गुवाहाटी, 13 जनवरी (हि.स.)। असम के मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत बिस्व सरमा ने माघ बिहू के उरुका के दिन मंगलवार काे असम की सांस्कृतिक जगत के प्रतिष्ठित व्यक्तित्व और प्रसिद्ध कलाकार समर हजारिका के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है।
मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया पर अपने शोक संदेश में कहा कि समर हजारिका के निधन का समाचार अत्यंत मर्माहत करने वाला है और यह असम की सांस्कृतिक जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। उन्होंने कहा कि दिवंगत कलाकार ने अपने गायन और रचनात्मक योगदान से असमिया संगीत और सिनेमा को समृद्ध किया।
समर हजारिका, महान गायक और सांस्कृतिक प्रतीक डॉ. भूपेन हजारिका के कनिष्ठ भ्राता थे। उन्होंने आकाशवाणी और विभिन्न संगीत एलबमों के लिए गीत गाए, साथ ही कई असमिया फिल्मों में पार्श्वगायक के रूप में ख्याति अर्जित की। उनकी आवाज में सजी ‘प्रथम मरमे जदि’ और ‘इ जे रणांगणर कहानी’ जैसी कालजयी रचनाएं आज भी श्रोताओं के हृदय में जीवंत हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि समर हाज़रिका का निधन ऐसी क्षति है जिसकी भरपाई संभव नहीं है। इस शोकाकुल क्षण में उन्होंने दिवंगत आत्मा की चिरशांति की कामना की और शोकसंतप्त परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की।
मशहूर गायक समर हजारिका का निधन
गुवाहाटी, 13 जनवरी (हि.स.)। असम के दिग्गज गायक भूपेन हजारिका के छोटे भाई और मशहूर गायक-संगीतकार समर हजारिका का निधन हो गया है। वे लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे। परिवार की ओर से उनके निधन की पुष्टि की गई है।
हाल ही में अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद मंगलवार 13 जनवरी को गुवाहाटी के निजारापार स्थित अपने आवास पर उन्होंने अंतिम सांस ली। 75 वर्षीय समर हजारिका अपने पीछे पत्नी, एक बेटा और एक बेटी छोड़ गए हैं। उनके निधन से असम की सांस्कृतिक दुनिया में शोक की लहर दौड़ गई है।
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने जताया शोक
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने समर हजारिका के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि समर की भावपूर्ण आवाज हर मंच और अवसर को रोशन करती थी। उन्होंने असम के सांस्कृतिक परिदृश्य में अहम योगदान दिया और डॉ. भूपेन हजारिका की विरासत को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मुख्यमंत्री ने कहा कि समर हजारिका के जाने से असम ने एक और अनमोल और सुनहरी आवाज खो दी है। उन्होंने दिवंगत कलाकार के परिवार और प्रशंसकों के प्रति संवेदनाएं व्यक्त करते हुए ओम शांति कहा।
कौन थे समर हजारिका
समर हजारिका का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ, जिसने आधुनिक असमिया संगीत को नई पहचान दी। जहां उनके बड़े भाई भूपेन हजारिका वैश्विक स्तर पर भारतीय सिनेमा और संगीत के दिग्गज बने, वहीं समर हजारिका ने असम की सांस्कृतिक जड़ों से जुड़कर अपनी अलग पहचान कायम की। उन्होंने 1960 के दशक में अपने संगीत करियर की शुरुआत की और कई असमिया फिल्मों को अपनी आवाज दी। इसके अलावा उनके कई संगीत एल्बम भी रिलीज हुए, जिन्हें श्रोताओं का भरपूर प्यार मिला। समर हजारिका असमिया संगीत जगत के उन कलाकारों में गिने जाते हैं, जिन्होंने सादगी और भावनाओं के साथ संगीत को लोगों के दिलों तक पहुंचाया।
−40 मकानों पर मंडराया खतरा,-पांच थानों की फोर्स और पीएसी तैनात
