
शी चिनफिंग ने रिश्ते मजबूत करने के लिए चार सुझाव दिए
रणनीतिक संवाद बढ़ाना और आपसी भरोसा गहरा करना।
सहयोग और संपर्क बढ़ाना।
दोनों देशों के लिए विन-विन नतीजे सुनिश्चित करना।
बहुपक्षीय मंचों पर मिलकर काम करना।
पीएम मोदी ने इन सुझावों का स्वागत किया और कहा कि भारत-चीन प्रतिस्पर्धी नहीं बल्की साझेदार हैं। दोनों नेताओं ने सहमति जताई कि उनके साझा हित मतभेदों से कहीं बड़े हैं और मतभेदों को विवाद में नहीं बदलना चाहिए।
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में भूस्खलन से एनएचपीसी टनल का मुहाना बंद, 11 लोग अभी भी फंसे, रेस्क्यू जारी
उत्तराखंड से मिली सूचना के अनुसार पिथौरागढ़ में एनएचपीसी की टनल का मुहाना भूस्खलन के कारण बंद हो गया है। 19 लोग फंस गए थे। जिनमें से 8 को रेस्क्यू किया जा चुका है। 11 लोग अभी भी फंसे हैं।
मौसम विभाग ने कहा है कि सितंबर में भी सामान्य से अधिक बारिश होने की संभावना है। इस कारण इस महीने भी उत्तराखंड में भूस्खलन और बादल फटने से अचानक बाढ़ आ सकती है। साथ ही दक्षिण हरियाणा, दिल्ली और उत्तर राजस्थान में सामान्य जनजीवन अस्त-व्यस्त हो सकता है।
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने रविवार को कहा कि सितंबर, 2025 में मासिक औसत वर्षा, दीर्घावधि औसत 167.9 मिलीमीटर के 109 प्रतिशत से अधिक होने की संभावना है। विभाग के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्र ने चेतावनी दी, ”कई नदियां उत्तराखंड से निकलती हैं। इसलिए भारी वर्षा का मतलब है कि कई नदियां उफान पर होंगी । इसका असर निचले इलाकों के शहरों और कस्बों पर पड़ेगा। ”