संभल, 13 जनवरी (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के संभल में सरकारी तालाब की भूमि पर अवैध रूप से बने मकानों की पैमाइश शुरू हाे गई है। हयातनगर क्षेत्र के वाजिदपुर सराय में राजस्व प्रशासन की टीम ने यह कार्रवाई कर रही है। यह काम शाम तक पूरा हाेने की उम्मीद जताई जा रही है। कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए पांच थानों की पुलिस और पीएसी बल तैनात किया गया।
मंगलवार सुबह करीब 11 बजे नायब तहसीलदार दीपक कुमार जुरैल के नेतृत्व में राजस्व टीम वाजिदपुर सराय पहुंची। टीम में चार कानूनगो और 20 लेखपाल शामिल हैं। नक्शे के आधार पर गाटा संख्या 332 में दर्ज सरकारी 5 बीघा तालाब की भूमि को चिह्नित किया गया और फीता लगा कर एक-एक मकान की पैमाइश की जा रही है। कार्रवाई के दौरान मौके पर लोगों की भीड़ जमा हो है।
नायब तहसीलदार दीपक कुमार जुरैल ने बताया कि तीसरी बार इस सरकारी भूमि की पैमाइश की जा रही है। शिकायत के आधार पर की गई इस कार्रवाई में करीब 40 मकानों को चिह्नित किया गया है। इन मकानों का निर्माण लगभग 25 से 30 साल पुराना प्रतीत होता है। यह कार्रवाई शाम तक जारी रहने की उम्मीद है।
संभल तहसीलदार धीरेंद्र कुमार सिंह ने गांव वाजिदपुर सराय के गाटा संख्या 332 रकबा 0.332 हेक्टेयर तालाब की भूमि की पैमाइश के लिए नायब तहसीलदार दीपक कुमार जुरैल को प्रभारी नियुक्त किया है। टीम में कानूनगो पंकज गुप्ता, सुरेंद्र सिंह, अमीचंद्र, चंद्रपाल सिंह और लेखपाल आयुष कुमार, मुकेश कुमार यादव, अमित कुमार, नितिन शर्मा, मुकेश कुमार शर्मा, गुन्नू बाबू, अनुराग शर्मा, सुभाष चंद्र, सुरेंद्र सिंह, पुष्पेंद्र सिंह, पीयूष शर्मा, हरीश कुमार, रोहित कुमार, नीरज सैनी, देवेंद्र कुमार सैनी, आशू कुमार गौतम, विकास कुमार, चंपत सिंह, सचिन गुप्ता, शहराज उसमानी शामिल हैं।
कोलकाता, 13 जनवरी (हि. ,स.)। पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी के काफिले पर बीते सप्ताह हुए कथित हमले की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से जांच की मांग को लेकर दायर याचिका को कलकत्ता हाईकोर्ट ने स्वीकार कर लिया है। यह याचिका सोमवार को हाईकोर्ट की एकल पीठ में दाखिल की गई थी।न्यायमूर्ति शुभ्रा घोष की एकल पीठ ने याचिका को स्वीकार कर लिया है, हालांकि मामले की पहली सुनवाई की तारीख अभी तय नहीं की गई है।
यह मामला केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय ने भी गंभीरता से लिया है। गृह मंत्रालय ने इस संबंध में नेता प्रतिपक्ष के कार्यालय से विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी। शुभेंदु अधिकारी के कार्यालय ने 10 जनवरी की रात उनके काफिले पर हुए हमले से जुड़े पांच वीडियो पहले ही गृह मंत्रालय को भेज दिए हैं।
सूत्रों के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने स्वयं शुभेंदु अधिकारी से फोन पर बातचीत कर घटना की जानकारी ली। लगभग 15 मिनट चली बातचीत के दौरान अधिकारी ने चंद्रकोणा में हुई पूरी घटना का विस्तृत विवरण गृह मंत्री को दिया।
बताया गया है कि 10 जनवरी की देर शाम पश्चिम मेदिनीपुर जिले के चंद्रकोणा इलाके में शुभेंदु अधिकारी के काफिले पर हमला हुआ। वह पुरुलिया जिले में एक राजनीतिक कार्यक्रम में शामिल होने के बाद कोलकाता लौट रहे थे।
शुभेंदु अधिकारी का आरोप है कि चंद्रकोणा रोड मार्केट क्षेत्र के चार रास्तों के चौराहे को पार करने के बाद तृणमूल कांग्रेस के कुछ कार्यकर्ताओं ने अचानक सड़क जाम कर दी। उनके अनुसार, हमलावर तृणमूल कांग्रेस के झंडे लिए हुए थे।
नेता प्रतिपक्ष ने यह भी दावा किया कि सत्तारूढ़ दल के कार्यकर्ताओं ने उनके काफिले पर बांस के डंडों से हमला किया और उनकी बुलेटप्रूफ गाड़ी को भी निशाना बनाया। उन्होंने आरोप लगाया कि काफी देर तक हमले के बावजूद स्थानीय पुलिस मौके पर नहीं पहुंची।
किसी तरह मौके से निकलने के बाद शुभेंदु अधिकारी सीधे चंद्रकोणा पुलिस चौकी पहुंचे, जहां उन्होंने जमीन पर बैठकर विरोध जताया।
यह पहली बार नहीं है जब नेता प्रतिपक्ष के काफिले पर हमला हुआ हो। इससे पहले अगस्त 2025 में उत्तर बंगाल के कूचबिहार शहर में भी उनके काफिले पर कथित तौर पर तृणमूल कांग्रेस से जुड़े लोगों ने हमला किया था और वाहनों को रोकने की कोशिश की गई थी।
साउथ सुपरस्टार प्रभास की हॉरर-कॉमेडी फिल्म ‘द राजा साब’ सिनेमाघरों में रिलीज के बाद दर्शकों और समीक्षकों से मिली-जुली प्रतिक्रिया मिली है। इसका सीधा असर फिल्म के बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन पर देखने को मिला। जहां वीकेंड पर फिल्म ने ठीक-ठाक कमाई की, वहीं कारोबारी दिनों की शुरुआत होते ही इसकी रफ्तार बुरी तरह थम गई। उधर रणवीर सिंह की ‘धुरंधर’ भी अब बॉक्स ऑफिस पर फीकी पड़ती नजर आ रही है और रिलीज के बाद अब तक का सबसे कमजोर कारोबार दर्ज किया है।
चौथे दिन ‘द राजा साब’ की कमाई में आई बड़ी गिरावट
सैकनिल्क के आंकड़ों के मुताबिक, ‘द राजा साब’ ने चौथे दिन यानी पहले सोमवार को महज 6.6 करोड़ रुपये की कमाई की, जो अब तक का इसका सबसे कम कलेक्शन है। फिल्म ने पहले दिन 53.75 करोड़ रुपये की शानदार ओपनिंग ली थी, दूसरे दिन इसकी कमाई 26 करोड़ और तीसरे दिन 19.1 करोड़ रुपये रही। तीसरे और चौथे दिन के आंकड़ों में आई भारी गिरावट ने निर्माताओं की चिंता बढ़ा दी है। हालांकि इसके बावजूद फिल्म ने चार दिनों में कुल 114.6 करोड़ रुपये का कारोबार कर लिया है।
‘धुरंधर’ की रफ्तार भी हुई सुस्त
आदित्य धर के निर्देशन में बनी ‘धुरंधर’ की कमाई भी अब धीमी पड़ती दिख रही है। सैकनिल्क के अनुसार, फिल्म ने 39वें दिन यानी छठे सोमवार को सिर्फ 2.25 करोड़ रुपये का कारोबार किया। इसके साथ ही घरेलू बॉक्स ऑफिस पर फिल्म की कुल कमाई 807.90 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। हालांकि फिल्म का अगला लक्ष्य अब भी 1000 करोड़ क्लब में शामिल होना है। खास बात यह है कि फिल्म के निर्माताओं ने इसके सीक्वल की घोषणा पहले ही कर दी है, जो 19 मार्च को रिलीज होने वाला है।
मकर संक्रांति भारतीय संस्कृति में सिर्फ़ एक तारीख वाला त्योहार नहीं है, बल्कि यह मौसम के बदलाव, सामाजिक जीवन और लोक संस्कृति का एक रंगीन रूप है। यह वह समय है जब सूरज दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर जाता है और प्रकृति और मानव जीवन दोनों में नई ऊर्जा आती है। इस त्योहार के साथ सदियों पुरानी पतंग उड़ाने की परंपरा को भी सदियों का साथ मिला है। अपने पूरे इतिहास में, यह सिर्फ़ मनोरंजन तक ही सीमित नहीं रहा है और इसमें सामाजिक, सांस्कृतिक और स्वास्थ्य से जुड़े पहलू भी जुड़े हैं। हालांकि अब पतंग उड़ाना छत पर खड़े होकर और डोर खींचने का खेल नहीं रहा, आजकल यह सामूहिक उत्सव, मानसिक खुशी और शारीरिक व्यायाम का प्रतीक है।
भारत में पतंग उड़ाने को एक बहुत पुरानी परंपरा माना जाता है। इसका ज़िक्र इतिहास और लोककथाओं में मिलता है। यह शाही महलों में पराक्रम और चतुराई का प्रतीक हुआ करता था, लेकिन समय के साथ यह जीवन की रोज़मर्रा की ज़रूरत बन गया है। मकर संक्रांति, बसंत पंचमी और अन्य उत्सवों के दौरान आसमान में उड़ती रंग-बिरंगी पतंगें भारतीय समाज की सामान्य जागरूकता और उत्सव का संकेत हैं। यह त्योहार न केवल एक परंपरा है, बल्कि हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों में एक बड़ा सामाजिक आयोजन भी है।
पतंगबाजी खेल का सबसे खूबसूरत सामाजिक पहलू है। यह लोगों को उनके घरों से बाहर निकालता है और उन्हें दूसरों से जोड़ता है। छतों पर बातचीत, बच्चों की हंसी, युवाओं की प्रतियोगिताएं और बुज़ुर्गों की मुस्कान, ये सभी दृश्य इस त्योहार को जीवंत बनाते हैं। “वो काटा… वो मारा” की गूंज न केवल खेल की तीव्रता है, बल्कि एक साथ सुनाई देने वाली आवाज़ भी है। आधुनिक युग में जहाँ सामाजिक मेलजोल कम हो रहा है, ऐसे त्योहार एक विकल्प हैं जिनका उपयोग मानवीय संबंधों को बनाए रखने के लिए किया जा सकता है।
मकर संक्रांति के दौरान आयोजित होने वाले पतंग उत्सवों और सामूहिक कार्यक्रमों के साथ इस परंपरा ने एक नया मोड़ लिया है। ऐसे आयोजन स्थानीय सरकारों, सामाजिक संस्थानों, स्वैच्छिक संस्थानों द्वारा अलग-अलग जगहों पर एक साथ किए जाते हैं, ताकि न केवल मनोरंजन, बल्कि सांस्कृतिक संरक्षण, सामाजिक सह-अस्तित्व भी हासिल किया जा सके। इन आयोजनों में बुज़ुर्ग, महिलाएं और बच्चे समान रूप से शामिल होते हैं, जिससे यह समाज के सभी वर्गों का त्योहार बन जाता है, न कि सिर्फ़ समाज के एक हिस्से का। पतंग उड़ाना एक ऐसा खेल है जिसके कई स्वास्थ्य फायदे हैं और इसे आमतौर पर एक मौसमी खेल माना जाता है। पतंग उड़ाने से शरीर के ज़्यादातर हिस्सों की कसरत होती है, जिसमें हाथ, कंधे और आँखें शामिल होती हैं, जिससे शरीर एक्टिव रहता है। बाहर घूमने से शरीर को सूरज की रोशनी मिलती है और मानसिक थकान दूर होती है। डॉक्टरों और मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसी ग्रुप और मज़ेदार एक्टिविटीज़ तनाव कम करने में मदद कर सकती हैं।
पतंग उड़ाना मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी बहुत फायदेमंद है। खुले आसमान में रंग-बिरंगी पतंगों को उड़ते देखना मन को खुशी और सुकून देता है। यह आपको वर्तमान पल में लाता है और एक तरह से सहज ध्यान का अनुभव कराता है। आज लोग जिस तेज़ रफ़्तार और तनाव भरी ज़िंदगी जी रहे हैं, उसमें मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए ऐसे अनुभव भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं। यह न सिर्फ़ मनोरंजन है, बल्कि बच्चों के लिए शिक्षाप्रद भी है जब वे पतंग उड़ाते हैं। यह धैर्य, संतुलन, तालमेल और प्रतिस्पर्धा की भावना पैदा करता है। हवा की दिशा के बारे में जानना, डोर का सही तनाव, समय पर सही फ़ैसले लेने की क्षमता, ये सभी क्षमताएँ बच्चों में फ़ैसले लेने की क्षमता को मज़बूत कर सकती हैं। इसके अलावा, जब यह अभ्यास परिवार के माहौल में किया जाता है, तो यह बच्चों में सामाजिक मूल्यों और सांस्कृतिक जुड़ाव को बढ़ाता है।
फिर भी, पतंग उड़ाने को खुशी और रोमांच के उत्सव के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन यह सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को भी दिखाता है। समय के साथ, चीनी मांझे और नायलॉन की डोर से कई गंभीर दुर्घटनाएँ हुई हैं। यह न सिर्फ़ इंसानों के लिए जानलेवा रहा है, बल्कि पक्षी और दूसरे जानवर भी मारे गए हैं। सड़क दुर्घटनाएँ, गले कटना और पक्षियों की मौत, ये सब इस परंपरा के विकृत रूप का सबूत हैं। यह सरकार और प्रशासन द्वारा बनाए गए नियमों से किया गया है जो काफ़ी नहीं हैं। यह ज़रूरी है कि लोग इसके बारे में जागरूक हों और ज़िम्मेदारी की भावना विकसित करें। पतंगों को सूती धागे, सुरक्षित और खुली जगहों, बच्चों की देखरेख और समय पर ध्यान देने जैसी चीज़ों से सुरक्षित बनाया जा सकता है, ये सभी उपाय पतंग उड़ाने की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं। सबसे ज़रूरी बात यह है कि त्योहार की खुशी किसी के लिए दुख का कारण न बने।
पतंग उड़ाने को पर्यावरण के नज़रिए से भी दोबारा देखने की ज़रूरत है। पतंग का कचरा पेड़ों, बिजली की तारों और सड़कों पर भी पहुँच जाता है, जिससे पर्यावरण संबंधी चुनौतियाँ पैदा होती हैं। प्लास्टिक और नायलॉन की पतंगें लंबे समय तक नष्ट नहीं होतीं और वे वन्यजीवों के लिए खतरनाक होती हैं। इसलिए, इस समय इको-फ्रेंडली पतंगों और प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल ज़रूरी है। ज़्यादातर सोशल ऑर्गनाइज़ेशन और वॉलंटियर ग्रुप ये अच्छे प्रयास कर रहे हैं। वे बच्चों और युवाओं को सुरक्षित और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील पतंग उड़ाने के लिए मोटिवेट कर रहे हैं। स्कूलों और सोशल फोरम में जागरूकता फैलाई जा रही है ताकि परंपरा और प्रकृति के बीच संतुलन बना रहे। बदलते समय के साथ पतंग उड़ाना भी बदल रहा है। अब यह सिर्फ़ छतों तक सीमित नहीं रहा। डिजिटल और सोशल मीडिया ने इसे इंटरनेशनल पहचान दी है। पतंग उत्सव के वीडियो और फ़ोटो पूरी दुनिया में घूम रहे हैं। इसी तरह, विदेशों में रहने वाले भारतीय समुदाय मकर संक्रांति पर पतंग उत्सव मनाकर अपनी संस्कृति से जुड़े रहते हैं।
यह बदलाव दिखाता है कि सभी परंपराएं एक जैसी नहीं रहतीं, बल्कि समय के साथ बदलती हैं। ऐसा ही एक बदलाव पतंग उड़ाना है, जहाँ आधुनिकता, परंपरा, मनोरंजन और स्वास्थ्य एक साथ उड़ते हैं। यह त्योहार हमें समझाता है कि खुशी और ज़िम्मेदारी के बीच कोई विरोध नहीं है, बल्कि वे एक-दूसरे के पूरक हैं। आखिर में, मकर संक्रांति और इसके साथ होने वाला पतंग उड़ाना सिर्फ़ एक त्योहार नहीं है, बल्कि जीवन का उत्सव भी है। यह हमें सामूहिकता, संतुलन और खुशी का मतलब सिखाता है। जब परंपरा को सही तरीके से और ज़िम्मेदारी के साथ अपनाया जाता है, तो यह न सिर्फ़ अतीत की याद दिलाती है, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बनती है। आसमान में उड़ती पतंगें यह विचार लाती हैं कि सीमाएं सिर्फ़ ज़मीन पर होती हैं और आसमान सपनों के लिए खुला है, आपको बस इतना जानना है कि डोर कैसे पकड़नी है और संतुलन कैसे बनाए रखना है।
शाहिद कपूर की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘ओ रोमियो’ का दर्शक बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। विशाल भारद्वाज द्वारा हाल ही में जारी किया गया टीजर सोशल मीडिया पर खूब सुर्खियां बटोर रहा है। हालांकि टीजर में रणदीप हुड्डा की गैरमौजूदगी ने फैंस को हैरान कर दिया, क्योंकि पहले खबरें थीं कि फिल्म में विलेन की भूमिका रणदीप निभाने वाले हैं। अब इस पूरे मामले को लेकर एक अहम खुलासा सामने आया है।
निजी परेशानियों के चलते रणदीप ने लिया बाहर होने का फैसला
बॉलीबुड सूत्र ने बताया कि रणदीप हुड्डा ने फिल्म की तैयारी भी शुरू कर दी थी। सूत्र के अनुसार, “रणदीप के हिस्से की शूटिंग शुरू होने से ठीक पहले उनकी निजी जिंदगी में कुछ गंभीर परेशानियां आ गईं। यह दौर पिछले साल अप्रैल का था, जब उनकी फिल्म ‘जाट’ (2025) रिलीज हुई थी।” बताया गया कि इस दौरान रणदीप अपनी पत्नी लिन लैशराम की सेहत से जुड़ी समस्याओं और निजी हालातों से जूझ रहे थे, जिस वजह से उन्होंने काम से पहले परिवार को प्राथमिकता देने का फैसला किया।
रणदीप के बाहर होते ही हुई नई कास्टिंग
सूत्र के मुताबिक, रणदीप का प्रोजेक्ट से अलग होना पूरी तरह आपसी सहमति और मित्रतापूर्ण माहौल में हुआ। उनके बाहर निकलने के बाद निर्माताओं ने तुरंत विलेन के किरदार के लिए नई कास्टिंग की और अभिनेता अविनाश तिवारी को इस भूमिका के लिए साइन कर लिया। फिल्म में शाहिद कपूर के साथ विक्रांत मैसी, तृप्ति डिमरी, दिशा पाटनी, तमन्ना भाटिया, नाना पाटेकर और फरीदा जलाल जैसे दमदार कलाकार भी नजर आएंगे। ‘ओ रोमियो’ 13 फरवरी 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज होने के लिए तैयार है।
माइथोलॉजी और कॉमेडी के अनोखे मेल के साथ ‘राहु केतु’ इस वक्त जबरदस्त चर्चा में है। ट्रेलर रिलीज होते ही फिल्म ने सोशल मीडिया पर धूम मचा दी है। दमदार गानों, दिलचस्प टीज़र और एक बिल्कुल नई सिनेमाई दुनिया ने दर्शकों की उत्सुकता को कई गुना बढ़ा दिया है। देशभर के अलग-अलग शहरों में हुए कॉलेज विज़िट्स ने युवाओं के बीच फिल्म को लेकर क्रेज को और भी मजबूत कर दिया है।इससे साफ है कि ‘राहु केतु’ को लेकर दीवानगी पूरी तरह रियल है।
इस फिल्म को मिल रहा प्यार सिर्फ दर्शकों तक सीमित नहीं है, बल्कि इंडस्ट्री के दिग्गजों ने भी इसकी सराहना की है। अमिताभ बच्चन, सलमान खान और संजय दत्त जैसे बड़े सितारों ने टीम को शुभकामनाएं दी हैं। इसके अलावा अली फज़ल और ऋत्विक धनजानी ने भी फिल्म के लिए अपना सपोर्ट जाहिर किया है, जिससे ‘राहु केतु’ को लेकर बढ़ता बज़ और ज्यादा मजबूत हो गया है।
वरुण शर्मा, पुलकित सम्राट और शालिनी पांडे की फ्रेश तिकड़ी के साथ यह फिल्म ह्यूमर, अफरा-तफरी और चार्म का जबरदस्त तड़का लगाने का वादा करती है। विपुल विग के निर्देशन में बनी इस फिल्म में चंकी पांडे, अमित सियाल, मनु ऋषि चड्ढा और सुमित गुलाटी जैसे शानदार कलाकार भी नजर आएंगे, जो कहानी को और भी रंगीन और एंटरटेनिंग बनाते हैं।
लगातार बढ़ता क्रेज और इंडस्ट्री से मिल रहा सपोर्ट साफ इशारा कर रहा है कि ‘राहु केतु’ इस सीज़न की सबसे चर्चित एंटरटेनर फिल्मों में से एक बनने जा रही है। ज़ी स्टूडियोज़ की प्रस्तुति और ज़ी स्टूडियोज़ व बीलाइव प्रोडक्शंस के बैनर तले बनी यह फिल्म 16 जनवरी 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज होगी। दर्शकों को अब बड़े पर्दे पर इस पागलपन का इंतजार है।
विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग में प्रधानमंत्री मोदी का संबोधन
नई दिल्ली, 13 जनवरी (हि.स.)। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग में युवाओं को देश की रचनात्मक शक्ति का केंद्र बताते हुए कंटेंट, क्रिएटिविटी, नेक्स्ट जेनरेशन रिफॉर्म्स और भारतीय सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक मंच पर आगे बढ़ाने का आह्वान किया।
प्रधानमंत्री ने एक्स पर किए गए अलग-अलग पोस्ट में कहा कि बीते 11 वर्षों में देश के हर क्षेत्र में संभावनाओं के अनंत द्वार खुले हैं। उन्होंने कंटेंट और क्रिएटिविटी सेक्टर का उल्लेख करते हुए कहा कि युवा रामायण और महाभारत की प्रेरक कथाओं को भी गेमिंग वर्ल्ड का हिस्सा बना सकते हैं। हनुमान जी जैसे पात्र पूरी दुनिया की गेमिंग इंडस्ट्री को दिशा दे सकते हैं।
प्रधानमंत्री ने कहा कि नेक्स्ट जेनरेशन रिफॉर्म्स का जो सिलसिला शुरू किया गया था, वह अब रिफॉर्म एक्सप्रेस का रूप ले चुका है और इसके केंद्र में देश की युवा शक्ति है।
एक अन्य पोस्ट में प्रधानमंत्री ने कहा कि गुलामी की मानसिकता से बाहर निकलकर देश को अपनी विरासत और अपने विचारों को आगे बढ़ाना होगा। उन्होंने कहा कि स्वामी विवेकानंद का जीवन भी युवाओं को यही संदेश देता है।
भारत में प्रत्येक पर्व और त्योहार का अपना सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्त्व होता है। ऐसा ही एक पर्व मकर संक्रांति है जो लोक मंगल को समर्पित है। हिन्दू तीज-त्योहारों में मकर संक्रांति का विशेष महत्व है। मकर संक्रांति का त्योहार धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। लोकमंगल के त्योहार देश की सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक बुनियाद को मजबूत बनाने और समाज को जोड़ने का काम करते हैं। यह त्योहार न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसका वैज्ञानिक महत्व भी है। मकर संक्रांति सूर्य, पृथ्वी और ऋतुओं के बीच के संबंध को दर्शाने वाला पर्व है। इस वर्ष मकर संक्रांति 14 जनवरी 2026 को मनाई जाएगी। पंचांग के अनुसार, मकर संक्रांति पर पुण्य काल मुहूर्त 14 जनवरी 2026 की दोपहर 3 बजकर 13 मिनट से शाम 5 बजकर 45 मिनट तक रहेगा। ये मुहूर्त स्नान, दान और धार्मिक कार्यों के लिए बेहद शुभ माना गया है। वहीं मकर संक्रांति पर महा पुण्य काल मुहूर्त दोपहर 3 बजकर 13 मिनट से शाम 4 बजकर 58 मिनट तक रहेगा। मकर संक्रान्ति पर्व पूरे भारत और नेपाल में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। मकर संक्रांति भारत में मनाए जाने वाले प्रमुख त्यौहारों में से एक है, जिसे विभिन्न राज्यों में अलग-अलग नाम से जाना जाता है। उत्तर भारत में इसे संक्रांति, गुजरात और महाराष्ट्र में उत्तरायण, तमिलनाडु में पोंगल और असम में माघ बिहू कहा जाता है। हिन्दी भाषी क्षेत्रों में इस त्यौहार को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। यह त्यौहार सूर्य देव के मकर राशि में प्रवेश करने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है।
धार्मिक विश्वास के अनुसार मकर संक्रांति पर किये गये दान के कार्य अन्य दिनों के अपेक्षा सौ गुना अधिक पुण्य प्राप्त होता। इस दिन गरीबों और जरूरतमंदों को दान देना बेहद पुण्यकारी माना जाता है। यह त्योहार देश में पतंजबाजी के लिए भी काफी प्रसिद्ध है। इस अवसर पर महिला और पुरुष सबेरे से शाम होने तक अपनी अपनी छतों पर वो काटा की करतल ध्वनि के साथ पतंगबाजी का आनंद उठाते है। इस दिन तिल का हर जगह किसी ना किसी रूप में प्रयोग होता ही है। पौराणिक मान्यता के अनुसार ऐसा माना जाता है कि अगर मकर संक्राति के दिन तिल का दान या सेवन किया जाए तो इससे शनि देव प्रसन्न होते हैं। जिससे ऐसे व्यक्ति जिस पर शनि देव का कुप्रभाव है वह भी कम हो जाता है। इसलिए इस दिन काले तिल को दान करने की मान्यता है। तिल स्वास्थ्य के लिए भी बेहद फायदेमंद है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति के दिन का ही चयन किया था। मकर संक्रांति के दिन गंगा जी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर सागर में जा मिलीं। इसीलिए आज के दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व है। मकर संक्रान्ति के अवसर पर गंगास्नान एवं गंगातट पर दान को अत्यन्त शुभ माना गया है। इस पर्व पर तीर्थराज प्रयाग एवं गंगासागर में स्नान को महास्नान की संज्ञा दी गयी है। मकर संक्रांति को मौसम में बदलाव का सूचक भी माना जाता है।
भारत में मकर संक्रान्ति विभिन्न रूपों में मनाया जाता है। बंगाल में इस पर्व पर गंगासागर पर बहुत बड़े मेले का आयोजन होता है। यहां इस पर्व के दिन स्नान करने के बाद तिल दान करने की प्रथा है। कहा जाता है कि इसी दिन यशोदा जी ने श्रीकृष्ण की प्राप्ति के लिए व्रत रखा था। इसी दिन गंगा भगीरथ के पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होते हुए गंगा सागर में जा मिली थीं। यही वजह है कि हर साल मकर संक्रांति के दिन गंगा सागर में भारी भीड़ होती है। इस साल महाकुंभ मेले में दूसरा शाही स्नान भी मकर संक्रांति 2025 के पावन पर्व पर आयोजित हो रहा है। यह महाकुंभ प्रयागराज में हो रहा है। मकर संक्रांति 2025 विशेष रूप से स्नान और दान का पर्व है। इस दिन गंगास्नान करना बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।
बिहार में भी मकर संक्रांति को खिचड़ी के ही नाम से जानते हैं। यहां भी उड़द की दाल, चावल, तिल, खटाई और ऊनी वस्त्र दान करने की परंपरा है। इसके अलावा असम में इसे ‘माघ- बिहू और ‘ भोगाली-बिहू के नाम से जानते हैं। तमिलनाडू में इस पर्व को चार दिनों तक मनाते हैं। यहा पहला दिन भोगी पोंगल दूसरा दिन सूर्य पोंगल, तीसरा दिन मट्टू पोंगल और चौथा दिन कन्या पोंगल के रूप में मनाते हैं। पूजा और अर्चना की जाती है। राजस्थान में इस दिन बहुएं अपनी सास को मिठाईयां और फल देकर उनसे आर्शीवाद लेती हैं। इसके अलावा वहां किसी भी सौभाग्य की वस्तू को 14 की संख्या में दान करने का अलग ही महत्व बताया गया है। महाराष्ट्र में इस दिन गूल नामक हलवे को बांटने की प्रथा है। तो इस तरह पूरे भारत में इस पर्व को अलग-अलग तरह की परंपराओं के साथ मनाया जाता है।
श्रद्धालुओं को मिलेगा आध्यात्मिक पर्यटन का नया अनुभव
-मुख्यमंत्री योगी की परिकल्पना के अनुसार तैयार की गई हैं टैंट सिटी – जयवीर सिंह
लखनऊ, 13 जनवरी (हि.स.)। मकर संक्रांति सहित अन्य प्रमुख स्नान पर्व पर आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए संगम तट पर आधुनिक सुविधाओं से युक्त टेंट सिटी बसाई गई है। संगम की पुण्य धारा में डुबकी लगाने देश-दुनिया से श्रद्धालुओं का निरंतर आगमन हो रहा है। इसी क्रम में आगंतुकों को सुरक्षित और यादगार अनुभव प्रदान करने के उद्देश्य से उत्तर प्रदेश राज्य पर्यटन विकास निगम (यूपीएसटीडीसी) ने संगम तट की रेत पर आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित टैंट कॉलोनी बसाई है, जो कल्पवासियों और पर्यटकों के लिए आस्था के साथ-साथ आकर्षण का नया केंद्र बनकर उभरी है।
उत्तर प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने मंगलवार काे बताया कि प्रयागराज के अरैल सेक्टर-7 में त्रिवेणी पुष्प से पहले विकसित टैंट कॉलोनी में कुल 50 अत्याधुनिक कॉटेज बनाए गए हैं। इनकी ऑनलाइन बुकिंग यूपीएसटीडीसी की वेबसाइट के माध्यम से की जा सकती है। टैंट कॉलोनी को तीन श्रेणियों में बांटा गया है। इसमें 15 हजार रुपये किराए वाला प्रीमियम, 11 हजार 500 रुपये का लग्जरी और 7 हजार 500 रुपये का डीलक्स कॉटेज शामिल है। यहां कुल 12 प्रीमियम, 8 लग्जरी और 30 डीलक्स टैंट बने हैं। इनमें ठहरने वाले श्रद्धालुओं के लिए टैंट शुल्क में सात्विक भोजन की समुचित व्यवस्था की गई है। टैंट कॉलोनी परिसर में यज्ञशालाएं बनाई गई हैं। यहां लगातार भजन-कीर्तन हो रहा है। सांस्कृतिक रंग देने के लिए कलाग्राम भी विकसित किया गया है, जहां स्थानीय शिल्प और लोककला को बढ़ावा दिया जा रहा है।
पर्यटन मंत्री ने बताया कि माघ मेले में रोजगार और नवाचार को विशेष बढ़ावा मिला है। यहां संगम टेंट कॉलोनी में एक जिला एक उत्पाद (ओडीओपी) प्रदर्शनी के जरिए प्रयागराज की पारंपरिक मूंज कला के भी स्टॉल लगे हैं। यहां के कारीगरों को रोजगार के अवसर मिल रहे हैं। माघ मेला 2026 न केवल आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत कर रहा है, बल्कि उद्यमियों और हस्तशिल्पियों के लिए व्यापार का बड़ा मंच भी बन गया है, जहां देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु मूंज से बने डलिया, पेन स्टैंड, रोटी रखने के बर्तन, गमले और सजावटी सामान जैसे उत्पाद पसंद कर रहे हैं। नैनी क्षेत्र के महेवा इलाके की यह पारंपरिक कला, जिसे चांद जैसी कारीगर वर्षों से आगे बढ़ा रही हैं, अब आधुनिक रूप में सामने आकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना पा रही है।
पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने बताया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विजन के अनुरूप माघ मेला केवल आस्था का आयोजन नहीं, बल्कि पर्यटन, रोजगार और स्थानीय कला को बढ़ावा देने का एक सशक्त माध्यम बन रहा है। यूपीएसटीडीसी द्वारा विकसित संगम टेंट कॉलोनी इसका बेहतरीन उदाहरण है, जहां श्रद्धालुओं को आधुनिक सुविधाओं के साथ भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक वातावरण का अनुभव मिल रहा है। उन्होंने कहा कि एक जिला एक उत्पाद के तहत मूंज कला जैसे पारंपरिक शिल्प को मंच देकर स्थानीय कारीगरों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए गए हैं। योगी जी की सोच है कि प्रदेश का हर आयोजन रोजगार, नवाचार और संस्कृति से जुड़े, और माघ मेला 2026 इसी सोच को जमीन पर उतारता हुआ दिखाई दे रहा है।